काल भैरव के पास अब किस मुंह से जायेंगे मोहन!

बादल सरोज 

शिगूफेबाजी, झांसेबाजी और पाखण्ड की कोई अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता हो तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी बिना किसी मुश्किल के विश्व विजेता बनकर निकलेगी। दिनदहाड़े, खुलेआम, बिना पलक झपकाए झूठ बोलने में इसे जो सिद्धि मिली हुई है, वह कमाल का है। मध्यप्रदेश की भाजपा तो इस मामले में और भी निराली है। पूर्व मुख्यमन्त्री रहते मंदसौर के किसानों को गोलियों से भूनने की योग्यता के चलते मोदी मंत्रिमंडल में कृषि और किसान कल्याण मंत्री बने शिवराज सिंह इस विधा के बड़े वाले उस्तादों में से एक थे। उनके बाद दिल्ली से आई पर्ची से निकले मुख्यमंत्री मोहन यादव अब इस मामले में उनसे भी आगे निकलने की जी-तोड़ कोशिश में जुटे हुए हैं।

असल में जब बताने लायक कुछ किया-धरा नहीं हो, दिखाने के लिए दूर-दूर तक कोई उपलब्धि नहीं हो तो इसी तरह के शोशे और जुमले उछालकर ही सत्ता को काम चलाना पड़ता है। मध्यप्रदेश के 17 शहरों में शराब बिक्री पर रोक को शराबबंदी के शुभारंभ जैसा बताने का उनका ऐलान कुछ इसी तरह का है। ये वो 17 शहर शहर हैं, जिन्हें भाजपा सरकार ने धार्मिक शहर का तमगा पकड़ाया हुआ है; मतलब यह कि बतोलेबाजी में वे अपने ईश्वरों को भी झांसा देने से बाज नहीं आ रहे।

महेश्वर में हुई कैबिनेट की बैठक के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव के बयान के अलावा कोई और आदेश अभी तक जारी नहीं हुआ है। तो ऐसे में शराबबंदी की घोषणा के मायने क्या हैं यह तो वे ही जाने; मगर उनके कहे को ही पढ़ें तो अब इन 17 शहरों में भी शराब पीने पर रोक नहीं होगी। बस बिक्री वाली दुकानें इन शहरों में नहीं होंगी। बिना किसी रोकथाम के इन नगरों की सीमा से ज़रा-सा बाहर जाकर दारू लाई भी जा सकती हैं, पी भी जा सकती है और पिलाई भी जा सकती है। दिखावे की हास्यास्पदता सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, इससे आगे भी है।

जैसे इस घोषणा के बाद 3600 शराब दुकानों में से सिर्फ 47 शराब की दुकाने बंद होंगी। लेकिन इसी सांस में 211 नई दुकानें खोले जाने का भी फैसला हुआ है। इन दुकानों को पेसा क़ानून के तहत लाइसेंस दिया जाना बताया गया है। मतलब इन्हें आदिवासी बहुल ग्रामीण इलाकों में खोला जाएगा। इसके दूसरे भी असर होंगे, उन्हें फिलहाल छोड़ भी दें तो नतीजा यह होगा कि बिक्री पर रोक, जिसे एक और पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने सम्पूर्ण नशाबन्दी की ओर बड़ा कदम बताया है, के बाद प्रदेश में शराब दुकानों की संख्या 164 और बढ़ जाने वाली है। इसके अलावा बिना पानी मिलाये पी जाने वाली रेडी टू ड्रिंक की नई किस्म की शराब भी बेचने की घोषणा हुई है, जिसे आने वाले दिनों में परचून की दुकानों में भी बेची जाने लगे, तो आश्चर्य नहीं होगा।

इस तथ्य से किसी को इनकार नहीं कि शराब पीना अच्छी बात नहीं है, पियक्कड़ होना तो और भी खराब बात है। मदिरापान सिर्फ शारीरिक सेहत को ही नुकसान नहीं पहुंचाता है, पारिवारिक और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए भी यह बेहद हानिकारक है। मगर इसका समाधान कानूनी शराबबंदी में नहीं ढूंढा जा सकता है। इस तरह की नशाबंदी समस्या कम करने की बजाय उसे और बढ़ाती है। अवैध शराब, नकली और मिलावटी शराब के धंधे फलने-फूलने लगते हैं, लोगों का जीवन भी खतरे में पड़ता है, वे लुटते भी हैं और अपराध अलग से बढ़ते हैं। यही वजह है कि इससे निपटने के सभ्य समाज में दो तरीके होते हैं : पहला, नागरिकों की चेतना और समझ को विकसित करते हुए उन्हें संयम सिखाना और दूसरा, मदिरा की कीमत बढ़ाना। भाजपा की सत्ता ने ठीक इससे उलटा वाला रास्ता चुना है।

मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार देश की ऐसी अनोखी सरकार है, जो मदिरापान के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करती है। शिवराज सिंह के कार्यकाल में ऐसे अनेक कदम उठाए गए। देसी और अंग्रेजी शराब की दुकानों को मिलाकर कम्पोजिट बनाने के एक ही आदेश से मदिरा दुकानों की संख्या दोगुनी कर दी गयी। शॉप्स एंड एस्टैब्लिशमेंट एक्ट के अनुसार सभी दुकानें रात 10 बजे बंद हो जानी चाहिए, मगर शराब दुकानों के लिए यह समय रात 11.30 बजे तक का कर दिया गया। बार, क्लब और होटल्स के रेस्टारेन्ट्स में रात 2 बजे तक शराब परोसे और पिलाए जाने की छूट दे दी गयी। बाकी महंगाई भले बेलगाम रही, मगर शराब की कीमतों में 20 प्रतिशत की कमी कर दी गयी और आयकर चुकाने वाले लोगों को अपने घर में ‘महंगी’ शराब की 100 बोतल तक रखने की कानूनी मोहलत दे दी गई।

इसके अलावा एक और कहर देश की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी वाले इस प्रदेश के आदिवासियों पर बरपा। आबकारी क़ानून आदिवासियों के लिए यह प्रावधान करता है कि वे अनुसूचित जाति के लिए अधिसूचित इलाकों में अपनी वनोपज महुआ से शराब बना सकते हैं। यह क़ानून महुआ की घर में उतरी शराब को 4-5 लीटर प्रति व्यक्ति, 45 लीटर प्रति परिवार तक रखने की अनुमति देता है। विशेष पर्वों, त्यौहारों पर 45 लीटर की अनुमति अलग है। शराब कंपनियों और उनके लाईसेंसी ठेकेदारों की कमाई बढ़ाने के लिए यह प्रावधान व्यवहार में उलटे जा चुके हैं। कथित शराब जब्ती के मुकदमों में होने वाली गिरफ्तारियों में औसतन तीन-चौथाई प्रकरण आदिवासियों और दलितों के खिलाफ होते हैं। एक तिहाई से अधिक जब्ती महुआ से बनी शराब की होती है। अब 47 शराब दुकानों को बंद कर जो 211 नई दुकानें पेसा कानून के तहत खोली जा रही हैं, वे देर-सबेर आदिवासियों को लूटने का जरिया ही बनने वाली हैं।

‘कॉरपोरेट रियायती, भ्रष्टाचार हिमायती’ नीतियों के चलते, बाकी सब जगह आमदनी घटने और लगातार कर्ज में डूबते जाने के चलते दिवालिया हुई सरकार के पास आबकारी की कमाई के सिवा कमाई का कोई और आसान जरिया नहीं बचा है, इसलिए शराब पीने-पिलाने को आकर्षक बनाया जा रहा है। ठेका लेने वालों के लिए दुकानों की चमचमाती सज्जा अनिवार्य कर दी गयी। यही नीतियां मोहन यादव के कार्यकाल में भी जारी है। पिछले 6 वर्षों में शराब से होने वाली आमदनी एक कोरोना लॉकडाउन के वित्तीय वर्ष को छोड़कर लगातार बढ़ी। 2018-19 के साढ़े नौ हजार करोड़ से बढ़कर 2024-25 में साढ़े तेरह हजार करोड़ तक पहुंच गयी। पिछले 8 वर्षों में मध्यप्रदेश में शराब की खपत 10 करोड़ लीटर से दो गुनी होकर लगभग 20 करोड़ लीटर तक पहुंच गयी। बार की संख्या बढ़कर 437 हो गई है।

इसका नतीजा यह निकला कि मध्यप्रदेश, जिसे संक्षेप में मप्र कहा जाता है, भाजपा राज में इस मप्र ने एक साथ दो नए ज्यादा सटीक पर्यायवाची हासिल किये हैं; पहला मृत्यु-प्रदेश और अब मद्य-प्रदेश। इस मद्य-प्रदेश के मुख्यमंत्री ‘करें गली में क़त्ल बैठ चौराहे पर रोयें’ की भंगिमा बनाए 17 शहरों की 47 दुकानें बंद करवाने के नाम पर जो करना चाहते हैं, उसका मदिरापान करने न करने से कोई संबंध नहीं है। यह धर्म की आड़ में अपने सारे पाप छिपाने की, खुद को ज्यादा बड़ा और पक्का हिन्दुत्ववादी बताने की ऐसी चतुराई है, जिसे इस कुनबे के नेता आजमाते रहते हैं।

चलते-चलते सनातनी पाठकों के लिए सबसे खास बात यह भी कि जिन धार्मिक नगरियों में शराब की दुकाने बंद करने की घोषणा की गई है उसमें उज्जैन भी शामिल है। ये वही उज्जैन है जहां से मुख्यमंत्री मोहन यादव जीत कर आते हैं। महाकाल की नगरी के तौर पर प्रसिद्ध इस उज्जैन को भी मदिरा की दुकान से विहीन कर दिया गया है। इतना ही नहीं शिव के दूसरे रूप कालभैरव का भी यह स्थान है, जो काल के स्वामी होने के साथ अपने क्रोध और उग्रता के लिए भी जाने जाते हैं और काल भैरव सिर्फ मदिरा का ही भोग ग्रहण करते हैं! तो ऐसे में अब काल भैरव का क्या होगा? काल भैरव के पास अब किस मुंह से जायेंगे महाकाल की नगरी में शराब की दुकानें बंद करने वाले मुख्यमंत्री मोहन यादव?
(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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