कृष्ण किशोर पांडेय
फ्रीडम एट मिड नाइट आज अपना 70वां जन्मदिन मना रहा है। यह एक ऐसा मौका है जबकि उन वर्षों में देश ने क्या पाया और क्या खोया उसपर विचार किया जाए। 70 साल की उपलब्धियों या असफलताओं का विश्लेषण भविष्य के लिए अपनी योजनाएं निर्धारित करने में बहुत कारगर सिद्ध होंगे। किसी भी देश के लिए कुछ सवाल इतने अहम होते हैं कि उनके बारे में लिए गए निर्णय भविष्य को निश्चित रूप से प्रभावित करते हैं। आर्थिक नीति, विदेश नीति, सामाजिक नीति और शिक्षा नीति ये सभी इतने महत्वपूर्ण विषय हैं कि इनके बारे में आगे की योजनाएं बनाना एक महत्वपूर्ण कार्य होता है और इसीलिए अतीत की घटनाओं का विश्लेषण इसमें कारगर सिद्ध होता है।
भारत की आजादी रात के 12 बजे मिली और इसीलिए फ्रीडम एट मिड नाइट का अपना महत्व है। देशभर में आजादी मिलने की खबर का जश्न मनाया गया। ऐसा उत्साह था जैसे यह देश आजादी पाने के बदले जो कीमत चुकानी पड़ी है उसको भी याद कर रहा है। आजादी मिलने के बाद से देश ने अपनी विकास यात्रा शुरू की। आजादी मिलते ही अपना संविधान बनाने की प्रक्रिया आरंभ हुई और 1950 का दशक शुरू होते ही देश का पहला संविधान बनकर तैयार हो गया जिसे लोगों ने स्वीकृत और अंगीकृत किया।
भारत का संविधान भारत की सबसे पहली बड़ी उपलब्धि के रूप में माना जाएगा। इस संविधान की अनेक विशेषताओं में से सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संशोधन तो हो सकते हैं लेकिन मूल भावना को बदला नहीं जा सकता। इस संविधान में ही इसकी सुरक्षा का उपाय भी निहित है। सुप्रीम कोर्ट संविधान की व्याख्या भी करेगा और वह इसकी रक्षा भी करेगा। आज देश में लोकतंत्र की जड़ें जितनी मजबूत दिख रही हैं उसमें संविधान का भी बहुत बड़ा योगदान है।
संविधान लागू होने के बाद से भारत की विकास यात्रा भी प्रारंभ हो गई। आजादी के समय जिस देश के पास विकास का कोई इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था उसने 50 और 60 के दशक में अपना इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर लिया। इन दो दशकों में ही तीन बार विदेशी हमलों का सामना भी करना पड़ा। अनेक मुसीबतें आईं लेकिन देश की जनता अपनी सरकार के पीछे हर समय एक चट्टान की भांति खड़ी रही। इन दो दशकों में देश की जनता ने यह साबित कर दिया कि अनेकता में एकता का जो आदर्श गांधी जी तथा अन्य नेताओं ने देखा था उसे जनता भी ठीक-ठीक समझती है और अपना भी रही है।
साठ के दशक के अंत में देश में आर्थिक नीतियों को लेकर एक आंतरिक टकराव भी सामने आया। एक तरफ जहां इंदिरा गांधी के नेतृत्व में प्रगतिशील नेताओं और दलों का समूह था जो भारत में सार्वजनिक क्षेत्रों को मजबूत करने, गरीबों और कमजोर वर्गों को ऊपर उठाने और बड़ी संख्या में रोजगार देने पर जोर दे रहा था, वहीं दूसरा पक्ष अर्थव्यवस्था की नीति को इस ढंग से आगे बढ़ाना चाहता था जिसमें निजी क्षेत्र को अधिक प्रोत्साहन मिले और पूंजी उत्पादन पर ज्यादा जोर दिया जाए।
सत्तर का दशक भारत के लिए हर तरह से सफलता का एक स्वर्णकाल माना जाता है। बैंकों का राष्ट्रीयकरण, आम बीमा का राष्ट्रीयकरण, सार्वजनिक क्षेत्र में अनेक कंपनियों और निगमों की स्थापना, हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की दिशा में बड़ी सफलता और रोजगार देने के क्षेत्र में भी अच्छी सफलता मिलना इस दशक की उपलब्धि है।
इसी दशक में बांग्लादेश को आजाद कराकर भारत ने दुनिया में अपनी प्रतिष्ठा कायम की। निर्गुट देशों को एक साथ इकट्ठा करने और आपस में व्यापार बढ़ाने के क्षेत्र में भी सफलता मिली। लेकिन इसी दशक में भारत को पहली बार आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी जो लोकतंत्र के लिए एक पहला झटका था। अच्छी बात यह है कि फिर सबकुछ लोकतंत्र की राह पर आ गया और फिर व्यवस्था सामान्य हो गई।
अस्सी के दशक में देश आगे बढ़ता रहा इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन भारत विरोधी ताकतें खालिस्तान की बात उठाकर भारत को कमजोर करने में भी लगी रही। उनका सामना भी इसी दशक में हुआ। और इसी दशक में इंदिरा गांधी जैसी सफल प्रधानमंत्री की हत्या ने यह संकेत भी दे दिया कि देशविरोधी ताकतें चुप नहीं बैठी हैं और देश को आगे बढ़ने देना नहीं चाहती हैं। 1984 के अंत में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने जो एक राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे लेकिन विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रति उनकी गहरी दिलचस्पी ने देश को काफी मदद पहुंचाई।
यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि सत्तर के दशक में भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण कर लिया था और विज्ञान तथा अंतरिक्ष विज्ञान और सुरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने संबंधी प्रक्रियाओं को भी गति प्रदान की थी। राजीव गांधी के प्रयास से विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक नई प्रगति हुई। लेकिन फिर देशविरोधी ताकतों ने फिर अपना रंग दिखाया और राजीव गांधी की हत्या हो गई। इस बीच में राजीतिक उतार चढ़ाव होते रहे।
1990 के दशक की शुरुआत सामाजिक और आर्थिक दोनों क्षेत्रों में एक नए संदेश के साथ हुई। एक तरफ जहां पिछड़े वर्गों के विकास के लिए उन्हें शिक्षा और रोजगार में आरक्षण देने की परंपरा शुरू हुई तो दूसरी तरफ आर्थिक सुधार की दिशा में एक नई प्रगति हुई।
यह प्रगति आगे दूर तक जा सकती थी लेकिन 1992 के बाबरी मस्जिद कांड ने सामाजिक क्षेत्र में एक नई उथल-पुतल मचा दी। उस समस्या से देश आजतक निजात नहीं पा सका। जिस देश में सर्वधर्मसम्भाव के आदर्श को आगे बढ़ाया जा रहा था उस देश में विभिन्न धर्मों और जातियों के बीच खाई पैदा करने की कोशिशें शुरू हो गईं। जाहिर है कि आर्थिक और सामाजिक प्रगति पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा जो आजतक जारी है।
21वीं सदी की शुरूआत अच्छी रही और शुरू के दो दशकों में आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई। पहली बार किसानों के कर्ज माफ हुए और मनरेगा जैसी योजना ने कमजोर वर्गों में एक नई आशा का संचार किया। 2014 से भारत में एक नए परिवर्तन का दौर शुरू हुआ। यह दौर 2013 तक की विकास यात्रा के मार्ग से हटकर एक दूसरे मार्ग पर चल पड़ा। आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और यहां तक कि विदेश नीति के स्तर पर भी परिवर्तन का दौर साफ दिखने लगा।
2014 में भाजपा के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी थी और बाद में कई राज्यों में उसी पार्टी की सरकारें बनी। भाजपा की सरकार उसके पहले भी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी थी लेकिन किसी भी स्तर पर चाहे वह आर्थिक नीति हो, सामाजिक नीति हो, धार्मिक नीति हो या विदेश नीति हो लीक से हटकर चलने पर जोर नहीं देती थी।
2014 के बाद सभी क्षेत्रों में लीक से हटकर चलने की एक नई प्रणाली चल पड़ी जो अभी जारी है। विश्लेषण करने वाले यह कहते हैं कि यह सरकार पुरानी लीक से इसलिए हट रही है क्योंकि वह भाजपा के एजेंडे को लागू करना चाहती है। लीक से हटकर नई लीक पर चलने के इसी प्रयास ने आज देश के सामने अनेक समस्याएं खड़ी कर दी हैं। कई ऐसे निर्णय हुए जिनके बारे में देश की जनता यह निर्णय नहीं कर पा रही है कि इन कदमों से देश का कोई भला हुआ या नहीं हुआ।
आज हर क्षेत्र में दुविधापूर्ण स्थिति बनी हुई है। राजनीति के क्षेत्र में जिस तरह का टकराव बढ़ रहा है वह लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए शुभ नहीं माना जाएगा। एक पक्ष दावा कर रहा है कि वह भ्रष्टाचार को मिटाने में लगा है जबकि दूसरे पक्ष का दावा है कि भ्रष्टाचार अपनी गति से आगे बढ़ रहा है और सिर्फ कुछ लोगों के खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई हो रही है। सीमाओं पर लगातार खतरे बढ़ रहे हैं। सामाजिक क्षेत्र में किसान, मजदूर, छोटे कारोबार करने वाले तथा कहीं कहीं तो सरकारी कर्मचारियों में भी असंतोष की स्थिति है। कुल मिलाकर यह कहना सही होगा हम इन समस्याओं का भी समाधान ढूंढने मे सफल होंगे।
सच्चाई यह है कि भारत एक ऐसा देश है जहां अनेकता में एकता के आदर्श को भुलाया नहीं जा सकता। इस एकता को तोड़ने की किसी भी कोशिश को जनता सफल नहीं होने देगी। बहरहाल, आशा करनी चाहिए कि विभिन्न क्षेत्रों में जो ऊहापोह की स्थिति पैदा हो गई है वह लंबे समय तक नहीं चलेगी और फ्रीडम एट मिड नाइट अपना जन्मदिन शानदार ढंग से मनाता रहेगा। देश की जनता अपने आदर्शों को समझती है और उसे गुमराह करने की कोई भी कोशिश सफल नहीं हो पाएगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और राजनीतिक चिंतक हैं। इस आलेख में उनके विचार निजी हैं।)




