मुर्शिदाबाद से कश्मीर तक : जिम्मेदार कौन?

शमिक लाहिड़ी

मुर्शिदाबाद में हाल ही में 8 अप्रैल 2025 को दंगे शुरू हुए थे। उस दिन उमरपुर में राष्ट्रीय राजमार्ग-12 को अवरुद्ध कर दिया गया था। 11 अप्रैल को बड़ी संख्या में लोगों ने राष्ट्रीय राजमार्ग-12 के विभिन्न हिस्सों को अवरुद्ध कर दिया और सरकारी एवं निजी संपत्ति तथा वाहनों में तोड़फोड़ की। तभी अचानक, प्रदर्शन स्थल से दूर एक गांव पर हमला हुआ। 70 वर्षीय सीपीआई (एम) समर्थक हरगोविंद दास और उनके बेटे चंदन दास की हमलावरों ने बेरहमी से हत्या कर दी। कई लोगों के घरों में तोड़फोड़ और लूटपाट की गई। कई लोग डर के मारे गांव छोड़कर भाग गए।

यह विरोध प्रदर्शन वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के विरोध में था। क्या केवल मुसलमान ही इस कानून का विरोध कर रहे थे? ऐसा नहीं है। इस कानून ने देश के संविधान में दिए गए अधिकारों को छीन लिया है। यह कानून संविधान के धर्मनिरपेक्ष आदर्शों के पूरी तरह विपरीत है। पूरे देश में इसका विरोध हो रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस विधेयक का विरोध करने वाले 234 सांसदों में से 208 हिंदू सांसद थे।

आखिर इस मुद्दे पर दंगा क्यों?

बड़ा सवाल यह उठता है कि इस मुद्दे पर दंगा क्यों? क्या जिन वाहनों को आग लगाई गई, उनके चालकों या मालिकों ने यह कानून बनाया था? हिंदू समुदाय बहुल गांव पर हमला क्यों किया गया? क्या उन्होंने इस कानून को लागू किया है? क्या हरगोविंद दास और उनके बेटे चंदन दास ने इस कानून के समर्थन में दंगे भड़काये थे? इनमें से कुछ भी नहीं हुआ, तो फिर दंगे क्यों? अचानक, किसने या किस बात ने, मुख्य विरोध स्थल से बहुत दूर, दूसरे गांव से कुछ युवकों को इकट्ठा कर, मात्र 60-70 घरों वाले हिंदू गांव जाफराबाद में संपत्ति लूटने और नष्ट करने के लिए इकट्ठा किया? क्या यह अचानक एकत्र हुए सैकड़ों नाराज मुस्लिम लड़कों का काम है? यह सब करना इतना आसान नहीं है! इन सब चीजों के पीछे मास्टरमाइंड कौन है? इस प्रश्न का उत्तर अवश्य दिया जाना चाहिए, अन्यथा ऐसी घटनाएं बार-बार होती रहेंगी।

क्या राज्य प्रशासन को पहले से कुछ पता नहीं था? तो फिर पुलिस का खुफिया विभाग क्या कर रहा था? देश और राज्य के विभिन्न हिस्सों में कई दिनों से विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं। इसके अलावा, पिछले कुछ हफ्तों से रामनवमी और हनुमान जयंती को लेकर विभिन्न सांप्रदायिक भड़काऊ नारे लगाए जा रहे थे। तो फिर यह सब जानते हुए भी खुफिया विभाग को नाक में तेल डालकर सोने का आदेश किसने दिया? उस शाम लूटपाट बिना रुके तीन या चार घंटे तक चलती रही। पुलिस क्या कर रही थी? क्या वे इसे नियंत्रित नहीं कर सकते थे, या फिर उन्होंने किसी के आदेश पर बदमाशों को 3-4 घंटे तक अंधाधुंध लूटपाट करने की इजाजत दी थी? जिला पुलिस अधीक्षक क्या कर रहे थे? यदि उनकी पुलिस स्थिति को नियंत्रण में लाने में विफल रही, तो उन्होंने सेना या अर्धसैनिक बलों को ऊपर भेजने का अनुरोध क्यों नहीं किया? राज्य पुलिस के ‘अंशकालिक’ महानिदेशक कहां थे? राज्य सरकार ने अर्धसैनिक बलों की तैनाती के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश तक इंतजार क्यों किया? यह सवाल जरूर उठेगा कि राज्य सरकार को ऐसा करने से कौन रोक रहा था?

भारत में धर्मनिरपेक्षता

क्या यह सब इसलिए होने दिया गया, ताकि आरएसएस का पुराना नारा ‘हिंदू खतरे में है’ को सभी हिंदुओं के लिए विश्वसनीय बनाया जा सके! क्या कुछ फटेहाल मुस्लिम लड़कों को एक हिंदू बहुल गांव में 3-4 घंटे तक लूटपाट, हत्या और घायल करने की अनुमति देने का कारण सिर्फ यह है कि मुसलमानों को हिंदुओं का दुश्मन बताया जाए? पिछले 14 वर्षों में पश्चिम बंगाल में हुए 50 से अधिक सांप्रदायिक दंगों के पीछे के वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक आयोग क्यों नहीं बनाया जा रहा है? ममता बनर्जी किसके आदेश पर इन सभी दंगों की घटनाओं पर पर्दा डालने की पहल कर रही हैं? बंगाल की अग्नि-पुत्री शेरनी किससे इतना डरती है?

बोल रहा है अतीत!

दो घटनाएं याद आती हैं। 7 मई 2012 को तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से राइटर्स बिल्डिंग में एक घंटे से अधिक समय तक मुलाकात की। क्या चर्चा हुई, किसी को पता नहीं है। हिलेरी ने भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री के साथ एक घंटे से अधिक समय क्यों बिताया, जबकि विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों को उनसे मिलने के लिए लंबी लाइनों में इंतजार करना पड़ता है? क्या वे कम्युनिस्ट सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए सिर्फ आभार व्यक्त करने आई थीं? या फिर उन्होंने देश के भविष्य पर सिर्फ मार्गदर्शन देने के लिए 13,000 किलोमीटर की यात्रा की थी? वह कौन सी बात थी, जो दोनों ने गुप्त रखी है?

दूसरी घटना यह थी कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत 6-17 फरवरी तक पश्चिम बंगाल में विभिन्न स्थानों के 11 दिवसीय दौरे पर आए थे। यह किसी भी आरएसएस प्रमुख की पश्चिम बंगाल राज्य की सबसे लंबी यात्रा थी। इसके तुरंत बाद, दिलीप घोष ने तलवार भांजनी शुरू कर दी और सुवेंदु अधिकारी गदा लेकर उतर आए। यह बताना कठिन है कि रामनवमी एक धार्मिक आयोजन है या युद्ध का मैदान, विशेषकर तब जब विभिन्न मीडिया संस्थानों द्वारा इसकी विस्तृत और उत्तेजक कवरेज की जाती है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसी बीच खबर आई कि लगभग 26,000 शिक्षकों और शिक्षाकर्मियों की नौकरी चली गयी।

ममता बनर्जी सरकार के बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के खिलाफ बेरोजगारों की चीखें, विरोध प्रदर्शन और लोगों के गुस्से की आग जल रही है। इस बीच संशोधित वक्फ अधिनियम के खिलाफ देशव्यापी लोकतांत्रिक विरोध के दौरान, राज्य के 38,000 गांवों में से एक छोटे से हिंदू गांव में अचानक लूटपाट और दंगा क्यों हुआ? खासकर उन गांवों या नगर पालिकाओं में जहां दूर-दूर तक कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए, वहां बिना किसी बड़ी योजना के कुछ गुंडों ने दंगे शुरू कर दिए और पुलिस खबर मिलने के बाद भी किसके आदेश पर सोई रही?

जंगल में बर्बरता!

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम के बायसरन घाटी में आतंकवादियों ने हमला किया। सरकार की मानें तो इस हमले में 26 लोग मारे गये, जिनमें से एक को छोड़कर सभी भारतीय पर्यटक थे। स्थानीय टट्टू सवार सैयद आदिल हुसैन शाह को पर्यटकों की रक्षा करते समय आतंकवादियों ने गोली मार दी। यह घटना हाल के वर्षों में कश्मीर में नागरिकों पर सबसे बड़ा आतंकवादी हमला है। मारे गए 26 लोगों में से 1 मुस्लिम और 1 ईसाई था, जबकि शेष 25 हिंदू थे। ऐसा कहा जाता है कि पर्यटकों से उनके धर्म का पता लगाने के लिए विभिन्न तरीकों से पूछताछ करने के बाद ही हत्या को अंजाम दिया गया था।

भाजपा के शासन काल में ही क्यों?

जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी हमले कोई नई घटना नहीं है। पाकिस्तान द्वारा विभिन्न तरीकों से आतंकवादियों को समर्थन देना भी कोई नई बात नहीं है। नया मुद्दा है धर्म के आधार पर निर्दोष पर्यटकों पर हमले का। हालाँकि, 25 साल पहले भी ऐसी ही क्रूर हत्या हुई थी। 20 मार्च 2000 की रात को भारतीय सेना की वर्दी पहने 15-17 सशस्त्र आतंकवादी एक सैन्य जीप में आये और चित्तिसिंहपुरा गांव में निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलीबारी कर दी, जिसमें 36 सिख मारे गये। उस समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे, इस बार नरेन्द्र मोदी हैं। भाजपा के शासनकाल में आतंकवादियों को एक धर्म विशेष के लोगों की हत्या करने का दो बार मौका मिला। क्या यह महज संयोग है या इसके पीछे कोई रहस्य छुपा हुआ है? दो बार आतंकवादियों ने धर्म के आधार पर हत्याएं की हैं और दोनों बार केवल भाजपा सरकार के कार्यकाल में ही। क्या यह पर्याप्त संकेत नहीं है!

रहस्यमय संयोग

सिख नरसंहार तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की भारत यात्रा से कुछ ही दिन पहले हुआ था। इस आतंकवादी हमले के दौरान, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस 21-24 अप्रैल तक भारत की यात्रा पर थे। क्या यह महज संयोग है या इसके पीछे कोई गहरा रहस्य छिपा है? कुछ अन्य विचित्र, अत्यंत रहस्यमयी घटनाएँ भी हैं। देश के प्रधानमंत्री के व्यवहार से यह रहस्य और भी गहरा हो गया है। उनका 19 अप्रैल को एक रेलवे परियोजना का उद्घाटन करने के लिए जम्मू-कश्मीर जाने का कार्यक्रम था, लेकिन इसे स्थगित कर दिया गया। बताया गया कि प्रतिकूल मौसम पूर्वानुमान के कारण दौरा स्थगित कर दिया गया है। हालाँकि, मौसम विभाग के पास हल्की बारिश के पूर्वानुमान के अलावा कोई अन्य चेतावनी नहीं थी। प्रधानमंत्री ने यह सुनकर कि थोड़ी बारिश हो सकती है, यात्रा रद्द कर दी! क्यों?

अनुच्छेद-370 का उन्मूलन और आतंकवाद

2019 में सत्ता में आने पर मोदी-शाह ने संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया, जम्मू-कश्मीर को दो भागों में विभाजित कर दिया और इसे अपने नियंत्रण में ले लिया। इससे पहले आरएसएस-भाजपा ने यह प्रचार किया था कि नोट बंद करने से आतंकवादियों को पकड़ा जाएगा। कुछ नहीं हुआ। क्या 2019 के बाद आतंकवादी हमले कम हुए? “2019 से सितंबर 2024 तक पुलवामा में आतंकवादी हमले सहित 690 से अधिक घटनाओं में कम से कम 262 सैन्यकर्मी और 171 नागरिक मारे गए हैं।” (एफपी, फॉरेन पॉलिसी पत्रिका में प्रकाशित, 19 सितंबर, 2024)

कौन जिम्मेदार है?

जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की है, वहां की राज्य सरकार की नहीं। पुलिस, सेना और अर्धसैनिक बल सभी केंद्र सरकार के नियंत्रण में हैं। तो फिर मोदी-शाह 27 नागरिकों की मौत की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेंगे? देश की जनता मीडिया को इकट्ठा करके चंद खाली घरों को बम से उड़ाने, हाथ धोने की छवि में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती। बल्कि सवाल यह उठता है कि सुरक्षा बलों को पहले से ही पता था कि वे घर आतंकवादियों के हैं तो फिर वे सब कुछ जानते हुए भी इतने दिनों तक चुप क्यों रहे? क्या पुलवामा जैसे बड़े खूनी हमले का इंतजार किया जा रहा था?

सुरक्षा बल कहां थे?

अब तक सभी को पता चल गया है कि 22 अप्रैल को यानी उस भयावह घटना के दिन क्या हुआ था। जो कोई भी कश्मीर गया है, वह जानता है कि वहां सुरक्षा व्यवस्था कितनी सख्त है। अनंतनाग जिले में कई आतंकवादी हमले हुए हैं। वहां का सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल पहलगाम है। उस दिन वहां एक भी सुरक्षा गार्ड क्यों नहीं था? कहा जा रहा है कि स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा बलों को इसकी सूचना नहीं दी, जिसके चलते सुरक्षा बल तैनात नहीं किए गए। क्या सुरक्षा बलों का खुफिया विभाग ख़त्म कर दिया गया है? क्या उन्होंने हजारों पर्यटकों को पैदल या घोड़ों पर सवार होकर पुलिस चौकियों, अर्धसैनिक बलों और सेना के शिविरों के सामने से गुजरते नहीं देखा? या फिर यह पूछना असामान्य है कि क्या सुरक्षा बलों को जानबूझकर दूर रखा गया था?

पुलवामा जांच रिपोर्ट कहां है?

क्या कोई सरकार जानबूझकर अपने नागरिकों की सुरक्षा के प्रति इतनी उदासीन हो सकती है? लाख टके का सवाल यह है कि क्या यह सचमुच मोदी-शाह की विफलता या उदासीनता का नतीजा है या इसके पीछे कोई और रहस्य है? 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में 40 जवान शहीद हुए। मोदी ने उन शहीदों की तस्वीरें दिखाकर चुनावी दहलीज पार कर ली। उसकी जांच रिपोर्ट कहां है? आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र 2020 में दाखिल किया गया था। पिछले 5 वर्षों में मुकदमे में क्या प्रगति हुई है, यह कोई नहीं जानता। तत्कालीन राज्यपाल सतपाल मलिक, जो स्वयं भाजपा के वरिष्ठ नेता थे, ने पुवामा घटना के संबंध में विभिन्न आरोप लगाए। प्रधानमंत्री ने उन्हें डांटकर चुप कराने की कोशिश की और यहां तक कि उन्हें राज्यपाल के पद से भी हटा दिया। लेकिन सरकार उनके द्वारा उठाए गए प्रमुख सवालों पर चुप क्यों रही?

इसका लाभ किसे मिलेगा?

पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों का लक्ष्य भारत के लोगों को धर्म के आधार पर बांटना, एक-दूसरे के प्रति नफरत पैदा करना, देश की एकता और स्थिरता को नष्ट करना और भारत को कमजोर करना है। वे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच आपसी नफरत और स्थायी विभाजन चाहते हैं जो आरएसएस-भाजपा कर रही है। हमारे हमले का लक्ष्य कौन है? निश्चित रूप से आतंकवाद और उसका समर्थन करने वाले लोग। पाकिस्तान लंबे समय से यह अपराध करता रहा है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन्हें निशाना बनाने के बजाय, इस देश के नागरिकों, जम्मू-कश्मीर के निवासियों पर हमला क्यों किया जा रहा है? स्थानीय टट्टू सवार सैयद आदिल हुसैन शाह भी पर्यटकों की रक्षा करते समय आतंकवादियों के हाथों मारे गये।

कश्मीरियों पर शारीरिक हमला करके और उन्हें अपने देश से अलग-थलग करके आरएसएस-भाजपा किसके हाथ मजबूत कर रही हैं? क्या हिन्दू-मुस्लिम दंगे देश को मजबूत बनाएंगे? फिर भी आरएसएस-भाजपा नफरत फैलाकर दंगों की स्थिति पैदा कर रही है। हालांकि, अगले ही दिन 23 अप्रैल को बंगाल निवासी बीएसएफ जवान झंटू अली शेख आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गए। सर्वदलीय बैठक में सभी विपक्षी दलों ने घोषणा की है कि वे आतंकवाद और उसके प्रायोजकों से लड़ने के लिए सरकार द्वारा की जाने वाली किसी भी कार्रवाई का एकजुट होकर समर्थन करेंगे। हालांकि, उस दिन प्रधानमंत्री देश की सुरक्षा को लेकर बुलाई गई बैठक में शामिल नहीं हुए, बल्कि बिहार में पार्टी के चुनाव अभियान में बोलने को ज्यादा महत्व दिया। आखिर पीएम मोदी के लिए क्या अहम है देश की सुरक्षा या पार्टी का प्रचार?

पाकिस्तान में सब कुछ – सरकार, अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र, शांति ध्वस्त हो रहा है। कश्मीर पर हमले उस देश के लोगों का ध्यान भटकाने, युद्ध का पागलपन भड़काने, अतिवादी धार्मिक और राष्ट्रवादी प्रचार करने तथा देश के शासकों को सत्ता में बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। आश्चर्य की बात यह है कि मोदी-शाह भी इस देश में भी उसी रास्ते पर चल रहे हैं।

पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी चाहते हैं कि कश्मीर अस्थिर रहे, पर्यटन उद्योग बंद हो जाए और असंख्य गरीब लोग बेरोजगार हो जाएं। इसलिए उनमें से कुछ लोग पैसे के लिए आतंकवादी समूह में शामिल हो सकते हैं। ऐसे में सभी पर्यटन केंद्रों को बंद करने की घोषणा करके मोदी सरकार किसकी मदद कर रही है? पाकिस्तान ने धर्म के नाम पर एक देश बनाया और उस देश के लोगों को बर्बाद कर दिया। क्या ऐसा नहीं लगता कि आरएसएस और भाजपा आज धर्मनिरपेक्ष भारत को भी उसी रास्ते पर ले जाना चाहते हैं?
(लेखक माकपा के पूर्व सांसद और केंद्रीय समिति सदस्य हैं। बांग्ला भाषा में लिखे इस मूल लेख को ‘गणशक्ति’ ने प्रकाशित किया है जिसका यह हिन्दी अनुवाद है।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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