सत्य प्रकाश
भारत ने लंबे समय तक आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर नक्सलवाद जैसी जटिल चुनौती का सामना किया है। दशकों तक फैली हिंसा, वैचारिक भ्रम और सामाजिक असंतुलन ने कई क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से दूर रखा। हाल के वर्षों में सुरक्षा और विकास के संयुक्त प्रयासों से इस चुनौती पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया है। लेकिन अब संघर्ष का स्वरूप बदल चुका है- हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों और नेटवर्क के स्तर पर। ऐसे में “नक्सल मुक्त भारत” की उपलब्धि को स्थायी बनाने के लिए शहरी वैचारिक तंत्र पर ध्यान देना जरूरी हो गया है।
वर्ष 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने राष्ट्र को नक्सली हिंसा से मुक्त करने का संकल्प व्यक्त लिया और इसके लिए गहन और व्यापक अध्ययन के बाद एक सुगठित रणनीति तय की गयी। इसमें एक ओर नक्सली हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की कार्रवाई तेज की गयी तो दूसरी ओर इन क्षेत्रों में विकास कार्यों पर विशेष ध्यान दिया गया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि लंबे और कठिन संघर्ष के बाद हथियार बंद नक्सली कैडर पर काबू पा लिया गया है लेकिन उनका समर्थन करने वाली विचारधारा की जड़ें नष्ट नहीं हुई हैं। जिस विकृत विचारधारा ने संविधान को ठुकराया और लोकतंत्र को चुनौती दी तथा हिंसा को न्यायोचित ठहराया, उसका सफाया करना अगला महत्त्वपूर्ण कार्य है। सूक्ष्म रुप से देखा जाए तो विश्व में जहां-जहां वाम चरमपंथी विचारधारा उभरी है तो उसके साथ हिंसा अनिवार्य रूप से रही है।
नरेन्द्र मोदी सरकार की स्पष्ट रीति नीति से 31 मार्च 2026 को नक्सल मुक्त भारत की घोषणा कर दी गयी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में नक्सली हिंसा के अंत का ऐलान करते हुए कहा कि जमीन पर लडाई जीत ली गयी है लेकिन नक्सली विचारधारा और शहरी नेटवर्क अर्बन नक्सल को खत्म करने के लिए लंबा संघर्ष करना होगा। लगभग सात दशक से चली आ रही नक्सली हिंसा के नासूर को नष्ट करने और रेड कारिडोर के मिथक को तोडने के लिए मोदी सरकार की रणनीति में सटीकता, तत्परता और निष्ठा प्रमुख तत्व रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के व्यापक अनुभव और श्री शाह के कुशल नेतृत्व एवं निर्देशन ने नक्सल मुक्त भारत का लक्ष्य प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की स्पष्ट रणनीति और सुरक्षा बलों के साहस तथा संघर्ष से पिछले लगभग सात दशक से चल रहे लाल आतंक का अंत तो हुआ है। हथियारबंद दस्ते खत्म हो रहे हैं लेकिन वैचारिक आधार का भी समूल नाश करना होगा। सबसे पहले, उन शहरी नेटवर्क पर कार्रवाई जरूरी है जो अभी भी नक्सलियों को वित्तीय, कानूनी और अन्य साजो सामान की सहायता उपलब्ध करा रहे हैं। तथाकथित “अर्बन नक्सल” यानी शहरों में बैठे कुछ विचारक, सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी संस्थायें हिंसा करने वाले नक्सलियों को कानूनी सहायता, मीडिया नैरेटिव या आर्थिक मदद दे दे रहे हैं। ये लोग इस समाज और विकास विरोधी आंच को बुझने नहीं देना चाहते। ये भी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के साझेदार हैं।
सरकार के प्रयासों से पिछले कुछ वर्षों में ऐसे तत्वों पर भी शिकंजा कसना शुरू हुआ है। भीमा कोरेगांव मामले से लेकर टेरर फंडिंग मामलों तक नक्सलियों के साथ संबंध रखने वाले कई छद्म बुद्धिजीवियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का असली चेहरा बेनकाब हुआ है। कुछ को न्यायालय के समक्ष पेश किया गया और कुछ की विदेशी फंडिंग पर रोक लगाई गई। सरकार ये संदेश देने में सफल रही है कि बंदूकधारी और कलमधारी जो भी देश के विरुद्ध साजिश करेगा उसे बख्शा नहीं जाएगा।
नक्सल मुक्त भारत के संकल्प के अंतर्गत शाह ने कई ऐतिहासिक कदम उठाये। इनमें सुरक्षा बलों को विशेष हथियार, जूते और आपात चिकित्सा सुविधा जैसे उपाय शामिल हैं। नक्सलियों का सामने करने के लिए विशेष रुप से गठित जिला आरक्षित गार्ड – डीआरजी को केंद्रीय गृहमंत्री के निर्देश पर केवल 20 दिन में हथियार उपलब्ध कराये गये जिससे यह बल नक्सली विरोधी अभियान में शामिल हो सका। इसी तरह सुरक्षाबलों के लिए एंटी स्पाईक बूट्स की मांग को उन्होंने तुरंत पूरा करवाया। इससे पहले जवान स्पाईक की वजह से घायल हो जाते थे। श्री शाह के निर्देश पर सुरक्षाबलों को सेना से आधुनिक उपकरण अस्थायी तौर उपलब्ध कराये गए। सुरक्षा बलों को स्नाईपर रायफल और वाहन पोर्टेबल वी-सेट उपलब्ध करायी गयी। घायल सुरक्षाबलों को एयर एम्ब्युलेंस से एयरलिफ्ट करने के लिए सुविधा दी गई।
सरकार की ओर से नक्सलियों को रेड कार्पोरेट बनाम गोली का स्पष्ट संदेश गया। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को समाज की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए पूरे अवसर तथा हर सहायता का न केवल आश्वासन दिया गया बल्कि इन्हें जमीन पर पूरा भी किया गया। सरकार ने साफ कहा कि हिंसा करने वाले लोगों को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार ने स्थानीय स्तर पर विकास कार्य शुरु किये जिससे ग्रामीणों का भरोसा सुरक्षा बलों और प्रशासन पर बढा। नियर नेल्लार योजना के अंतर्गत इतना सराहनीय कार्य हुआ कि पहले गांव के लोग सिक्यूरिटी केम्प का विरोध करते थे लेकिन वे ही लोग विकास कार्य देखकर सिक्यूरिटी केम्प की मांग करने लगे, जिसके कारण नक्सल के गढ़ तक केम्प बनाने में सफलता मिली।
हर केम्प के पांच किलोमीटर के दायरे में बैंक, सडक, प्राथमिक चिकित्सा सुविधा केंद्र और विद्यालय आदि विकास कार्य किये गए। जंगलों में तेंदूपत्ता की उगाही पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाया जिससे नक्सलियों का वित्तीय स्रोत बंद हो गया और ग्रामीणों की आय में वृद्धि हुई। आदिवासी क्षेत्रो में लोगों के आवास के लिए श्री शाह ने प्रधानमंत्री आवास के तहत विशेष अनुमति कराई। अब तक 15 हजार से ज्यादा घर उपलब्ध कराये गए जा चुके हैं। इसी तरह से तिलवट पंचायत, लेओर योजना, अमर बलिदानी स्मारक आदि सभी योजना शाह के नेतृत्व में बनी और सफल हो पाई।
नक्सल विरोधी अभियान में शाह पूरी निष्ठा के साथ जुटे रहे और हर छोटे बडे घटनाक्रम पर बारीकी से निगाह रखी। उनके आदेश से तुरंत छह पुल बनाये गये जिसमें से चार बीजापुर तथा दो नारनपुर में हैं। कई महीनों तक अनेक प्रयास के बाद भी राष्ट्रीय खनिज विकास निगम से फण्ड नहीं मिल पाया था तो केंद्रीय गृहमंत्री के आग्रह करने के बाद सिर्फ दो दिन में फण्ड जिलाधीश के खाते में आ गया। यह आग्रह शुक्रवार को किया गया और रविवार को पहली बार अकाउंट में फण्ड आ गया। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बस सुविधा पहुंचाना राज्य सरकार के लिए घाटे का कार्य था लेकिन शाह ने वित्तीय घाटा पूरा करने का निर्देश दिया जिससे छत्तीसगढ़ सरकार ने मुख्यमंत्री बस योजना शुरू हो सकी। इसी तरह मुख्यमंत्री मोबाइल टावर योजना के तहत मोबाईल नेटवर्क कोने कोने तक पहुंचा।
आरंभिक काल से नक्सलियों ने भारत राष्ट्र की वैधता पर सवाल उठाये और उसे निशाना बनाया। संविधान की अवहेलना करने के साथ गांवों में कथित जनता सरकार चलाकर समानांतर न्यायालय स्थापित किए। नक्सलियों का साथ नहीं देने वाले व्यक्ति को सरकारी मुखबिर कहकर जन-अदालतों में मौत की सजा दी गयी। नक्सलियों ने ऐसे भय का वातावरण निर्मित कर दिया जिससे क्षेत्र में संवैधानिक शासन का संकट पैदा हो गया। यह नक्सलियों का यह सुनियोजित तरीका था कि पहले शून्य पैदा करो और फिर अपनी विचारधारा का जहर भर दो।
वैचारिक स्तर पर नक्सली विचारधारा से लडने के लिए विशेष स्तर पर सामना करना होगा। किताब और कलम से लड़ने वालों को किताब और कलम से जवाब देना होगा। इसलिए सरकार का ध्यान शिक्षा, जागरूकता और वैकल्पिक नैरेटिव पर है। विश्वविद्यालयों में नक्सलवाद की सच्चाई उजागर करने के लिए सेमिनार हों और आदिवासी युवाओं को डिजिटल माध्यमों से जोड़ा जाए। नक्सली प्रभाव से मुक्त हुए क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम आयोजित हों और युवाओं को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोडा जाए। नक्सली सहानुभूति वाले विचारों को तथ्यों से काटा जाए। युवा पीढ़ी को ये समझाना जरूरी है कि माओ का युग बीत चुका और नए भारत में सिर्फ संविधानवाद, लोकतंत्र और विकास की जगह है। शहरी नक्सल नेटवर्क की कमर तोड़ने के लिए कानूनन कार्रवाई निगरानी और सख्ती के साथ साथ शहरी छद्म नक्सल नायकों का महिमामंडन खत्म करना है। समाज को इनके वास्तविक स्वरूप से अवगत कराना है। यह एक लंबा वैचारिक अभियान हो लंबा चल सकता है लेकिन इस पर काम करना होगा।
नक्सल मुक्त भारत की उपलब्धि को बनायें रखने के लिए यह अभियान अब गांवों, जंगलों और दूर दराज की पहाडियों पर नहीं बल्कि शहरों, विश्वविद्यालयों और सभा सम्मेलनों में चलाना होगा। नक्सली वैचारिक समर्थन हटाने के नक्सली हिंसा से प्रभावित लोगों के दुख दर्द को सामने लाना होगा और शहरी समाज को उनसे अवगत कराना होगा। नक्सलियों के वित्तीय स्रोतों को भी खत्म करना होगा। नक्सली वैचारिकता अक्सर सांस्कृतिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और पर्यावरण संरक्षण की आड में आने मनसूबों को पूरा करती है। ऐसे तत्वों से सावधान रहने और इन पर कडी निगरानी की आवश्कता है।
नक्सली प्रभाव से मुक्त हुए गांवों और युवाओं पर विशेष ध्यान देने की जरुरत होगी। इन गांवों में विकास और युवाओं के उत्थान के लिए सरकार ने विशेष कार्यक्रम शुरु किये हैं। इनका क्रियान्वयन सरकार की मंशा के अनुरुप हो जाए, इसके लिए स्थानीय प्रशासन को तैयार करना होगा। इस पूरी प्रक्रिया की सख्त निगरानी की जानी चाहिए। ऐसी योजनाओं और कार्यक्रमों में स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार की व्यापक गुंजाइश रहती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नक्सली हिंसा के मूल में भ्रष्टाचार भी है।
केंद्रीय गृहमंत्री ने छत्तीसगढ़ सरकार बनने के बाद 21 जनवरी 2024 को अपने पहले प्रवास में दिसंबर 2025 तक नक्सल मुक्त भारत की योजना का खाका बना लिया था जिसकी घोषणा उन्होंने अगस्त 2024 के अपने प्रवास में की थी। उनके नेतृत्व में आसूचना ब्यूरो, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल तथा अन्य सुरक्षाबल, गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों का अद्भुत समन्वय किया गया। संक्षेप में कहें तो श्री शाह के नेतृत्व में अब नक्सल प्रभावित इलाकों का पूरा नक्शा बदल रहा है। जिस इलाके में रात को बस अंधेरा और भय रहता था, अब वहां बच्चे पढ़ते नजर आते हैं। महिलायें, युवाओं और आम जन की आंखों में नये सपने हैं। विकास की लहर नक्सलवाद को जड़ से समाप्त करेगी।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जनता भरोसा बढाने के लिए संयुक्त पूछताछ समिति का गठन किया गया जिसमें स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों जैसे पत्रकारों तथा संबंधित परिजनों को शामिल किया गया। रणनीतिक स्तर पर प्रत्येक बडे नक्सली पर एक बडे अधिकारी की तैनाती गयी और युवा आईपीएस अधिकारियों प्रभावित क्षेत्रों में तैनात किया गया। इससे जांच में तेजी आयी और सजा जल्दी दी जा सकी। भूल रहित ऑपरेशन्स के लिए गोपनीय सूचना आधारित बड़े अभियान चलायें गये। केंद्रीय गृह मंत्री के निर्देश पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में बस्तरिया बटालियन का गठन किया गया।
शाह ने जनता से सीधा संपर्क स्थापित करने के निर्देश दिये। जंगल और सुदूर क्षेत्रों में आकाशवाणी (रेडियो) ही एकमात्र माध्यम था। आकाशवाणी में 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत स्लॉट स्थानीय भाषा में आत्मसमर्पण और आदिवासी कल्याण के लिए दिया गया। इस परिवर्तन से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास को गति मिली। नक्सली हिंसा का समूल नाश करने की रणनीति में पुनर्वास एक विशेष तत्व है जिसपर सरकार ने सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री के आदेश से पुनर्वास नीति को इस तरीके से तैयार किया गया जिससे सामूहिक आत्मसमर्पण संभव हो पायें। जेल में बंद नक्सलियों को भी शाह के प्रयासों से समाज की मुख्यधारा में लाया गया। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)




