
सत्य प्रकाश
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) की हालिया भारत यात्रा के दौरान भारतीय कूटनीति के नये आयाम दिखायी दिये जिन्होंने न केवल पूरी दुनिया को हैरान किया बल्कि यह भी कड़ा संदेश दिया कि भारत अब किसी भी तरह से दोयम दर्जे का बर्ताव सहने के लिए तैयार नहीं है और वह “जैसे को तैसा” की भाषा में जवाब देने का माद्दा रखता है। अमेरिकी विदेश मंत्री का भारत में परंपरागत तरीके से कोई स्वागत नहीं किया गया और न ही द्विपक्षीय स्तर पर कोई बड़ी वार्ता आयोजित की गयी। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात हुई और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन भी आयोजित किया गया।
सम्मेलन में मार्को रुबियो का सामना बहुत असहज सवाल से हुआ जिसके उत्तर में उन्हें अपने ही देश के राष्ट्रपति को अप्रत्यक्ष रुप से “मूर्ख” कहना पड़ा। इसी सम्मेलन में एस. जयशंकर ने स्पष्ट रुप से कहा कि भारतीय विदेशी नीति भारत और भारतीय जनता के हित के लिए है और भारत सरकार इसी के अनुरुप अपने निर्णय लेगी। यह टिप्पणी रुस से कच्चे तेल खरीदने के संदर्भ में की गयी है।
जयशंकर ने स्पष्ट किया कि जैसे अमेरिका अपने हितों को देखता है, वैसे ही भारत ‘इंडिया फर्स्ट’ नीति और अपने हितों के अनुसार कई स्रोतों से सस्ती ऊर्जा सुनिश्चित करता रहेगा। मार्को रुबियो ने भारत के इस रुख और उसकी रणनीतिक स्वायत्तता से सहमति जताई। भारत सरकार का रुख स्पष्ट, संप्रभुता-केंद्रित और ‘इंडिया फर्स्ट’ की नीति पर आधारित रहा है। पिछले कई वर्षों से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनर्गल बयानों और भारतीयों तथा भारतीय मूल के व्यक्तियों पर नस्लीय टिप्पणियों के प्रति भारत सरकार ने अपने नाराजगी स्पष्ट से दर्शा दी।
भारत के प्रति अमेरिकी नीति पर अपने रुख को स्पष्ट करते हुए मार्को रुबियो को पूरी भारत यात्रा के दौरान न्यूनतम सम्मान दिया गया। कोलकाता, आगरा और जयपुर में उनके सम्मान के लिए स्थानीय और छोटे अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गयी। केंद्र के मंत्री, राज्यों के मंत्री या अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं अधिकारियों को भी उनके स्वागत या विदाई समारोह में नहीं भेजा गया। अतिथि देवो भव की परंपरा वाले राष्ट्र भारत ने किसी भी विदेशी अतिथि के साथ इस तरह का बर्ताव शायद कभी नहीं किया है। ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका और भारत के आपसी रिश्तों को न्यूनतम स्तर पर पहुंचा दिया है।
पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव, भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद किसी बड़े वैश्विक नेता का यह पहला दौरा था, जो रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण माना गया। भारत सरकार द्वारा पारंपरिक रूप से अमेरिकी शीर्ष नेताओं को मिलने वाले भव्य स्वागत के मुकाबले इस बार का रुख थोड़ा औपचारिक और सख्त दिखाई दिया। इसके पीछे मुख्य रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति की विवादित “हेलहोल” टिप्पणी और नस्लीय बयान रहे हैं। इससे भारत में भारी नाराजगी है। भारत सरकार ने रुबियो का स्वागत बेहद सीमित और नपे-तुले प्रोटोकॉल के तहत करके अमेरिका को यह जता दिया कि भारत ऐसे बयानों को हल्के में नहीं लेता।
अमेरिका की हाल के दिनों में पाकिस्तान के साथ रक्षा एवं रणनीतिक संबंधों को फिर से बढ़ाने की कोशिशों को भारत ने संशय से देखा है। ऐसे में भारत ने मार्को रुबियो के सामने झुकने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का प्रदर्शन किया। कूटनीति में इस तरह की “दिखावट” का मतलब साफ तौर पर यह संदेश देना होता है कि भारत इस समय संबंधों में केवल व्यावहारिक और व्यावसायिक रवैया रख रहा है, न कि कोई विशेष रियायत दे रहा है। इसके साथ ही, दिल्ली की भीषण गर्मी और हीटवेव ने भी उनके इस दौरे के माहौल को थोड़ा सुस्त और असहज बनाए रखा, जिस पर खुद मार्को रुबियो ने भी मंच से चुटकी ली कि “यह मियामी की उमस भरी गर्मी से भी कहीं ज्यादा गर्म है।”
दूसरी ओर, मार्को रुबियो ने भारत के साथ संबंध सामान्य बनाने का प्रयास किया। अमेरिका में मार्को रुबियो को राष्ट्रपति पद का प्रबल उम्मीदवार माना जाता है। मार्को रुबियो ने कहा है कि भारत और अमेरिका बहुत जल्द एक ऐतिहासिक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। उन्होंने आश्वस्त किया कि अमेरिका अपनी तरफ़ से भारत को प्रचुर मात्रा में ऊर्जा (क्रूड ऑयल) की आपूर्ति करने के लिए तैयार है। अमेरिकी विदेश मंत्री की यात्रा का मूल उददेश्य क्वाड की बैठक में शामिल होना था। मार्को रुबियो और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और एस. जयशंकर के बीच हुई बैठकों में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने पर सहमति बनी। इसके अलावा समुद्री सुरक्षा, क्रिटिकल मिनरल्स और सुरक्षित टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन को लेकर अहम रणनीतियां तय की गईं। भारत ने अमेरिकी वीजा मिलने में आ रही कठिनाइयों का मुद्दा मार्को रुबियो के सामने मजबूती से उठाया। हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री की इस यात्रा ने स्पष्ट कर दिया है कि व्यापारिक मतभेदों के बावजूद भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी अटूट है और अमेरिका भारत को वैश्विक मंच पर अपना सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी मानता है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने 23 मई 2026 को अपनी पहली भारत यात्रा की शुरुआत नई दिल्ली के बजाय कोलकाता से की। उनके कोलकाता दौरे के पीछे रणनीतिक, धार्मिक और राजनयिक कारण रहे हैं। कैथोलिक आस्था से जुड़े मार्को रुबियो अपनी पत्नी के साथ सबसे पहले मदर टेरेसा के मिशनरीज ऑफ चैरिटी (मदर हाउस) के मुख्यालय पहुंचे। उन्होंने ‘निर्मला शिशु भवन’ का भी दौरा किया। भारत में विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम के नियमों और ईसाई धर्मार्थ संगठनों की फंडिंग को लेकर अमेरिका और भारत के बीच आंतरिक चर्चाएं चल रही है। मार्को रुबियो ने इस यात्रा के जरिए मानवाधिकारों और वैश्विक मानवीय कार्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का एक संदेश दिया कि अमेरिका उनके साथ है। कोलकाता का अमेरिका के साथ बहुत पुराना ऐतिहासिक संबंध है। कोलकाता में स्थित अमेरिकी वाणिज्यिक दूतावास, दुनिया के सबसे पुराने अमेरिकी वाणिज्य दूतावासों में से एक है और भारत में स्थापित होने वाला पहला अमेरिकी दूतावास है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)




