
मधूलिका सिन्हा
अमेरिका की ग्रीन कार्ड नीति में प्रस्तावित बदलावों ने लाखों भारतीय आईटी पेशेवरों, छात्रों और कुशल कामगारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। एच-1बी वीजा धारकों के लिए ग्रीन कार्ड प्रक्रिया को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने न सिर्फ भारतीय प्रवासी समुदाय बल्कि अमेरिकी उद्योग जगत और नीति-निर्माताओं को भी असहज कर दिया है। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने बाद में स्पष्टीकरण देकर आशंकाओं को कम करने की कोशिश की है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया है कि अमेरिका की बदलती आव्रजन नीतियां भारतीय प्रतिभाओं और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को किस दिशा में ले जाएंगी।
ग्रीन कार्ड एक ऐसा दस्तावेज है जिससे अमेरिका में अस्थायी रूप से बसे अप्रवासियों को वहां स्थायी रूप से रहने, पढ़ाई करने और नौकरी बदलने का कानूनी अधिकार मिल जाता है। यह अमेरिका की नागरिकता हासिल करने का रास्ता भी खोलता है। ऐसे में यह बेहतर भविष्य की तलाश में अमेरिका पहुंचे दुनिया भर के कुशल पेशेवरों और विशेष रूप से भारत के आईटी प्रोफेसनल्स, इंजीनियरों, चिकित्सकों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और अन्य प्रतिभाशाली युवाओं का प्रमुख आकर्षण रहा है। वैसे यह किसी को अमेरिका में आजीवन रहने की गारंटी नहीं देता। इसके साथ कुछ शर्तें जुड़ी हुई हैं और हर दस साल बाद इसका नवीकरण किया जाता है।
ग्रीन कार्ड को लेकर ताजा विवाद 22 मई को अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा- यूएससीआईएस की ओर से जारी नीति निर्देशों के बाद शुरु हुआ जिसमें कहा गया था अमेरिका में अस्थायी रूप से रह रहे अधिकांश विदेशी नागरिकों जैसे H-1B वीजा धारकों को “असाधारण परिस्थितियों” में ग्रीन कार्ड के लिए ‘एडजस्टमेंट ऑफ स्टेटस’ की प्रक्रिया का लाभ लेने के लिए अपने देश वापस लौटना लौटना पड़ सकता है और वहां के अमेरिकी दूतावास या वाणिज्य दूतावास के जरिए दोबारा से आवेदन करना पड़ सकता है। अभी तक इन्हें अमेरिका से ही ग्रीन कार्ड का आवेदन करने की सुविधा मिली हुई थी।
नीति निर्देशों में कुछ “असाधारण परिस्थितियों” की कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं होने और इसे पूरी तरह से अधिकारियों के विवेक पर छोड़े जाने से भारतीय पेशेवरों के इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होने की आशंका हो गई क्योंकि अमेरिका में इस समय ग्रीन कार्ड के लिए आवदेन करने वालों में इनकी संख्या सबसे अधिक है। ऐसे लोगों की प्रतीक्षा सूची पहले से ही काफी लंबी है। नए नियमों से यह प्रतीक्षा अवधि और बढ़ सकती है। अभी ही कई भारतीय पेशेवरों को ग्रीन कार्ड के लिए 15 से 20 वर्ष या उससे अधिक समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ रही है। यूएसआईएस की ओर से जारी ताजा वीजा बुलेटिन के अनुसार, पहले से किए गए ग्रीन कार्ड आवदेनों की प्रोसेसिंग टाईम को भी और पीछे धकेल दिया गया है।
अप्रवासियों के लिए आव्रजन नियमों में ऐसे बदलाव से सिर्फ भारतीय पेशेवरों में ही नहीं बल्कि उनकी नियोक्ता अमेरिकी कंपनियां और उद्योग जगत में भी खलबली मची है। इस बीच भारत सरकार ने भी स्थिति पर संज्ञान लेते हुए अमेरिकी प्रशासन से संपर्क साधा है और स्पष्ट अनुरोध किया कि इस तरह के बदलावों से वहां रह रहे भारतीय समुदाय, कुशल कामगारों और छात्रों के जीवन में भारी उथल-पुथल मच सकती है इसलिए उनके हितों की रक्षा की जाए और उनकी कानूनी स्थिति को लेकर स्पष्टता रखी जाए।
भारत सरकार के राजनयिक प्रयासों, अमेरिकी टेक कंपनियों और उद्योग जगत की कड़ी प्रतिक्रिया, मुकदमों के खतरों और भारी जनदबाव को देखते हुए अमेरिकी सरकार ने अपने रुख में नरमी दिखाते हुए सप्ताह भर बाद गृह सुरक्षा विभाग के जरिए एक संशोधित आदेश में स्पष्ट किया कि ज्यादातर H1-B वीजा धारकों को ग्रीन कार्ड आवेदन प्रक्रिया पूरी करने के लिए अमेरिका छोड़कर नहीं जाना होगा।
यूएससीआईएस के प्रवक्ता जैक काहलर ने नीतिगत बदलाव को सही ठहराते हुए कहा कि ये व्यवस्था ग्रीन कार्ड को लेकर घरेलू प्रोसेसिंग पर पूरी तरह से रोक लगाने के लिए नहीं बल्कि उन कमियों को दूर करने के लिए है जिनका इस्तेमाल गलत तरीके से ग्रीन कार्ड हासिल करने के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि इस नीति का ऐसे उच्च-योग्यता वाले और कुशल अप्रवासियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जिन्होंने कानून का पालन किया है। उन्होंने कहा कि यह नीति पूरी निष्पक्षता से लागू हो इसके लिए आव्रजन अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वह प्रत्येक मामले की बारीकी से छानबीन करने के बाद ही यह तय करें कि किन अप्रवासियों को ग्रीन कार्ड के आवेदन के लिए वापस अपने देश जाना होगा और किन्हें यह सुविधा पहले की तरह अमेरिका में ही मिलेगी।
ट्रंप प्रशासन द्वारा नीतिगत बदलावों के असर को कम करने की कोशिशों के बावजूद, आव्रजन के पक्षधर और कानूनी विशेषज्ञ इसे लेकर बहुत संशय में हैं। उनका कहना है कि आदेश की भाषा देखते हुए ऐसा लगता है कि यूएससीआईएस के अधिकारियों को बहुत ज्यादा अधिकार दिया गया है। इससे इस बात का खतरा हमेशा रहेगा कि वे कभी भी किसी व्यक्ति को ग्रीन कार्ड के आवेदन के लिए स्वदेश लौटने को कह सकते हैं। उनका एक तर्क यह भी है कि एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया को केवल “असाधारण प्रतिभाओं के लिए आरक्षित” अपवाद में बदलना यूएससीआईएस के कार्यकारी अधिकारों से बाहर है, इसलिए इस नीति की वैधता अदालत में जाकर ही तय होगी।
नई नीति की इस आधार पर भी आलोचना हो रही है कि यह उन देशों के आवेदकों के लिए विशेष रूप से मुश्किल भरी होगी, जिन पर अभी अमेरिकी प्रशासन की यात्रा संबंधी पाबंदियां और वीजा प्रोसेसिंग रोकने के नियम लागू हैं। यदि इनके ग्रीन कार्ड प्रोसेसिंग में ज्यादा समय लग गया तो उनके परिवार वालों को लंबे समय तक अमेरिका में अकेले रहना पड़ सकता है। दूसरा इस बीच अगर अमेरिका में रह रहे उनके बच्चे 21 वर्ष की आयु पार कर जाते हैं और उन्हें तुरंत कोई रोजगार नहीं मिल पाता तो वे माता-पिता के H1-B वीजा पर निर्भरता के लाभ से बाहर हो सकते हैं।
अमेरिका में आव्रजन नियमों में बदलाव को लेकर ऐसे विवाद अक्सर उठते रहे हैं। जब से ट्रंप सरकार आई तब से ये विवाद कुछ ज्यादा ही गहरा गया है। अमेरिकी कांग्रेस में समय- समय पर रोजगार-आधारित आव्रजन प्रणाली में सुधार के कई पस्ताव पेश किए जा चुके हैं हालांकि इनमें से ज्यादातर प्रयास H1-B और ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया को और सख्त बनाने की दिशा में ही बढ़ते दिखाई दिए हैं। वैसे भी सरकार के पास यह विशेषाधिकार पहले से ही मौजूद है कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए कभी भी किसी का ग्रीन कार्ड तो क्या नागरिकता भी रद्द कर सकती है। अदालत में इसे चुनौती दी जा सकती है। लेकिन इसमें भी अक्सर सरकार का ही पलड़ा भारी रहता है।
यह भी दिलचस्प है कि सरकार की सख्ती और नीतिगत अनिश्चितताओं से निबटने में अप्रवासियों को अपने स्थानीय लोगों का साथ नहीं मिल रहा। ग्रीन कार्ड पा चुके कई अप्रवासी नहीं चाहते कि और लोगों को यह सुविधा मिले ताकि उनके बच्चों के लिए कॉलेजों में दाखिला आसान बना रहे और प्रतिस्पर्धा के कारण रोजगार के अवसर कम न हों। इन विपरीत हालात के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारतीय पेशेवरों की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए ग्रीन कार्ड के नियमों में बदलाव का यह मसला नीति-निर्माताओं के लिए खास बना रहेगा।
(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार तथा यूट्यूबर हैं और अमेरिका के न्यूयार्क में रहती हैं।)




