नई दिल्ली। दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाता सूचियों में कथित अनियमितताओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं।
रविवार को विशेष सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सभाओं और लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19(2) में निर्धारित शर्तों के अनुरूप ही लगाए जा सकते हैं। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि दिल्ली मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलती रहें, इंटरनेट सेवाएं बाधित न हों और शहर में लोगों की स्वतंत्र आवाजाही सुनिश्चित की जाए।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने शनिवार को लगाई गई पाबंदियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए कहा कि मेट्रो और रेल सेवाएं तब तक सामान्य रूप से संचालित होनी चाहिए, जब तक संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान की आशंका को देखते हुए किसी नियमन की आवश्यकता न हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर लगाई जाने वाली पाबंदियों को संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरना होगा। संविधान का अनुच्छेद 19(2) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है। इनमें सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना भी शामिल है। हालांकि, इस प्रावधान के तहत प्रतिबंध लगाने का अधिकार मनमाने तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
बैरिकेडिंग की तत्काल समीक्षा के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से कहा कि दिल्ली में लोगों की आवाजाही यातायात संबंधी नियमों के अधीन स्वतंत्र रूप से होने दी जाए। पीठ ने निर्देश दिया कि कानून-व्यवस्था और यातायात की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बैरिकेड लगाने की आवश्यकता की तत्काल समीक्षा की जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि इंटरनेट सेवाएं बिना बाधा के जारी रहनी चाहिए। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि उसके निर्देशों का अर्थ यह नहीं है कि प्रशासन सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) के तहत कार्रवाई करने की अपनी वैधानिक शक्तियां खो देगा।
जस्टिस वी. मोहना ने कहा, “अगर कानून इसकी मांग करता है, तो वह अधिकार हमेशा मौजूद है।” अदालत का आशय था कि कानूनी आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन सामान्य रूप से इंटरनेट सेवाओं को बाधित करने के लिए मनमानी नहीं की जा सकती।
पीठ ने हिरासत के मामले में भी स्पष्ट निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। विशेष रूप से शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों के समूहों के मामले में यह सुनिश्चित किया जाए कि उनके खिलाफ ऐसी कार्रवाई न हो, जो उस क्षेत्र में लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के दायरे से बाहर जाकर की गई हो।
बीएनएसएस की धारा 163 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट सार्वजनिक शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए तत्काल और अस्थायी आदेश जारी कर सकते हैं। इसके अंतर्गत परिस्थितियों के अनुसार पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने पर रोक भी लगाई जा सकती है। लेकिन इस प्रावधान का इस्तेमाल किस क्षेत्र में और किन परिस्थितियों में किया गया है, यह भी महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट के आसपास लगे प्रतिबंधों के बोर्ड हटाने को कहा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के ठीक बाहर भी बीएनएसएस की धारा 163 लागू कर दी गई है। इस पर पीठ ने कहा कि उसे जानकारी दी गई है कि सुप्रीम कोर्ट परिसर और उसके आसपास धारा 163 लागू होने के संबंध में सूचना-पट्ट लगाए गए हैं। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि ये बोर्ड पहले ही नहीं हटाए गए हैं, तो उन्हें हटाया जाए ताकि सुप्रीम कोर्ट या किसी अन्य अदालत में आने-जाने को लेकर लोगों के मन में कोई आशंका न रहे।
यह निर्देश इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रतिबंधों के कारण लोगों के लिए सार्वजनिक स्थानों पर मौजूद रहना और अदालतों तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया था। केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि दिल्ली में इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी गई हैं और मेट्रो स्टेशन तथा ट्रेनें पूरी तरह संचालित हो रही हैं। उन्होंने यह आश्वासन भी दिया कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को अपना काम करने में बाधा नहीं पहुंचाई जाएगी।
अदालत ने कथित अवमानना के लिए जिम्मेदार बताए गए पक्षों से हलफनामा दाखिल करने और अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा। पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि शनिवार की घटनाओं से संबंधित कुछ अन्य याचिकाओं की प्रतियां रविवार को सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को उपलब्ध कराई जाएं, ताकि वह सरकार से निर्देश लेकर अदालत को जानकारी दे सकें। जस्टिस वी. मोहना ने सुनवाई में मौजूद वकीलों से यह भी कहा कि यदि वे वास्तव में जनकल्याण को लेकर गंभीर हैं, तो वे यह आश्वासन दें कि शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करेंगे और किसी दूसरे व्यक्ति को उकसाएंगे नहीं।
‘कपिल सिब्बल का सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा बहाल करना चाहते हैं’
सुनवाई की शुरुआत में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि पुलिस ट्रेनों से लोगों को उठा रही थी। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर के आसपास चार किलोमीटर के दायरे में प्रतिबंध होने की बात कही गई थी, लेकिन कथित तौर पर इससे बाहर के इलाकों से भी लोगों को हिरासत में लिया जा रहा था। सिब्बल ने यह भी कहा कि इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गई थीं और शनिवार को दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशन बंद रखे गए थे। उन्होंने शुक्रवार को अदालत द्वारा सेवाओं पर पूरी तरह रोक न लगाने के निर्देश का हवाला देते हुए कहा कि इसके बावजूद लोगों की आवाजाही प्रभावित हुई।
सिब्बल की मीडिया में आई उस टिप्पणी के संदर्भ में, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर अपना भरोसा कम होने की बात कही थी, जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अदालत यहां “संस्था में श्री सिब्बल का विश्वास बहाल करने” के लिए है। उन्होंने कहा कि न्याय के संघर्ष में संस्थान के प्रति उनका विश्वास न्यायपालिका के सबसे भरोसेमंद हथियारों में से एक रहा है। यह टिप्पणी ऐसे समय आई, जब सुनवाई का एक बड़ा हिस्सा इस सवाल पर केंद्रित था कि क्या प्रशासनिक पाबंदियों और पुलिस कार्रवाई के कारण नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का हनन हुआ है।
‘पुलिस राज से बस एक कदम दूर थी दिल्ली’
वरिष्ठ अधिवक्ता शदान फरासत ने अदालत को बताया कि शनिवार को हिरासत में लिए गए लोगों में वह भी शामिल थे और उनके साथ अन्य लोगों की तरह दुर्व्यवहार किया गया। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल वकीलों के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे नागरिक समाज के अधिकारों से जुड़ा है। फरासत ने कहा कि वकील व्यापक नागरिक समुदाय का ही हिस्सा हैं और उन्हें कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं हैं। उनके मुताबिक, शनिवार को दिल्ली में स्थिति बेहद दमनकारी थी। लोगों को सड़क पर खड़े होने तक की अनुमति नहीं दी जा रही थी। उन्होंने दावा किया कि हिरासत में लिए जाने के बाद उन्हें चलती बस में चढ़ा दिया गया।
उन्होंने अदालत से कहा कि यह मामला किसी व्यक्ति या वकील विशेष का नहीं, बल्कि नागरिकों के विरोध करने के अधिकार का है। शनिवार की स्थिति का अपना अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा, “मुझे जो एहसास हुआ, उसके मुताबिक हम पुलिस राज से बस एक कदम दूर थे।” फरासत ने पीठ से देश की राजधानी में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के नागरिकों के अधिकार को बहाल करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि शनिवार को यह अधिकार नष्ट कर दिया गया था।
बिना पहचान-पत्र के पुलिसकर्मियों की मौजूदगी पर सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने हिरासत और उससे जुड़ी घटनाओं के वीडियो फुटेज का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि वीडियो में दिखाई देने वाली कार्रवाई को केवल अनुपातहीन कहकर नहीं समझा जा सकता, क्योंकि किसी भी कार्रवाई में सबसे पहले उसकी आवश्यकता पर विचार किया जाना चाहिए और उसके बाद यह देखना चाहिए कि वह कितनी आनुपातिक है।
उन्होंने सवाल उठाया कि शांतिपूर्ण और निहत्थे तरीके से आगे बढ़ रहे लोगों, बच्चों और विद्यार्थियों को हिरासत में लेने, उनके साथ मारपीट करने और झड़पों में उलझने की आवश्यकता आखिर क्या थी। उनके मुताबिक, ऐसी कार्रवाई पूरी तरह अनुचित थी। शंकरनारायणन ने अदालत से तत्काल लोगों की स्वतंत्र आवाजाही बहाल करने और सभी बैरिकेड हटाने का निर्देश देने की मांग की।
उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली में बिना पहचान-पत्र या बैज के पुलिसकर्मियों की मौजूदगी अब भी बनी हुई है। उन्होंने एक अन्य कानूनी सवाल भी उठाया। उनके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के तत्काल आसपास बीएनएसएस की धारा 163 लागू करने से पहले आवश्यक मंजूरी ली जानी चाहिए थी। उन्होंने अदालत से इस पहलू पर भी विचार करने का आग्रह किया।
दिल्ली पुलिस ने कहा, उसके जवानों के साथ भी हुई मारपीट
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अधिवक्ता जय अनंत देहाद्राई ने अदालत को बताया कि प्रदर्शन के दौरान कई पुलिसकर्मियों के साथ भी मारपीट की गई थी। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि अदालत इस आधार पर भेदभाव नहीं करती कि गलत व्यवहार का शिकार कौन हुआ है। जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा का उसका दायित्व सभी के लिए समान है।
जस्टिस बागची ने कहा कि पुलिस अधिकारियों को भी राज्य से अलग अपना कोई ऐसा व्यक्तिगत अधिकार प्राप्त नहीं है, जिसके आधार पर वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर मनमानी कर सकें। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल से मामले में अदालत की सहायता करने को कहा।
पीठ ने दोहराया कि जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को लेकर अदालत समान रूप से संवेदनशील है, चाहे मामला किसी पुलिस अधिकारी का हो या किसी आम नागरिक का। उसने कहा कि मामले में दाखिल सभी हस्तक्षेप आवेदनों को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा और संबंधित मामलों पर एक समेकित आदेश पारित किया जाएगा।
7000 से 8000 लोगों को हिरासत में लेने का दावा
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने दावा किया कि लगभग 7,000 से 8,000 लोगों को हिरासत में लिया गया था। उन्होंने इस कार्रवाई के संदर्भ में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर सवाल उठाया। राजनीतिक नेताओं की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका दायर करने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि मामला केवल अदालत की अवमानना तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, राज्य ने युवाओं को उस चुनाव प्रणाली के खिलाफ संवैधानिक तरीके से विरोध करने से भी रोका, जिसे वे अनुचित मानते हैं।
गुरुस्वामी ने कहा कि दांव पर इससे कहीं अधिक गंभीर सवाल है। उन्होंने इसे नागरिकों के शांतिपूर्ण ढंग से इस्तेमाल किए जाने वाले संवैधानिक अधिकारों के निलंबन का मामला बताया। उन्होंने कहा कि पिछली बार अदालत को इस तरह की मांगों और चुनौतियों पर विचार करना पड़ा था, तब देश में आपातकाल लागू था। उनकी दलील का मूल सवाल यह था कि यदि नागरिकों को चुनाव प्रणाली पर सवाल उठाने और उसके खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने से रोका जाता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनके संवैधानिक अधिकारों का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है।
केंद्र का दावा- मेट्रो सेवाओं में कोई कटौती नहीं हुई
याचिकाकर्ताओं की दलीलों का जवाब देते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों को पहले ही रिहा किया जा चुका है। मेट्रो सेवाओं को लेकर उन्होंने दावा किया कि किसी भी मेट्रो सेवा में कटौती नहीं की गई। उनके अनुसार, 10 अक्टूबर को मेट्रो के कुल परिचालन में कोई कमी नहीं हुई और ट्रेनें निर्धारित मानकों के अनुसार चलाई गईं।
हालांकि, मेट्रो स्टेशन बंद किए जाने के सवाल पर मेहता ने बताया कि दिल्ली मेट्रो नेटवर्क में कुल 303 स्टेशन हैं, जिनमें से केवल 45 स्टेशन बंद किए गए थे। उन्होंने इसे कुल स्टेशनों का लगभग 15 प्रतिशत बताया। उनका यह भी कहना था कि 10 अक्टूबर को रात 10 बजे के बाद सभी स्टेशन खोल दिए गए थे।
इस पर जस्टिस बागची ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) से कहा कि वह मेट्रो के नक्शे पर बंद किए गए स्टेशनों की स्थिति स्पष्ट करे, ताकि अदालत घटनाक्रम को बेहतर तरीके से समझ सके। पीठ ने यह भी कहा कि वह ट्रेन सेवाओं से संबंधित जारी की गई एडवाइजरी देखना चाहेगी।
इस तरह सुनवाई में एक ओर याचिकाकर्ताओं ने मेट्रो स्टेशन बंद होने और लोगों की आवाजाही पर रोक के जरिए विरोध प्रदर्शन को बाधित करने का आरोप लगाया, वहीं केंद्र सरकार ने सेवाओं के समग्र परिचालन में कटौती से इनकार किया। अदालत ने इस विवाद के तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए संबंधित विवरण और दस्तावेज मांगे।
वकीलों के काम में बाधा नहीं डालने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए समय देने की बात कही कि किसी भी अधिवक्ता को अपने पेशेवर दायित्व निभाने से किसी भी तरह नहीं रोका जाए। अदालत ने केंद्र की ओर से मिले आश्वासन को भी दर्ज किया कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों के कामकाज में बाधा नहीं पहुंचाई जाएगी।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का व्यापक महत्व इस बात में है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाता है। अदालत ने जहां प्रशासन को कानून के तहत कार्रवाई करने की शक्ति से वंचित नहीं किया, वहीं यह भी स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण और निहत्थे नागरिकों की आवाजाही तथा विरोध के अधिकार को मनमाने प्रतिबंधों के जरिए बाधित नहीं किया जा सकता।





एक प्रश्न तो यह भी है कि आखिर 163 लगाने की जरूरत क्यों हुई। क्या इसे साबित करने के लिए सरकार के पास पर्याप्त सबूत हैं कि ऐसे किसी घटना की आशंका थी कि आम जनता या सार्वजनिक रूप से किसी भी संस्थान को नुकसान पहुंचाया जा सकता है।
बहुत ही सार्थक एवं तथ्य परक आलेख के लिए आभार। यह क्रम आगे भी जारी रखने के लिए ढ़ेर सारी शुभकामनाएं।