लोकतंत्र की जंग या चुनावी टकराव? खड़गे के बयान से गरमाई सियासत

बैलेट पेपर से चुनाव कराने, SIR रोकने और पिछले दो वर्षों में हुए विधानसभा चुनाव रद्द करने की मांग; कांग्रेस अध्यक्ष ने भाजपा-आरएसएस की विचारधारा, जातिगत भेदभाव और चुनाव आयोग की भूमिका पर उठाए सवाल।

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी राजनीतिक संघर्ष अब सिर्फ नाम जोड़ने और मिटाने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। यह विवाद चुनावी पारदर्शिता, संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही और लोकतंत्र में जनता के भरोसे का सवाल बनता जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने रविवार को बिहार की राजधानी पटना में इस संघर्ष को ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ करार देते हुए केंद्र की भाजपा सरकार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोला। उन्होंने SIR तत्काल रोकने, भविष्य के सभी चुनाव बैलेट पेपर से कराने और पिछले दो वर्षों में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग की।

बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह, जिन्हें ‘श्री बाबू’ के नाम से जाना जाता है, की 139वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में खड़गे ने SIR के खिलाफ चल रहे विरोध को देशव्यापी आंदोलन का रूप देने की अपील की। उनका संदेश साफ था कि मतदाता सूची की प्रक्रिया पर भरोसे से जुड़े सवालों को केवल प्रशासनिक कवायद मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। जब किसी नागरिक के मतदान के अधिकार पर मतदाता सूची में उसके नाम की मौजूदगी निर्भर करती है, तब नाम जोड़ने, हटाने और पात्रता की जांच करने वाली प्रक्रिया का पारदर्शी होना अनिवार्य है। यही वह बिंदु है जहां SIR का विवाद एक व्यापक संवैधानिक बहस में बदलता दिखाई देता है।

खड़गे ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में कथित हेरफेर और विपक्षी समर्थकों के नाम हटाए जाने की शिकायतें चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती हैं। उन्होंने मांग की कि SIR को तत्काल रोका जाए और जिन मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, उन्हें बहाल करने की प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए। उनका तर्क है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से जनता को केवल आदेशों और प्रक्रियाओं का हवाला नहीं, बल्कि ऐसे सवालों पर स्पष्ट जवाब भी मिलने चाहिए जिनका सीधा संबंध मताधिकार से है।

SIR: वोटरों की पहचान या वोट के अधिकार की परीक्षा?

SIR के समर्थकों की दलील यह हो सकती है कि मतदाता सूची को अपडेट रखना और उसमें गलत या दोहराई गई प्रविष्टियों की पहचान करना चुनावी व्यवस्था की जरूरत है। लेकिन ऐसी प्रक्रिया की वैधता और विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि उसका संचालन किस तरह से किया जा रहा है। यदि दस्तावेज जुटाने में कठिनाई, प्रशासनिक त्रुटि, तकनीकी समस्या या सत्यापन की जटिलताओं के कारण पात्र मतदाता प्रभावित होते हैं, तो उनके लिए सुधार और अपील का प्रभावी रास्ता उपलब्ध होना चाहिए। मतदाता सूची की शुद्धता और मताधिकार की रक्षा एक-दूसरे के विरोधी लक्ष्य नहीं हैं; किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को दोनों के बीच संतुलन बनाना होता है।

यहीं चुनाव आयोग की जवाबदेही का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया, नाम हटाने के कारण, आपत्तियों के निपटारे और सुधार के अवसरों के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए। यदि विपक्ष किसी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का आरोप लगाता है, तो उसकी जांच सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। प्रभावित मतदाताओं की शिकायतों, पुराने और नए आंकड़ों तथा संबंधित अधिकारियों के रिकॉर्ड की जांच जरूरी है। इसी तरह, किसी आरोप को प्रमाणित तथ्य मान लेने के बजाय उसके समर्थन में उपलब्ध साक्ष्यों को भी परखा जाना चाहिए।

खड़गे ने इस विवाद को और आगे बढ़ाते हुए पिछले दो वर्षों में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग की। यह एक व्यापक राजनीतिक मांग है, जिसके कानूनी और संवैधानिक परिणाम भी गंभीर होंगे। किसी चुनाव को रद्द करने का सवाल सिर्फ राजनीतिक असहमति से तय नहीं हो सकता; उसके लिए संबंधित कानून, सक्षम प्राधिकार और प्रमाणों के आधार पर प्रक्रिया जरूरी है। फिर भी, खड़गे के बयान का राजनीतिक संदेश स्पष्ट है: कांग्रेस चुनावी प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों को अलग-अलग शिकायतों के बजाय लोकतांत्रिक जवाबदेही के बड़े मुद्दे के रूप में सामने लाना चाहती है।

बैलेट पेपर की वापसी: भरोसे की बहस का नया मोर्चा

कांग्रेस अध्यक्ष ने भविष्य के सभी चुनाव बैलेट पेपर से कराने की मांग भी दोहराई। उनका कहना है कि कागजी मतपत्रों से पारदर्शिता सुनिश्चित करने और चुनावी प्रक्रिया में जनता का भरोसा बहाल करने में मदद मिल सकती है। यह मांग ऐसे समय उठाई गई है जब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों, मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज हो रही है। सरकार और चुनाव आयोग के सामने चुनौती यही है कि चुनावी व्यवस्था के प्रति उठ रहे संदेहों का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रियाओं और सत्यापन योग्य तथ्यों से दिया जाए। दूसरी ओर, विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह जिन चुनावों को रद्द करने या जिन नतीजों को अवैध ठहराने की मांग कर रहा है, उनके समर्थन में ठोस और जांच योग्य साक्ष्य सामने रखे। हालांकि मामला यहीं आकर फंस रहा है। विपक्ष आरोपों के समर्थन में जो कुछ दस्तावेज सामने रख रहा है, चुनाव आयोगी उसका जवाब नहीं दे रहा है।

भाजपा-आरएसएस पर खड़गे ने किया हमला

खड़गे ने अपने भाषण में चुनावी प्रक्रिया से आगे बढ़कर भाजपा और आरएसएस की विचारधारा को भी निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह विचारधारा देश में सामाजिक विभाजन को गहरा कर रही है और जब तक आरएसएस की विचारधारा समाप्त नहीं होगी, देश में शांति स्थापित नहीं हो सकती। यह कांग्रेस अध्यक्ष का तीखा राजनीतिक वक्तव्य था, जिसके जरिए उन्होंने चुनावी विवाद को संविधान, समानता और सामाजिक सौहार्द की बहस से जोड़ने की कोशिश की।

खड़गे ने कहा कि कांग्रेस की राजनीति एकता, समानता और संविधान में विश्वास पर आधारित है, जबकि उनके आरोप में भाजपा राजनीतिक लाभ के लिए समाज को बांटने का काम करती है। इस टकराव को केवल दो राजनीतिक दलों के बीच सत्ता की लड़ाई के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके भीतर धर्म, जाति, सामाजिक पहचान और संवैधानिक मूल्यों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोणों की प्रतिस्पर्धा भी मौजूद है। हालांकि, भाजपा और आरएसएस पर लगाए गए आरोपों को खड़गे के राजनीतिक आंकलन के रूप में ही देखा जाना चाहिए; उनका मूल्यांकन संबंधित घटनाओं, नीतियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए।

इस संदर्भ में खड़गे का जोर इस बात पर था कि चुनावी अधिकार और सामाजिक समानता को अलग-अलग मुद्दों की तरह नहीं देखा जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर सकती है, जब नागरिकों को बिना भेदभाव मतदान करने, सार्वजनिक संस्थानों तक पहुंचने और अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने का अवसर मिले। यही वजह है कि उन्होंने अपने भाषण में SIR, कथित वोट चोरी और जातिगत भेदभाव को एक ही व्यापक राजनीतिक विमर्श के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया।

छुआछूत और शुद्धिकरण पर भी उठाए सवाल

खड़गे ने जाति आधारित भेदभाव और छुआछूत की प्रथाओं पर भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था के नाम पर किसी व्यक्ति को अपमानित करना या सामाजिक रूप से अलग-थलग करना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। उन्होंने ‘शुद्धिकरण’ जैसी प्रथाओं को लेकर कार्रवाई की मांग की और कहा कि उनकी लड़ाई धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर किए जाने वाले भेदभाव के खिलाफ है।

उन्होंने दलितों के लिए देश के हर मंदिर में बिना किसी भेदभाव प्रवेश करने और पूजा करने के अधिकार की बात कही। यह मुद्दा संविधान में निहित समानता और गरिमा के सिद्धांत से जुड़ा है। किसी नागरिक की जाति के आधार पर उसके साथ अलग व्यवहार किया जाना केवल सामाजिक तनाव का विषय नहीं, बल्कि उसके बुनियादी अधिकारों और सार्वजनिक जीवन में समान भागीदारी का सवाल भी है।

खड़गे ने राहुल गांधी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी पर भी सवाल उठाए। राहुल गांधी उत्तराखंड के हल्द्वानी में कथित ‘शुद्धिकरण’ की घटना के विरोध में पहुंचे थे। खड़गे ने कहा कि इस प्रकरण में राहुल गांधी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होना उन लोगों के लिए उपलब्ध जगह पर सवाल उठाता है जो स्थापित सामाजिक प्रथाओं को चुनौती देते हैं। इस मामले में वास्तविक घटनाक्रम, प्राथमिकी का आधार और संबंधित पक्षों के बयान अलग-अलग जांचे जाने चाहिए; केवल प्राथमिकी दर्ज होने से किसी पक्ष का दोष या निर्दोष होना तय नहीं हो जाता।

खड़गे का यह तर्क कि आस्था लोगों को जोड़ने का माध्यम होनी चाहिए, उन्हें बांटने का नहीं, उनके भाषण का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। उन्होंने अपनी धार्मिक आस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि सामाजिक समानता की मांग को धर्म-विरोधी अभियान के रूप में पेश करना उचित नहीं है। इस तरह उन्होंने भाजपा पर अपने हमले को केवल चुनावी विवाद तक सीमित न रखकर सामाजिक न्याय और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रश्नों से भी जोड़ा।

नीतीश कुमार पर भी खड़गे ने साधा निशाना

बिहार के राजनीतिक संदर्भ में खड़गे ने जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष नीतीश कुमार पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार कभी राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी नेताओं की राजनीति के साथ खड़े दिखाई देते थे, लेकिन अब भाजपा के साथ उनका गठबंधन उस राजनीतिक विरासत से अलग नजर आता है। खड़गे ने इसे समाजवादी मूल्यों और मौजूदा राजनीतिक साझेदारी के बीच विरोधाभास के रूप में पेश किया।

खड़गे का यह हमला बिहार में विचारधारा और गठबंधन की राजनीति के बीच संबंध को केंद्र में लाता है। भारतीय राजनीति में दलों के गठबंधन समय के साथ बदलते रहे हैं, लेकिन ऐसे बदलावों के साथ उनके पुराने वैचारिक दावों और वर्तमान राजनीतिक फैसलों की तुलना भी होती है। खड़गे का बयान इसी विरोधाभास को उभारने की कोशिश करता है।

राम मंदिर के चंदे पर भी भाजपा को घेरा

खड़गे ने अयोध्या के राम मंदिर को दिए गए चंदे को लेकर उठे विवाद पर भी भाजपा को घेरा। उन्होंने भगवान राम का उल्लेख करते हुए उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की जिन पर राम के नाम पर धन के दुरुपयोग के आरोप हैं। यह बयान धार्मिक आस्था और राजनीतिक जवाबदेही के संबंध को लेकर था। हालांकि, किसी व्यक्ति या संस्था पर धन की हेराफेरी का आरोप तभी स्थापित माना जा सकता है जब उसके समर्थन में विश्वसनीय साक्ष्य और जांच के निष्कर्ष उपलब्ध हों। खड़गे का व्यापक संदेश यह था कि धर्म, जाति या राष्ट्रवाद के नाम पर राजनीतिक समर्थन मांगने वाले किसी भी पक्ष को जवाबदेही से अलग नहीं रखा जा सकता। यदि किसी धार्मिक परियोजना के चंदे को लेकर गंभीर शिकायतें हैं, तो उनकी जांच पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए। इस मुद्दे को राजनीतिक आरोपों के स्तर से आगे ले जाने के लिए वित्तीय रिकॉर्ड, संबंधित संस्थाओं के जवाब और जांच के निष्कर्षों को देखना जरूरी है।

कुल मिलाकर खड़गे के पटना भाषण ने चुनावी प्रक्रिया, सामाजिक समानता और राजनीतिक विचारधारा को एक व्यापक बहस में जोड़ दिया है। SIR रोकने, बैलेट पेपर से चुनाव कराने और पिछले दो वर्षों के विधानसभा चुनाव रद्द करने की उनकी मांगें बताती हैं कि कांग्रेस मौजूदा विवाद को सिर्फ चुनावी प्रशासन का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भरोसे से जुड़ा संकट मानकर पेश कर रही है। भाजपा और आरएसएस पर सामाजिक विभाजन के आरोप, नीतीश कुमार के गठबंधन पर टिप्पणी और जातिगत भेदभाव के खिलाफ कार्रवाई की मांग इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं।

लेकिन लोकतंत्र की मजबूती के लिए सिर्फ तीखे भाषण या बड़े राजनीतिक दावे पर्याप्त नहीं हो सकते। एक तरफ चुनाव आयोग को मतदाता सूची से जुड़े सवालों का पारदर्शी और तथ्यपरक जवाब देना चाहिए, वहीं विपक्ष को अपने आरोपों के समर्थन में जांच योग्य प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे। लोकतंत्र की असली परीक्षा इसी में है कि नागरिक का मताधिकार किसी राजनीतिक दल की कृपा पर नहीं, बल्कि निष्पक्ष और जवाबदेह व्यवस्था पर आधारित हो। मतदाता सूची की शुद्धता, मतदान की विश्वसनीयता और सामाजिक समानता- तीनों पर सवाल उठने की स्थिति में संस्थाओं की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। खड़गे ने इसे ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ का नाम दिया है; इस राजनीतिक रूपक से सहमति या असहमति अलग विषय है, लेकिन इससे उठे बुनियादी सवालों का जवाब पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और संविधानसम्मत कार्रवाई के जरिए देना ही होगा।

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प्रवीण कुमार
पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव रखता हूं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के साथ काम करते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर निरंतर लेखन करता आ रहा हूं। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं और डिजिटल मीडिया कंसल्टेंसी से भी जुड़ा हूं। बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और भगवत गीता के विचार मेरे लेखन और जीवन-दृष्टि को दिशा देते हैं।

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