संसद के बाहर सजी जन-अदालत; CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का जन-महाभियोग प्रस्ताव पारित!

खड़गे ने रखे छह आरोप, राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव को बताया अवैध; नेहा बोरा ने कहा- सिर्फ महाभियोग नहीं, जेल भेजे जाने चाहिए मुख्य चुनाव आयुक्त। सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, तेजस्वी यादव, योगेंद्र यादव, कपिल सिब्बल और महुआ मोइत्रा समेत विपक्षी नेताओं की मौजूदगी।

देश की चुनावी व्यवस्था, मतदाता सूची और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता को लेकर जारी राजनीतिक टकराव शनिवार 31 अक्टूबर 2026 को एक नए मुकाम पर पहुंच गया। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन INDIA ने दिल्ली में जन-महाभियोग की प्रतीकात्मक कार्यवाही आयोजित की। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के सरकारी आवास 10, राजाजी मार्ग पर आयोजित इस मॉक संसद में विपक्षी दलों के नेताओं, सांसदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। करीब 3 घंटे 23 मिनट तक चली इस कार्यवाही में खड़गे की ओर से पेश किया गया जन-महाभियोग प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया।

इस आयोजन की अध्यक्षता लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार ने की। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया, जबकि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने समापन संबोधन में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और 2024 के लोकसभा चुनाव की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए। कांग्रेस सहित 19 विपक्षी दलों के करीब 215 सांसदों की भागीदारी वाले इस आयोजन में विपक्ष ने यह संदेश देने की कोशिश की कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवाल अब केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नागरिक समाज और आम मतदाताओं के बीच भी पहुंच चुके हैं।

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इस जन-महाभियोग का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यही था कि जब संसद के भीतर संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ विपक्ष की आवाज को पर्याप्त जगह नहीं मिलती, तब विपक्ष संसद के बाहर जनता के बीच अपनी बात रखने का रास्ता चुनता है।

मल्लिकार्जुन खड़गे ने पेश किया 6 आरोपों वाला प्रस्ताव

कार्यवाही की शुरुआत राष्ट्रगान के साथ हुई। इसके बाद पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अध्यक्षता संभाली। प्रस्ताव पेश करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ व्यक्तिगत दुश्मनी की लड़ाई नहीं है, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बचाने का सवाल है।

खड़गे ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के निर्देशों पर चुनाव आयोग का संचालन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से देश निष्पक्षता और स्वतंत्रता की उम्मीद करता है, लेकिन मौजूदा हालात में उसकी भूमिका को लेकर गंभीर सवाल पैदा हो गए हैं।

खड़गे ने अपने प्रस्ताव में छह प्रमुख आरोप रखे। इनमें चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने, मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाने, एसआईआर की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, फॉर्म-6 में कथित बदलाव, ईसीआईनेट के माध्यम से मतदाता सूची पर केंद्रीकृत नियंत्रण और चुनाव आयोग के भीतर संस्थागत असहमति को पर्याप्त महत्व नहीं देने जैसे मुद्दे शामिल थे।

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उन्होंने दावा किया कि मतदाता सूची से करीब 13.2 करोड़ नाम हटाए जाने का मामला लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है। खड़गे ने कहा कि कमजोर वर्गों, महिलाओं और युवाओं के मताधिकार की रक्षा करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है। किसी कंप्यूटर सिस्टम के जरिए किसी नागरिक का वोट देने का अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।

खड़गे ने यह भी याद दिलाया कि करीब सात महीने पहले विपक्ष के 193 सांसदों ने संसद के दोनों सदनों में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए नोटिस दिया था, लेकिन उन पर आगे कार्रवाई नहीं हुई। उनके मुताबिक, जब संसद में इस विषय पर सुनवाई का रास्ता बंद हो गया, तब विपक्ष को जनता के बीच यह कार्यवाही आयोजित करनी पड़ी।

खड़गे ने कहा- हमारी मांग है कि सीईसी को तत्काल पद से हटाकर 2023 का कानून रद़्द हो। SIR को रोका जाए। संविधान बनाने वालों ने वोट का अधिकार सबको दिया है। हर नागरिक को बराबरी का दर्जा दिया। कई देश अमेरिका, यूके, फ्रांस आजादी मिलने या लोकतंत्र के बाद महिलाओं को वोट का अधिकार नहीं दिए, सिर्फ भारत ही ऐसा देश है, जहां संविधान लागू होते ही हर नागरिक को एक वोट का अधिकार दिया गया।

खड़गे ने कहा कि 2014 के बाद सत्ता हासिल करने और उसे बनाए रखने के लिए तमाम संस्थागत तरीकों का इस्तेमाल किया गया। उनके आरोपों में राजनीतिक दलों को तोड़ने, निर्वाचित सरकारों को गिराने और केंद्रीय जांच एजेंसियों के इस्तेमाल के साथ अब मतदाता सूची को लेकर उठ रहे सवाल भी शामिल थे। उन्होंने मांग की कि ज्ञानेश कुमार को पद से हटाया जाए, एसआईआर की मौजूदा प्रक्रिया रोकी जाए और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून की समीक्षा की जाए।

राहुल गांधी का बड़ा हमला, बोले- 2024 का चुनाव अवैध

राहुल गांधी ने अपने संबोधन में चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष के आरोपों को और आक्रामक राजनीतिक स्वर दिया। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव को पूरी तरह अवैध ठहराते हुए कहा कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का पूरा समर्थन करते हैं। राहुल ने कहा कि उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए और उन्हें न्याय के दायरे में लाया जाना चाहिए।

राहुल गांधी ने दावा किया कि एसआईआर के तहत 13 करोड़ से ज्यादा (करीब 15 फीसदी) मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। यह संख्या देश के हर सात में से एक व्यक्ति के बराबर है। राहुल के मुताबिक, इन लोगों ने पिछले लोकसभा चुनाव में मतदान किया था।

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राहुल गांधी ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग जैसे गंभीर विषय पर चर्चा करने के लिए विपक्ष को संसद के बजाय एक राजनीतिक नेता के आवास के बगीचे में बैठना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह कितनी अजीब स्थिति है कि देश की संवैधानिक संस्थाओं के दरवाजे विपक्ष के लिए बंद होते जा रहे हैं और उसे अपनी बात रखने के लिए संसद के बाहर वैकल्पिक मंच तैयार करना पड़ रहा है।

राहुल ने कहा कि ज्ञानेश कुमार को यह नहीं समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का राजनीतिक संरक्षण उन्हें हमेशा बचा लेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष के खुलासों के बावजूद सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त को पद पर बनाए रखने पर अड़ी रहती है, तो इससे जनता के सामने कई सवाल खड़े होंगे।

उन्होंने कहा कि भाजपा चुनावों में धांधली करती रहे, लेकिन देश की जनता और विपक्ष के सदस्य इसे न तो भूलेंगे और न ही माफ करेंगे। राहुल के मुताबिक, मौजूदा राजनीतिक हालात में विपक्ष के हाथ एक नया राजनीतिक हथियार लगा है और यह आने वाले समय में सत्ता पक्ष के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

राहुल गांधी ने कहा कि जो लोग आज सड़कों पर उतरकर अपने मताधिकार की रक्षा की मांग कर रहे हैं, वे यह नहीं भूलेंगे कि उनके साथ क्या हुआ। उनका संदेश साफ था कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का जवाब केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं दिया जा सकता। चुनाव आयोग को अपनी कार्यप्रणाली के बारे में देश के सामने जवाब देना होगा।

नेहा बोरा बोलीं- SIR लोकतंत्र को बर्बाद करने की साजिश

जन-महाभियोग में छात्र राजनीति की प्रतिनिधि और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा का संबोधन खास चर्चा में रहा। उन्होंने इस पूरी कार्यवाही को केवल विपक्षी दलों का राजनीतिक कार्यक्रम मानने से इनकार किया और इसे आम नागरिकों के मताधिकार से जोड़कर देखा। नेहा ने कहा- जिन लोगों ने इस देश के लोगों की इज्जत नहीं की, न आजादी की इज्जत की। उन्हें न सिर्फ महाभियोग से हटाया जाएगा बल्कि सलाखों के पीछे भी डाला जाएगा। SIR एक सोची समझी साजिश है इस लोकतंत्र को बर्बाद करने की।

नेहा बोरा ने कहा कि देश की जनता लंबे समय से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई की मांग कर रही थी। अगर संसद में बैठे सत्ताधारी दल वास्तव में जनता के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहे होते, तो आज जिस तरह की कार्यवाही खड़गे के आवास पर आयोजित करनी पड़ रही है, वह देश की असली संसद के भीतर हो रही होती।

उन्होंने आरोप लगाया कि किसी खास राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के लिए संवैधानिक पद का दुरुपयोग किया गया है। नेहा का संबोधन इस लिहाज से महत्वपूर्ण था कि इस पूरे विवाद को विपक्षी दलों की सत्ता की लड़ाई से आगे बढ़ाकर छात्र समुदाय और आम नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ने की कोशिश की गई। नेहा ने मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और तकनीकी प्रणालियों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए।

215 सांसद, 19 दल और जनता की अदालत का संदेश

इस जन-महाभियोग कार्यक्रम में INDIA गठबंधन के 19 दलों के करीब 215 सांसदों ने शिरकत की। इनमें कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत राय, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव, माकपा सांसद जॉन ब्रिटास और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पी. संदोश कुमार सहित विपक्ष के कई अन्य नेता और सांसद मौजूद रहे।

राजनीतिक दलों के नेताओं के अलावा नागरिक समाज के कई प्रतिनिधियों ने भी इस कार्यवाही में हिस्सा लिया। इनमें सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और निखिल डे शामिल थे। छात्र नेताओं के साथ-साथ ऐसे कुछ लोग भी इस मॉक संसद की कार्यवाही में शामिल हुए, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। इस तरह कार्यक्रम में राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ उन नागरिकों की भागीदारी भी देखने को मिली, जो मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के कारण सीधे तौर पर प्रभावित होने का दावा कर रहे हैं।

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वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल की मौजूदगी ने इस आयोजन को संवैधानिक और कानूनी बहस का आयाम दिया। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही इस विवाद के महत्वपूर्ण पहलू हैं। स्वराज इंडिया से जुड़े सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की भागीदारी ने इस आयोजन को विपक्षी दलों की सीमाओं से आगे नागरिक समाज और व्यापक लोकतांत्रिक बहस से जोड़ने का संकेत दिया।

योगेंद्र यादव लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया, मतदाता सूची और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सवालों पर सक्रिय रहे हैं। उनके लिए मतदाता सूची में किसी भी तरह की अपारदर्शिता केवल प्रशासनिक चूक का मामला नहीं, बल्कि नागरिक के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा प्रश्न है। किसी नागरिक का नाम सूची से हटने का अर्थ केवल एक दस्तावेज में बदलाव नहीं, बल्कि उसके मताधिकार पर असर पड़ना है।

वहीं महुआ मोइत्रा ने चुनाव आयोग की जवाबदेही और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर विपक्ष की एकजुटता का समर्थन किया है। उन्होंने पहले भी कहा था कि एसआईआर की कथित अनुचित प्रक्रिया और उसके जरिए मतदाताओं के अधिकारों पर पड़ने वाले असर को राजनीतिक रूप से सामने लाना जरूरी है। उनके मुताबिक, इस मुद्दे पर विपक्षी दलों की एकजुटता का मकसद मुख्य चुनाव आयुक्त को जवाबदेह ठहराना है।

कार्यवाही में केवल सांसदों और राजनीतिक नेताओं को ही नहीं, बल्कि उन नागरिकों को भी अपनी बात रखने का अवसर दिया गया जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। यह इस आयोजन का एक महत्वपूर्ण पक्ष था। प्रस्ताव पारित होने के बाद विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और एसआईआर पर रोक लगाने की अपनी मांग दोहराई। हालांकि इस प्रस्ताव का कोई स्वतः कानूनी प्रभाव नहीं है और इससे ज्ञानेश कुमार का पद समाप्त नहीं होता। यह राजनीतिक विरोध और सार्वजनिक जवाबदेही की मांग का प्रतीकात्मक प्रदर्शन है।

संसद के बाहर महाभियोग, भीतर उठेंगे जवाबदेही के सवाल?

विपक्ष के इस आयोजन ने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका को बहस के केंद्र में ला दिया है। चुनाव आयोग केवल चुनाव कराने वाली प्रशासनिक संस्था नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता के गठन की निष्पक्षता सुनिश्चित करने वाली संवैधानिक संस्था है। इसलिए उसकी विश्वसनीयता पर उठने वाले सवालों का महत्व किसी सामान्य राजनीतिक विवाद से कहीं अधिक है।

INDIA bloc public impeachment of Gyanesh Kumar

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब किस तरह देता है। क्या मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है? क्या एसआईआर में नागरिकों को पर्याप्त अवसर और सुरक्षा दी जा रही है? क्या चुनाव आयोग के फैसलों और तकनीकी प्रणालियों की स्वतंत्र जांच संभव है? और क्या संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही तय करने के लिए मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त है?

विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जन-महाभियोग पारित कर अपनी राजनीतिक और सार्वजनिक लड़ाई को एक नया मंच दिया है। अब निगाहें एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में होने वाली ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ महारैली पर हैं। असली कसौटी यह होगी कि विपक्ष अपने आरोपों को तथ्यों और दस्तावेजों के साथ कितनी मजबूती से देश के सामने रखता है और चुनाव आयोग इन सवालों का जवाब किस तरह देता है। क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं है। यह नागरिकों के भरोसे का आधार भी है। और जब इसी भरोसे पर सवाल उठने लगें, तो जवाबदेही की मांग को अनसुना करना किसी भी संवैधानिक व्यवस्था के लिए आसान नहीं होता।

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प्रवीण कुमार
पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव रखता हूं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के साथ काम करते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर निरंतर लेखन करता आ रहा हूं। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं और डिजिटल मीडिया कंसल्टेंसी से भी जुड़ा हूं। बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और भगवत गीता के विचार मेरे लेखन और जीवन-दृष्टि को दिशा देते हैं।

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