सुनहरे रेशे को फिर से चमकाने की चुनौती

कभी भारतीय अर्थव्यवस्था और ग्रामीण आजीविका का अहम आधार रहा जूट उद्योग आज प्लास्टिक और पॉलिएस्टर से मुकाबला कर रहा है। सरकारी नीतियों, तकनीकी नवाचार और जूट जियोटेक्सटाइल जैसे नए उत्पादों के जरिए इस पारंपरिक उद्योग में नई संभावनाएं तलाशने की कोशिश हो रही है।

इंद्र शेखर शाह

भारतीय अर्थव्यवस्था में कभी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखने वाले जूट आधारित कारोबार को गति देने के लिए सरकार भले ही प्रयासरत है, लेकिन प्लास्टिक और पॉलिएस्टर के सामने अभी भी इसकी मांग नहीं बढ़ पा रही है। भारत का जूट क्षेत्र टिकाऊ एवं समावेशी विकास का एक मुख्य आधार बन सकता है और इसके लिए सरकार प्रयासरत है। यह संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में लाखों किसानों, श्रमिकों, कारीगरों और उद्यमियों को सहारा देता है।

नीतिगत समर्थन, नवाचार और बेहतर उत्पादन के जरिए इस सेक्टर की प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने की दिशा में काम जारी है। जूट ग्रामीण आजीविका, पर्यावरण की स्थिरता और औद्योगिक विकास में योगदान देता है। इसकी बढ़ती अहमियत अपेक्षाकृत अधिक पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ सामग्रियों की दिशा में आगे बढ़ने के भारत के संकल्प को दर्शाती है। निरंतर निवेश, नवाचार और सामुदायिक भागीदारी के जरिए ही इस क्षेत्र की पूरी क्षमता का लाभ उठाया जा सकता है।

भारत में जूट का इतिहास तीसरी सदी ईसा पूर्व से शुरू होता है। हालांकि, एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक वस्तु के रूप में इसका प्रचलन ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान रणनीतिक सैन्य उपयोग की दृष्टि से अहम होने के कारण हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल में कई जूट मिलें स्थापित कीं, जिससे यह क्षेत्र जूट की खेती और उसके प्रसंस्करण का केंद्र बन गया। वर्ष 1947 में भारत की आजादी और उसके बाद हुए देश के बंटवारे ने बंगाल की जूट की समन्वित अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया।

जूट उगाने वाले लगभग 80 प्रतिशत इलाके पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) का हिस्सा बन गए। लेकिन अधिकांश जूट मिलें भारत में ही रह गईं, जिससे इन मिलों में प्रसंस्करण के लिए कच्चे माल की भारी कमी हो गई। इस असंतुलन को दूर करने के लिए सरकार ने सितंबर 1949 में “अधिक जूट उगाओ” अभियान शुरू किया। किसानों को धान की खेती छोड़कर जूट की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। परिणामस्वरूप, भारत में कच्चे जूट का उत्पादन 6.7 लाख टन (1951-52) से बढ़कर 14.56 लाख टन (1961-62) हो गया। यानी दोगुने से भी अधिक।

जूट पैकेजिंग अधिनियम, 1987 ने आवश्यक सामानों की पैकेजिंग के लिए जूट की बोरियों के उपयोग को अनिवार्य करके इस सेक्टर को और मजबूत किया। इस कदम से भारत के जूट किसानों के लिए एक स्थिर बाजार सुनिश्चित हुआ। समय के साथ जूट एक रणनीतिक हरित रेशे के रूप में उभरा और इसने ग्रामीण आजीविका एवं पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ औद्योगिक विकास में योगदान दिया।

वर्तमान में देश में कच्चे जूट की खेती में पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। इसके बाद बिहार, असम, ओडिशा और झारखंड का स्थान है। जूट की बुवाई आमतौर पर मार्च-अप्रैल में होती है और 100-110 दिनों में इसकी कटाई कर ली जाती है। यह गर्म एवं नमी वाले मौसम में अच्छी तरह पनपता है और फसल के बढ़ने के दौरान इसे 700-1,500 मिलीमीटर वर्षा की जरूरत होती है। कृषि-जलवायु संबंधी आवश्यकताओं को देखते हुए इसकी खेती मुख्य रूप से पूर्वी एवं पूर्वोत्तर भारत में होती है और यह अधिकांशतः वर्षा पर निर्भर होती है।

इस फसल को मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसान उगाते हैं। जूट भारत के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक रेशों में से एक है। कई तरह के उपयोगों और पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण इसे व्यापक महत्व दिया जाता है। व्यापार एवं उद्योग की दृष्टि से जूट और मेस्ता को एक जैसे उपयोग के कारण सामूहिक रूप से ‘कच्चा जूट’ के तौर पर वर्गीकृत किया जाता है। मेस्ता तने के रेशे (बास्ट फाइबर) वाली एक फसल है। इसे जूट के सस्ते विकल्प के तौर पर उगाया जाता है, खासकर कम वर्षा वाले कृषि-जलवायु क्षेत्रों में। अपने खास सुनहरे रंग और रेशम जैसी चमक के कारण जूट को आमतौर पर “सुनहरा रेशा” कहा जाता है।

भारत दुनिया में कच्चे जूट का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। खाद्यान्नों के उत्पादन के तीसरे अग्रिम अनुमान (2025-26) के अनुसार, जूट और मेस्ता का उत्पादन 2024-25 में 88.02 लाख गांठों से बढ़कर 2025-26 में 94.03 लाख गांठें हो गया है। भारत दुनिया में जूट के सामानों का भी सबसे बड़ा उत्पादक देश है और जुलाई 2026 तक अनुमानित वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग 75 प्रतिशत है।

भारत के पूर्वी क्षेत्र, खासकर पश्चिम बंगाल में जूट उद्योग का एक बड़ा औद्योगिक आधार है। यह उद्योग संगठित मिलों और विविध जूट इकाइयों में लगभग 3.70 लाख श्रमिकों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है। यह जूट की खेती में जुटे लगभग 40 लाख किसान परिवारों की आजीविका का साधन भी है। दिसंबर 2025 तक भारत में 120 कंपोजिट जूट मिलें हैं और अकेले पश्चिम बंगाल में इनमें से 89 मिलें स्थित हैं, जो सभी राज्यों की तुलना में सबसे अधिक है।

जूट के सामान के उत्पादन में भारत पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना हुआ है और देश में होने वाला उत्पादन राष्ट्रीय मांग को समुचित तरीके से पूरा करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में जूट के सामान की घरेलू खपत 12.05 लाख टन थी। यह जूट के सामान के कुल उत्पादन 12.80 लाख टन [मूल पाठ में इसके आगे का वाक्य अधूरा है]।

जूट जैविक रूप से अपघटनीय (बायोडिग्रेडेबल) और पुनर्चक्रण योग्य (रीसायकलेबल) ऐसा प्राकृतिक रेशा है, जो तेजी से उगता है, सस्ता है और आसानी से उपलब्ध है। यह मजबूत, टिकाऊ, हवादार और बहुमुखी उपयोग वाला रेशा है। इसका इस्तेमाल पैकेजिंग, निर्माण कार्य, खेती और औद्योगिक वस्त्र (इंडस्ट्रियल टेक्सटाइल) में किया जाता है। गर्मी एवं आवाज को रोकने की क्षमता, नमी सोखने की अधिक क्षमता और कम स्थैतिक विद्युत (स्टैटिक) पैदा करने समेत जूट में उपयोग की दृष्टि से कई अच्छे गुण भी होते हैं। यह प्राकृतिक और सिंथेटिक, दोनों प्रकार के रेशों के साथ अच्छी तरह घुलमिल जाता है। इससे कई तरह के मूल्यवर्धित और वस्त्र संबंधी उत्पाद बनाना आसान हो जाता है।

अफ्रीका, मध्य पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्रों में जूट की पत्तियों को लंबे समय से सब्जी के तौर पर खाया जाता रहा है। जापान में जूट की पत्तियों को स्वास्थ्यवर्धक भोजन के तौर पर व्यापक पहचान और लोकप्रियता मिली है। पोषण की दृष्टि से देखें तो जूट की पत्तियों में विटामिन, कैरोटीनॉयड, कैल्शियम, पोटैशियम और आहार फाइबर भरपूर मात्रा में होते हैं, जो इन्हें सेहत के लिए फायदेमंद भोजन का एक अहम स्रोत बनाते हैं। जूट की पत्तियों से एंटीऑक्सिडेंट हर्बल पेय और स्वास्थ्य देखभाल से जुड़े उत्पाद (हेल्थ केयर प्रोडक्ट) बनाने के लिए कारगर तकनीकें भी विकसित की गई हैं।

जूट से बना एक बहुउपयोगी और विविध उत्पाद जूट जियोटेक्सटाइल है, जो तकनीकी वस्त्र की श्रेणी में आता है। इसका उपयोग सिविल इंजीनियरिंग, मिट्टी के कटाव को रोकने, सड़क पर फुटपाथ बनाने और नदी के किनारों की सुरक्षा जैसे विविध क्षेत्रों में किया जा सकता है। जेजीटी को जूट के रेशों से खास शोधन एवं बुनाई की प्रक्रियाओं के जरिए बनाया जा सकता है। अपनी कार्यक्षमता, पर्यावरण के अनुकूल होने, अच्छे तकनीकी-भौतिक गुणों और किफायती कीमत के कारण इसे तेजी से अपनाया जा रहा है।

पर्यावरण की दृष्टि से जेजीटी पूर्ण रूप से जैव-अपघटनीय (बायोडिग्रेडेबल) है। इससे मिट्टी की बनावट और उर्वरता बेहतर होती है। इसके अलावा, जेजीटी को दुनिया भर में खराब हो चुकी भूमि पर मिट्टी को स्थिर करने, कटाव रोकने और पर्यावरण को बहाल करने का एक असरदार प्राकृतिक समाधान माना जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह मिट्टी का तापमान कम रखकर और सतह में कम से कम छेड़छाड़ करके सूक्ष्म पर्यावरण को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसलिए यह बीजों के अंकुरण और पौधों के शुरुआती विकास में सहायक होता है।

जूट जियोटेक्सटाइल को सिविल इंजीनियरिंग, मिट्टी के संरक्षण और बुनियादी ढांचे के विकास में अलग-अलग कामों के लिए एक असरदार प्राकृतिक सामग्री के तौर पर पहचान मिली है। इसका उपयोग बड़े पैमाने पर मिट्टी के बांधों, पहाड़ी कटाई वाली जगहों, नदी के किनारों, नहरों और बारिश का पानी जमा करने वाली संरचनाओं में ढलान की सुरक्षा के लिए किया जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसकी शुरुआती तन्यता संबंधी सामर्थ्य (टेंसाइल स्ट्रेंथ) अधिक होती है और इसकी सतह का खुरदरापन मिट्टी को स्थिर करने एवं कटाव को कम करने में मदद करता है।

सड़क और माल ढुलाई वाले मार्गों के निर्माण के साथ-साथ रेलवे ट्रैक के निर्माण में जेजीटी भार वितरण और नियंत्रण में सुधार करता है। इससे रखरखाव की आवश्यकताएं और जीवनचक्र की लागत कम हो जाती हैं। खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में गुप्त जल निकासी प्रणालियों में इसका उपयोग मिट्टी के खिसकने को रोकते हुए पानी के नियमित प्रवाह को संभव बनाता है। जेजीटी का उपयोग पूर्वनिर्मित ऊर्ध्वाधर नालियों के जरिए नरम मिट्टी को स्थिर करने, संघनन को तेज करने और भार वहन क्षमता बढ़ाने के लिए भी किया जाता है। हाल के वर्षों में राष्ट्रीय जूट बोर्ड इंजीनियरिंग की एक सामग्री के तौर पर जूट जियोटेक्सटाइल को विकसित करने और बढ़ावा देने के कार्य में सक्रिय रूप से जुटा हुआ है। बोर्ड अंतिम उपयोगकर्ताओं को तकनीकी सहायता देता है, जिसमें डिजाइन संबंधी जरूरतों, खरीद की प्रक्रियाओं, जांच के तरीकों और तैनाती के तरीकों के बारे में मार्गदर्शन शामिल है।

सरकार ने भारत के जूट क्षेत्र को मजबूत करने के लिए लगातार कई नीतिगत उपाय किए हैं। इनमें कच्चे जूट के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी शामिल है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए कच्चे जूट का एमएसपी 5,925 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है। इससे पूरे भारत में उत्पादन की औसत लागत पर 61.8 प्रतिशत रिटर्न मिलना सुनिश्चित होगा। यह वित्त वर्ष 2014-15 में कच्चे जूट के एमएसपी (2,400 रुपये प्रति क्विंटल) की तुलना में लगभग 147 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। जूट किसानों को दी जाने वाली एमएसपी की रकम में भी समय के साथ बढ़ोतरी हुई है। वित्त वर्ष 2004-05 से वित्त वर्ष 2013-14 की अवधि के दौरान भुगतान की गई रकम 441 करोड़ रुपये थी। वित्त वर्ष 2014-15 से वित्त वर्ष 2025-26 के बीच यह बढ़कर 1,342 करोड़ रुपये हो गई है।

सरकार ने ‘जूट पैकेजिंग सामग्री (सामानों की पैकिंग में अनिवार्य उपयोग) अधिनियम’ भी लागू किया है। इसमें उन सामानों और उस सीमा के बारे में बताया गया है, जिनके लिए जूट पैकेजिंग सामग्री का उपयोग अनिवार्य है। सरकार ने शत-प्रतिशत अनाज और 20 प्रतिशत चीनी की पैकिंग जूट के बोरों में करना अनिवार्य कर दिया है। राष्ट्रीय जूट विकास कार्यक्रम (एनजेडीपी) जूट क्षेत्र के विकास एवं प्रोत्साहन की एक मुख्य योजना है। इसे राष्ट्रीय जूट बोर्ड द्वारा वित्त वर्ष 2021-22 से 2025-26 के दौरान 485.58 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ लागू किया जा रहा है। यह खेती की उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ दो मुख्य हिस्सों- जूट-आईकेयर और जूट विविधीकरण योजना के जरिए विविधता लाने पर भी ध्यान देता है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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