आखिर क्यों उगते हैं कालाहांडी और डेंगलमाल जैसे कुकुरमुत्ते?

देश के बेहद पिछड़ा-गरीब और बदनसीब कहे जाने वाले इलाकों की सच्चाईयां भी अजीब किस्म की हैं। कहने के लिए कई किस्मों की रोजगारपरक योजनाएं देश भर में चलाकर समाज के आखिरी छोर तक लोगों को आत्मनिर्भर बनाये जाने की दावेदारियां की जाती रहीं हैं।

लेकिन समाज के सबसे नीचे का सच न सिर्फ विरोधाभासी है बल्कि वहां की वास्तविकताएं लोकमानस के लिए चिंताओं की पोटली है। आजादी मिलने के पहले तक भारत के सुदूरवर्ती इलाके श्रम की प्रतिष्ठा के अद्भुत केंद्र रहे हैं। वहां की सामाजिक और सांस्कृतिक अवधारणा समरसता और सामुदायिकता पर आश्रित रही है।

इस वजह से भारत के गांव अपने आप में प्रौद्योगिकी, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और अंतर्जातीय संबंधों के ऐसे मजबूत आधार थे जहां स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, धर्म, परिवार और कृषि की शानदार परम्पराओं को पोसने वाला एक बेहद मजबूत समाज था। आज उन इलाकों में विकास आया तो निर्माण और सुविधाओं के चंद फलसफे जरूर लिखे गए किन्तु कुप्रवृत्तियों की मौजूदगी वहाँ आज भी दिखती है।

उदाहरण के लिए देश के पूर्वी राज्य झारखंड और पश्चिमी प्रदेश महाराष्ट्र के सामाजिक हालात पर नजर डालिये तो वहां आजादी अभी भी कोसों दूर दिखती है। यदि ओडिशा की सामाजिक और सांस्कृतिक अवधारणा बेतरह शिथिल, अदक्ष और भ्रष्ट प्रशासन के चंगुल में दम तोड़ चुकी है तो महाराष्ट्र में दलितों के पक्ष में लड़ी गयी ऐतिहासिक लड़ाइयों के बावजूद यह कसक रह-रहकर सालती है कि वहां जो होना था, वह अभी तक हो नहीं पाया। बल्कि महिलाओं की आधिकारिता के सवाल पर कई दृष्टांत चिंताओं के सबब बन जाते हैं।

यह सच है कि कभी किसी जमाने में ओडिशा के कालाहांडी-बोलांगीर-कोरापुट और महाराष्ट्र के अधिकांश हिस्सों में लोग खेती-बाड़ी, वनोपज जुटाने और कुदरती संसाधनों से सुसंगत रिश्ते बनाकर सदियों तक सामुदायिक जीवन, संपत्ति पर सामूहिक हक़ और सर्वानुमतिमूलक जनतंत्र के जीवंत बोध को बचाये रखते थे। लेकिन देखते ही देखते उन तमाम जगहों का दृश्य-परिदृश्य बदलता चला गया।

अब तो ज़िन्दगी में विडंबनाओं के अम्बार हैं। सुखद कुदरती सुंदरता है किन्तु वहां की ज़िन्दगी खूबसूरत नहीं है। ओडिशा-महाराष्ट्र के अलावा हर राज्य में सरकार के बनवाये लोगों के पक्के मकान हैं, घर में भोजन के अधिकार वाला अनाज है, जनधन सुविधा के तहत बैंक में खाते हैं, खाते में पैसे हैं और इनके अलावा उनके पास चावलवाला खैराती कार्ड भी है। खेती-किसानी को लेकर योजनाओं के अम्बार हैं। योजनाएं इतनी हैं कि खुद जिले स्तर के अधिकारी उन्हें गिनकर बता नहीं पाते। तो आम जनता भी उन्हें जान नहीं पाती।

कालाहांडी-पलामू-बुंदेलखंड से लेकर मुर्शिदाबाद जैसे शोषण के तीर्थ-स्थलों में सदियों से चली आ रही वंचना आज भी है, वहां कालातीत शोषण है और उनसे उपजा हर साल का अबाध पलायन है। वहां के गांवों में पंचायत है। उन पंचायतों में विभिन्न राजनीतिक दलों के एजेंट हैं। जनवादी विकास के लोकलुभावन पोस्टर्स हैं लेकिन उन्हीं गांवों में राशनकार्ड गिरवी रखकर कर्ज जुटाते किसान हैं।

नवीन पटनायक के इलाके से  सूरत और अहमदाबाद जाकर श्रम बेचते और वहां से जानलेवा ‘अबूझ बीमारी’ लेकर लौटते सैकड़ों मजदूर हैं। उन्हीं नवीन बाबू की रियासत की नवजात शिशु बेचती माएं हैं तथा बिन शादी किये मां बनती बालाएं हैं। विकास और लोकतंत्र को चिढ़ाता यवतमाल है जहां देश भर में सबसे ज्यादा बिन शादी किये माताएं हैं जिनकी राहत के लिए उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है।

देश के विकास का सरोकार जैसा भी हो लेकिन यवतमाल ही ग्राम्य समाज की हद नहीं है बल्कि हरियाणा का मेवात भी है जहां कई गांवों के हर तीसरे घर में बाहर से खरीदकर लायी गयी बहुएं हैं यानी परोक्ष ही सही किन्तु देश के कई राज्यों में असंगठित बहु बाजार भी है।

इसके आगे देश में बुंदेलखंड भी है जहां पानी के नाम पर तमाम संघर्ष हैं, विरोध है और उस विरोध के प्रतिरोध में खूरेंजी से लेकर रक्तिम संघर्ष भी है। इस पानी के कारण पलामू इस कारण से नामचीन हुआ कि सरकारी योजनाओं के तहत वहां इतने कुएं खोदे गए कि हर कदम पर एक कुआं पाएंगे और संताल परगना में हर दस कदम पर तालाब और पोखर की मौजूदगी कागजों पर दिखती है।

इसी पानी को लेकर चाहे झारखण्ड हो या महाराष्ट्र– अमूमन हर राज्य में पानी की मौजूदगी के आधार पर सामाजिक परम्पराएं सदियों से चली आ रहीं हैं। जैसे झारखंड में जिस गांव के नाम का अंत ‘दा’ से होता है वहां पानी की कभी कमी नहीं होती थी। ऐसे इलाके में तालाब-पोखर-आहर और कुओं के चलते पीने के अलावा खेतों में फसल उगाने के लिए भरपूर मात्रा में पानी की उपलब्धता होती थी। ऐसे गांवों में आंखें मूंदकर बेटी ब्याहने की परम्परा का जिक्र आज भी लोग करते हैं। पानी और शादी का नाता बहुत पुराना है।

कालाहांडी आज भी सरकार द्वारा तय धान के लक्षित उत्पाद से कहीं ज्यादा उपज का रिकॉर्ड हर साल दर्ज करवाता है लेकिन पड़ोसी जिलों के लोग वहां के कई इलाकों में अपनी बेटी ब्याहना नहीं चाहते। क्योंकि भोजन की कमी की वजह से आज भी कहीं-कहीं मां-बाप एक कुंतल चने की कीमत से भी कम रकम में अपने नौनीहाल को बेच देते हैं या लिए गए कर्ज के एवज में महाजन के पास अपना बच्चा गिरवी रखते हैं।

पानी की कमी की शुरुआत कालाहांडी में 1965 से शुरू हुई। कहते हैं अभाव में स्वभाव बदलता है। इसलिए लगातार अकाल ने वहां के लोगों को मानसिकता से भिखारी और लालची बना दिया। लिहाजा, समझौतों की अटूट श्रृंखंला में बंधुआ मजदूरी-बाल श्रम से लेकर पलायन का धब्बा कालाहांडी को नसीब हुआ। लड़कियों की कमी और बदनसीब मेवात से बहुओं की बढ़ती मांग से कालाहांडी की लड़कियों से हरियाणा के आंगनों में किलकारियां गूंजने लगीं।

मगर, बहुओं की खरीद-फरोख्त के बाजार के बिचवानों की आवाजाही से कालाहांडी में सामाजिक असंतुलन के हालत पैदा हो गए। जो लड़कियां कालाहांडी से ब्याहकर हरियाणा गयीं फिर कभी लौटकर मायके नहीं आईं क्योंकि उन्हें बेचा गया था। प्राकृतिक असंतुलन और विकास कार्यक्रमों से उपजी अव्यवस्था का खामियाजा समाज की औरतें ज्यादा उठातीं हैं– ये मानी हुई बात है।

दुनिया भर में आधुनिकता की बढ़ती संभावनाओं और विकास से बदलते समाज के चेहरे के साथ पानी को लेकर औरतों की तकलीफें बढ़ीं हैं। मुम्बई से 85 मील दूर बसे डेंगलमाल में तमाम प्रवृतियों की सरकारों के आने और जाने के बावजूद राज्य के 19000 गावों की तरह पेय जल की सुविधा आम नागरिकों की पहुंच से दूर है। वहां पानी इतनी बड़ी समस्या है जिससे उबरने केलिए नागरिकों को एक से अधिक शादियां रचानी पड़तीं हैं। दलील यह दी जाती है कि एक पत्नी बच्चों को देखने के लिए और बाकी की दो पत्नियां पानी ढोने का काम करतीं हैं।

उमा असलेकर ने महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ में काम करते हुए इस स्थिति पर जो रिपोर्ट पेश की है, उसमें पानी जुटाने के नाम पर औरतों के बढ़ते संघर्ष की जोरदार चर्चा है- बेशक दुनिया भर के विकासशील देशों की स्थिति महाराष्ट्र जैसी है। लेकिन नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) ने घरों से पनघट की बढ़ती दूरियों पर जो आंकड़े पेश किये हैं, वे चौंकाते हैं। इन आंकड़ों से भारत के ‘सबका साथ सबका विकास’ के सन्दर्भ पर सवाल उठना लाजिमी है, क्यों ज़िन्दगी की मूलभूत सुविधाओं को गांवों तक पहुंचाने में सरकारें बहुत सफल नहीं रहीं हैं।

जल और जन के परस्पर रिश्तों को लेकर यूएन वर्ल्ड वाटर असेसमेंट ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि पानी की उपलब्धता को लेकर भारत में आंकड़े जुटाने की संवेदनशीलता अभी देखने को नहीं मिल रही है। देश में पानी-सेहत-शिक्षा की स्थिति झारखण्ड से लेकर महाराष्ट्र तक एक जैसी है। तो सवाल उठना लाजिमी है कि कल्याणकारी राज्य की छाती पर क्यों उगते हैं कालाहांडी और डेंगलमाल?

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अमरेंद्र किशोर
स्वतंत्र पत्रकार और लेखक के तौर पर मशहूर अमरेंद्र किशोर दिल्ली में रहते हैं। विकास और सामाजिक सरोकारों से गहरा नाता रखने वाले अमरेंद्र का दक्षिण-पूर्व एशिया के दुर्गम इलाकों में रहने वाले मूल बाशिंदों गहरी रूचि है। यही वजह है कि उनके लेखन में जन-सरोकार के मुद्दों की गहराई में जाने की झलक मिलती है। अपनी पत्रकारिता के ज़रिये ज़मीनी स्तर पर सामाजिक और लैंगिक मुद्दों, ग्रामीण जीवन की जटिलताओं, गरीबी की मार्मिक वास्तविकताओं तथा आदिवासियों की ज़िन्दगी में बढ़ती चुनौतियों के गहन अन्वेषण का काम अमरेंद्र ने बख़ूबी किया है। अमरेंद्र किशोर भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय में पुनर्वास और पुनर्स्थापन मामलों के सलाहकार, राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रोजेक्ट रिव्यू कमेटी और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी सामाजिक विकास पुरस्कार समिति के सदस्य रह चुके हैं। ज़मीनी स्तर पर सामाजिक सहभागिता और जागरूकता के अलावा समाज के सतत विकास कार्यों के सिलसिले में फोर्ड फॉउंडेशन, जापान फॉउंडेशन, वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम की परियोजनाओं के साथ भी बतौर परियोजना निदेशक काम किया है। अंग्रेजी मासिक ''डेवलपमेंट फाइल्स'' के कार्यकारी सम्पादक (2014-2020) भी रह चुके हैं। इन्होंने ओडिशा की अनब्याही माताओं के मुद्दे पर मुल्क की मीडिया को नई दिशा दी है। फिलहाल, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन की हजारों बाघ विधवाओं पर केंद्रित अनुसंधान में सक्रिय हैं। आदिवासी, पर्यावरण और लोकज्ञान पर आधारित अभी तक इनकी सात क़िताबें प्रकाशित हुई हैं। इनके निबंध संग्रह 'जंगल-जंगल लूट मची है' कृति को दिल्ली सरकार के हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कृत (2007) किया जा चुका है। लोकज्ञान पर आधारित इनकी बहुचर्चित कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' के लिए इन्हें लोकायत देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय सम्मान (2011) से नवाज़ा गया है। अमरेंद्र सासाराम के शांति प्रसाद जैन कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक (1991) हैं और भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से जनसंचार में पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा (1994-95) की डिग्री ली है। इनकी पत्रकारिता भारतीय उप-महाद्वीप के आदिवासी समुदायों द्वारा झेली जा रही कठिनाइयों पर रोशनी डालती है और प्राकृतिक संसाधनों को स्थानीय जीवन से जोड़ने की तत्काल जरूरतों की वकालत भी करती है।

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