भारतीय राजनीति में एक बार फिर से विवादित बयान पर घमासान मच गया, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रति अपनी टिप्पणियों के कारण विपक्ष के निशाने पर आ गए। विपक्षी दलों ने शाह के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और उनकी बर्खास्तगी की मांग की। इस विवाद ने राजनीतिक गलियारों में इतनी हलचल मचा दी कि पीएम नरेंद्र मोदी को भी इस मुद्दे पर ट्वीट के जरिये हस्तक्षेप करना पड़ा। ये अलग बात है कि विपक्षी दलों के हमले की धार के समक्ष पीएम मोदी का ट्वीट फीका ही पड़ता दिखा। ऐसे में बड़ा सवाल यह कि डॉ. अंबेडकर पर अमित शाह के विवादित बोल संसद में अडाणी और बेरोजगारी-महंगाई जैसे बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने की सरकार की रणनीति का हिस्सा तो नहीं है?
विवाद पर पीएम मोदी का हस्तक्षेप
दरअसल बीते मंगलवार को राज्यसभा में संविधान के 75 साल पर चल रही चर्चा के दौरान अमित शाह ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए डॉ. अंबेडकर के नाम का अत्यधिक उल्लेख करने को लेकर एक विवादित बयान दिया। शाह ने कहा था, “अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर, अंबेडकर यह अब एक फैशन बन गया है। अगर ये लोग इतनी बार भगवान का नाम लेते तो सात जन्मों तक स्वर्ग मिल जाता।” इस टिप्पणी से आहत विपक्ष खासकर कांग्रेस और अन्य दलों ने इसे डॉ. अंबेडकर का अपमान करार दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विवाद पर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ट्वीट कर अमित शाह का बचाव किया और कांग्रेस पर आरोप लगाए कि वे “दुर्भावनापूर्ण झूठ” फैला रहे हैं। मोदी ने कहा, “गृह मंत्री ने संसद में कांग्रेस के काले कारनामों को उजागर किया, जिनमें अंबेडकर और एससी/एसटी समुदायों की अनदेखी की गई।” इसके बावजूद, मोदी का यह बयान विपक्षी हमलों को रोकने में सफल नहीं हो सका।
विपक्षी दलों का विरोध और संसद में हंगामा
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने संसद में विरोध प्रदर्शन किया। सांसदों ने अंबेडकर के पोस्टर पकड़े और शाह की टिप्पणी के खिलाफ नारेबाजी की। “बाबासाहेब का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान; अमित शाह माफी मांगो” जैसे नारे लगे। इस विरोध के कारण संसद की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ गई।
विपक्ष ने अमित शाह से न सिर्फ माफी की मांग की, बल्कि पीएम मोदी से शाह को सरकार से बर्खास्त करने की भी हुंकार भरी। इस मुद्दे पर राज्यसभा में भी हंगामा जारी रहा। तृणमूल कांग्रेस ने शाह के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस भी प्रस्तुत किया। कुल मिलाकर अमित शाह की बेवजह की टिप्पणियों ने विपक्ष को उत्तेजित कर दिया, जिससे संसद में कामकाज ठप हो गया।
बचाव में खुद मीडिया के सामने आए शाह
इस विवाद के बाद, अमित शाह ने भाजपा मुख्यालय में मीडिया से बात की और कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वे उनके बयान को “तोड़-मरोड़कर” पेश कर रहे हैं। शाह ने कहा, “मैं ऐसी पार्टी से ताल्लुक रखता हूं जो कभी बाबा साहब का अपमान नहीं कर सकती। भाजपा ने हमेशा अंबेडकर के सिद्धांतों का प्रचार किया और आरक्षण की अवधारणा को मजबूत किया।” उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस पार्टी आंबेडकर विरोधी है। शाह ने कहा कि यदि उनकी छवि को धूमिल किया गया तो वह कांग्रेस के खिलाफ कानूनी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेंगे।
बहरहाल, यह विवाद भारतीय राजनीति में एक बार फिर से बेहद संवेदनशील मुद्दे को हवा दे गया है। जहां एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शाह का बचाव किया, वहीं विपक्ष ने इसे डॉ. अंबेडकर का अपमान मानते हुए विरोध प्रदर्शन तेज कर दिया है। यह घटना दर्शाती है कि राजनीतिक बयानबाजी के माध्यम से संवेदनशील मुद्दों को कैसे भड़काया जा सकता है और इसके क्या दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। ऐसे वक्त में, जब दलितों और वंचित समुदायों के अधिकारों की रक्षा को लेकर भारतीय समाज में गहरी बहस चल रही है, ऐसे विवाद राजनीतिक माहौल को और भी गर्म कर सकते हैं। निश्चित रूप से ऐसा लगता है कि संसद में महंगाई-बेरोजगारी के मुद्दे को भटकाने तथा अडाणी मुद्दे को अटकाने के लिए मोदी सरकार की रणनीति का हिस्सा है संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर को बीच बहस में लेकर आना। अगर ऐसा है तो यह देश की सामाजिक सेहत के लिए ठीक नहीं है।




