मोदी सरकार ने पुस्तक प्रेमियों को दिया बड़ा झटका, इंडिया पोस्ट ने बंद की बुक पोस्ट सर्विस

नई दिल्ली। बिना किसी चर्चा, बिना किसी चेतावनी और बिना किसी परामर्श के भारतीय डाक विभाग यानी इंडिया पोस्ट ने अपनी बुक पोस्ट सेवा को अचानक से समाप्त कर दिया। बीते 16 दिसंबर 2024 की आधी रात को बुक पोस्ट सर्विस श्रेणी को इंडिया पोस्ट के डाक सॉफ्टवेयर से चुपचाप हटा दिया गया। मतलब बुक पोस्ट सर्विस का अब कोई विकल्प नहीं रह गया है। खास बात यह कि इसकी जानकारी इंडिया पोस्ट के दफ्तर में काउंटर पर बैठे कर्मचारी तक को नहीं दी गई।

पब्लिकेशन इंडस्ट्री और पुस्तक प्रेमी आमजन को तो इस सेवा के बंद होने की जानकारी तब हुई जब 17 दिसंबर की सुबह वह अपनी किताबों के पैकेट लेकर बुक पोस्ट करने डाकघर के काउंटर पर पहुंचे। निश्चित रूप से इस सेवा का बंद होना प्रकाशन उद्योग और पढ़ने-लिखने वाले लोगों के लिए मोदी सरकार द्वारा दिया गया बड़ा झटका है। अचानक लिए गए इस निर्णय से शिपिंग लागत तो बढ़ेगी ही, पढ़ने-लिखने की संस्कृति को गहरा धक्का लगा है।

16 दिसंबर 2024 को इंडिया पोस्ट ने अपनी ‘बुक पोस्ट’ सेवा बंद करके पुस्तक प्रेमियों और पूरे पुस्तक उद्योग को बड़ा झटका दिया है। रजिस्टर्ड बुक पोस्ट (RBP) सेवा के तहत, पांच किलो किताब की शिपिंग लागत मात्र 80 रुपये होती थी। ये दरें किसी भी सूरत में कूरियर सेवा से अधिक बेहतर थी। 19101 पिन कोड और 154,725 डाकघरों को कवर करने वाले इंडिया पोस्ट के विशाल नेटवर्क ने तेज डिलीवरी भी सुनिश्चित की जिससे अधिकांश पार्सल एक सप्ताह के भीतर पहुंचने लगे। एक शहर के भीतर स्थानीय डिलीवरी अक्सर अगले दिन अपने गंतव्य तक पहुंच जाती है।

कहने का मतलब यह कि अब तक की सरकारों ने पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए ये रियायती दरें तय की थीं। किताबों और पत्रिकाओं पर ये रियायत लंबे अरसे से मिलती आ रही थी। लेकिन अब साल 2024 के खत्म होने से ठीक 14 दिन पहले बुक पोस्ट को खत्म कर ढाई से तीन गुना शुल्क बढ़ाकर नए नाम के साथ नई व्यवस्था (रजिस्टर्ड पार्सल) लागू कर दी गई। अभी पिछले साल की ही तो बात है जब नवम्बर में सभी डाक सेवाओं पर 18% जीएसटी लगा दिया गया था, जिससे डाक से पुस्तकें भेजना पहले ही काफ़ी महंगा हो गया था।

कहने की ज़रूरत नहीं है कि अब छोटे प्रकाशकों, पुस्तक विक्रेताओं, लेखकों और सम्पादकों के लिए किताबें डाक से भेजना बहुत मुश्किल हो जाएगा। इसका सबसे ज़्यादा बुरा प्रभाव छोटे और गैर-व्यवसायिक प्रकाशकों व पत्र-पत्रिकाओं पर पड़ेगा जो पहले से ही कागज़ और छपाई की अत्यधिक मूल्यवृद्धि और बेतहाशा बढ़ती कीमतों से जूझ रहे हैं।

हालांकि यह ख़बर कोई बहुत आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि देश भर में जिस तरीके से निजीकरण की आंधी चल रही है, उसमें रेलवे तथा बैंकिंग सेक्टर की तरह लम्बे समय से भारतीय डाक विभाग का भी निजीकरण करके उसे पूरी तरह से प्राइवेट कंपनियों को सौंपने का उपक्रम लगातार जारी है।

एक तरफ़ कीमतें बढ़ाई जा रही हैं तो दूसरी तरफ़ पिछले कुछ सालों से डाक सेवाओं को पूरी तरह से तबाह भी किया गया है। नई नियुक्तियां बिलकुल बंद कर दी गई हैं। अधिकांश कार्य आउटसोर्सिंग पर कराए जा रहे हैं, इसलिए कर्मचारियों पर काम का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

वाराणसी के कई प्रकाशकों ने पुस्तकें होल्ड कर दी हैं। इससे कैंटोंमेंट और विश्वेश्वरगंज स्थित प्रधान डाकघरों में किताबों की बुकिंग में करीब 60 प्रतिशत तक की गिरावट होने से विभाग को राजस्व का नुकसान हो रहा है। पिछले सप्ताह तक काशी से विभिन्न प्रकाशकों की करीब एक हजार पुस्तकें प्रतिदिन दूसरे जनपदों में भेजी जाती थी। बातचीत में डाक विभाग के अधिकारियों ने दबी जुबान में इस बात को स्वीकार किया कि देशभर से शिकायतें सामने आ रही हैं। 50 रुपये प्रति किलोग्राम शुल्क बढ़ने से प्रकाशकों ने बुकिंग कम कर दी है।

प्रकाशकों ने संचार मंत्री को पत्र लिखकर पुराने स्लैब को लागू करने की मांग की है। प्रकाशकों का कहना है कि किताबों पर सब्सिडी मिलने से विद्यार्थियों पर कम बोझ पड़ता था। अब यह बोझ बढ़ेगा। पहले जहां पांच किलोग्राम तक पुस्तकों का पैकेट मंगाने में पहले 80 रुपये डाक व्यय आता था जो अब 200 रुपये को पार कर गया है।

शुल्क में एकाएक तीन गुना बढ़ोतरी से न सिर्फ पुस्तक उद्योग, प्रकाशकों, पुस्तक विक्रेताओं बल्कि पाठकों विशेषकर विद्यार्थियों पर सीधा असर पड़ेगा। पुस्तकों को रजिस्टर्ड बुक पैकेट की श्रेणी में रखते हुए पहले जहां एक रुपये प्रति 100 ग्राम की दर से 5000 ग्राम तक डाक व्यय व रजिस्ट्रेशन चार्ज 17 रुपये तथा 18 प्रतिशत जीएसटी के साथ बुकिंग होती थी जो अब रजिस्टर्ड पार्सल की श्रेणी की दर 19 रुपये 500 ग्राम तक, 16 रुपये अतिरिक्त 500 ग्राम से 20 किलोग्राम तक हो गई है। इसके अलावा रजिस्ट्रेशन चार्ज 17 रुपये तथा 18 प्रतिशत जीएसटी के साथ बुकिंग हो रही है।

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सत्ता विमर्श डेस्क
सत्ता विमर्श (Satta Vimarsh) नाम ही हमारी पहचान है। हमारा मानना है कि सब कुछ सत्ता के इर्द-गिर्द तय होता है, सरकार भी और सरोकार भी। लेकिन, इस सत्ता में हमारी-आपकी भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सत्ता में बैठे लोगों की। इसीलिए सत्ता और सरोकार से जुड़े मुद्दों पर विमर्श जरूरी है।

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