आदिवासी शिक्षा की उदासीनता का लोक पर्व

आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष के समय से भारत के जनजातीय इलाकों में एक विशेष लोक पर्व मनाया जा रहा है। यह पर्व प्रतीक है उस वक्त का जब आदिवासी शिक्षा में परिवर्तन लाने की दिशा में सरकार की तरफ से कदम बढ़ाने की योजनाएं तैयार की जा रही हैं। दो साल पहले मध्य प्रदेश सरकार ने आदिवासी बहुल क्षेत्रों के 92 सरकारी स्कूलों को सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मोड में संचालित करने का निर्णय लिया।

हालांकि इस फैसले का उद्देश्य शिक्षा में सुधार और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना था। लेकिन सरकार की यह पहल कई सवाल पैदा हुए, खासकर आदिवासी शिक्षा नीति के संदर्भ में। मसलन, मध्य प्रदेश में पीपीपी मॉडल का विस्तार आदिवासी शिक्षा से जुड़ी समस्याओं का कितना समाधान कर पाएगा? सवाल यह भी उठा कि क्या पीपीपी मॉडल वास्तव में आदिवासी शिक्षा में सुधार ला पाएगा, या यह केवल एक सरकारी कदम होगा जिससे शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन होगा?

आदिवासी बहुल राज्य होने के नाते मध्य प्रदेश में सरकार के इस निर्णय को हल्के में नहीं लिया जा सकता था। यहां विधानसभा और लोकसभा की सीटें आदिवासी समाज के लिए आरक्षित हैं और ऐसे में किसी भी सरकारी निर्णय का असर सीधे तौर पर आदिवासी समुदाय पर पड़ता है। हालांकि गुजरात और ओडिशा में पीपीपी मॉडल बहुत पहले अपनाया जा चुका है। लेकिन मध्य प्रदेश में इसका क्या असर होगा, यह पूरी तरह से साफ नहीं हो सका।

आदिवासियों की शिक्षा को लेकर इस तरह के निर्णय न सिर्फ प्रशासनिक दृष्टिकोण से, बल्कि आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक और सामाजिक जरूरतों के संदर्भ में भी एक गंभीर सवाल था। आदिवासी जीवनशैली, उनके परिवेश और उनकी सोच को समझे बिना शिक्षा का प्रसार करना किसी भी बदलाव का स्थायी परिणाम दे सकता था इसको लेकर आशंकाएं चर्चाओं में थीं। उनका विश्वास आमतौर पर सरकार और संस्थाओं पर बहुत अधिक होता नहीं है।

ऐसे में पीपीपी मॉडल के तहत निजी संस्थाओं को स्कूलों का संचालन सौंपने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह था कि उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई संदर्भों को ध्यान में रखते हुए नीति बनाई जाए। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। ऐसे में यह मान लिया गया कि पीपीपी आधारित जनजातीय शिक्षा एक नए युग की दस्तक है।

वैसे तो मध्य प्रदेश सरकार के इस फैसले पर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई। न तो खबरिया चैनल्स में और न ही सोशल मीडिया के किसी पोस्ट में। कई राज्यों से आदिवासियों की शिक्षा को लेकर उभरती खबरें लोकहित से अलग-थलग पड़ी हैं। जैसे बिहार में अभी आदिवासी कन्याओं की शिक्षा को लेकर जड़वत उदासी और बेइंतहा लापरवाही है। वहां एक भी प्राथमिक आवासीय या दिवाकालीन विद्यालय राज्य सरकार ने शुरू नहीं किया है। लेकिन मध्य प्रदेश बिहार नहीं है। शुरू से ही ट्राइबल स्टेट यानी आदिवासी राज्य के तौर पर सुविख्यात मध्य प्रदेश में सरकार के इस निर्णय को हल्के में लेना वाजिब नहीं था। क्योंकि इस सूबे में जनसरोकार के मामले में आदिवासियों की अपनी महत्ता रही है।

यहाँ राज्य विधानसभा की 47 सीटें और लोकसभा की छह सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। उन 47 विधानसभा क्षेत्रों के अलावा करीब 35 सीटें ऐसी हैं, जिनमें आदिवासी मतदाताओं की भूमिका निर्णायक होती है। लिहाजा, मध्यप्रदेश में आदिवासियों से सम्बंधित किसी भी निर्णय को कोई भी राजनीतिक दल सरकार में रहकर लापरवाही से लागू नहीं करती है। हाँ, सरकार की मंशाओं पर सवाल उठना या उठाया जाना लोकतंत्र का विशेषाधिकार है।

लेकिन बदलते परिदृश्य में जहाँ नागरिक संगठनों, सरकार और बाजार की अपनी शर्तें होती हैं तो नीतियां भी परिवर्तन के दौर से गुजरतीं हैं। यह दुर्भाग्य है कि आदिवासियों की शिक्षा के माध्यम को लेकर भाषायी कश्मकश चल ही रहा है। लेकिन अभी हम निर्णय पर नहीं पहुंच सके हैं। राज्य स्तर पर सरकारों द्वारा उद्देश्यों को हासिल करना आसान काम नहीं है क्योंकि अभी प्रबंधन की विधियों का प्रयोग काल है ।

पीपीपी मोड का मतलब यह कतई नहीं है कि निजी संस्थाओं को विद्यालय की ज़मीन, मकान या अन्य किस्म के संसाधनों का मालिकाना हक़ सौंप दिया जाता है। मुद्दा महज प्रबंधन का भी नहीं बल्कि सेवाओं के निष्पादन मात्र से है। हाँ, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पीपीपी मोड की आड़ में सरकार की विफलताएं परदे के पीछे चली जातीं हैं। ओडिशा में ऐसा हो चुका है। यह मोड कोई विचार नहीं है, बल्कि एक विचारधारा है जो जिम्मेदारियों को काम करते हुए एक साधन के रूप में निजीकरण को बढ़ावा देता है। सकारात्मक पक्ष यही है कि विद्यालयों की संख्या बढ़ाकर शिक्षा के अधिकार को शत-प्रतिशत पूरा किया जा सकता है, ऐसी उम्मीद की जाती है।

गुजरात में 400 ज्ञानसेतु विद्यालयों के लिए जब निविदा खोला गया तो पश्चिम बंगाल में भी इसी मोड को अपनाये जाने को लेकर उत्सुकता देखी गयी। लेकिन यहाँ बात आदिवासी विद्यालयों की है। देश के आम नागरिक और एक आदिवासी के परिवेश, संस्कार, दृष्टि, चिंतन, आत्मबोध से लेकर युगबोध अलग-अलग होते हैं। पूंजी सर्वाधिक जरूरी शर्त है और आदिवासियों के पास पढ़ने के लिए धनाभाव होता है। वह उपलब्ध संसाधनों पर भरोसा रखने का संस्कार लेकर जीता है।

बेशक, बाजार और उत्पाद का प्रभाव उसकी नियमित शैली पर असर डालने में सफल रहा है। लेकिन पढ़ाई से कहीं ज्यादा उसके लिए जीवन की अन्य जरूरतें मायने रखतीं हैं। अभी गैर-बराबरी का समय है। वंचना में जीने वाले आदिवासी संवैधानिक समानता के बल पर नगरीय जीवन की बराबरी करने में आतुर जरूर रहता है। एलिट आदिवासियों के अलावा तक़रीबन 99.9 फीसद आदिवासियों को आवासीय सुविधाओं से आबद्ध शिक्षा की आदत पड़ गयी है।

दरअसल, आदिवासी परिवर्तन पसंद नहीं होते। भले ही विकल्प कितना ही बेहतरीन क्यों न हो। मध्यप्रदेश के ग्रामीण और वन्य क्षेत्रों में शिक्षा को लेकर व्यापक निराशा है। मत भूलिए कि इसी राज्य के झाबुआ में पढाई छोड़कर काम की तलाश में निकली लडकियां अख़बारों की सुर्खियां बन गईं थीं। क्योंकि रोटी कमाना उनके जीवन की प्राथमिकता थी।

सरकार की रोजगारपरक योजनाएं प्रभावहीन हैं, क्या शिवराज सिंह की सरकार और क्या वर्तमान व्यवस्था। आदिवासी बहुल धाकड़खेड़ी गाँव इसका प्रत्यक्ष उदहारण है जहाँ की कुल आबादी 160 परिवार के 784 लोग है, जिसमें 63 लड़कियां और 73 लड़के हैं और जिनकी शिक्षा तक पहुंच नहीं है। बाकी 72 किस्म की योजनाओं की चर्चा का क्या करना। मध्याह्न भोजन और खेलकूद तथा पाठ्य सहगामी क्रियाकलापों की आपूर्ति में कमी के चलते अभिभावक अपने बच्चों को ऐसे सत्रों में भेजने के इच्छुक नहीं रह गए।

सबसे रोचक बात यह है कि विज्ञापनी दावों में यह बार-बार जताने की कोशिश की जाती रही है कि जनजातियों के विकास के प्रति मध्य प्रदेश सरकार पूरी तरह से ईमानदार है। हर साल कल्याणकारी उपायों पर भारी-भरकम राशि खर्च की जाती है। लेकिन नतीजों का जो हाल है वह जगजाहिर है। सरकार का तंत्र कहीं न कहीं जर्जर और पंगु बन चुका है। विभागीय सचिवों वाले वल्लभ भवन से धाकड़खेड़ी गाँव संपर्कविहीन है, आज से नहीं दशकों से।

सत्ता को पता होना चाहिए कि संचार और संवाद का नहीं होना तथा समस्याओं से मुंह मोड़कर आत्मप्रचार का दमामा पीटना गवर्नेंस नहीं होता। विद्यालय हर दिन उत्पाद का केंद्र होता है। वहां फाइलें दबाई नहीं जा सकतीं, जलाई नहीं जा सकती है। वल्लभ भवन सुविधाओं से लैस है किन्तु धाकड़खेड़ी गाँव में शिक्षक नहीं है। शिक्षा का अधिकार नहीं है। लेकिन सरकार विद्यालयों द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने की सद्भावना जरूर रखती है। वह गांवों के स्कूलों को नामी प्राइवेट स्कूल की तरह चलाने का मन जरूर रखती है।

सरकार स्पष्ट किया कि प्रारंभिक अनुबंध (कक्षा 6 से 12 तक के छात्रों की प्रगति को मापने के लिए) सात साल के लिए होगा। ये स्कूल सरकार को गुणवत्तापूर्ण शिक्षकों की कमी की समस्या को दूर करने में सक्षम बनाएंगे, राज्य में एक बड़ी समस्या जहां 89 आदिवासी विकास खंडों के स्कूलों में कई रिक्तियां हैं। अब प्राइवेट पार्टनर ही शिक्षकों और कर्मचारियों का चयन करेगा। इस बात के तसल्ली दी गयी कि सरकारी शिक्षक भी वहां काम करने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

अपना पल्ला झाड़ते हुए सरकार ने स्पष्ट किया कि प्रतियोगी परीक्षा में छात्रों का अधिकतम चयन सुनिश्चित करने के साथ छात्रों के ज्ञान के स्तर को बढ़ाने की जिम्मेदारी निजी भागीदारों की होगी। लेकिन सवाल है कि विद्यालयों में रिक्तियों के कारण क्या रहे है? अभी तक सरकार के शिक्षा विभाग ने क्या किया? ग्रामीण अंचलों से भी कहीं कठिन इलाकों में स्थित विद्यालयों के हालात बदतर हो चुके हैं। ऐसा क्यों? सरकार की जवाबदेही किसके प्रति है?

सवाल है कि क्या सरकार ने बनी-बनाई लीक से हटकर नव्यतम तरीकों को अपनाने की पहल कभी की है? जितनी ईमानदारी और तत्परता बीड़ी पत्ता का मसला सुलझाने में दिखा, उतनी ही तत्परता इन आदिवासी विद्यालयों को लेकर कभी हुई है क्या? सरकार को जबाव देना होगा।

आज आदिवासी विद्यालय का उदास-बेजान माहौल, आदिवासियों की शिक्षा का माध्यम और उसे स्वीकार करने का द्वन्द, अपनी मातृभाषा में शिक्षा हासिल नहीं करने की कुंठाएं अनेक सवाल पैदा करती है। सवाल है कि आदिवासी विद्यालयों के संचालन या प्रबंधन को सरेआम नीलाम ही करना था तो नमूने के तौर पर चरणबद्ध हस्तांतरण करने में क्या दिक्कत थी?

पेसा एक्ट लागू करने का रंगारंग उत्सव मनाने वाले राज्य सरकार ग्राम सभाओं को इस तरह के हस्तांतरण शामिल करने से क्यों बचती रही है? आदिवासी मतलब अनुसूचित जनजाति की समझदारी का दायरा बेहद बड़ा है। इन जनजातीय लोगों ने राज्य की आबोहवा की हिफाजत और जंगलों को बचाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

यदि पेसा एक्ट ने सालों पहले ग्राम सभा को सामुदायिक संसाधनों की सुरक्षा और संरक्षण का अधिकार दिया है तो फिर शिक्षा से इन नागरिक संकायों को जोड़ने की बात क्यों नहीं की गयी? क्या सरकार को ग्राम सभा पर भरोसा नहीं? अगर ऐसा है तो फिर पेसा एक्ट के तहत वनों की सुरक्षा और संरक्षण का भी अधिकार ग्राम सभा को देने की बात क्यों हुई? ये सवाल अनुत्तरित हैं।

यदि राज्य सरकार ने सामुदायिक वन प्रबंधन समितियों के गठन की जिम्मेदारी ग्राम सभा दी है तो उनके लिए विद्यालय चलाना कौन सी बड़ी बात थी? क्योंकि राज्य सरकार ने पंचायती राज व्यवस्था की पांचवीं अनुसूची के क्रियान्वयन में आने वाली दिक्कतों को दूर करने के लिए पेसा के तहत ग्राम सभाओं का गठन किया गया और ग्राम सभाएं अपने स्थानीय विकास के लिये स्वयं योजनाएँ बना रही हैं।

वनोपज के अधिकार मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति और बेहतर हुई है। जब इतना कुछ हासिल हो रहा है तो विद्यालय क्यों नहीं संभाले जा सकते हैं? फिर शिक्षा से जुड़े इस फैसले के अपने निहितार्थ होंगे। राजनीतिक बयानबाजी और विपक्ष के आरोपों से इतर क्या यह मसला सरकारी सदिच्छाओं का निरूपण है? क्या सरकार अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रही है? क्या आदिवासियों के विकास सरकार के लिए अब टेढ़ी खीर है? ऐसे सवाल युगीन बनते जा रहे हैं।

राज्य में आदिवासियों को लेकर उम्दा माहौल बताया जा रहा है। प्रदेश भर में जनजातीय विद्यार्थियों के लिए आश्रम, छात्रावास, शालाएँ, कन्या शिक्षा परिसर संचालित किए जा रहे हैं। अभी तक सरकार उन्हें चला रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रशिक्षण के लिए अनेक तरह की प्रोत्साहन योजना संचालित हो रही हैं। स्वरोजगार के लिए कौशल विकास के केन्द्र भी संचालित किये जा रहे हैं।

आदिवासी विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए भी राज्य सरकार द्वारा छात्रवृत्ति दी जाती है। अलग-अलग जिलों में बालक-बालिकाओं के लिए क्रीड़ा परिसर भी बनाए गए हैं। प्रदेश में अनुसूचित जनजाति साहूकार विनियम 1972 प्रभावी है। अब तो साहूकारों द्वारा वसूले जाने वाले ब्याज की दरों को भी नियंत्रित किया गया है। निर्धारित दर से अधिक ब्याज वसूलने वाले साहूकारों को कड़ा दण्ड दिया जा रहा है। यदि इतनी तत्पर सरकारी तंत्र है तो फिर पीपीपी मोड की जरुरत क्यों पड़ी?

यह बात दूसरी है कि इस राज्य में अंत्योदय स्वरोजगार योजना, नवजीवन आवास योजना, वसुंधरा-कृषि भूमि क्रय योजना, बंजर भूमि पुनरुद्धार योजना, जल जीवन-सामूहिक सिंचाई योजना, स्वावलंबन-दुकान योजना, पवन-पुत्र ऑटो रिक्शा एवं टेंपो प्रदाय योजना, मधुवन, निर्मित-श्रम ठेका समिति, रफ्तार, वनजा, धन्वन्तरि, न्याय निकेतन और सहारा जैसे बेशुमार कार्यक्रमों के जरिये राज्य सरकार आदिवासियों को न सिर्फ स्वावलम्बी बल्कि योग्य नागरिक बनाने की मंशा रखती है। मध्यप्रदेश के बहाने यदि हम अन्य राज्यों की बात करें तो यह बात खुलकर सामने आती है कि राजसत्ता आदिवासियों, खास तौर से उनके बीच की आधी आबादी को लेकर कितनी ईमानदार है।

सरकार भले ही न माने लेकिन वास्तविकता तो यही है कि उपरोक्त योजनाओं का पूर्ण लाभ इस वर्ग तक नहीं पहुंच पाया है। जिन सकारात्मक बदलावों की दावेदारियां की गयीं हैं वे इस बात के द्योतक हैं कि प्रदेश के आदिवासी जनजाति समाज में गतिशीलता जरूर आयी लेकिन अभी तक उसने उपलब्धियों का कोई नज़ीर पेश नहीं किया है। अपने सफल लोकतंत्र के रहते जब जनजाति वर्ग गरीबी के नीचे ही है तो क्यों न सरकार की तमाम उपलब्धियों को अधूरा, अधपका और अधकचरा समझा जाए।

बांग्लादेश, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका के आदिवासी और नगरीय आबादी के बीच शिक्षा का पीपीपी मोड सफल कहा गया है। वेस्टर्न केप का उदाहरण बेहद उम्दा है जहाँ स्कूल और अकादमियां दोनों राज्य द्वारा वित्त पोषित हैं, लेकिन निजी क्षेत्र द्वारा प्रबंधित हैं, और वे अक्सर वंचित समुदायों के छात्रों की सेवा करते हैं।

इन पीपीपी समझौतों के तहत सरकार स्कूल के लिए समग्र जिम्मेदारी रखती है, लेकिन स्कूल के दिन-प्रतिदिन के संचालन और प्रबंधन को कई भागीदारों को सौंपती है जिसमें निजी क्षेत्र की कंपनियां, दाताओं और गैर सरकारी संगठन शामिल हैं। वहां परियोजना का उद्देश्य गैर-लाभकारी भागीदारी के माध्यम से पब्लिक स्कूल प्रणाली में अतिरिक्त प्रबंधन कौशल और नवाचार लाना था, ताकि बिना शुल्क वाले स्कूलों में शिक्षण और सीखने की गुणवत्ता में सुधार हो सके।

आज का ज़माना सोशल मीडिया का है। लिहाजा, मध्य प्रदेश की जनजातियों के विकास के लिये जरूरी है कि इनकी प्रत्येक समस्या को राष्ट्रीय समस्या के रूप में आँका जाये और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही नीतियाँ बनाई जाएँ। क्योंकि प्रदेश के विभिन्न भागों में निवास कर रही आदिवासी जनजाति की अपनी कुछ व्यक्तिगत समस्याएं भी होती हैं। उन्हें व्यापकता में समझना होगा। अन्यथा कोई भी नीति सभी जनजातियों के लिये तब तक लाभप्रद नहीं हो सकती है जब तक कि उनमें स्थानीय समस्याओं के हल का उद्देश्य न हो। क्यों न गाँवों में स्वयं सहायता समूह बनाकर या प्रबंधन पृष्ठभूमि के युवाओं को इन विद्यालयों से सन्नद्ध कर शिक्षा व्यवस्था मजबूत की जाए।

इन आवासीय विद्यालयों या पीपीपी के लिए स्कूलों इन वर्गों के उत्थान के लिये किसी भी योजना को क्रियान्वित करने में ऐसे कर्मचारियों एवं अधिकारियों का सहयोग लिया जाना चाहिए था जो इस कार्य में रुचि रखते हैं और जिन्हें आदिवासियों की समस्याओं का ज्ञान हो। दिक्कत इसी बात की है कि आदिवासियों के कल्याण और उद्धार का जिम्मा उन लोगों को मिला है जिन्होंने कभी एक दिन भी आदिवासियों की मुश्किल भरी रातें साथ-साथ काटीं हों। देश के तमाम आदिवासी क्षेत्र, ख़ास तौर से मध्य प्रदेश में सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रमों से विशेष रूप से वे ही लोग लाभान्वित हुए हैं जो आर्थिक दृष्टि से उन्नत हैं, साथ-ही-साथ परिवार-विशेष के लोग ही अधिकाधिक कार्यक्रमों व योजनाओं से लाभान्वित हुए हैं।

बहरहाल, आदिवासी शिक्षा के मामले में केवल सरकारी योजनाओं और निजी संस्थाओं के बीच संबंध स्थापित करना पर्याप्त नहीं है। आदिवासी विकास से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए सरकार में जिम्मेदार अधिकारियों को टेक्नोलॉजी से ऊपर उठकर संविधान की मूल भावना को समझना होगा और ऐसे काम करने होंगे जिससे जमीनी स्तर पर सकारात्मक बदलाव देखने को मिले।

आज जरूरत इस बात की है कि सरकार इस क्षेत्र की जमीनी स्थिति को समझे और आदिवासी समुदाय को शिक्षा के माध्यम से सशक्त बनाने के लिए वास्तविक, दीर्घकालिक और प्रभावी कदम उठाए। अब नतीजे सामने है। संघ या भगवा मानसिकता में मग़रूर संस्थाओं ने जिस शैली में इन विद्यालयों का संचालन किया, उसके नतीजे बिलौ द एवरेज स्वीकार किया गया। इन संस्थाओं या गैर सरकारी संस्थाओं के मंसूबे शुरू से स्पष्ट थे। उनका जुनून शिक्षा के भगवाकरण से कहीं ज़्यादा आदिवासियों का हिंदूकरण रहा है।

लेकिन ध्यान रहे, धर्म आधारित सेवाएं जितनी मज़बूत नज़र आती हैं उतनी ही वे निर्मम भी होती हैं। हिन्दू संगठन सेवा के नाम पर सौदा का भले ही विरोध करने को आकुल व्याकुल हों किन्तु उनका ध्येय भी अब स्पष्ट होता दिख रहा है। राजकीय खजाने से हिन्दुत्व का प्रचार आदिवासी दमदार नहीं है। क्योंकि सुविधाओं को परोसने के ‘महाकर्म’ में तकनीकी तौर से चर्च बहुत सम्पन्न है। देश के उत्तर-पूर्वी राज्य इसके नज़ीर हैं।

जनजातीय इलाकों में शिक्षा के नाम धर्मध्वज फहराने की जुनूनी यात्रा असफल होती जा रही है। विद्यालयों के प्रबंधन में एनजीओ को सौंपी गई जानकारी मिर्ची खाकर पानी के लिए तरसने जैसी सरकार की बेचारगी सम्पूर्ण राजकीय व्यवस्था की असफलता है। मोहन यादव इसे माने या न माने- बेहतर होता, पुरानी व्यवस्था में लौट आएं। हालांकि मध्यप्रदेश की नौकरशाही प्रयोगवादी है। देश के एक से एक नौकरशाह मध्यप्रदेश कैडर में हैं। उनकी देखरेख में आदिवासी शिक्षा व्यवस्था सफल और संपन्न होगी, ऐसी उम्मीदें हैं।

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अमरेंद्र किशोर
स्वतंत्र पत्रकार और लेखक के तौर पर मशहूर अमरेंद्र किशोर दिल्ली में रहते हैं। विकास और सामाजिक सरोकारों से गहरा नाता रखने वाले अमरेंद्र का दक्षिण-पूर्व एशिया के दुर्गम इलाकों में रहने वाले मूल बाशिंदों गहरी रूचि है। यही वजह है कि उनके लेखन में जन-सरोकार के मुद्दों की गहराई में जाने की झलक मिलती है। अपनी पत्रकारिता के ज़रिये ज़मीनी स्तर पर सामाजिक और लैंगिक मुद्दों, ग्रामीण जीवन की जटिलताओं, गरीबी की मार्मिक वास्तविकताओं तथा आदिवासियों की ज़िन्दगी में बढ़ती चुनौतियों के गहन अन्वेषण का काम अमरेंद्र ने बख़ूबी किया है। अमरेंद्र किशोर भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय में पुनर्वास और पुनर्स्थापन मामलों के सलाहकार, राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रोजेक्ट रिव्यू कमेटी और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी सामाजिक विकास पुरस्कार समिति के सदस्य रह चुके हैं। ज़मीनी स्तर पर सामाजिक सहभागिता और जागरूकता के अलावा समाज के सतत विकास कार्यों के सिलसिले में फोर्ड फॉउंडेशन, जापान फॉउंडेशन, वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम की परियोजनाओं के साथ भी बतौर परियोजना निदेशक काम किया है। अंग्रेजी मासिक ''डेवलपमेंट फाइल्स'' के कार्यकारी सम्पादक (2014-2020) भी रह चुके हैं। इन्होंने ओडिशा की अनब्याही माताओं के मुद्दे पर मुल्क की मीडिया को नई दिशा दी है। फिलहाल, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन की हजारों बाघ विधवाओं पर केंद्रित अनुसंधान में सक्रिय हैं। आदिवासी, पर्यावरण और लोकज्ञान पर आधारित अभी तक इनकी सात क़िताबें प्रकाशित हुई हैं। इनके निबंध संग्रह 'जंगल-जंगल लूट मची है' कृति को दिल्ली सरकार के हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कृत (2007) किया जा चुका है। लोकज्ञान पर आधारित इनकी बहुचर्चित कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' के लिए इन्हें लोकायत देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय सम्मान (2011) से नवाज़ा गया है। अमरेंद्र सासाराम के शांति प्रसाद जैन कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक (1991) हैं और भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से जनसंचार में पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा (1994-95) की डिग्री ली है। इनकी पत्रकारिता भारतीय उप-महाद्वीप के आदिवासी समुदायों द्वारा झेली जा रही कठिनाइयों पर रोशनी डालती है और प्राकृतिक संसाधनों को स्थानीय जीवन से जोड़ने की तत्काल जरूरतों की वकालत भी करती है।

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