भरी संसद में मोदी सरकार के कुबूलनामे से जांच एजेंसी ED की खुली पोल-पट्टी

नई दिल्ली। भारतीय संसद में केंद्र सरकार के एक मंत्री ने ऐसा बयान दे दिया जिससे वित्त मंत्रालय की जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) की सारी पोल-पट्टी खुल गई। बयान पर गौर करें तो पता चलता है कि पिछले 10 वर्षों में ईडी द्वारा सैकड़ों नेताओं के खिलाफ दर्ज किए गए मामलों में बहुत कम सफलता मिली है।

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में जानकारी दी कि 10 वर्षों में प्रवर्तन निदेशालय ने सांसदों, विधायकों सहित कुल 193 नेताओं के खिलाफ मामलों को दर्ज किया, लेकिन इनमें से सिर्फ दो ही मामलों में आरोप साबित हो सके हैं। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने यह भी स्पष्ट किया कि इन मामलों में दोष साबित होने की दर बहुत ही कम है। हालांकि, इस दौरान किसी भी आरोपी को निर्दोष करार नहीं दिया गया है।

यह रिपोर्ट इस बात को लेकर सवाल उठाती है कि जब इतने सारे मामले दर्ज किए गए हैं, तो फिर प्रवर्तन निदेशालय को सजा दिलाने में इतनी कम सफलता क्यों मिली? इसके पीछे विभिन्न कारण हो सकते हैं, जिनमें कागजी कार्यवाही, गवाहों की कमी या फिर कोर्ट के फैसले में देरी जैसी समस्याएं शामिल हो सकती हैं।

दरअसल, यह सवाल माकपा सांसद एए रहीम द्वारा राज्यसभा में पूछा गया था, जिसमें उन्होंने जानना चाहा था कि प्रवर्तन निदेशाल ने पिछले 10 वर्षों में कितने नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए, विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई में कोई बढ़ोत्तरी हुई है और इनमें से कितने नेताओं को सजा मिली है। पंकज चौधरी ने इसका जवाब देते हुए यह जानकारी दी कि पिछले दशक में केवल दो मामलों में दोष साबित हुआ, और ये मामले 2016-17 तथा 2019-20 के थे।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। कई नेताओं का मानना है कि ED के द्वारा विपक्षी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की जाती है, लेकिन सजा दिलाने में इतनी कम सफलता इस बात का संकेत हो सकती है कि इन मामलों में राजनीतिक दबाव और अन्य असंतुलन भी हो सकते हैं। विपक्ष का कहना है कि यह न सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता है, बल्कि यह विपक्षी नेताओं के खिलाफ सत्ता द्वारा दबाव बनाने का भी तरीका हो सकता है।

केंद्र की मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर अपना बचाव करते हुए कहा कि ईडी की कार्रवाई हमेशा विश्वसनीय साक्ष्यों और सामग्री के आधार पर की जाती है। मंत्री पंकज चौधरी ने यह भी स्पष्ट किया कि ईडी द्वारा की गई सभी कार्रवाई न्यायिक समीक्षा के लिए पूरी तरह से खुली रहती है। इसका मतलब यह है कि किसी भी कार्रवाई को न्यायालय द्वारा जांचा जा सकता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई भी कार्रवाई पक्षपाती नहीं होगी।

गौर करें तो भारत में जब भी ईडी या अन्य केंद्रीय जांच एजेंसियां किसी नेता के खिलाफ कार्रवाई करती हैं तो निश्चित तौर पर यह राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील मुद्दा बन जाता है। विपक्षी दल यह आरोप लगाते हैं कि सत्ता का दुरुपयोग करके विपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। वहीं, सरकार का कहना है कि यह एजेंसियां पूरी तरह से स्वतंत्र हैं और इनकी कार्रवाई में कोई राजनीति नहीं होती।

बहरहाल, केंद्रीय राज्य मंत्री पंकज चौधरी के इस बयान से इतना तो साफ हो ही गया है कि ईडी की कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता है, खासकर जब बात नेताओं के खिलाफ मामलों की हो। एक ओर जहां सरकार यह दावा करती है कि ईडी स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से कार्य करती है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दलों के आरोपों का समाधान ढूंढ़ने की जरूरत है। यह मामला इस बात का भी संकेत है कि न सिर्फ संस्थाओं की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की जरूरत है, बल्कि राजनीतिक संदर्भ में भी निष्पक्षता बनाए रखना बेहद जरूरी है।

ईडी केसों पर सुप्रीम कोर्ट कर चुका है सख्त टिप्पणी
मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में आरोप साबित होने की दर पर सुप्रीम कोर्ट भी कई बार सख्त टिप्पणी कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को कई बार दोहराया है कि ईडी का उपयोग राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ गलत तरीके से किया जा सकता है और एजेंसी को इस पर जवाब देना होगा।

अदालत ने विशेष रूप से यह चिंता जताई कि जांच एजेंसी अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल कर सकती है, जो लोकतंत्र की साख के लिए खतरा हो सकता है। सर्वोच्च अदालत ने एजेंसी से यह स्पष्ट किया है कि किसी भी प्रकार की जांच और गिरफ्तारी को उचित आधार पर और पारदर्शिता के साथ किया जाना चाहिए। यह टिप्पणी एक तरह से ईडी के कार्यों पर कड़ी निगरानी रखने का संदेश है, ताकि किसी भी तरह की मनमानी और असंवैधानिक कार्रवाई से बचा जा सके।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी न्यायपालिका की उस भूमिका को भी रेखांकित करती है, जिसमें वह सुनिश्चित करती है कि किसी भी केंद्रीय जांच एजेंसी का उपयोग सही दिशा में हो और न्याय की प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप न हो। अब ईडी को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी कार्रवाई संविधान के दायरे में हो और इसका राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास न किया जाए।

नवंबर 2023 : तृणमूल विधायक पार्थ चटर्जी की जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ईडी की आरोप साबित करने की दर खराब है। किसी को अनिश्चितकाल तक विचाराधीन बंदी नहीं रख सकते।

अगस्त 2024 : एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 10 वर्षों में ईडी ने 5000 केस दर्ज किए। इनमें से सिर्फ 40 में आरोप सिद्ध हुए।

दिसंबर 2024 : सरकार ने संसद में बताया कि ईडी ने 1 जनवरी 2019 से 31 अक्टूबर 2024 के बीच 911 शिकायतें दर्ज कीं। 654 का ट्रायल हुआ और सिर्फ 42 में दोष सिद्ध हुआ।

देश के 45% विधायकों पर आपराधिक मामले
चुनाव सुधार पर काम करने वाली गौर सरकारी संगठन एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट में यह तथ्य निकलकर सामने आया है कि देश के 45% विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। ADR ने देश के 28 राज्यों और विधानसभा वाले तीन केंद्र शासित प्रदेशों के कुल 4123 विधायकों में से 4092 के चुनावी हलफनामे का विश्लेषण किया।

आंध्र प्रदेश के सबसे ज्यादा 174 में से 138 (79%) विधायकों ने जबकि, सिक्किम में सबसे कम 32 में से सिर्फ एक विधायक (3%) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के सबसे ज्यादा 134 विधायकों में से 115 (86%) पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

रिपोर्ट से पता चला कि 1861 विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होने की घोषणा की है। इनमें 1205 पर हत्या, हत्या की कोशिश, किडनैपिंग और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर आरोप हैं। 24 विधायकों के हलफनामे का विश्लेषण खराब स्कैनिंग की वजह से नहीं किया जा सका, जबकि विधानसभाओं में सात सीटें खाली हैं।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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