संभावनाओं का नया द्वार

कृष्ण किशोर पांडेय

2017 का उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव सिर्फ प्रदेश में ही नहीं बल्कि पूरे देश में राजनीतिक बदलाव की क्षमता और संभावना दोनों का संकेत बनने जा रहा है। चुनाव पूर्व कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन सिर्फ राजनीतिक सुविधा के मकसद से किया गया गठबंधन नहीं है। इसमें अपेक्षित और रचनात्मक तथा सार्थक बदलाव लाने की संभावना दिखाई दे रही है।

मनोवैज्ञानिक भी यह मानते हैं कि अगर लक्ष्य सामने साफ-साफ दिख रहा हो और निशाना लगाने वाला लक्ष्य साधने की सच्ची और ईमानदार नीयत रखता हो तो लक्ष्य वेध की संभावना बढ़ जाती है। राहुल और अखिलेश के बीच का गठबंधन सिर्फ दो युवकों की राजनीतिक आकांक्षाओं का गठजोड़ नहीं है बल्कि समाज में बदलाव लाकर उसे एकजुट करने की एक दूरगामी प्रक्रिया भी है।

स्थिति को साफ-साफ समझने में आसानी तब होगी जब हम समस्याओं को ठीक से समझें। उत्तर प्रदेश में धर्म, जाति, संप्रदाय इत्यादि सामाजिक बुराईयां इस तरह मजबूत बन चुकी हैं कि जो लोग कुछ करना भी चाहते हैं वे नहीं कर पाते हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अगर चाहते तो उन्हें उस संघर्ष की जरूरत ही नहीं थी जिसके लिए उन्हें मजबूर होना पड़ा। उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करने को उनकी पूरी पार्टी तैयार थी। विवाद इस बात का था कि अखिलेश यादव चार साल के अपने अनुभव के बाद यह समझ चुके थे कि वह मुख्यमंत्री बन तो जाएंगे लेकिन एक कठपुतली के रूप में जाति, संप्रदाय और धर्म आदि बुराईयों के ठेकेदारों के बीच रहकर ही काम करना होगा।

जाहिर है कि जिस पारिवारिक कलह को कुछ व्यक्तियों के बीच स्वार्थ के लिए होने वाले टकराव के रूप में देखा गया वह वास्तव में उससे ऊपर उठकर विचारधारा के आधार पर बदलाव की कल्पना करने वाले एक युवा मुख्यमंत्री के संघर्ष का आधार था। वैसे तो आज मुलायम सिंह बार-बार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का आपस में सदा टकराव ही रहा लेकिन अखिलेश ने यह संकेत देने का प्रयास किया है कि आज उस पुराने टकराव को दूर कर नए सिरे से बदलाव की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है।

राहुल और अखिलेश का दिल खोलकर एक साथ मिलना और साथ मिलकर काम करने का संकल्प यह बताता है कि इन दोनों को देश की वास्तविक समस्याओं की समझ है और वे पूरे देश के स्तर पर उन समस्याओं को दूर करने के लिए तत्पर भी हैं। इससे संकेत यह मिलता है कि उत्तर प्रदेश में जिस तरह का गठबंधन हुआ है वैसा गठबंधन देश के अन्य भागों में भी शुरू हो सकता है और विकास की राजनीति युवा नेतृत्व में एक सार्थक दिशा में आगे बढ़ सकती है।

धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, सच्चा लोकतंत्र और स्वतंत्र विदेश नीति ये ऐसे लक्ष्य हैं जो भारत की एकता और अखंडता को सुरक्षित रखते हुए आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय के साथ-साथ गरीबी, बेरोजगारी दूर करने के लक्ष्य की तरफ बढ़ने में मददगार सिद्ध हो सकते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि आज की युवा पीढ़ी के सामने इस तरह की कठिनाईयां आ गई हैं कि हमारे क्षमतावान युवक ठीक उसी तरह कुछ नहीं कर पा रहे हैं जिस तरह अधिकार संपन्न होने के बावजूद अखिलेश नहीं कर पा रहे थे।

हमारे युवकों को यह बताया जा रहा है कि उनके सामने जाति, धर्म, संप्रदाय के आधार पर अपनी सुरक्षा की समस्या बहुत बड़ी बन गई है। उन्हें यह समझाया जा रहा है कि तुम्हारी जाति, धर्म, संप्रदाय सब पर खतरा मौजूद है। यह एक ऐसा कारक है जो उन्हें सही दिशा में सोचने ही नहीं देता है। लोग यह तक भूल जाते हैं कि एक गांव या शहर जहां पीढ़ियों से लोग साथ रहते आए हैं वे अचानक एक-दूसरे के दुश्मन कैसे हो जाएंगे। कोई भी गंभीरता से सोचे तो उसे साफ दिखाई दे जाएगा कि हमारी कमजोरी क्या है और हमारी समस्याएं क्या है।

इसीलिए सार्थक और रचनात्मक बदलाव के लिए जरूरी है कि ऐसे लोग साथ इकट्ठे हों जो बुराईयों से संघर्ष करके वास्तव में विकास का वातावरण बनाने के प्रयासरत हों। किसी भी समाज में तरक्की तभी होगी जब शांति और सद्भाव का माहौल बने। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि बदलाव लाने की क्षमता युवा शक्ति में ही है।

राहुल और अखिलेश का एक साथ मिलकर विकास के लिए काम करने का संकल्प दिखाना यह भी बताता है कि उन्हें अगले दो वर्षों में बहुत कुछ करना है और उस भावी कार्यक्रम के बारे में इन लोगों में कोई बातचीत भी हो चुकी है। केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद पूरे देश के सामने और खासकर युवा पीढ़ी के सामने एक ऐसा सब्जबाग दिखाया गया और विश्वास दिलाया गया कि पिछले 60-70 वर्षों में जो कुछ हुआ वह सब गलत था और मोदी के नेतृत्व में हर दिशा में ऐसा सुधार दिखाई देगा जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की गई।

ढाई साल के अंदर सबको यह दिखने लगा कि जो वायदे किए गए थे उन्हें पूरा करने की बात तो दूर, जो कुछ अब तक हासिल किया गया था उसके भी नष्ट होने की आशंका पैदा हो गई है। मोदी सरकार की ओर से रोज नए-नए वायदे, रोज नए-नए आश्वासन आज भी जारी हैं। लेकिन आम आदमी और ज्यादा इंतजार करने के मूड में नहीं है। जहां तक युवा शक्ति का सवाल है, वह तो धैर्य खोता जा रहा है। बेरोजगारी की स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि उसपर कैसे लगाम लगेगा यह समझना मुश्किल हो गया है।

इसलिए उत्तर प्रदेश से जिस बदलाव की शुरुआत हुई है उसका देशभर में विस्तार होना लाजिमी है। परंतु बहुत कुछ इस बात पर निर्भर होगा कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले यह युवा शक्ति क्या कुछ करके दिखाती है। दो वर्षों में एक ऐसा सार्थक बदलाव सामने लाना होगा जहां लोगों को साफ-साफ दिखाई दे कि झूठे वायदों और वास्तविक काम में कितना फर्क होता है। लोगों को यह भी दिखाई देना चाहिए कि आजादी के बाद से अब तक जिन आदर्शों के सहारे देश चलता रहा उन्हें छोड़ने की जरूरत है या उनपर मजबूती से टिके रहने की जरूरत है। सिर्फ बातों से या प्रचार से यह संभव नहीं हो सकता। काम करके दिखाना होगा।

उत्तर प्रदेश में अखिलेश और राहुल दोनों ने जनता के सामने कुछ ठोस वायदे किए हैं मसलन किसानों के कर्ज माफ करना, उनकी फसलों के उचित दाम दिलाना, नए उद्योग-धंधों के विकास की ओर ठोस कदम उठाकर बेरोजगारी दूर करना, आर्थिक दृष्टि से पिछड़े लोगों को सहायता देना, तकनीकी विकास से युवाओं को जोड़ना, छात्रों में नया उत्साह पैदा करना, महिलाओं की तरक्की के लिए विशेष कार्ययोजना बनाना आदि ये सभी ऐसे काम हैं जिनपर अगर अमल किया जाए तो लोग उन सभी बुराईयों से धीरे-धीरे मुक्ति पा लेंगे जिनमें फंसकर वे अपना भविष्य बर्बाद कर रहे हैं।

युवा शक्ति बहुत कुछ कर सकती है। भारत की युवा शक्ति ने बार-बार यह परिचय दिया है कि उसकी क्षमता में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। लेकिन जरूरत यह है कि उस शक्ति का सही ढंग से उपयोग किया जाए। भारत के युवा वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर दुनिया के दूसरे देशों में जाकर अपनी धाक जमा चुके हैं। इस देश में कभी प्रतिभा की कमी नहीं रही। जरूरत है तो सिर्फ यह कि राजनीतिक नेतृत्व राष्ट्रीय प्रतिभा और राष्ट्रीय साधनों को राष्ट्र की प्रगति के लिए इस्तेमाल करने का तरीका ढूंढे।

राहुल और अखिलेश दो अलग-अलग पार्टियों के नेता हैं लेकिन दोनों का उन नीतियों में विश्वास है जो वास्तव में इस देश को सही दिशा में लेकर जा सकती हैं। धर्मनिरपेक्षता इस देश के लिए इसलिए जरूरी है कि इसी से सामाजिक सद्भाव कायम होगा और विकास का माहौल बनेगा। विभिन्न जातियों के टकराव की बजाय उन सबमें आपसी मेल कायम हो इसके बारे में भी इन दोनों पार्टियों की राय एक जैसी है। विकास के लिए कौन सा मॉडल अपनाया जाए इसके बारे में भी दोनों पार्टियां साझा रणनीति बना सकती हैं।

अगर उत्तर प्रदेश में जनता ने इस गठबंधन को समर्थन दिया और इनकी सरकार बनी तो इनकी पहली परीक्षा दो वर्षों में इनके कामकाज से होगी। जैसे-जैसे इन्हें सफलता मिलेगी वैसे-वैसे देश के अन्य भागों में भी ऐसे गठबंधन बनने लगेंगे और लोकसभा चुनाव आते-आते पूरे देश के माहौल में बदलाव दिखने लगेगा। मतलब यह है कि राहुल और अखिलेश के गठबंधन ने संभावनाओं का एक नया द्वार खोला है। दोनों युवा नेताओं की इच्छाशक्ति, कार्यप्रणाली, सभी वर्गों को जोड़ने की क्षमता और सृजनात्मक शक्ति इन सब पर ही आज पैदा हुई आशाओं का भविष्य टिका हुआ है।

यह गठबंधन अपने आप में एक छोटी घटना भले ही हो, लेकिन इसमें अनेक और बड़ी-बड़ी घटनाओं को जन्म देने की क्षमता मौजूद है। वैसे तो बिहार में नीतीश कुमार ने अपने धुर विरोधी लालू यादव के साथ मिलकर एक गठबंधन किया था लेकिन वह एक राजनीतिक गठबंधन भर था और क्षेत्रीय स्तर तक ही सीमित था। उत्तर प्रदेश का गठबंधन सिर्फ राजनीतिक नहीं, घोषित रूप से बदलाव लाने के लिए किया गया गठबंधन है और इसकी लहर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और राजनीतिक चिंतक हैं। इस आलेख में उनके विचार निजी हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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