नोटबंदी या अक्लमंदी?

कृष्ण किशोर पांडेय

8 नवंबर 2016 को घोषित नोटबंदी असल में सरकार की अक्लमंदी का सबसे बड़ा सुबूत है। यह मामला जब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंचा तो पीठासीन मुख्य न्यायाधीश ने अपनी टिप्पणी में सरकार से यही कहा, ‘आपने पूरे देश को हिलाकर रख दिया।’ इससे ज्यादा सटीक टिप्पणी कोई और नहीं हो सकती। इस फैसले के हर पहलू पर अलग-अलग नजर डालें तो यह साफ दिखाई देता है कि इससे फायदा कुछ नहीं हुआ और नुकसान इतना ज्यादा हुआ कि अगले कुछ वर्षों तक उसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा। सबसे पहले आर्थिक पहलू को ही लें।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संदेश में नोटबंदी पर आदेश जारी करते हुए इसके तीन फायदे गिनाए थे। पहला यह कि इससे देश के अंदर जो कालाधन है उसको बाहर लाने में मदद मिलेगी। दूसरा यह कि आतंकवाद और हवाला कारोबारियों दोनों पर लगाम कसी जाएगी। और तीसरा यह कि देश का आर्थिक विकास तेजी से आगे बढ़ेगा और उसके रास्ते की बाधाएं दूर होंगी। उन्होंने अपील भी की थी जनता राष्ट्रहित को ध्यान में रखते हुए कुछ कठिनाईयां झेलने को तैयार रहे, लेकिन हुआ क्या?

उस आदेश के बाद 50 दिन बीते हुए कई दिन हो चुके हैं, नोटबंदी के चलते देश की जनता ने हर तरह के कष्ट का सामना किया है और संयम भी दिखाया है। लेकिन परिणाम यह निकला कि अपने ही जमा किए हुए कमाई के पैसे बैंक से निकालने के लिए लोगों को घंटों कतार में खड़ा होना पड़ा और यहां तक कि इस कोशिश में सौ से ज्यादा लोग मौत के शिकार भी हो गए। कितने मरीज इलाज के अभाव में दम तोड़ गए क्योंकि इलाज के लिए उनके पास नए नोट नहीं थे। अनेक परिवारों में बेटे-बेटियों की शादियां टाल दी गईं या टूट गईं। कुछ लोगों ने हिम्मत जुटाई भी तो वे उस ढंग से नहीं कर पाए जैसा चाहते थे। मन मसोस कर रहना पड़ा।

लेकिन इसी बीच में कर्नाटक के पूर्व भाजपाई मंत्री जनार्दन रेड्डी की बेटी की शादी में 500 करोड़ रुपये खर्च किये गए। मोदी सरकार के वर्तमान केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की बेटी की शादी भी पूरी शानो-शौकत के साथ हुई। सबसे दिलचस्प पहलू तो यह रहा कि कालाधन रखने वाले बैंकों की कतार में लगे बिना अपने धन को सफेद बनाने में सफल हो गए। रिजर्व बैंक के पास 500 और 1000 के पुराने नोट जो पहले से प्रचलन में थे लगभग सारे वापस आ गए।

सरकार का अनुमान था कि 4 से 5 लाख करोड़ रुपये ऐसे होंगे जो कालेधन के रूप में होंगे जो सरकार के हाथ में आ जाएंगे। इसका दूसरा नुकसान यह हुआ कि छोटे-छोटे काम धंधे ही नहीं, बल्कि बड़ी-बड़ी कंपनियों और कारखानों में भी काम ठप हो गया। लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार हो गए। एक तरह से अर्थव्यवस्था थम सी गई है। कोई भी अनुमान लगा सकता है कि उत्पादन अगर इतने दिनों तक ठप रहे तो अर्थव्यवस्था को कितना भारी नुकसान सहना पड़ेगा। जब इतने दिनों तक मजदूर काम नहीं कर पाए तो कितने बड़े अनुपात में कार्यदिवसों का नुकसान हुआ।

उससे भी बड़े नुकसान की बात यह हुई कि नए नोट बड़ी संख्या में कुछ सीमित लोगों के पास पहुंच गए और यह समझना मुश्किल है कि जो नया कालाधन जमा हो गया अब उसका क्या होगा। कुछ लोग नोटों के साथ पकड़े भी गए। उसमें भी कई तो भाजपा से संबंध रखने वाले लोग थे। सरकार का आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ऐसे जमा किए गए नोट पकड़ने की कोशिश में लगा है लेकिन ऐसे अनुमानित धन का सिर्फ 5 प्रतिशत भी पकड़ में नहीं आया।

गुजरात के महेश शाह ने 13 हजार 500 करोड़ के कालेधन की घोषणा की और उसपर आयकर भी चुका दिया। कायदे से बाकी बची सारी रकम सफेद है और उनसे पूछताछ भी नहीं की जानी चाहिए थी। सवाल यह उठता है कि एक व्यक्ति के पास 6500 करोड़ अगर जमा है तो उसे किस श्रेणी में रखा जाएगा।

इन तमाम बातों से जाहिर हो गया है कि आर्थिक रूप से नोटबंदी का फायदा न वर्तमान में हुआ है और न ही कोई दीर्घकालिक लाभ की संभावना है। नुकसान सिर्फ आर्थिक रूप से ही नहीं हुआ बल्कि लोगों में सरकार की सोच और कार्यप्रणाली के बारे में संशय भी पैदा कर दिया है। सरकार की साख और विश्वसनीयता पर सवाल उठना सिर्फ नुकसानदेह ही नहीं घातक भी है।

जहां तक आतंकवाद और गैरकानूनी आर्थिक स्रोतों पर लगाम कसने की बात है तो उसमें भी कोई खास सफलता नहीं मिली। यहां तक कि आतंकवादी बैंकों से करोड़ों की नए नोटों की गड्डियां लूटने में कामयाब हो गए। यह सिलसिला कब और कैसे रूकेगा यह कहना भी मुश्किल है। अब तो लोग यहां तक कहने लगे हैं कि या तो प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकारों को जमीनी हकीकत की जानकारी नहीं है या प्रधानमंत्री से सलाहकारों की सलाह को दरकिनार कर अपना बुलडोजर चला दिया।

नोटबंदी के राजनीतिक फलितार्थ पर एक नजर डालें तो गांव से लेकर शहरों तक छोटे-बड़े व्यापारी और उद्यमी जनसंघ के दिनों से ही भाजपा के अच्छे समर्थक बताए जाते रहे हैं। नोटबंदी ने उनकी रोजी-रोटी पर ऐसी लात मारी है कि वे खुद को संभाल नहीं पा रहे हैं। इससे उनका राजनीतिक रूप से भाजपा से विश्वास डिगना स्वाभाविक भी है। वैसे भी जनता में एक ऐसा भ्रम फैला है कि भाजपा के कट्टर समर्थकों को भी आम लोगों को नोटबंदी के फायदे बताने और उन्हें विश्वास दिलाने में कठिनाई हो रही है। यह भी ऐसे समय में हुआ जब पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं।

अगर नोटबंदी के पीछे कोई राजनीतिक मंशा रही होगी तो उसका पूरा होना भी कठिन हो गया है। नोटबंदी की घोषणा के समय अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाने में बात नहीं की गई थी। अचानक कैशलेस और डिजीटल अर्थव्यवस्था को फायदेमंद बताने की सरकार की मुहिम चल पड़ी है। भाजपा को निर्देश दिया गया है कि वह इस मुहिम को जन-जन तक पहुंचाए। इसका परिणाम भी उल्टा ही निकल रहा है।

आम आदमी के लिए यह समझना कठिन हो रहा है कि जब अमेरिका, जापान और यूरोप के देशों में शत-प्रतिशत अर्थव्यवस्था कैशलेस नहीं है तो भारत में यह कैसे सफल हो सकती है। खासतौर पर जब भारत का जनमानस इसके लिए तैयार नहीं है और आज भी जनता के एक बहुत बड़े वर्ग को कैशलेस की जानकारी नहीं है और न ही डिजीटल प्रणाली की। अगर लोगों को आज से प्रशिक्षण देना भी शुरू करें तो इसे कार्यरूप देने में वर्षों लग जाएंगे। यह निर्विवाद है कि भारत के संदर्भ में यह प्रणाली पूरी तरह अव्यवहारिक है। यहां ऐसी प्रणाली की जरूरत है जिसमें लोगों को कैश या कैशलेस दोनों तरह की प्रणाली पर अमल करने की आजादी हो।

इस पूरे तामझाम के बाद एक आम आदमी यह सोचने को मजबूर हो गया है कि रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने जब नोटबंदी के सुझाव को मानने से इंकार कर दिया ता तब मोदी सरकार को नए गवर्नर उर्जित पटेल की मदद से इतनी हड़बड़ी में यह सब करने की जरूरत क्यों पड़ी। अगर उत्तर प्रदेश या कुछ राज्यों में चुनाव जीतने के लिए ऐसा करना जरूरी समझा गया तो ऐसी सोच को दिमागी दिवालियापन ही कहेंगे। इसके लिए तो जिन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं वहां की जनता को केंद्रीय स्तर पर सुविधाओं की घोषणा करना ज्यादा जरूरी था।

सरकार की मजबूरी किस सीमा तक है इसको समझने के लिए इतना ही काफी है कि रिजर्व बैंक यह बताने के कतरा रहा है कि निदेशक मंडल की जिस बैठक में नोटबंदी का निर्णय लिया गया उसमें क्या-क्या कार्यवाही हुई। हालांकि सरकार के मंत्री और भाजपा के कुछ नेता बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि नोटबंदी सफल रही और कैशलेस प्रणाली का भी तेजी से विस्तार हो रहा है। लेकिन आम जनता न तो इन दावों पर विश्वास करने को तैयार है और न ही प्रधानमंत्री द्वारा घोषित हाल की कुछ सुविधाओं पर उन्हें कुछ आश्वासन मिलता प्रतीत होता है।

सबको मालूम है कि ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती। जो लोग बेरोजगार हो गए हैं उन्हें छोटी-मोटी सुविधाएं मिल भी जाए तो उन्हें कैसे खुशी मिलेगी। उससे भी बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या यह पूरा तामझाम लोगों की आर्थिक आजादी पर हमला नहीं है। एक नागरिक अपनी मेहनत की कमाई जब बैंक में जमा करता है तो यही सोचता है कि बैंक से या एटीएम से जरूरत के मुताबिक पैसा निकालेगा और खर्च करेगा।

सबको मालूम है कि कालाधन बैंक में नहीं जाता तो फिर बैंकों, बैंक कर्मचारियों और आम जनता को इसमें लपेटने की क्या जरूरत थी। लोगों में यह धारणा फैल रही है कि बैंक के अफसर और कर्मचारी कालाधन धारकों से मिलभगत करके काले को सफेद बना रहे हैं। तो फिर बैंकों को सुरक्षित कैसे माना जाए। जब से नोटबंदी लागू हुई तब से सरकार, रिजर्व बैंक और संबंधित विभाग बार-बार नियम बदलते गए। प्रधानमंत्री ने सफाई दी कि वह तो जनता की बात सुनते हैं और जनता की ओर से जो-जो सुझाव आए उनपर उन्होंने अमल किया।

सवाल यह उठता है कि जनता तो कभी नहीं चाहती थी कि नोटबंदी हो। उसपर ध्यान क्यों नहीं दिया गया। सरकार में कोई भी व्यक्ति यह महसूस करने को तैयार नहीं है कि जनता को जो कष्ट भुगतने पड़ रहे हैं उसे आसानी से भुलाया नहीं जा सकता है। जनता का कष्ट और सत्ता पक्ष के दावे ठीक वही दृश्य उपस्थित कर रहे हैं जो साफ दिखते हुए घाव पर ऊपर से नमक छिड़कने जैसे दृश्य में दिखाई पड़ता है।

सबसे अंतिम सवाल यह कि विपक्ष के लोगों ने इस पूरे तामझाम के पीछे बहुत बड़ी आर्थिक साजिश का जो आरोप लगाया है क्या उसमें कोई सच्चाई है? प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत रूप से रिश्वत लेने का जो आरोप लगा है क्या उसमें कोई सच्चाई है? नोटबंदी की घोषणा से पूर्व प्रधानमंत्री के करीबी मित्रों और उनके पार्टी के लोगों को इसके बारे में संकेत दिया गाय था यह आरोप क्या सही है? क्या प्रधानमंत्री अन्य राजनीतिक दलों को आर्थिक रूप से पंगू बनाकर अपनी पार्टी को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहे थे। क्या यह आरोप भी सही है?

आम नागरिकों को संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का इस पूरी प्रकिया में उल्लंघन हुआ है यह आरोप क्या सही नहीं है? इन सभी सवालों के जवाब तभी मिलेंगे जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित पांच जजों वाली संविधान पीठ पूरे मामले की सुनवाई करेगी और अपना निर्णय सुनाएगी। संविधान पीठ को आमतौर पर वही मामला सौंपा जाता है जिसे बहुत ही गंभीर माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने जब यह कहा था कि उसकी नजर में सरकार ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है तो नि:संदेह वह इन तमाम मामलों पर गहराई से विचार करेगा और क्या कुछ कानूनी है या गैरकानूनी उसपर निर्णय देगा।

आशा करनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद कोई भी आनेवाली सरकार ऐसा कदम उठाने से पहले सौ बार सोचेगी। फिलहाल तो चिंता का विषय यही है कि सरकार की साख दांव पर लगी है और जिस प्रधानमंत्री पर लोगों ने इतनी अधिक इज्जत दी थी, उनकी निजी विश्वसनीयता भी दांव पर है। बैंक की साख खतरे में है। तो क्या माना जाए, हमारी आर्थिक आजादी भी सरकार के आदेशों का मोहताज है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और राजनीतिक चिंतक हैं। इस आलेख में उनके विचार निजी हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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