रघुवर के राज में क्रॉस जिहाद का सच

राम मंदिर का नाम रटने वाले क्या सलीबों का सच जानते है? सवाल सलीबों का नहीं, त्रिशूल का नहीं, बल्कि सवाल है आदिवासी हिन्दू हैं- तो हिन्दु बहुल आबादी में दूसरे धर्मों का प्रतीक चिह्न क्यों? क्या यह किसी इलाका विशेष का अतिक्रमण है? क्या यह किसी ताक़त की साजिश है? क्योंकि आप राम मंदिर की राजनीति करते रहिए, उत्तर प्रदेश को अपनी अस्मिता का सवाल बनाते रहिये, उसे हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाते रहिये, लव ज़िहाद का मुद्दा लहकाते रहिये। लेकिन ध्यान रखिये, आपकी नाक के नीचे सदियों की साजिश अपनी जवानी की कुलाचें भरती नजर आ रही है। आप लव जिहाद पर बवाल काट रहे हैं और संथाल परगना और इसके समीपवर्ती जिलों में क्रॉस जिहाद की धूम मची है।

घरों की दीवारों पर क्रॉस है, जान लीजिए। खलिहानों में क्रॉस है, मान लीजिये। क्या आपकी जानकारी में ऐसा कुछ हो रहा है? यदि हां, तो यह कैसी साजिश है? यदि साजिश है, तो क्या इस साजिश की योजना इटली में पकायी जा रही है? योजना कहीं भी बनाई और पकायी जाए, लेकिन सच तो यही है कि तक़रीबन 18 साल से राज तो आपका है। मतलब झारखण्ड में भगवा राजनीति का बोलबाला है। इस लंबे कालखण्ड में ध्वज वाहकों, हे शाखा मृगों! आपने क्या किया? क्या गगनचुम्बी सलीबों पर टंगे सवालों का जवाब आपके पास है?

मेरा सवाल साधारण है, संथाल परगना में इतने सलीब क्यों हैं श्रीमंतों? खेतों और खलिहानों में सलीब क्यों? हिंदुत्व के मालिकानों! वह सरकार कहां है, जो हिंदुत्व का गुणगान करती है। विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस के वे कट्टर कार्यकर्ता कहां हैं जो गाय और मन्दिर के सवाल पर जान देने की प्रतिज्ञा दोहराते हैं। कभी आपने सोचा है कि झारखण्ड में लोक आस्थाएं खलिहानों में क्यों सज जाती हैं? जैसे उत्तरप्रदेश में श्रद्धा के बोल शाम के वक़्त हवाओं में क्यों गूंजते हैं?

हमारे रहबरों! सांप्रदायिकता के ओहदे पर बैठकर हिंदुस्तान को मत देखिए। क्योंकि सांप्रदायिकता के चश्मे पहनकर आप पंचायत का चुनाव जीत सकते हैं लेकिन सूबे की राजनीति में मात खा जाएंगे। इस सूबे की राजनीति में आपके पास सलीबों की बढ़ती लोकप्रियता पर क्या कहना है। हाँ, झारखण्ड के पास एक मुख्यमंत्री है। वैसे तो मुख्यमंत्री तो हर राज्य के पास है तो झारखण्ड के पास भी है। लेकिन यह मुख्यमंत्री चीखता है। चिल्लाता है। नौकरशाही पर घुड़कता है। उसे बेइज्जत करता है। उससे पूछता है कि ‘तुमको कौन बनाया रे एक्स, वाई और जेड?’ यही अंदाज है इस कद्दावर मुख्यमंत्री का।

लेकिन इस मुख्यमंत्री के पास जवाब नहीं है कि आदिवासी इलाकों में मिड डे मील क्यों बन्द है? अनुकम्पा के आधार पर नौकरियाँ नहीं देने की लाचारी क्या है? राज्य में एक घोटाले का पर्दा उठता है तो दूसरे की गुंजाइश बन जाती है।

सुजलाम सुफलाम योजना के तहत आहरों वाले इस देस में 5000 पोखर खोदे जाएंगे। लेकिन,आज उन तालाबों की सुधि कौन लेगा रघुवरजी! आप अपने रियासत के तालाब-पोखरों का सच जानिए। लिट्टीपाड़ा ब्लॉक में 500 मीटर के दायरे में मुझे तक़रीबन 10 तालाबो के दर्शन का मौका मिला रघुवर जी। उन तालाबों की बनावट देखकर भ्रष्टाचार के भगवा कैडर की तहें समझ मे आती हैं। इन तालाबों में बूंद भर पानी नहीं है हुजूर। बल्कि इनकी घेराबन्दी देखकर ऊंचे-ऊंचे कब्रों का एहसास होता है। रघुवरजी! ये जल प्रबंधन के कब्रगाह हैं या गुड गवर्नेंस के।

इतना ही नहीं, चुओं को कुओं में बदल दिया, कोई देखनेवाला नही। ऐसे कुओं का डिटेल्स लिखा है लेकिन प्राक्कलित राशि की जगह रिक्तता है।यही रिक्तता सरकार और पब्लिक के बीच की है। हुज़ूर, कोई इस विकास का नामलेवा नहीं। किसी को इस विकास से मतलब नहीं।

क्यों जिन रास्तों के अगल-बगल इन तालाबों का अस्तित्व है, उस रास्ते पर मोटरसाइकिल चलाना मुश्किल है। इलाका नक्सल प्रभावित है तो आपने भी ऐसे चैलेंजिंग एरिया में डेवलपमेंट करने का क्रेडिट लूट लिया। पहाड़िया इलाके में 100 रुपये का कर्ज तीन महीने में 150 रुपये हो जाता है। और साल भर में 350 रुपये सूद समेत महाजन को लौटाना पड़ता है। बीमार पड़ने पर गाय गोरु बेचकर पैसा जुटाते हैं या मौत का इंतजार करते हैं।

बार-बार किसी पहाड़िया बस्ती के रिटायर्ड एक एयरफोर्स के जवान की बातें याद आ रही थीं– ‘अपना इलाका सूडान से भी बदतर है सर। कोई दस नवजात बच्चों में 4-5 मर ही जाते हैं।’ जवान श्रीलंका शांति सेना से लेकर सूडान पीस फोर्स में रह चुका है। खैर इस रास्ते पर कहीं अपनी बाइक से उतरकर हम नीचे की ओर बढ़ते हैं, जहां एक पहाड़िया बस्ती है। पता चला थोड़ी देर पहले एक नवजात शिशु की मौत हुई है। तो मौत का मातम बस्ती में पसरा था। अफसोस जताने हम भी पहुंचे।

लोकतंत्र का पंचनामा लिखने यहां कोई डॉक्टर नहीं आता। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 25 किलोमीटर की दूरी पर है। कोई आशा वर्कर उस गांव तक नहीं पहुंचती। पैदा हुए बच्चे का गर्भनाल बांस की खपच्ची की तेज़ धार से काटा जाता है। इतनी सारी सच्चाईयां एक साथ सामने आती चली गईं कि देखकर सुनकर ज़िन्दगी का निर्गुण भाव जागने लगा।

लौट रहा था अमड़ापाड़ा, जहां से कहीं और जाने की तैयारी किये बैठे थे अपनी टीम के लोग। चौराहे पर अभी आयुष्मान भारत की प्रचार-गाड़ी बड़े से स्क्रीन पर मोदी-रघुवर के आश्वासनों से भरे प्रचार परोस रही थी। कोई 57 लाख लोगों को मुफ्त इलाज के इंतजाम किए जा चुके हैं। लेकिन क्या होगा, इस आयुष्मान भारत का, जहां तक जाने का रास्ता सरकार ने अभी तक तय नहीं किया। विकास का मूर्त रूप प्रचार पोस्टरों में सजा दिखता है।

असली सच तो नौनिहालों की मौत पर प्रकट होती है, जो नौनिहाल महाकाल की गोद मे बैठकर लोरियां सुनते हैं। यदि मलेरिया से मरते इन पहाड़िया लोगों के बीच आत्मसम्मान बचाने की बात और महाजनों के चंगुल से छुड़ाने की कवायद ईसाई मिशनरियाँ करतीं है तो खलिहानों में सलीब सजना लाजिमी है। आप घर वापसी के नाम पर धर्मांतरित आदिवासियों के पैर धोते रहिये। योजनाओं की घोषणा करते रहिए। कल्पना कीजिये हुजूरे, बीएसएनएल का कनेक्शन रात भर नहीं था, आपने विभागीय अधिकारियों को रात भर थाने में गुजारने का फरमान चला दिया लेकिन बच्चों की मौत पर थाने में रात कौन बिताएगा जहांपनाह।

अब तरक़्क़ी के तर्क बदल चुके हैं। खेतों में फसल आयी है यीशु के आशीर्वाद से। अब महाजनों से मतलब नहीं। और शायद, जुमले वाली उस व्यवस्था से भी नहीं। सरकार से जितना मिल जाये, नहीं मिलने का अफसोस नहीं और मिलने का अभिमान नहीं। खलिहानों से खुशियां आती हैं और उन खलिहानों को भरने वाला बोंगा, वनदेवता या रघुकुल के श्रीरामचन्द्र नहीं– ऐसा धर्मांतरित आदिवासी मानते हैं। ज़िन्दगी में चमत्कार बाइबिल ने किया है तो इस लोक आस्था को आप भी स्वीकार कीजिये।
(लेखक डेवलपमेंट जर्नलिस्ट और जन सरोकार से जुड़े मुद्दों के विशेषज्ञ हैं।)

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अमरेंद्र किशोर
स्वतंत्र पत्रकार और लेखक के तौर पर मशहूर अमरेंद्र किशोर दिल्ली में रहते हैं। विकास और सामाजिक सरोकारों से गहरा नाता रखने वाले अमरेंद्र का दक्षिण-पूर्व एशिया के दुर्गम इलाकों में रहने वाले मूल बाशिंदों गहरी रूचि है। यही वजह है कि उनके लेखन में जन-सरोकार के मुद्दों की गहराई में जाने की झलक मिलती है। अपनी पत्रकारिता के ज़रिये ज़मीनी स्तर पर सामाजिक और लैंगिक मुद्दों, ग्रामीण जीवन की जटिलताओं, गरीबी की मार्मिक वास्तविकताओं तथा आदिवासियों की ज़िन्दगी में बढ़ती चुनौतियों के गहन अन्वेषण का काम अमरेंद्र ने बख़ूबी किया है। अमरेंद्र किशोर भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय में पुनर्वास और पुनर्स्थापन मामलों के सलाहकार, राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रोजेक्ट रिव्यू कमेटी और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी सामाजिक विकास पुरस्कार समिति के सदस्य रह चुके हैं। ज़मीनी स्तर पर सामाजिक सहभागिता और जागरूकता के अलावा समाज के सतत विकास कार्यों के सिलसिले में फोर्ड फॉउंडेशन, जापान फॉउंडेशन, वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम की परियोजनाओं के साथ भी बतौर परियोजना निदेशक काम किया है। अंग्रेजी मासिक ''डेवलपमेंट फाइल्स'' के कार्यकारी सम्पादक (2014-2020) भी रह चुके हैं। इन्होंने ओडिशा की अनब्याही माताओं के मुद्दे पर मुल्क की मीडिया को नई दिशा दी है। फिलहाल, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन की हजारों बाघ विधवाओं पर केंद्रित अनुसंधान में सक्रिय हैं। आदिवासी, पर्यावरण और लोकज्ञान पर आधारित अभी तक इनकी सात क़िताबें प्रकाशित हुई हैं। इनके निबंध संग्रह 'जंगल-जंगल लूट मची है' कृति को दिल्ली सरकार के हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कृत (2007) किया जा चुका है। लोकज्ञान पर आधारित इनकी बहुचर्चित कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' के लिए इन्हें लोकायत देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय सम्मान (2011) से नवाज़ा गया है। अमरेंद्र सासाराम के शांति प्रसाद जैन कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक (1991) हैं और भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से जनसंचार में पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा (1994-95) की डिग्री ली है। इनकी पत्रकारिता भारतीय उप-महाद्वीप के आदिवासी समुदायों द्वारा झेली जा रही कठिनाइयों पर रोशनी डालती है और प्राकृतिक संसाधनों को स्थानीय जीवन से जोड़ने की तत्काल जरूरतों की वकालत भी करती है।

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