जनादेश 2018 ; अति की हद पर अर्द्धविराम

ओम प्रकाश तिवारी

हदें केवल देशों की ही नहीं होती हैं। हदें इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं की भी होती हैं। निजी संपत्ति और अति की भी होती हैं। राजनीति में झूठ, जुमलेबाजी, नकरात्मकता और पोंगापंथी की भी होती है। इन पर पहले अर्द्धविराम फिर पूर्ण विराम लगता है। अभी अर्द्धविराम लगा है। 2019 में पूर्ण विराम लगाने का आगाज है।

इस लिहाज से यह शुरुआत है राजनीति में नकरात्मकता के अंत का। अब इसे कोई नेता नहीं रोक सकता। यह जनता का फैसला है। यह किसी नेता के मन की बात नहीं है। यह सार तत्व है पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के नतीजों का। मिजोरम, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में नरेंद्र मोदी, अमित शाह और योगी आदित्यनाथ की भाजपा की पराजय हुई है।

मध्यप्रदेश को छोड़कर चार अन्य राज्यों में यह जोड़ी मुंह दिखाने के काबिल भी नहीं बची है। यही वजह है कि 11 दिसंबर की सुबह से ही नतीजों पर तीनों ही नेताओं की बोलती बंद है। मुंह छिपाते फिर रहे हैं। प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी ने संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दिन पारंपरिक वक्तव्य देकर चुनाव पर पत्रकारों के सवालों का कोई जवाब दिए बिना सदन के प्रवेश द्वार की तरफ निकल गए।

अभी कुछ ही दिन हुए हैं, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी पार्टी के एक कार्यक्रम में कहा था कि भाजपा 50 साल तक राज करेगी। पूर्वोत्तर में एक-दो राज्यों में सरकार बनाने के बाद कहा था कि उनका विजय रथ नहीं रुकेगा। कोई भी नहीं रोक सकता। नरेंद्र मोदी 2013 से ही कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगा रहे हैं। यह सब ऐसी बातें हैं जो अतिश्योक्ति से भरी हैं। इस तरह से बोलने वाले को लोग बड़बोला, अंहकारी और अंत में गप्पबाज कहने लगते हैं।

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों ने यह साबित कर दिया है। अब इनकी दो दिनों से बोलती बंद हैं। चेहरा दिखाने लायक नहीं बचे हैं। इनका बनाया पप्पू अच्छे अंक से पास हो गया है और तब से यह सभी गप्पू छिपते फिर रहे हैं। अपने अंहकार में इन लोगों ने शालीनता के साथ ही सामान्य शिष्टाचार का भी परित्याग कर रखा है।

पांच राज्यों के चुनाव नतीजों से यह भी सन्देश मिलता है कि जनता के लिए चेहरा और नेता कोई मायने नहीं रखता। उसे अच्छा विकल्प चाहिए…कथित अच्छा चेहरा, अच्छा नेता यदि जनाकांक्षाओं पर खरा नहीं उतरता है तो जनता उसे उसके सिंहासन से उतार फेंकती है। यही लोकतंत्र की खूबी है। यही व्यवस्था है। शासन तंत्र का निर्माण जनता करती है, अपने हित के लिए ताकि वह सुरक्षित रहे। उसका समाज विकासगामी रहे। सभ्यता गतिमान रहे। मानवता और संवेदना बनी रहे। मानवकल्याण होता रहे।

जब ऐसा नहीं होता है तो जनता अपनी व्यवस्था गढ़ती है, बनाती है और सृजित करती है। अपने ही बीच से वह नेता भी चुन लेती है…जनता कभी भीड़ होती है तब उसमें कोई विवेक नहीं होता। तब उसे नेता चाहिए होता है। तब वह नेता के पीछे चलती है। लेकिन जब उसका नेता से मोहभंग होता है तो वह विवेकपूर्ण हो जाती है। तब वह भीड़ नहीं होती। तब वह अपना नायक खोजती है। चुनती है। सृजित करती है।

छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने वे सभी हथकंडे अपनाए जो उसके नेताओं के दिमाग सोच सकते थे। मीडिया में विज्ञापनों के माध्यम से अपने खोखले कामों और उपलब्धियों का बखान, फेक न्यूज का प्रचार-प्रसार, कांग्रेस और उसके नेताओं के खिलाफ दुष्प्रचार, भाषणों में निम्न स्तर की भाषा का प्रयोग, गाय और राम मंदिर मुद्दे का उपयोग, सेना और देश का राजनीतिकरण।

पाकिस्तानी विरोधी मानसिकता का सियासीकरण करते हुए मुस्लिम विरोध को हवा देना। हिंदुत्व का जातीयकरण करते हुए हनुमानजी को दलित बताने तक की निम्न स्तर की सोच तक पहुंच जाना। यहां तक कि अधिकारियों पर ईवीएम से छेड़छाड़ का दबाव बनाना यह दर्शाता है कि भाजपा को हार स्वीकार नहीं थी। लेकिन उसे तो हारना था और हार गई। क्योंकि यह सारे मुद्दे चुनाव के समय वोट की फसल काटने के बाद उसे पचाने के लिए जुगाली करने जैसे थे।

भाजपा के किसी भी नेता ने न तो अपने पद के अनुकूल भाषा का इस्तेमाल किया और न ही कद के अनुसार व्यवहार प्रदर्शित किया। बदले में जब उसे उसी की भाषा में जवाब मिला तो वह तिलमिला गई और अभद्र होती चली गयी। नतीजा सामने है। लोकतंत्र में विपक्ष का भी सम्मान जरूरी होता है यह बात 2014 के जनादेश और उसके बाद के कई चुनावों में जीत के अहंकार में भूल गयी थी। अब शायद वह इसे न भूलना चाहे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार और आलोचक हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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