एनआरसी : समस्या की असली वजह तो जानिए

मनोहर मनोज

असम में 40 लाख लोगो की भारतीय नागरिकता की पात्रता सूची से विलग हो जाने वाली रिपोर्ट को लेकर देश भर में अलग-अलग मंचों पर जो द्विपक्षीय और दो-ध्रुवीय विश्लेषण हो रहा है, उसमें इस समस्या का ना तो कारण दिखेगा और ना ही समाधान। इसपर मैं कुछ लिखने को विवश हुआ। विवश इसलिए कि ये 40 लाख लोग तकनीकी रूप से भारत के नागरिक भले नहीं हों, जिसमें भूलवश हुई गैर पात्रता शामिल नहीं है, पर ये व्यक्ति मानवीय दृष्टि से, मानवशास्त्रीय दृष्टि से, ऐतिहासिक दृष्टि से, भारतीय जनजीवन और संस्कृति की दृष्टि से और अखंड भारतीय इतिहास के डीएनए के हिसाब से उसी भारत के ही तो हिस्से हैं। आखिर इस समस्या की जड़ें कहां से शुरू होती है।

जिन लोगो ने देश को सांप्रदायिक रूप से विभाजित करने का महापाप किया, जिन्होंने विभाजन के दंगों में दस लाख लोगो की बलि ली, आज इसी का नतीजा है कि असम के 40 लाख लोग और ना जाने बांग्लादेश से पाकिस्तान गए लाखों उर्दूभाषी बिहारी मुसलमानों को यह जिल्लत सहनी पड़ी है। यह सभी लोग मूल रूप से भारतीय हैं, ठीक वैसे ही जैसे पश्चिम स्थित पाकिस्तान और पूर्व स्थित बांग्लादेश मूल में भारत देश की ही सरजमीं है।

द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत देकर देश का विभाजन करने वाला इस मुल्क का महाखलनायक मोहम्मद अली जिन्ना इतना बड़ा पाप करने के बाद अपने राजनीतिक छल और वेस्टर्न सोफिस्टिकेशन की वजह से अभी भी कई बौद्धिकों और यहां तक कि भारत के भी कई लोगों की डॉर्लिंग बनता है। वह जिन्ना जो निजी जीवन में घोर प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष और पूर्ण रूप से गैर इस्लामिक था, राजनीतिक जीवन में वही शख्स उतना ही फसादी, इस्लामिक और अलगाववादी था। जो जिन्ना अपने समूचे जीवन में अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा में कभी मुस्लिम लीग तो कभी कांग्रेस, कभी ब्रिटिश कोएटरी तो कभी भारतीय बिज़नेस टाइकून के संग अपना पाला बदलता रहता था, वही जिन्ना 1935 इंडिया एक्ट में सेपरेट कम्युनल इलेक्टोरेट का प्रस्ताव देखकर वॉल पर लिखा सेंटेंस पहचान लिया और फिर शुरू हआ मुस्लिम कम्युनल पॉलिटिक्स की उसकी भयानक कैम्पेन।

1946 की प्रांतीय असेंबली के चुनाव में जिन्ना की मुस्लिम लीग को हैरतभरी सफलता दिलाकर पाकिस्तान की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करने वाले लोग पाकिस्तान के मुस्लिम तो कत्तई नहीं थे। इनके पक्ष में मतदान करने वाले सबसे अव्वल तो यूपी, सीपी, बिहार और बंगाल के थे। वही बंगाल जो कम्युनल विभाजन के बाद भी भारत स्थित बंगाल में मुस्लिम की करीब 25 प्रतिशत आबादी बसती है, वही बंगाल के 40 लाख मुस्लिम जो माइग्रेट कर असम में हैं। यह कौन सा डेमोग्राफिक लॉजिक बनता है।

ममता दीदी इस एनआरसी फैसले को लेकर जो चिंता जता रही हैं, वह चिंता तो उन्हें अपने बंग भंग को लेकर जतानी चाहिए। देश के हिन्दुओं को यहां के मुसलमानों से घृणा करने की जरूरत नहीं है। भारत के कथित मुसलमानों ने अरब में फली-फूली मजहब का आवरण जरूर ओढ़ा है, पर जीवविज्ञानी दृष्टि से वह भारतीय ही है, धीरे-धीरे उन्हें जब अपनी हकीकत और ऐतिहासिक तथ्य का पता लगेगा तो खुद शर्मसार होंगे और भारत-पाक बांग्ला के पुन:एकीकरण का मार्ग प्रशस्त करेंगे। हिन्दू और मुस्लिम दोनों जब अपने इतिहास का सही रूप से दीदार करेंगे तो समस्या का अपने आप समाधान हो जाएगा। आखिर हिन्दू धर्म की वर्णव्यवस्था और दूसरी मुस्लिम समाज का ऐतिहासिक भारतीय सच पर आत्मावलोकन हो जाये तो फिर राष्ट्र और धर्म दोनों का एकीकरण हो जाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और इकनॉमी इंडिया के संपादक हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी मत हैं।)

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सत्ता विमर्श डेस्क
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