भारत विभाजन का असली गुनहगार कौन?

प्रेरित कुमार

71 बरस पहले हमारे पूर्वजों ने गुलामी के परचम को मां भारती के माथे से हटाकर औपचारिक तौर पर स्वाधीनता हासिल की थी। लिहाज़ा इस आज़ादी दिवस के अवसर पर स्वाधीनता के उन महावीरों को याद करते हुए आज की नई पीढ़ियों को देश के बंटवारे से जुड़ी कुछ बातों से रू-ब-रू कराना जरूरी है ताकि स्वाधीनता के महावीरों को लेकर उनके मन में कोई भ्रम अथवा वहम की गुंजाइश न हो।

मुल्क के बंटवारे की तोहमत अक्सर गांधी जी (बापू) पर लगाई जाती है और कहा जाता है कि गांधी ही भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के असली गुनहगार हैं। ये तोहमत और भ्रम ऐसे लोग लगाते हैं जो हमेशा से नए इतिहास के निर्माण में भरोसा करते आए हैं। इसलिए अगस्त 1947 की तात्कालिक परिस्थितियों को जरा टटोलने की कोशिश करते हैं। दरअसल, महात्मा गांधी देश के बंटवारे के पक्ष में बिलकुल नहीं थे। उनका स्पष्ट मत था कि कांग्रेस को किसी भी परिस्थिति में देश के विभाजन का समर्थन नहीं करना चाहिए।

गांधी जी ने साफ कहा था कि अंग्रेजों को हिंदुस्तान बिना किसी शर्त के छोड़ के जाना होगा और यदि बंटवारा होना ही आखिरी परिणति है तो अंग्रेजों के जाने के बाद होना चाहिए। गांधी जी ने तत्कालीन वायसराय के समक्ष ये विचार रखा कि उन्हें जिन्ना को निमंत्रण देना चाहिए कि वह मुस्लिम लीग की ओर से सरकार बनाएं। अगर वे देश के सभी लोगों के हित में काम करते हैं तो कांग्रेस को उनका समर्थन करना चाहिए। यदि लीग यह प्रस्ताव ठुकराता है तो कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाना चाहिए।

सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। गांधी जी को नजरअंदाज कर कांग्रेस कार्यकारिणी ने कैबिनेट मिशन की योजना स्वीकार कर ली। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से प्रकाशित किताब ‘गाँधी : हिज लाइफ एंड थॉट के पृष्ठ संख्या 281 में आचार्य जे.बी. कृपलानी लिखते हैं कि लॉर्ड माउंटबेटन ने गांधी जी से यहां तक कह दिया कि ‘कांग्रेस आपके साथ नहीं, बल्कि मेरे साथ है।’ इस बात ने गांधी जी को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। गांधी जी ने निर्णय लिया कि वह आज़ादी के इस त्योहार में शामिल नहीं होंगे। गांधी जी और खान अब्दुल गफ्फार खान आखरी कोशिश तक जुटे रहे कि मुल्क का विभाजन न हो।

गांधी जी ने कहा कि दुर्भाग्य से आज हमें जिस तरह की आज़ादी मिल रही है यह दरअसल भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच टकराव का बीज है। 9 अगस्त 1947 से ही गांधी डी मुल्क के भीतर मचे साम्प्रदायिक त्रासदी को रोकने कलकत्ता पहुंचे। आज़ादी के दिन सड़कों पर मचे कत्लोगारत को रोकने के लिए वह बंगाल की एक बस्ती नोआखाली जो अभी बांग्लादेश में है पहुंच गए। अभी गांधी जी ने नोआखाली में सामाजिक सद्भाव की स्थापना की ही थी कि अचानक उन्हें जानकारी मिली कि बिहार भी साम्प्रदायिक दंगे की आग में झुलस रहा है। गांधी जी ने फौरन बिहार जाने की तैयारी की और अगले पल बिहार पहुंचकर दंगे को रोकने में सफल रहे। गांधी जी की इस अद्वैत शक्ति को देखते हुए मौलाना अबुल कलाम आज़ाद नें गांधी जी को सूचना दी कि दिल्ली स्थित जामा मस्जिद भी साम्प्रदायिक तनाव के चपेट में आ चुका है और इसे अब केवल आप ही रोक सकते हैं।

गांधी जी के इस सफल पहल पर माउंटबेटन लिखते हैं कि पंजाब में दंगे पर काबू पाने के लिए हमारे पास 55 हजार सेना थी, जबकि बंगाल में केवल एक इंसान की वजह से सभी दंगों पर काबू पा लिया गया। गांधी जी को जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी शहर में शांति और सद्भावना के लिए बधाई देने पहुंचे तो गांधी जी ने कहा कि ‘जब तक हिन्दू और मुस्लिम एक साथ प्रेम से नहीं रहेंगे तब तक ये सब व्यर्थ है।’ गांधी जी की योजना थी आगे दिल्ली फिर पंजाब और उसके बाद लाहौर जाकर पूरे देश में शांति स्थापित करना। लेकिन शांति और अहिंसा के इस उपासक व अद्वैत इंसान की 30 जनवरी 1948 में हत्या कर दी गई।

गांधी भी चाहते तो नेहरू, पटेल आदि आज़ादी और बंटवारे के बड़े हिमायती नेताओं की तरह दिल्ली में आराम फरमाते हुए सत्ता की राह ताके उजड़ते मु्ल्क की बदनसीबी और लाखों के खून से लिपटी दो नए मुल्क़ के जन्म पर सोहर गीत गा रहे होते। लेकिन उन्होंने मानवता की इस बदनीयती के खिलाफ अपनी जान को जोखिम में डालते हुए जलते मुल्क़ पर सद्भावना के पानी का छिड़काव किया। लेकिन कुछ लोगों की बदनीयती और इतिहास की प्रामाणिकताओं से वंचितों ने गांधी जी के नियत और चरित्र पर ही हमला करना शुरू कर दिया। नई पीढ़ियों को गांधी जी के असली इतिहास से दूर रख मनगढ़ंत इतिहास को बताकर गांधी जी के बारे में नफ़रत भरा। लेकिन गांधी जी का महत्व सनातनी संस्कृति के अनुसार उस पावन गंगा और यमुना की तरह है जो मैला और कुचैला होने के बाद भी उसकी अपनी प्रासंगिकता और महत्व कभी कम नहीं होगी।
(लेखक युवा पत्रकार हैं और लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

 

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सत्ता विमर्श डेस्क
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