जाति जनगणना पर साहेब की टाइमलाइम तो देखिए!

जाति जनगणना कराने का मोदी सरकार का यह फैसला वाकई चौंकाने वाला है, क्योंकि राहुल गांधी समेत तमाम विपक्षी दलों की मांग के बावजूद बीजेपी नीत मोदी सरकार इसे लगातार टालती आ रही थी। कहने का मतलब यह कि सत्ताधारी भाजपा या उससे जुड़ी तमाम संस्थाएं जाति जनगणना के पक्ष में बिलकुल नहीं थी।

पीएम मोदी ने कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों पर आरोप लगाया था कि जाति जनगणना के जरिए ये लोग देश को बांटने की साजिश रच रहे हैं। एक टीवी इंटरव्यू में पीएम मोदी ने तो यहां तक कह दिया था कि कांग्रेस की जाति जनगणना की मांग “अर्बन नक्सल” वाली सोच को दर्शाती है।

मोदी सरकार ने जाति जनगणना को सामाजिक विभाजन का कारण बताते हुए गरीबी और आर्थिक आधार पर नीतियों को प्राथमिकता देने की बात करती थी। पीएम मोदी के बयान जाति के बजाय गरीबों, युवाओं, महिलाओं, और किसानों पर केंद्रित थे। निश्चित रूप से, विपक्ष के दबाव और राजनीतिक परिस्थितियों, खासकर बिहार चुनाव से पहले, 2025 में सरकार ने जातिगत जनगणना कराने का फैसला लिया, जो उनके पहले के स्टैंड से बदलाव दर्शाता है।

याद करें तो जब बीजेपी विपक्ष में थी, तब इसके नेता, जैसे गोपीनाथ मुंडे साल 2010 में जातिगत जनगणना की मांग किया करते थे। लेकिन 2014 में सत्ता में आने के बाद बीजेपी का रुख एकदम से बदल गया। 2021 में मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे में कहा था कि 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना (SECC) में कई कमियां थीं और इसके आंकड़े गलतियों से भरे और अनुपयोगी थे। सरकार का हलफनामा यह दर्शाता है कि मोदी सरकार उस समय जातिगत जनगणना के प्रति सकारात्मक नहीं थी।

साल 2023 तक पीएम मोदी ने जातिगत जनगणना की मांग को लेकर विपक्ष पर समाज को बांटने का आरोप लगाया। उन्होंने ‘जाति’ के बजाय गरीबी और आर्थिक आधार पर नीतियां बनाने पर जोर दिया। उदाहरण के लिए, 2023 में छत्तीसगढ़ में एक रैली में उन्होंने कहा कि “सबसे बड़ी आबादी गरीबों की है” और गरीब ही “सबसे बड़ी जाति” हैं।

पीएम मोदी ने कई मौकों पर जातिगत पहचान के बजाय आर्थिक स्थिति को प्राथमिकता दी। 2023 में उन्होंने कहा भी था कि देश में सिर्फ चार “जातियां” हैं: गरीब, युवा, महिलाएं, और किसान। उनका तर्क था कि इन वर्गों के उत्थान से ही देश का उत्थान होगा।

बिहार की जातिगत जनगणना (2023) के बाद, जब विपक्ष ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की मांग की तो पीएम मोदी ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा था कि क्या आबादी के आधार पर हक तय होगा, तो “क्या हिंदू अपनी सबसे बड़ी आबादी के आधार पर सारे हक ले लेंगे?”

विपक्ष, खासकर राहुल गांधी ने दावा भी किया था कि पीएम मोदी पहले खुद को ओबीसी के रूप में पेश करते थे, खासकर चुनावों के दौरान, लेकिन जब जाति जनगणना की बात आई तो वे इसे टालते थे। 2023 में राहुल गांधी ने कहा कि मोदी पहले कहते थे “मैं ओबीसी हूं,” लेकिन बाद में कहने लगे, “देश में सिर्फ चार “जातियां” हैं: गरीब, युवा, महिलाएं, और किसान।”

लोकसभा चुनाव 2024 से पहले पीएम मोदी के कुछ बयानों पर गौर करें तो स्पष्ट तौर पर मालूम होता है कि नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी कभी भी जाति जनगणना के पक्ष में नहीं थे। 2023 में छत्तीसगढ़ में पीएम मोदी कहते हैं, “देश में सबसे बड़ी आबादी गरीबों की है। मेरे लिए सबसे बड़ी जाति गरीब है। कांग्रेस लोगों में बैर भाव बढ़ाना चाहती है।”

साल 2023 में विकसित भारत संकल्प यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी कहते हैं, “मेरे लिए सबसे बड़ी जाति है गरीब, युवा, महिलाएं, और किसान। इन चार जातियों का उत्थान ही भारत को विकसित बनाएगा।”

बिहार में 2 अक्टूबर 2023 को जब जाति जनगणना के आंकड़े जारी किए गए थे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए विपक्षी दलों पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा था- “ये लोग (विपक्ष) पहले भी जात-पांत के आधार पर लोगों को बांटते रहे हैं और आज भी यही पाप कर रहे हैं।” फिर कई महीने बाद लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 29 अप्रैल 2024 को एक टीवी इंटरव्यू में पीएम मोदी ने कहा था कि कांग्रेस की जाति जनगणना की मांग “अर्बन नक्सल” वाली सोच को दर्शाती है।

निश्चित रूप से साल 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्ष, खासकर ‘इंडिया गठबंधन’, ने जाति जनगणना को प्रमुख मुद्दा बनाया। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने इसे सामाजिक न्याय से जोड़ा। आखिरकार समुद्र मंथन के बाद जब बीजेपी और पीएम मोदी को लगा कि पीछे हटे तो सत्ता से गए तो अचानक से जाति जनगणना के ऐतिहासिक फैसले का ऐलान कर दिया।

Previous articleडिजिटल एक्सेस सिर्फ सुविधा नहीं, आपका मौलिक अधिकार भी है
Next articleमुर्शिदाबाद से कश्मीर तक : जिम्मेदार कौन?
सत्ता विमर्श डेस्क
सत्ता विमर्श (Satta Vimarsh) नाम ही हमारी पहचान है। हमारा मानना है कि सब कुछ सत्ता के इर्द-गिर्द तय होता है, सरकार भी और सरोकार भी। लेकिन, इस सत्ता में हमारी-आपकी भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सत्ता में बैठे लोगों की। इसीलिए सत्ता और सरोकार से जुड़े मुद्दों पर विमर्श जरूरी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here