सुप्रीम कोर्ट का निर्देश महिला सैन्य अधिकारियों की पहली बड़ी जीत

भारतीय सेना जैसे अनुशासन और सेवा आधारित संस्थान में समानता और निष्पक्षता सिर्फ नीतिगत मसला नहीं बल्कि नैतिक आवश्यकताएं भी हैं। जब महिला अधिकारी वर्षों तक सेवा देती हैं, ऑपरेशनों में भाग लेती हैं और नेतृत्व संभालती हैं, तब उन्हें केवल लिंग के आधार पर सीमित करना लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों का हनन है। शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन नहीं दिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से जो अंतरिम निर्देश दिए गए हैं वह न सिर्फ कानून का पालन सुनिश्चित करते हैं, बल्कि सामाजिक बदलाव की ओर भी इशारा करते हैं।

देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने एक अहम अंतरिम आदेश में केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वे उन शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) महिला सैन्य अधिकारियों को फिलहाल सेवा से मुक्त न करें जिन्होंने उन्हें स्थायी कमीशन (Permanent Commission) न दिए जाने के फैसले को चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि मौजूदा हालात में इन महिला अधिकारियों का मनोबल नहीं गिराया जाना चाहिए, खासकर तब जब मामला न्यायालय में विचाराधीन है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की दो सदस्यीय पीठ ने 69 महिला सैन्य अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि अगली सुनवाई होने तक किसी भी याचिकाकर्ता को सेवा से मुक्त नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई अगस्त 2025 के लिए इस टिप्पणी के साथ सूचीबद्ध की है, “यह समय नहीं कि उन्हें भटकने दिया जाए।”

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “हमें मौजूदा स्थिति में इन अधिकारियों का मनोबल नहीं गिराना चाहिए। ये सभी अत्यंत प्रतिभाशाली और प्रशिक्षित अधिकारी हैं। उनकी सेवाओं का उपयोग किसी अन्य क्षेत्र में किया जा सकता है। यह समय नहीं है कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के चक्कर काटने के लिए मजबूर किया जाए।”

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारतीय सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता और महिला अधिकारियों के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश के तौर पर देखा जाना चाहिए। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने अदालत में सरकार का पक्ष रखते हुए बताया कि सेना में स्थायी कमीशन नहीं देना एक प्रशासनिक निर्णय है जो सशस्त्र बलों की ‘युवा बनाए रखने की नीति’ पर आधारित है। उन्होंने तर्क दिया कि सेना को युवाओं की जरूरत है और हर साल सिर्फ 250 अधिकारियों को ही स्थायी कमीशन दिया जा सकता है। ASG भाटी का कहना था कि, “यह एक नीतिगत मामला है जिसमें सेना की संरचना और आवश्यकताओं के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं। लिहाजा सरकार के इस नीतिगत मामले पर अदालत रोक न लगाए।”

महिला अधिकारियों के तर्क : प्रतिभा को नकारा नहीं जा सकता

कर्नल गीता शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में महिला अधिकारियों का पक्ष रखते हुए कहा कि कई महिला अधिकारी वर्षों की सेवा के बाद भी सिर्फ लिंग के आधार पर स्थायी कमीशन से वंचित की जा रही हैं। उन्होंने कर्नल सोफिया कुरैशी का उदाहरण दिया जो उन दो महिला अधिकारियों में शामिल हैं जो “ऑपरेशन सिंदूर” के हर पल की जानकारी मीडिया को दे रही हैं। उन्होंने अदालत को याद दिलाया कि कर्नल सोफिया कुरैशी को भी इसी प्रकार की याचिका के माध्यम से स्थायी कमीशन की मांग करनी पड़ी थी और अब वही अधिकारी देश को गौरवान्वित कर रही हैं।

गुरुस्वामी ने सवाल उठाया, “क्या हम ऐसे प्रतिभाशाली अधिकारियों को सिर्फ उनके लिंग के आधार पर बाहर कर सकते हैं?” इसपर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मामला पूरी तरह एक कानूनी प्रश्न है और इसका सीधा संबंध अधिकारियों की व्यक्तिगत उपलब्धियों या प्रदर्शन से नहीं है। अदालत का कहना था कि भले ही कोई अधिकारी उत्कृष्ट सेवाएं दे रहा हो, लेकिन अदालत उसके अधिकारों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर ही निर्णय करेगी।

इस प्रकरण में भारतीय सेना का तर्क है कि स्थायी कमीशन के लिए पद सीमित हैं और उन्हें युवाओं के लिए संरक्षित रखना जरूरी है। इसीलिए केवल चुनिंदा अधिकारियों को ही यह सुविधा दी जाती है। लेकिन, यह तर्क समानता के संवैधानिक अधिकार से टकराता है, जब महिला अधिकारियों को केवल उनके लिंग के कारण अवसरों से वंचित किया जाता है।

क्या है महिला अफसरों को स्थायी कमीशन का विवाद

महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का मुद्दा पिछले कई वर्षों से चर्चा में है और न्यायिक कार्रवाई का विषय बना हुआ है। साल 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने उस समय सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया था जिसमें महिलाओं की शारीरिक क्षमताओं और सामाजिक दायित्वों का हवाला देकर उन्हें कमांड पदों से वंचित किया जा रहा था।

तब न्यायालय ने कहा था कि “महिला अधिकारियों ने अतीत में देश का मान बढ़ाया है और सशस्त्र सेनाओं में लिंग आधारित भेदभाव समाप्त करने के लिए सरकार की मानसिकता में बदलाव आवश्यक है।” उस फैसले के बाद से नौसेना, वायु सेना और तटरक्षक बल सहित अन्य सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने को लेकर अदालत ने कई दिशा-निर्देश जारी किए।

हालांकि न्यायालय के कई आदेशों के बावजूद, सशस्त्र बलों में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने की प्रक्रिया में अब भी कई बाधाएं मौजूद हैं। चयन प्रक्रिया, मेडिकल बोर्ड, वरिष्ठता और प्रदर्शन जैसे आधारों पर कई योग्य महिला अधिकारियों को बाहर कर दिया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सेना में संरचनात्मक बाधाओं और पारंपरिक सोच के चलते महिलाओं को अभी भी समान अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। सेना में लंबे समय तक सेवा करने की इच्छा रखने वाली महिला अधिकारियों के लिए यह असमानता चिंता का विषय बनी हुई है।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट का यह अंतरिम आदेश महिला सेना अधिकारियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है। हालांकि यह अस्थायी निर्णय है, लेकिन इस बात का संकेत तो दे ही गया है कि शीर्ष अदालत इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है और महिला सैन्य अधिकारियों के अधिकारों की रक्षा के प्रति संवेदनशील है। अगस्त के महीने में जब इस मामले पर विस्तृत सुनवाई होगी तब यह तय होगा कि क्या अदालत सेना की नीतिगत बाधाओं को चुनौती देती है या फिर सरकार के तर्कों को स्वीकार करती है।

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प्रवीण कुमार
मैं कौन हूं, क्या हूं, क्यों हूं, यह सब खुद मुझे भी नहीं पता क्यों कि खुद के बारे में बताना, जताना या उकेरना सबसे मुश्किल काम होता है। हां! बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और गीता के दर्शन से मैंने अपने जीवन को संवारने की कोशिश जरूर की है। बिहार के बेगूसराय जिले का रहने वाला हूं। जाने-अनजाने में पत्रकारिता के आंगन में ढाई दशक से अधिक वक्त से कूद-फांद कर रहा हूं। शुरूआती दौर में जी भरकर देश के तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में वैचारिक लेखन किया। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर लिखने में अपनी रूचि रहती है। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर लेखन कर रहा हूं। डिजिटल और सोशल मीडिया कंसल्टेंट के तौर भी हाथ साफ करता रहता हूं। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान फेक न्यूज़ की बयार को गहराई से जांचा परखा था। उससे पहले नोएडा स्थित ज़ी न्यूज़ में हिन्दी वेबसाइट की शुरूआत कर काफी लंबा वक्त गुजारा। इससे भी पीछे का पूछेंगे तो करीब डेढ़ दशक तक दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अखबारों के संपादकीय विभाग में अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हुए एक पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, एक बेहतर इंसान भी बनने की कोशिश की, पर कितना बन पाया ये सब ''ऊपर वाले पर'' छोड़ता हूं...

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