प्राकृतिक खेती ही है टिकाऊ समाधान

सत्य प्रकाश

आधुनिक युग कहें या फिर तकनीकी खेती का जमाना, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर आधारित खेती ने उत्पादन तो बढ़ाया है, लेकिन मिट्टी, जल और मानव स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। वहीं “प्राकृतिक खेती” लोगों के बीच एक नई उम्मीद बनकर उभरी है। यह सिर्फ कृषि की एक तकनीक नहीं, बल्कि पूरा जीवन दर्शन है जो धरती, जल, वायु और जीवों के सामंजस्य पर आधारित है।

प्राकृतिक खेती को रसायन-मुक्त, पारंपरिक या शून्य लागत खेती (Zero Budget Natural Farming) भी कहा जाता है। इस पद्धति में गोबर, गोमूत्र, नीम, जीवामृत, घनजीवामृत, बीजामृत जैसे स्थानीय जैव संसाधनों से भूमि की उर्वरता बढ़ाई जाती है। परिणामस्वरूप न केवल किसान की लागत घटती है, बल्कि उपभोक्ताओं को स्वास्थ्यवर्धक भोजन भी मिलता है।

प्राकृतिक खेती के वैज्ञानिक आधार
बहुत से लोग प्राकृतिक खेती को केवल पारंपरिक तरीका मानते हैं, परंतु यह पूरी तरह वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है। मसलन, मिट्टी का संरक्षण कर केंचुए और सूक्ष्मजीव मिट्टी को उपजाऊ बनाया जाता है। यही प्राकृतिक “यूरिया” और “डीएपी” का काम करते हैं।

फसल अवशेषों से मिट्टी ढकी रहने से नमी बनी रहती है और खरपतवार की समस्या कम होती है। एक खेत में विभिन्न फसलें, पौधे और पशुधन का एकीकरण जैव विविधता को बढ़ाता है। नीम, ब्रह्मास्त्र, अग्निआस्त्र जैसे प्राकृतिक कीटनाशक फसलों में लगने वाले रोगों से बचाव करते हैं। इस तरह प्राकृतिक खेती किसी भी बाहरी रासायनिक इनपुट पर निर्भर नहीं रहती।

किसान की बढ़ती आय और घटती लागत
प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों का कहना है कि इससे उनके फसलों की उत्पादन क्षमता लगभग डेढ़ गुना बढ़ गई है। कारण स्पष्ट है- जब खेत की मिट्टी जीवित रहती है तो उसकी उत्पादकता अपने आप बढ़ती है। रासायनिक खेती में किसान की आमदनी का बड़ा हिस्सा यूरिया, डीएपी और कीटनाशकों पर खर्च हो जाता है। जबकि प्राकृतिक खेती में खेत पर ही उपलब्ध गोबर, मूत्र और अवशेषों से तैयार खाद के कारण लागत न्यूनतम हो जाती है।

अध्ययन बताते हैं कि प्राकृतिक खेती से उत्पादन लागत में 60–70% तक कमी आती है। मिट्टी की जैविक संरचना सुधरती है और फसलें कीट और बीमारियों के प्रति अधिक प्रतिरोधक बनती हैं। इसके साथ ही एक तरफ रासायनिक खेती से तैयार भोजन में कीटनाशकों के अंश लंबे समय तक शरीर में रहते हैं जो बीपी, डायबिटीज, थायराइड जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं। लेकिन प्राकृतिक खेती में फर्टिलाइज़र-फ्री भोजन शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता को बढ़ाता है।

पर्यावरण की दृष्टि से भी प्राकृतिक खेती काफी अमह है। मसलन यह पानी की बचत करती है, मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ाती है, कार्बन व नाइट्रोजन उत्सर्जन को घटाती है और पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करती है।

जैविक खाद्य बाजार की बढ़ रही मांग
भारत में ऑर्गेनिक और नैचुरल फूड मार्केट तेजी से बढ़ रहा है। साल 2022 में जैविक खाद्य बाजार का आकार मात्र 97.33 अरब डॉलर था, वहीं साल 2027 तक इसके 287.33 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। भारत के प्रमाणीकृत जैविक खाद्य उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय मांग भी बढ़ रही है। अमेरिका, यूरोपीय संघ और कनाडा इसके सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। साल 2024 में भारत ने लगभग 36 लाख टन जैविक उत्पाद निर्यात किए हैं।

राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन: एक नया अध्याय
केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (National Mission on Natural Farming) शुरू किया है, जिसका लक्ष्य है- मिट्टी की सेहत में सुधार करना, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता को घटाना, किसानों की आय बढ़ाना, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन सुनिश्चित करना।

वित्तीय वर्ष 2025–26 में इस मिशन का कुल बजट ₹2481 करोड़ है, जिसमें केंद्र का हिस्सा ₹1584 करोड़ और राज्यों का हिस्सा ₹897 करोड़ है। अगले दो वर्षों में मिशन के अंतर्गत 15,000 ग्राम पंचायत समूहों में प्राकृतिक खेती लागू की जाएगी। एक करोड़ किसानों तक यह योजना पहुंचेगी और 7.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती की जाएगी।

प्राकृतिक खेती को सफल बनाने के लिए सरकार ने 10,000 जैव-इनपुट संसाधन केंद्र (Bio-input Resource Centres) स्थापित करने की योजना बनाई है। 2000 मॉडल फार्म बनाए जा रहे हैं, जहां किसान प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें। 18.75 लाख किसान जीवामृत, बीजामृत आदि स्वयं तैयार करेंगे। 30,000 कृषि सखियों और सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों (CRPs) को तैयार किया जाएगा। इस मिशन से किसानों को खेती की लागत घटने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता भी विकसित होगी।

देशी गाय और गोबर अर्थव्यवस्था
प्राकृतिक खेती का आधार देसी गाय है। गाय का गोबर और गोमूत्र मिट्टी को समृद्ध करते हैं और इससे तैयार जीवामृत खेती की जान मानी जाती है। केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह की मानें तो भविष्य में डेयरी सहकारी समितियों में गोबर प्रबंधन, बायोगैस उत्पादन और जैविक खाद निर्माण को प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे गांवों में रोजगार और आय दोनों में वृद्धि होगी।

भारत के कई राज्यों मसलन हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड, केरल और पूर्वोत्तर में पहले से ही प्राकृतिक खेती को सरकारी सहायता प्राप्त है। उदाहरण के लिए हिमाचल प्रदेश की “प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना” इस दिशा में एक सफल मॉडल है।

प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा प्रभाव मृदा जीव विज्ञान (Soil Biology) पर होता है। जब खेत में रासायनिक दवाइयां नहीं डाली जातीं तो सूक्ष्मजीव और केंचुए पुनर्जीवित होते हैं। यही जीव मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों का अपघटन करते हैं और पोषक तत्व बढ़ाते हैं।

इसके साथ ही जुताई न करने से मिट्टी की संरचना बनी रहती है। फसल मिश्रण से जल संरक्षण और खरपतवार नियंत्रण होता है। ‘प्रति बूंद फसल’ की अवधारणा संतुलित रहती है। इस प्रकार से देखें तो प्राकृतिक खेती केवल खेती की तकनीक नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र की पुनर्स्थापना का एक आंदोलन है।

प्राकृतिक खेती ही है टिकाऊ समाधान
बहरहाल, भारत में बढ़ती जनसंख्या और घटते जल संसाधनों के बीच प्राकृतिक खेती ही टिकाऊ समाधान है। यह न सिर्फ किसान की आर्थिक स्थिति को सुधारती है, बल्कि देश को स्वास्थ्य, पोषण और पर्यावरणीय सुरक्षा भी प्रदान करती है। मिशन की मदद से आने वाले वर्षों में जब एक करोड़ किसान प्राकृतिक खेती अपनाएंगे, तब भारत की मिट्टी, भोजन और पर्यावरण – तीनों सुरक्षित होंगे।

कुल मिलाकर, प्राकृतिक खेती केवल एक कृषि तकनीक नहीं, बल्कि धरती से जुड़ने की प्रक्रिया भी है। यह हमें बताती है कि जब हम प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर खेती करते हैं, तो लाभ केवल किसानों या उपभोक्ताओं को नहीं, बल्कि पूरी धरती को होता है। धरती की उर्वरता पुनर्जीवित होती है, समाज को स्वस्थ भोजन मिलता है। इसलिए, अब समय आ गया है कि हम रासायनिक खेती की निर्भरता छोड़कर, “धरती से संवाद करती खेती” यानी प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ाएं।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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