प्रवीण कुमार
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के मैदान में इस बार सबसे दिलचस्प जंग आरजेडी, कांग्रेस, सीपीआई-माले और वीआईपी पार्टी के गठजोड़ से बने महागठबंधन के अंदर ही लड़ी जा रही है। इस चुनाव में एक ओर जहां जनता दल (यूनाइटेड)-भाजपा गठबंधन यानी NDA ने अपने अभियान को “स्थिरता और विकास” के नारे से बांधा है, वहीं दूसरी ओर महागठबंधन जो सामाजिक न्याय और आर्थिक बराबरी की राजनीति का प्रतिनिधि माना जाता है, ‘आंतरिक अहंकार’ और ‘संगठनात्मक अनुशासनहीनता’ की लड़ाई में उलझ गया है।
महागठबंधन के भीतर 12 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां लड़ाई किसी बाहरी विरोधी से नहीं, बल्कि अपने ही सहयोगियों से है। RJD, कांग्रेस, CPI और VIP सभी दल इन सीटों पर एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में हैं। महागठबंधन के घोषित मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भले ही इसे ‘फ्रेंडली फाइट’ कह रहे हों, लेकिन ज़मीनी सच्चाई में यह “फ्रेंडली” फाइट कम और “फ्रैक्चर्ड” फाइट ज़्यादा है। इस आपसी संघर्ष ने न सिर्फ महागठबंधन की चुनावी स्थिति को कमजोर किया है, बल्कि वाम–समाजवादी राजनीति के नैतिक दावों को भी सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है।
पलटकर देखें तो वामपंथी और समाजवादी राजनीति का इतिहास हमेशा जनता की एकता, दलित-पिछड़े-मुस्लिमों की एकजुटता और वर्गीय संघर्ष के साझा मोर्चे पर खड़े रहने के सिद्धांत पर गर्व करता है। लेकिन बिहार चुनाव-2025 में यही विचारधारा अपने भीतर से टकराती दिख रही है।
12 सीटों पर महागठबंधन का कोर वोट बैंक यादव, मुस्लिम और अति-पिछड़ा वर्ग इस बार के चुनाव में सबसे ज्यादा असमंजस में दिख रहा है। कई सीटों पर वोटर यह तय ही नहीं कर पा रहा कि उसका असली उम्मीदवार कौन है। जो गठबंधन जनता को ‘एकता’ का संदेश देने निकला था, वह खुद “किसका प्रचार करे, किसे छोड़े” के संकट से जूझ रहा है। यह स्थिति सिर्फ सीटों के बंटवारे की नहीं, बल्कि राजनीतिक अहंकार और संगठनात्मक अविश्वास की भी है।
सीट-दर-सीट टकराव- क्यों और कैसे?
वैशाली में राजद बनाम कांग्रेस का सीधा संघर्ष- 2020 के चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस दूसरे नंबर पर थी और इसलिए इस बार उसे ‘क्वालिटी सीट’ कहकर पार्टी ने नहीं छोड़ा। राजद के अजय कुशवाहा और कांग्रेस के संजीव कुमार चुनाव में आमने-सामने हैं। निश्चित तौर पर यहां यादव और कुशवाहा वोटों में बंटवारा होगा। अब तेजस्वी यादव कब “इशारा” करेंगे और फिर संगठन एक्शन में आएगा तब तक चुनाव बीत जाएगा।
कहलगांव सीट दिवंगत कांग्रेस नेता सदानंद सिंह का गढ़ माना जाता रहा है। कांग्रेस इसे अपनी विरासत मानती है, जबकि राजद अपने नए युवा चेहरे रजनीश भारती के दम पर महागठबंधन के साथी दल कांग्रेस को चुनौती दे रही है। यह सीट इस बात का प्रतीक है कि कैसे ‘नई पीढ़ी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा’ पुराने जनाधार से टकरा रही है। ऐसे भी यह सीट बहुत जटिल परिस्थिति में फंसी दिख रही है। BJP ने अपने सीटिंग विधायक पवन यादव का टिकट काट दिया तो वह निर्दलीय लड़ रहे हैं। कांग्रेस से पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे शुभानंद मुकेश अब जेडीयू के टिकट पर NDA से उम्मीदवार हैं। राजद और कांग्रेस की आपसी लड़ाई में यादव, कुशवाहा और मुस्लिम वोट बंट रहा है।
सुल्तानगंज और सिकंदरा सीट की बात करें तो यहां यादव वोट बैंक ही आपस में टकरा रहा है। दोनों सीटों पर यादव समुदाय के दो उम्मीदवारों के बीच की लड़ाई बताती है कि जातीय एकता के नारे के भीतर भी सत्ता-समीकरणों का अंतर्विरोध कितना गहरा है।
पहले बात करते हैं सुल्तानगंज की। यहां टकराव राजद के चंदन सिन्हा और कांग्रेस के ललन यादव के बीच है। पिछले चुनाव का गणित देखें तो जेडीयू के ललित नारायण मंडल जीते थे। कांग्रेस के ललन कुमार यादव दूसरे स्थान पर रहे थे। मौजूदा स्थिति यह है कि यहां जेडीयू के ललित नारायण मंडल 25 वर्षों (पांच टर्म) से जीत रहे हैं और बेहद मजबूत हैं। राजद-कांग्रेस की आपसी लड़ाई और एक निर्दलीय यादव उम्मीदवार के खड़े होने से महागठबंधन का वोट पूरी तरह से बंट रहा है। लिहाजा जेडीयू प्रत्याशी की जीत अभी से पक्की मानी जा रही है।
सिकंदरा सीट पर टकराव राजद के उदय नारायण चौधरी और कांग्रेस के विनोद चौधरी के बीच है। पिछले चुनाव का गणित देखें तो ‘हम’ (NDA) के प्रफुल्ल मांझी जीते थे। कांग्रेस के सुधीर कुमार दूसरे नंबर पर थे। मौजूदा स्थिति यह है कि इस समीकरण में महागठबंधन के दोनों प्रत्याशियों के बीच यादव और मुसलमान का वोट बंट जाएगा और पहले की तरह एनडीए का उम्मीदवार आगे निकल सकता है। राजद के उदय नारायण चौधरी बिहार विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं और एक बेहद दिग्गज चेहरा हैं। वहीं, कांग्रेस यहां 2020 में दूसरे स्थान पर थी और इसे अपनी मजबूत सीट मानती है। लिहाजा उसने अपना दावा मजबूती से रखा है।
नरकटियागंज में विरासत बनाम संगठन की ताकत जोर आजमाइश कर रही है। यहां कांग्रेस के शाश्वत केदार पांडेय (पूर्व सीएम केदार पांडेय के पोते) और राजद के दीपक यादव आमने-सामने हैं। यह टकराव सिर्फ दो उम्मीदवारों का नहीं, बल्कि कांग्रेस की ‘वंश परंपरा’ और राजद की ‘मंडल पीढ़ी’ के बीच वैचारिक टकराव का प्रतीक है। पिछले चुनाव में बीजेपी की रश्मि वर्मा यहां से जीती थीं। कांग्रेस के विनय वर्मा दूसरे नंबर पर थे।
मौजूदा स्थिति यह है कि राजद और कांग्रेस के बीच आमने-सामने की स्थिति की वजह से महागठबंधन को नुकसान और एनडीए प्रत्याशी को क्लीन स्वीप मिल सकता है। कांग्रेस यहां दूसरे नंबर पर रही थी, इसलिए वह इसे अपनी ‘क्वालिटी’ वाली ताकतवर सीट मानती है। कांग्रेस उम्मीदवार शाश्वत केदार (पूर्व सीएम केदार पांडेय के पोते) का मजबूत राजनीतिक जनाधार भी है। राजद का दावा वोट के लिहाज से तो उतना मजबूत नहीं है। उनके (दीपक यादव) पक्ष में बस यही बात है कि वह 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं और तेजस्वी के सलाहकार संजय यादव के करीबी माने जाते हैं।
बछवाड़ा से शुरू हुई वैचारिक दरार – महागठबंधन के भीतर सबसे गंभीर टकराव बेगूसराय की बछवाड़ा सीट से शुरू हुआ। यहां टकराव कांग्रेस के शिव प्रकाश राय और सीपीआई के अवधेश राय के बीच है। सीपीआई के अवधेश राय 2020 के चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार सुरेंद्र मेहता से मात्र 484 वोटों से हारे थे। यही सीट वाम राजनीति के लिए “रेड लाइन” थी। लेकिन कांग्रेस ने जब यहां अपना उम्मीदवार उतार दिया तो यह सीपीआई के लिए सिर्फ राजनीतिक नहीं, आदर्श और सम्मान की लड़ाई बन गई है।
इसके जवाब में सीपीआई ने करगहर, राजापाकर और बिहारशरीफ में कांग्रेस के खिलाफ प्रत्याशी उतार दिए। इस तरह एक सीट का विवाद “फ्रेंडली फाइट” के जरिये तीन सीटों पर वैचारिक विद्रोह में बदल गया। करगहर और राजापाकर जैसी सीटों पर सीपीआई का प्रभाव बेहद सीमित है, लेकिन इसका संदेश स्पष्ट है कि “आप हमें हाशिए पर नहीं रख सकते।” कहें तो यह स्थिति महागठबंधन के भीतर ‘समानता’ बनाम ‘प्रधान दल के वर्चस्व’ के संघर्ष को भी उजागर करती है। राजद जहां “सबसे बड़े भाई” की भूमिका में है, वहीं कांग्रेस और सीपीआई खुद को “समान भागीदार” साबित करने में लगी हैं।
करगहर की बात करें तो यहां टकराव कांग्रेस के संतोष मिश्रा और CPI के महेंद्र गुप्ता के बीच है। पिछले चुनाव में यहां से कांग्रेस के संतोष कुमार मिश्र ने जीत दर्ज की थी यानी यह कांग्रेस की सीटिंग सीट है। जेडीयू के बशिष्ठ सिंह दूसरे नंबर पर थे। मौजूदा स्थिति में सीपीआई के महेंद्र गुप्ता हालांकि कांग्रेस को बड़ा नुकसान पहुंचाने की स्थिति में नहीं हैं, फिर भी वोटों का थोड़ा बहुत बिखराव तो हो सकता है।
बिहारशरीफ में कांग्रेस के औमैर खान और सीपीआई के शिव कुमार यादव के बीच फ्रेंडली फाइट है। पिछले चुनाव में बीजेपी के सुनील कुमार ने जीत दर्ज की थी। यहां राजद के सुनील कुमार दूसरे नंबर पर थे। इस स्थिति में तो यह सीट राजद की थी लेकिन गठबंधन में यह सीट कांग्रेस को दी गई। मौजूदा समीकरण की बात करें तो यहां का शहरी वोटिंग पैटर्न जाति से ज्यादा हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर होता है। कांग्रेस और सीपीआई के अलग-अलग लड़ने से महागठबंधन का वोट बंटेगा और एनडीए का प्रत्याशी एक बार फिर आसानी से जीत सकता है।
राजापाकर में टकराव कांग्रेस की प्रतिमा दास और सीपीआई के मोहित पासवान में है। पिछले चुनाव में कांग्रेस की प्रतिमा दास जीती थीं। जेडीयू के महेंद्र राम दूसरे नंबर पर थे। जीत का अंतर मात्र 1796 वोट था। मौजूदा स्थिति देखें तो यह कांग्रेस की सीटिंग सीट है, लेकिन जीत का अंतर बहुत कम था। सीपीआई के मोहित पासवान जो जिला पार्षद भी हैं, कांग्रेस की राह को मुश्किल की तरफ धकेल सकती है।
अब आते हैं मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) पर। पहले बात करते हैं चैनपुर की। यहां राजद प्रत्याशी बृजकिशोर बिंद और वीआईपी प्रत्याशी बाल गोविंद बिंद आपस में टकरा रहे हैं। पिछले चुनाव में बसपा के मोहम्मद जमा खान जीते थे। बीजेपी के बृज किशोर बिंद दूसरे नंबर पर थे। मौजूदा स्थिति यह है कि पिछली बार के विजेता मोहम्मद जमा खान अब जेडीयू में हैं और मंत्री भी हैं। पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे बृज किशोर बिंद अब राजद से उम्मीदवार हैं। राजद और वीआईपी के फ्रेंडली फाइट से महागठबंधन का वोट बंटेगा और एनडीए उम्मीदवार के जीतने की संभावना बन सकती है। दरअसल यहां दोनों पार्टियां राजद और वीआईपी ‘बिंद’ वोट बैंक पर अपना-अपना दावा कर रही हैं। राजद के बृजकिशोर बिंद (पूर्व मंत्री) एक बड़ा चेहरा हैं।
गौराबौराम में वीआईपी के संतोष सहनी और राजद के अफजल अली खान आपस में टकरा रहे हैं। पिछले चुनाव में वीआईपी की स्वर्णा सिंह ने यह सीट जीती थीं और यह तब एनडीए का हिस्सा थीं। राजद के अफजल अली खान दूसरे नंबर पर थे। मौजूदा स्थिति में वीआईपी सुप्रीमो मुकेश सहनी ने अपने भाई संतोष सहनी को यहां से उतारा है। राजद के अफजल अली खान को पार्टी से सिंबल मिल चुका है। यहां विवाद की असल वजह यह है कि वीआईपी सुप्रीमो मुकेश सहनी के गृह क्षेत्र की सीट है, इसलिए यह उनके लिए प्रतिष्ठा का विषय है। दोनों सीटों पर यह संघर्ष इस बात का प्रतीक है कि महागठबंधन में सामाजिक प्रतिनिधित्व का दावा तो है, पर परस्पर समन्वय की कमी भी उतनी ही गहरी है।
और अंत में बात खगड़िया के बेलदौर सीट की। यहां कांग्रेस के मिथिलेश कुमार निषाद और IIP की अनीसा सिंह आपस में टकरा रहे हैं। पिछले चुनाव में जेडीयू के पन्ना लाल सिंह पटेल ने जीत दर्ज की थी। कांग्रेस के चंदन यादव दूसरे नंबर पर थे। मौजूदा स्थिति यह है कि पन्नालाल पटेल पांच बार के विधायक हैं और उनके खिलाफ एंटी-इनकम्बैंसी बहुत ज्यादा है, लेकिन कांग्रेस और IIP की आपसी लड़ाई से एक बार फिर जीत का सेहरा पन्नालाल के माथे बंध सकता है।
महागठबंधन का असली संकट क्या है?
वाम-समाजवादी राजनीति की ताकत हमेशा “नीचे से ऊपर” यानी जनता से नेतृत्व तक के संवाद में रही है। लेकिन इस बार के चुनाव में तस्वीर उलटी हो गई दिख रही है। निर्णय “ऊपर से नीचे” थोपे जा रहे हैं। बीच चुनाव जमीनी कार्यकर्ता इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि “किसके लिए घर-घर जाएं?” और “किसे असली उम्मीदवार मानें?”
राजनीतिक रूप से यह वही स्थिति है जिसे ग्रासरूट कार्यकर्ता “असली दुश्मन दोस्त के घर से निकलना” कहते हैं। महागठबंधन की यह असमंजस भरी रणनीति अंततः NDA के लिए अप्रत्यक्ष तौर पर मदद की वजह बन सकती है। ये भूलना नहीं चाहिए कि बिहार की राजनीति में गठबंधन की लड़ाई अक्सर वोट शेयर से ज्यादा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करती है।
महागठबंधन के भीतर के ये झगड़े तीन स्तरों पर नुकसानदेह हैं- संगठनात्मक रूप से देखें तो कार्यकर्ता और स्थानीय पदाधिकारी दो पाटों में पिस रहे हैं। जनसंदेश के स्तर पर देखें तो “विकास बनाम बंटवारा” का नैरेटिव अब NDA के पास चला गया है। महागठबंधन का नैरेटिव “भीतर की लड़ाई” तक सीमित रह गया है। और वैचारिक स्तर पर देखें तो वाम और समाजवादी दलों की एकजुटता की विश्वसनीयता पर जनता में सवाल उठ रहे हैं।
तो फिर रास्ता क्या है?
ऐसे में अगर महागठबंधन को इस संकट से बाहर निकलना है तो उसे सीटों की लड़ाई नहीं, जनाधार के साझा निर्माण पर ध्यान देना होगा। यह जरूरी है कि राजद अपने “बड़े भाई” वाले व्यवहार से बाहर आए, कांग्रेस “क्वालिटी सीट” की मानसिकता छोड़कर जनता के बीच विश्वास कायम करे और सीपीआई जैसी विचारधारा आधारित पार्टियों को केवल प्रतीकात्मक नहीं, सह-निर्णायक भूमिका दी जाए। यही वह वैचारिक पुनर्निर्माण है जो बिहार की समाजवादी राजनीति को फिर से ताकत दे सकता है।
बहरहाल “महागठबंधन तभी महा बनेगा, जब भीतर का गठबंधन बचेगा”। इन 12 सीटों की कहानी दरअसल पूरे बिहार के राजनीतिक चरित्र की एक झलक है जहां एक ओर जनता बदलाव चाहती है तो वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दल आपसी मनमुटाव, सीट-सौदेबाज़ी और अहंकार में उलझे हैं।
महागठबंधन अगर इस फूट से उबरने में विफल रहा तो 2025 का चुनाव सिर्फ NDA की जीत नहीं, बल्कि समाजवादी एकता की विचारधारा की पराजय के रूप में दर्ज होगा और अगर महागठबंधन समय रहते भीतर की लड़ाई सुलझा ले तो यही 12 सीटें पराजय की नहीं, पुनर्जागरण की कहानी बन जाएगी।




