सत्य प्रकाश
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध से उपजे खाड़ी संकट को लेकर भारत ने संतुलित और शांतिपूर्ण कूटनीति का रास्ता चुना है। इस संकट में भारत की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य संवाद और कूटनीति से शांति बहाली और अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में स्पष्ट रूप से कहा कि भारत किसी भी युद्ध के पक्ष में नहीं है। भारत का रुख साफ है- संवाद और कूटनीति के जरिए ही इस संकट का समाधान निकाला जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण भारत की पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप है, जो शांति और स्थिरता को प्राथमिकता देता है।
भारत ने अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध किये हैं। युद्ध के कारण व्यापार मार्गों जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य पर पड़ रहे दबाव को कम करना भारत की प्राथमिकता है क्योंकि इससे पेट्रोल, डीजल, गैस और उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इसके अलावा खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग एक करोड़ भारतीयों और समुद्री जहाजों पर तैनात भारतीय चालक दलों की सुरक्षा भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है। सरकार के प्रतिनिधि संबंधित देशों के अधिकारियों के साथ निरंतर संपर्क में हैं और उचित कदम उठाये जा रहे हैं। उभरती चुनौतियों के संदर्भ में भारत अपनी सैन्य कूटनीति और डिफेंस के नेटवर्क में भी रणनीतिक बदलाव कर रहा है।
युद्ध ग्रस्त ईरान में फंसे भारतीय नागरिकों को ईरानी सीमा से सटे अजरबैजान तथा अन्य देशों में भूमि मार्ग से सुरक्षित स्वदेश लाया गया है और संकट से प्रभावित देशों बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात, सउदी अरब से भी भारतीय नागरिकों को स्वदेश लाया जा रहा है। होर्मुज जलडमरुमध्य में भारतीय जहाजों को निकालने के लिए विशेष व्यवस्था की गयी है और कच्चे तेल तथा एलपीजी से लदे जहाज निकाले जा रहे हैं। भारत की मुख्य चिंता देश में ऊर्जा आपूर्ति को बनाये रखना है।
पश्चिम एशिया संघर्ष से भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पडने की आशंका है। इसके प्रभाव स्पष्ट रुप से दिखायी देने लगे हैं। भारत की ऊर्जा आपूर्ति मूल रुप से विदेशों और विशेषकर खाडी देशों पर निर्भर है। हालांकि वर्तमान में भारत 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल और अन्य ईंधन की आपूर्ति कर रहा है लेकिन इसकी लागत में लगातार वृद्धि हो रही है। कुछ सीमा तक सरकार इसे स्वयं वहन करेगी लेकिन अंत में यह उपभोक्ताओं तक पहुंचेगी जो मुद्रास्फीति के रूप में दिखेगी। एक अनुमान के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की वृद्धि भारत में मुद्रास्फीति को लगभग 0.35% से 0.40% तक बढ़ा देती है। इससे न केवल बाजार में मांग प्रभावित होगी बल्कि उत्पादन पर भी असर पड़ेगा।
एक अन्य मुख्य प्रभाव विदेशी मुद्रा भंडार पर पडेगा। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में डॉलर की तुलना में रुपया कमजोर होगा और घरेलू बाजार में उपभोक्ता वस्तुएं महंगी होंगी। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 115-120 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं, जिससे भारत का आयात भुगतान तेजी से बढ़ा है। डॉलर की मांग बढ़ने और भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण भारतीय रुपया मार्च 2026 में 94 रुपये प्रति डॉलर के ऐतिहासिक निचले स्तर तक गिर गया है। तेल के महंगे आयात और निर्यात में बाधा के कारण चालू खाता घाटा बढ़ने का अनुमान है, जिससे देश की आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण खाड़ी देशों से तेल और गैस का आयात प्रभावित हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप भारत ने रूस से तेल आयात बढ़ाकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की है। भारत अपनी जरूरत का 85% एलपीजी और 55% एलएनजी खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है। आपूर्ति में रुकावट से घरेलू रसोई गैस और उर्वरक उत्पादन पर दबाव बढ़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने के कारण जहाजों को लंबे रास्तों जैसे केप ऑफ गुड होप से आना पड़ रहा है जिससे शिपिंग का समय और बीमा प्रीमियम दोनों बढ़ गए हैं। भारत ने अपनी तेल निर्भरता को खाड़ी देशों से हटाकर अन्य देशों पर केंद्रित किया है। तेल आयात का लगभग 70% हिस्सा खाड़ी से बाहर के देशों जैसे रूस, अमेरिका और नाइजीरिया से आ रहा है। भारत को मिलने वाले कुल धन प्रेषण का लगभग 38%, करीब 40-50 अरब डॉलर खाड़ी देशों से आते हैं। खाडी देशों में संकट की स्थिति में काम करने वाले भारतीयों की नौकरियों पर खतरा मंडरा रहा है, जिससे केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। सुरक्षा कारणों से प्रवासियों की संभावित वापसी से विदेशी मुद्रा प्रवाह में कमी आने की आशंका है। इनके अलावा विमानन, विमान ईंधन, शेयर बाजार और आयात निर्यात प्रभावित हो रहा है।
ईरान पर अमेरिका और इजरायली हमले से उपजे हालात से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था और प्रमुख उद्योगों को बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और महंगाई को काबू में रखने के लिए रणनीतिक हस्तक्षेप किए हैं। ‘पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस (सूचना प्रस्तुत करना) आदेश, 2026’ के तहत सभी सरकारी और निजी तेल कंपनियों जैसे रिलायंस और अडानी के लिए अपने स्टॉक और आपूर्ति का रियल-टाइम डेटा सरकार को देना अनिवार्य कर दिया गया है। प्राकृतिक गैस और एलपीजी की आपूर्ति को विनियमित करने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू किया गया है। इसके तहत घरेलू रसोई गैस को प्राथमिकता दी गई है और उर्वरक जैसे औद्योगिक क्षेत्रों के लिए गैस आवंटन को 70% तक सीमित कर दिया गया है। निर्यातकों के लिए 497 करोड़ रुपए की ‘रिलीफ’ योजना शुरू की गयी है। इससे निर्यातकों को उच्च माल ढुलाई दरों और बीमा लागतों से राहत मिल सकेगी। भारत के पास वर्तमान में लगभग 3.37 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल भंडार में है जो लगभग 10 दिनों की जरूरत पूरा कर सकता है। सरकार इसे और बढ़ाने के लिए ओडिशा के चांदीखोल में नए केंद्र विकसित कर रही है।
भारत ने इस जटिल परिस्थिति में एक संतुलित रणनीति अपनाई है। उसने ईरान, इजरायल और अमेरिका जैसे सभी प्रमुख पक्षों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा है। इसका उद्देश्य न सिर्फ तनाव को बढ़ने से रोकना है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता को भी बनाए रखना है। मालूम हो कि खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में भारत की विदेश नीति का मुख्य लक्ष्य अपने नागरिकों, व्यापारिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। अब तक की स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि भारत इस दिशा में सफल रहा है। पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट में भारत ने संयम, संतुलन और कूटनीति का परिचय दिया है। युद्ध की बजाय संवाद पर जोर देकर भारत न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर रहा है, बल्कि वैश्विक शांति के प्रयासों में भी योगदान दे रहा है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)




