बुधवार की रात सोना महंगा हुआ। गुरुवार सुबह दूध के दाम बढ़ गए। शुक्रवार आते-आते पेट्रोल, डीजल और CNG की कीमतों में भी इजाफा हो गया। इसी बीच खबर आई कि देश की थोक महंगाई दर 42 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है और डॉलर के मुकाबले रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर फिसल गया है।यानी सिर्फ 48 घंटे के भीतर आम आदमी को हर तरफ से महंगाई की मार झेलनी पड़ी। यह केवल कुछ वस्तुओं के महंगे होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस आर्थिक दबाव का संकेत है जो धीरे-धीरे पूरे उपभोक्ता तंत्र को प्रभावित कर रहा है। सवाल यह है कि क्या यह महज अस्थायी उतार-चढ़ाव है या फिर अर्थव्यवस्था किसी बड़े दबाव की तरफ बढ़ रही है? और सबसे बड़ा सवाल- क्या सरकार के हाथ से अर्थव्यवस्था कहीं फिसल तो नहीं रही है?
महंगाई का नया भयावह चेहरा
भारत में आमतौर पर महंगाई की चर्चा खुदरा कीमतों यानी खाने-पीने और रोजमर्रा के सामान के महंगे होने से होती है। लेकिन इस बार तस्वीर ज्यादा गंभीर इसलिए है क्योंकि महंगाई एक साथ कई स्तरों पर दिखाई दे रही है। सोने की कीमत बढ़ना सिर्फ निवेश बाजार का मामला नहीं होता। भारत में सोना आर्थिक असुरक्षा का प्रतीक भी माना जाता है। जब वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है, लोग निवेशक सोने की तरफ भागते हैं और कीमतें ऊपर जाती हैं। इसका मतलब साफ है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार भी अस्थिरता का संकेत दे रहे हैं।
दूसरी तरफ दूध की कीमतों में बढ़ोतरी सीधे घर-घर के बजट पर असर डालती है। दूध ऐसा उत्पाद है जिसका उपयोग लगभग हर परिवार करता है। इसके महंगे होने का मतलब है कि चाय से लेकर बच्चों के पोषण तक हर चीज की लागत बढ़ेगी। यही नहीं, दूध महंगा होने का असर मिठाई, दही, पनीर और रेस्तरां उद्योग तक पहुंचेगा। तीसरा झटका पेट्रोल, डीजल और CNG के रूप में आया। यह सबसे खतरनाक संकेत इसलिए है क्योंकि ईंधन की कीमतें पूरी अर्थव्यवस्था की लागत तय करती हैं। ट्रांसपोर्ट महंगा होगा तो सब्जियां, अनाज, कपड़े, दवाइयां और निर्माण सामग्री तक सब कुछ महंगा हो जाएगा। यानी यह सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित संकट नहीं है।
रुपया कमजोर क्यों हो रहा है?
डॉलर के मुकाबले रुपये का लगातार गिरना महंगाई की आग में घी डालने जैसा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है- खासकर कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मशीनरी और कई औद्योगिक कच्चे माल। जब रुपया कमजोर होता है तो इन सभी चीजों का आयात महंगा हो जाता है। तेल कंपनियों को ज्यादा पैसे देने पड़ते हैं, जिसका असर पेट्रोल-डीजल के दामों पर आता है। कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ती है और आखिरकार उसका बोझ उपभोक्ता पर डाल दिया जाता है। रुपये की कमजोरी के पीछे कई कारण हैं। मसलन, अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची बनी हुई हैं, जिससे विदेशी निवेशक डॉलर की तरफ लौट रहे हैं। वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है। भारत का आयात बिल लगातार बढ़ रहा है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली से भी रुपये पर दबाव बना है। आसान शब्दों में कहें तो भारत से पैसा बाहर जा रहा है और डॉलर की मांग बढ़ रही है। यही कारण है कि रुपया लगातार कमजोर पड़ रहा है।
थोक महंगाई का खतरा क्यों बड़ा है?
थोक महंगाई दर यानी WPI का 42 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंचना सामान्य खबर नहीं है। थोक महंगाई खुदरा महंगाई का शुरुआती संकेत मानी जाती है। इसका मतलब है कि फैक्ट्रियों, उद्योगों और व्यापारियों के लिए सामान खरीदना महंगा हो रहा है। आज अगर उद्योगपतियों को कच्चा माल महंगा मिल रहा है तो कुछ हफ्तों या महीनों बाद वही लागत आम उपभोक्ताओं तक पहुंचेगी। यानी आने वाले समय में रोजमर्रा की वस्तुएं और महंगी हो सकती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक जिन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा दबाव दिख रहा है उनमें शामिल हैं- खाद्य तेल, दालें, पैकेज्ड फूड, सीमेंट और स्टील, इलेक्ट्रॉनिक्स, परिवहन सेवाएं। यानी महंगाई अब सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि मकान बनाने से लेकर मोबाइल खरीदने तक हर क्षेत्र में असर दिखाई दे सकता है।
आम आदमी की जेब पर कितना असर?
अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो आने वाले महीनों में एक मध्यमवर्गीय परिवार का मासिक बजट काफी बढ़ सकता है। मान लीजिए किसी परिवार का मासिक खर्च अभी 35 से 40 हजार रुपये है। दूध और खाद्य वस्तुओं की कीमत बढ़ने से 1000-1500 रुपये अतिरिक्त खर्च हो सकते हैं। पेट्रोल-डीजल महंगा होने से रोजाना यात्रा का खर्च बढ़ेगा। गैस, CNG और परिवहन महंगा होने से स्कूल बस, ऑटो और टैक्सी किराए भी बढ़ सकते हैं। बिजली और निर्माण सामग्री महंगी होने से किराए और हाउसिंग लागत बढ़ सकती है। यानी कुल मिलाकर मध्यम वर्ग पर हर महीने 3 से 5 हजार रुपये तक का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। निम्न आय वर्ग के लिए यह संकट और गहरा होगा क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन और परिवहन पर खर्च होता है।
क्या सरकार के हाथ से चीजें निकल रही हैं?
यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि महंगाई फिलहाल कई मोर्चों से हमला कर रही है और सरकार के पास विकल्प सीमित दिखाई दे रहे हैं। अगर सरकार पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम करती है तो राजस्व घटेगा। पहले ही सरकारी खर्च बढ़ा हुआ है और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखना चुनौती बना हुआ है। अगर रिजर्व बैंक ब्याज दरें बढ़ाता है तो महंगाई नियंत्रित हो सकती है, लेकिन इससे लोन महंगे हो जाएंगे। घर, गाड़ी और व्यापार के लिए EMI बढ़ेगी और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
सरकार खाद्य वस्तुओं पर सब्सिडी बढ़ा सकती है, लेकिन इससे वित्तीय दबाव और बढ़ेगा। दूसरी तरफ वैश्विक परिस्थितियों पर भारत का सीधा नियंत्रण नहीं है। कच्चे तेल की कीमत, डॉलर की मजबूती और अंतरराष्ट्रीय तनाव जैसे कारक घरेलू बाजार को लगातार प्रभावित कर रहे हैं। यानी सरकार के सामने दुविधा है- महंगाई रोकें या विकास की रफ्तार बनाए रखें।
कीमतें अभी और महंगी होंगी क्या?
मौजूदा संकेत तो इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि आने वाले महीनों में कई और क्षेत्रों में कीमतें बढ़ सकती हैं। मसलन मॉनसून या सप्लाई बाधित होने पर दाल, सब्जी और खाद्य तेल महंगे हो सकते हैं। ईंधन महंगा रहने पर ट्रक और लॉजिस्टिक लागत बढ़ेगी। सीमेंट, स्टील और बिजली महंगी होने से मकान निर्माण लागत बढ़ सकती है। मोबाइल, टीवी, इलेक्ट्रॉनिक्स और आयातित सामान महंगे हो सकते हैं। स्कूल परिवहन, दवाइयां और अस्पताल सेवाओं की लागत बढ़ सकती है। यानी महंगाई का असर अब धीरे-धीरे हर क्षेत्र में फैलने की आशंका है।
सबसे बड़ा खतरा: आय नहीं बढ़ रही
महंगाई तब सबसे ज्यादा खतरनाक हो जाती है जब लोगों की आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ती। फिलहाल निजी क्षेत्र में वेतन वृद्धि सीमित है और रोजगार बाजार भी दबाव में है। अगर खर्च बढ़े और आय स्थिर रहे तो उपभोक्ता खर्च घटने लगता है। लोग खरीदारी कम करते हैं, बाजार की मांग घटती है और अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। यही स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो “स्टैगफ्लेशन” जैसी चुनौती पैदा हो सकती है यानी धीमी विकास दर और ऊंची महंगाई एक साथ हमला करती है।
बहरहाल, 48 घंटे में सोना, दूध, पेट्रोल-डीजल और CNG का महंगा होना केवल संयोग नहीं है। यह उस व्यापक आर्थिक दबाव की तस्वीर है जो धीरे-धीरे आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है। कमजोर रुपया, बढ़ती थोक महंगाई और ईंधन कीमतों में उछाल मिलकर आने वाले महीनों के लिए मुश्किल संकेत दे रहे हैं। सरकार के लिए चुनौती केवल कीमतें नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि लोगों का भरोसा बनाए रखने की भी है। क्योंकि जब महंगाई लगातार कई मोर्चों से हमला करती है, तब सबसे पहले आम आदमी का बजट टूटता है और सबसे बाद में अर्थव्यवस्था संभलती है।




