अमेरिका के चर्चित सेक्स ट्रैफिकिंग आरोपी Jeffrey Epstein की मौत के वर्षों बाद भी उससे जुड़ी फाइलें दुनिया भर में सनसनी पैदा कर रही हैं। लेकिन इस बार चर्चा केवल अपराधों की नहीं, बल्कि उस तकनीकी क्रांति की है जिसने छिपे हुए नेटवर्क और प्रभावशाली लोगों के रिश्तों को उजागर करना शुरू कर दिया है।
ब्रिटिश दैनिक द गार्डियन के अनुसार, डेनमार्क के डेटा साइंटिस्ट Tommy Carstensen ने अमेरिकी न्याय विभाग (DoJ) द्वारा जारी लाखों दस्तावेजों को व्यवस्थित कर इंटरनेट का सबसे बड़ा डिजिटल एपस्टीन आर्काइव तैयार कर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि कुछ साल पहले तक उन्हें एपस्टीन केस में खास दिलचस्पी भी नहीं थी। लेकिन जब अमेरिकी न्याय विभाग समय पर पूरी जानकारी सार्वजनिक करने में विफल रहा, तब उन्होंने खुद डेटा विश्लेषण शुरू किया।
आज उनके आर्काइव में एपस्टीन की संपत्तियों, वित्तीय लेनदेन, ईमेल रिकॉर्ड, ऑडियो-वीडियो ट्रांसक्रिप्ट और यहां तक कि फेस रिकग्निशन टूल तक मौजूद है। कोई भी व्यक्ति किसी चेहरे की तस्वीर अपलोड कर यह देख सकता है कि वह एपस्टीन फाइल्स में मौजूद तस्वीरों में दिखाई देता है या नहीं।
इसी कड़ी में गैर-लाभकारी संस्था Decoherence Media ने हाल ही में एक नया फेस डेटाबेस जारी किया है। इसमें AI आधारित फेस रिकग्निशन तकनीक की मदद से उन लोगों की पहचान की गई है जो एपस्टीन के नेटवर्क में दिखाई देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 100 से अधिक ऐसे चेहरे मिले हैं जिनका जिक्र पहले सार्वजनिक दस्तावेजों में नहीं था। हालांकि विशेषज्ञ लगातार यह स्पष्ट कर रहे हैं कि किसी तस्वीर या रिकॉर्ड में दिखाई देना अपराध में शामिल होने का प्रमाण नहीं है।
डेटाबेस बनाने वाले Tristan Lee का कहना है कि इंटरनेट पर एपस्टीन को लेकर कई झूठी साजिशें और अफवाहें फैल रही थीं। ऐसे में उनका उद्देश्य तथ्यों के आधार पर यह समझना था कि एपस्टीन का सामाजिक और आर्थिक नेटवर्क वास्तव में कितना बड़ा और प्रभावशाली था।
इस तकनीकी जांच में AI आधारित फेस रिकग्निशन का इस्तेमाल हुआ, जिसमें Amazon Web Services की Rekognition तकनीक भी शामिल थी। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्वीकार किया कि फेस रिकग्निशन तकनीक में कई सीमाएं हैं, खासकर गैर-श्वेत चेहरों की पहचान में त्रुटियां अधिक हो सकती हैं। इसलिए हर पहचान को कई स्तरों पर मैन्युअली सत्यापित किया गया।
जांच के दौरान Sergey Brin जैसे हाई-प्रोफाइल नामों से जुड़ी नई तस्वीरें भी सामने आईं। हालांकि रिपोर्ट बार-बार यह स्पष्ट करती है कि किसी व्यक्ति का एपस्टीन के सामाजिक दायरे में होना अपने आप में गैरकानूनी गतिविधि का प्रमाण नहीं है।
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे संवेदनशील पहलू पीड़ितों की निजता रहा। कई शोधकर्ताओं और पत्रकारों ने आरोप लगाया कि अमेरिकी न्याय विभाग ने दस्तावेज जारी करते समय पीड़ितों की पहचान छिपाने में गंभीर लापरवाही की। इसके बाद स्वतंत्र शोधकर्ताओं ने खुद ऐसे नामों और तस्वीरों को हटाने के लिए सिस्टम तैयार किए।
इसका असर भारत में कई स्तरों पर महसूस किया जा रहा है। एपस्टीन नेटवर्क में दुनिया भर के कारोबारी, टेक उद्योग से जुड़े लोग, राजनेता और हाई-प्रोफाइल हस्तियां शामिल बताई जाती रही हैं। ऐसे में भारत के टेक और बिजनेस समुदाय में भी यह चर्चा तेज हो गई है कि कैसे ग्लोबल एलीट नेटवर्क काम करते हैं और डिजिटल डेटा के जरिए उनकी गतिविधियों को ट्रैक किया जा सकता है।
यह मामला अब केवल एक अपराध कथा नहीं रह गया है। यह दिखाता है कि आधुनिक दौर में डेटा साइंस, AI और ओपन-सोर्स जांच तकनीकें किस तरह सत्ता, पैसा और प्रभाव के उन नेटवर्कों को सामने ला रही हैं जिन्हें पहले छिपाना आसान था।




