Madarsa Survey Politics : क्या बंगाल में BJP ने शुरू कर दिया नया आइडियोलॉजिकल ड्राइव?

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में सत्ता संभालने के महज एक महीने के भीतर बीजेपी सरकार ने ऐसे दो फैसले लिए हैं जिन्होंने राज्य की राजनीति को नई बहस के केंद्र में ला दिया है। पहले मदरसों में ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य किया गया और अब राज्य के सभी मदरसों के व्यापक सर्वेक्षण का आदेश जारी कर दिया गया है। सरकार इसे शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और सुधार की पहल बता रही है, लेकिन विपक्ष और अल्पसंख्यक संगठनों की नजर में यह कदम राजनीतिक संदेश देने की कोशिश भी हो सकता है।

राज्य सरकार ने 5 जुलाई 2026 तक सभी मदरसों का सर्वेक्षण पूरा करने का निर्देश दिया है। सर्वे में छात्रों की संख्या, शिक्षकों की योग्यता, बुनियादी ढांचे और आर्थिक स्रोतों की जानकारी जुटाई जाएगी। आधिकारिक तौर पर इसे प्रशासनिक प्रक्रिया बताया जा रहा है, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ कहीं अधिक बड़े दिखाई देते हैं।

क्या असम मॉडल की ओर बढ़ रहा है बंगाल?

बीजेपी लंबे समय से ममता बनर्जी सरकार पर “अल्पसंख्यक तुष्टीकरण” का आरोप लगाती रही है। ऐसे में सत्ता में आते ही मदरसों को लेकर उठाए गए कदमों की तुलना पड़ोसी असम से होना स्वाभाविक है। असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार ने मदरसों के नियमन, बंदी और पाठ्यक्रम सुधार को लेकर कई विवादास्पद फैसले लिए थे। विपक्ष का आरोप रहा है कि इन कदमों का सबसे ज्यादा असर मुस्लिम समुदाय पर पड़ा। बंगाल में भी अब वही सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकार वास्तव में शिक्षा में सुधार चाहती है या फिर बहुसंख्यक मतदाताओं को राजनीतिक संदेश देने की रणनीति पर काम कर रही है।

सरकार का तर्क है कि गैर-मान्यता प्राप्त और अवैध मदरसों की पहचान कर उन्हें बंद किया जाएगा तथा वहां पढ़ने वाले छात्रों को सरकारी स्कूलों या मान्यता प्राप्त मदरसों में स्थानांतरित किया जाएगा। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री खुदीराम टुडू का कहना है कि शिक्षा के नाम पर किसी भी तरह की अवैध गतिविधि बर्दाश्त नहीं की जाएगी और छात्रों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना सरकार की प्राथमिकता है। लेकिन आलोचकों का सवाल है कि यदि मकसद सिर्फ शिक्षा सुधार है तो फिर सर्वेक्षण की प्रक्रिया केवल मदरसों तक सीमित क्यों है? क्या राज्य के अन्य गैर-मान्यता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों पर भी इसी तरह का अभियान नहीं चलाया जाना चाहिए? यही वह बिंदु है जहां सरकार की मंशा पर राजनीतिक बहस शुरू होती है।

आंकड़ों के पीछे छिपी राजनीतिक चुनौती

पश्चिम बंगाल में वेस्ट बंगाल बोर्ड ऑफ मदरसा एजुकेशन के तहत 614 सरकारी मान्यता प्राप्त और सहायता प्राप्त मदरसे हैं। इसके अलावा 2000 से अधिक निजी और गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे संचालित होने का अनुमान है। इतने बड़े नेटवर्क का सर्वेक्षण प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह मुस्लिम समुदाय के बीच असुरक्षा की भावना भी पैदा कर सकता है। अल्पसंख्यक संगठनों को आशंका है कि “अवैध मदरसों” की परिभाषा और कार्रवाई की प्रक्रिया भविष्य में विवाद का कारण बन सकती है। उनका तर्क है कि बिना पर्याप्त संवाद और भरोसे के ऐसे कदम समुदाय को संदेह के घेरे में खड़ा करने का काम करेंगे।

क्या है BJP का राजनीतिक गणित?

विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में पहली बार सत्ता में आई बीजेपी अपने मुख्य वैचारिक एजेंडे और चुनावी वादों को तेजी से लागू कर अपने समर्थक आधार को संदेश देना चाहती है। ‘वंदे मातरम’ और मदरसा सर्वेक्षण जैसे मुद्दे बीजेपी के उस राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं जिसमें राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और शिक्षा सुधार को एक साथ जोड़कर देखा जाता है। लेकिन इसके साथ जोखिम भी जुड़ा है। बंगाल की सामाजिक संरचना में मुस्लिम आबादी की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। ऐसे में यदि सरकार की कार्रवाई को समुदाय विशेष के खिलाफ अभियान के रूप में देखा गया तो इससे सामाजिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक टकराव बढ़ सकता है।

बहरहाल, मदरसों का सर्वेक्षण अपने आप में कोई असामान्य प्रशासनिक कदम नहीं है। किसी भी सरकार को यह जानने का अधिकार है कि राज्य में चल रहे शैक्षणिक संस्थान किस तरह संचालित हो रहे हैं। लेकिन सवाल प्रक्रिया और राजनीतिक संदर्भ का है। जब कोई कदम ऐसे माहौल में उठाया जाता है जहां पहचान, धर्म और राजनीति पहले से ही संवेदनशील मुद्दे हों, तब उसका असर केवल प्रशासनिक नहीं रह जाता। यही वजह है कि बंगाल में मदरसा सर्वेक्षण अब सिर्फ शिक्षा सुधार का मुद्दा नहीं, बल्कि बीजेपी सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताओं और उसके वैचारिक एजेंडे की पहली बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है।

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सत्ता विमर्श डेस्क
सत्ता विमर्श (Satta Vimarsh) नाम ही हमारी पहचान है। हमारा मानना है कि सब कुछ सत्ता के इर्द-गिर्द तय होता है, सरकार भी और सरोकार भी। लेकिन, इस सत्ता में हमारी-आपकी भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सत्ता में बैठे लोगों की। इसीलिए सत्ता और सरोकार से जुड़े मुद्दों पर विमर्श जरूरी है।

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