अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव को लेकर एक बड़े समझौते का दावा सामने आया है, लेकिन उपलब्ध संकेत बताते हैं कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर यह कहकर सनसनी पैदा कर दी कि ईरान के साथ डील पूरी हो चुकी है और हॉर्मुज स्ट्रेट को बिना किसी शुल्क के खोलने की मंजूरी दे दी गई है। साथ ही अमेरिकी नौसेना की नाकाबंदी हटाने की बात भी कही गई है। हालांकि इस घोषणा के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर डील में हासिल क्या है? ट्रम्प की ओर से समझौते की शर्तों, समय सीमा और क्रियान्वयन के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। यही वजह है कि इस कथित समझौते को लेकर उत्साह से ज्यादा संशय का माहौल दिखाई दे रहा है।
ट्रम्प का दावा बनाम ईरान की सावधानी
दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने समझौते के अस्तित्व से पूरी तरह इनकार नहीं किया है, लेकिन उसने इसे अंतिम मंजिल मानने से भी परहेज किया है। तेहरान का कहना है कि कई महीनों की कठिन वार्ताओं के बाद एक समझौता ज्ञापन (MoU) तैयार हुआ है, लेकिन असली परीक्षा अब अमेरिकी प्रतिबद्धताओं की है। ईरान की ओर से साफ संकेत दिया गया है कि जब तक अमेरिका अपने वादों को जमीन पर लागू नहीं करता, तब तक अंतिम भरोसा कायम नहीं हो सकता। यही वह बिंदु है जहां डील के भीतर छिपे कई ट्विस्ट नजर आते हैं।
तीन बड़ी शर्तें बनी हुई हैं सबसे बड़ा रोड़ा
ईरान ने जिन तीन मांगों को प्रमुखता से रखा है, वे किसी भी समझौते के भविष्य का फैसला कर सकती हैं। अमेरिका सैन्य कार्रवाई और युद्ध जैसी स्थिति को पूरी तरह समाप्त करे। ईरान पर लगे समुद्री और आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं और विदेशों में फंसी ईरानी संपत्तियों और अरबों डॉलर के फंड को जारी किया जाए। इनमें से हर मांग राजनीतिक और रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। विशेषकर प्रतिबंधों और फंड रिलीज का मुद्दा अमेरिकी घरेलू राजनीति और पश्चिमी सहयोगियों की चिंताओं से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में सिर्फ घोषणा भर से इन शर्तों का समाधान होता नहीं दिख रहा।
MoU और अंतिम समझौते में बड़ा फर्क
विश्लेषकों की नजर में सबसे अहम तथ्य यह है कि अभी जिस दस्तावेज की चर्चा हो रही है, वह एक MoU बताया जा रहा है। कूटनीतिक भाषा में MoU अक्सर इरादों और सहमति के ढांचे को दर्शाता है, जबकि वास्तविक और बाध्यकारी समझौते के लिए आगे कई चरणों की जरूरत पड़ती है। ईरान के डिप्टी विदेश मंत्री का 60 दिन की वार्ता के लिए तैयार होने का बयान भी यही संकेत देता है कि बातचीत का रास्ता अभी खुला हुआ है। यदि डील पूरी तरह अंतिम होती, तो अतिरिक्त वार्ता की जरूरत शायद नहीं पड़ती।
हॉर्मुज स्ट्रेट पर है पूरी दुनिया की नजर
यूएस प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प के बयान में हॉर्मुज स्ट्रेट का उल्लेख सबसे अहम माना जा रहा है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार इसी समुद्री मार्ग से होता है। यदि वास्तव में इस मार्ग पर तनाव कम होता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिल सकती है। लेकिन यहां भी सवाल बना हुआ है कि क्या यह व्यवस्था स्थायी होगी या अस्थायी? क्या सभी पक्षों ने इन शर्तों पर सहमति दे दी है? इन सवालों के जवाब अभी सामने नहीं आए हैं।
19 जून की तारीख अगली बड़ी परीक्षा
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि 19 जून 2026 को स्विट्जरलैंड में समझौते पर आधिकारिक हस्ताक्षर होंगे। यदि ऐसा होता है तो यह मध्य पूर्व की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम साबित हो सकता है। फिर भी कूटनीतिक गलियारों में यह धारणा मजबूती से बनी हुई है कि हस्ताक्षर से पहले या उसके बाद भी कई पेचीदगियां सामने आ सकती हैं। प्रतिबंधों की वापसी, सैन्य गतिविधियों पर नियंत्रण और वित्तीय रियायतों जैसे मुद्दों पर अंतिम सहमति अभी दूर की कौड़ी दिखाई देती है।
अमेरिका-ईरान में शर्तों को लेकर नया विवाद
अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की शर्तों को लेकर नया विवाद सामने आ खड़ा हुआ है। अमेरिका ने ईरान के उस दावे को खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि शुक्रवार को समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद 60 दिन की वार्ता शुरू होने से पहले ईरान को अरबों डॉलर के फंड जारी कर दिए जाएंगे।
एक अमेरिकी अधिकारी ने CNN से कहा, “यह पूरी तरह गलत है। जब तक ईरान अपनी कमिटमेंट को लागू नहीं करेगा, तब तक कोई भी फंड जारी नहीं किया जाएगा।” अमेरिका की यह प्रतिक्रिया ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगले चरण की बातचीत तभी शुरू होगी जब वॉशिंगटन पहले अपने कई वादे पूरे करेगा। इनमें ईरान के विदेशों में फ्रीज्ड 24 अरब डॉलर के फंड जारी करना भी शामिल है।
दोनों देशों के बयानों से साफ है कि समझौते की व्याख्या को लेकर अभी भी मतभेद बने हुए हैं। ईरान का कहना है कि अमेरिका को पहले अपने वादे पूरे करने होंगे, जबकि अमेरिका का कहना है कि पहले ईरान को अपनी कमिटमेंट पर अमल करना होगा। हालांकि अमेरिकी उप राष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अगर ईरान समझौते की शर्तों का पालन करता है, तो अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह समझौता अगले 50 वर्षों के लिए मिडिल ईस्ट की तस्वीर बदल सकता है।
फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में वेंस ने कहा कि इस समझौते का सबसे बड़ा मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ईरान के पास कभी परमाणु हथियार न हो। समझौते के जरिए ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने, हासिल करने या खरीदने की किसी भी कोशिश से रोका जाएगा। वेंस ने यह भी बताया कि ट्रम्प सरकार अभी यह तय कर रही है कि 19 जून को जिनेवा में होने वाले समझौते के हस्ताक्षर समारोह में कौन-कौन शामिल होगा। उन्होंने कहा, “मेरा वहां जाने का पूरा इरादा है, लेकिन यह भी संभव है कि राष्ट्रपति ट्रम्प खुद समारोह में मौजूद रहें।”
14 पॉइंट के MoU में क्या-क्या है?
हालांकि व्हाइट हाउस ने अभी तक MoU के डिटेल्स पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन ईरानी सरकारी मीडिया मेहर न्यूज के अनुसार, दोनों देशों के बीच पीस डील का 14 प्वाइंट्स का जो मसौदा सामने आया है वो कुछ इस प्रकार से है…
1. ईरान, लेबनान और बाकी सभी मोर्चों पर युद्ध तुरंत बंद होगा।
2. अमेरिका और इजराइल फिर कोई नया युद्ध शुरू नहीं करने की गारंटी देंगे।
3. अमेरिका इजराइल की ओर से भी सुरक्षा गारंटी देगा।
4. होर्मुज से अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाई जाएगी।
5. ईरानी जहाजों और समुद्री व्यापार पर लगी पाबंदियां खत्म की जाएंगी।
6. 30 दिनों के भीतर समुद्री व्यापार को पहले की तरह बहाल किया जाएगा।
7. होर्मुज स्ट्रेट दोबारा खोला जाएगा।
8. ईरान के अरबों डॉलर के फ्रीज्ड फंड जारी किए जाएंगे।
9. शुरुआती चरण में फ्रीज्ड फंड का आधा हिस्सा जारी होगा।
10. ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की प्रक्रिया शुरू होगी।
11. अमेरिका प्राइमरी और सेकेंडरी दोनों तरह के प्रतिबंध हटाने पर बातचीत करेगा।
12. अमेरिका 30 दिनों के भीतर ईरान के आसपास के इलाकों से सैन्य मौजूदगी कम करेगा।
13. ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाने की अपना कमिटमेंट दोहराएगा। 60% एनरिच्ड यूरेनियम के मुद्दे पर आगे बातचीत होगी।
14. 60 दिन की आखिरी बातचीत होगी, जिसमें परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण जैसे मुद्दों पर समझौते की कोशिश होगी।
ट्रम्प बोले- ईरान नहीं माना तो अमेरिका के पास 2 रास्ते
ट्रम्प का कहना है कि ईरान के साथ युद्ध रोकने का समझौता हो गया है, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है। उनके मुताबिक आने वाले हफ्तों में ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम पर ऐसा समझौता करना होगा जिससे अमेरिका संतुष्ट हो। अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमेरिका फिर से सख्त कदम उठा सकता है। न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए फोन इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा कि पहला ऑप्शन यह होगा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू कर दे। या फिर दूसरा ऑप्शन यह होगा कि अमेरिका ‘मिडिल ईस्ट का संरक्षक’ बन जाएगा। इसके बदले अमेरिका, मिडिल ईस्ट की आय का 20% हिस्सा लेगा।
हालांकि ट्रम्प ने यह नहीं बताया कि यह व्यवस्था व्यवहार में कैसे लागू होगी। मिडिल ईस्ट कोई एक देश नहीं है, बल्कि कई देशों का एक इलाका है। इसलिए पूरे क्षेत्र की आय का 20% लेने का कोई मौजूदा अंतरराष्ट्रीय ढांचा नहीं है। न ही किसी अरब देश या खाड़ी देश ने ऐसे किसी प्लान का समर्थन किया है।
फिलहाल समझौते की तस्वीर यही बताती है कि अमेरिका और ईरान दोनों टकराव से पीछे हटने के संकेत तो दे रहे हैं, लेकिन इसे पूर्ण शांति समझौता कहना जल्दबाजी होगी। ट्रम्प की घोषणा और ईरान की शर्तों के बीच अभी भी बड़ा फासला मौजूद है। 19 जून के प्रस्तावित हस्ताक्षर, प्रतिबंधों पर फैसले और अमेरिकी कदमों की वास्तविकता तय करेगी कि यह समझौता ऐतिहासिक बनेगा या फिर कूटनीति का एक और अधूरा अध्याय। यानी जंग खत्म होने की घोषणा भले हो गई हो, लेकिन डील की असली कहानी में अभी कई ट्विस्ट बाकी हैं।




