ब्रिटेन में सोशल मीडिया बैन की तैयारी! क्या भारत भी लेगा ऐसा ही फैसला?

ब्रिटेन की लेबर सरकार ने एक ऐसा फैसला लेने की तैयारी शुरू कर दी है, जिसने दुनिया भर में डिजिटल सुरक्षा, बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने घोषणा की है कि उनकी सरकार 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके साथ ही गेमिंग प्लेटफॉर्म, लाइव-स्ट्रीमिंग सेवाओं और कुछ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित चैट सिस्टम पर भी सख्त नियंत्रण की योजना बनाई जा रही है।

ब्रिटिश सरकार का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई देशों में यह चिंता बढ़ रही है कि सोशल मीडिया बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य, व्यवहार और सामाजिक विकास को किस हद तक प्रभावित कर रहा है। दरअसल, ब्रिटेन में पिछले कुछ वर्षों से डिजिटल सुरक्षा कानून लगातार मजबूत किए गए हैं। बच्चों को अश्लील सामग्री, आत्महत्या और आत्म-क्षति से जुड़े कंटेंट तथा ऑनलाइन शोषण से बचाने के लिए कई नियम लागू किए गए हैं। इसके बावजूद सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया कंपनियों के एल्गोरिद्म और उनकी व्यावसायिक रणनीतियां बच्चों को अत्यधिक स्क्रीन-टाइम और डिजिटल निर्भरता की ओर धकेल रही हैं।

ब्रिटिश नियामक ऑफकॉम के आंकड़े बताते हैं कि 13 से 15 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 95 प्रतिशत बच्चे किसी न किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि 3 से 5 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों में भी सोशल मीडिया उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। सरकार द्वारा कराए गए व्यापक परामर्श में शामिल 83 प्रतिशत अभिभावकों ने माना कि सोशल मीडिया के नुकसान उसके फायदों से अधिक हैं, जबकि 90 प्रतिशत ने 16 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा का समर्थन किया।

ब्रिटिश सरकार की इस नीति के पीछे सबसे बड़ा प्रेरक ऑस्ट्रेलिया का मॉडल माना जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया का पहला देश बन चुका है जिसने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लागू किया। ब्रिटेन ने ऑस्ट्रेलिया के अनुभव का अध्ययन किया है और पाया है कि प्रतिबंध के बाद लाखों सोशल मीडिया अकाउंट हटाए गए या निष्क्रिय हुए। हालांकि कई बच्चों ने नियमों को दरकिनार करने के रास्ते भी खोज लिए हैं। इससे यह स्पष्ट हुआ कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रभावी निगरानी और तकनीकी व्यवस्था भी जरूरी है।

ब्रिटेन की योजना के अनुसार, टिकटॉक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और अन्य प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों की आयु सत्यापित करने के लिए बाध्य होंगे। इसके लिए फेस स्कैनिंग, डिजिटल पहचान, बैंकिंग या अन्य सत्यापन तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार यह भी चाहती है कि बच्चे वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) का उपयोग करके नियमों को आसानी से न तोड़ सकें। सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि ऑनलाइन गेमिंग और लाइव-स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर भी बच्चों और अजनबियों के बीच सीधे संवाद की सुविधाओं को सीमित करने पर विचार किया जा रहा है। AI आधारित रोमांटिक या यौन प्रकृति के चैटबॉट्स तक नाबालिगों की पहुंच रोकने की योजना भी चर्चा में है।

ब्रिटेन की नई सोशल मीडिया नीति

16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध का प्रस्ताव।
टिकटॉक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट समेत कई प्लेटफॉर्म दायरे में।
आयु सत्यापन अनिवार्य होगा।
गेमिंग और लाइव-स्ट्रीमिंग सेवाओं पर भी सख्ती।
AI चैटबॉट्स तक नाबालिगों की पहुंच सीमित करने पर विचार।
अगले वर्ष तक लागू होने की संभावना।

अब यहां से बहस का दूसरा पक्ष सामने आता है। कई मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाविदों और बाल अधिकार संगठनों का मानना है कि केवल आयु-आधारित प्रतिबंध कोई जादुई समाधान नहीं है। उनका तर्क है कि असली समस्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के एल्गोरिद्म, डेटा संग्रहण मॉडल और कंटेंट वितरण प्रणाली में है। यदि बच्चे सोशल मीडिया से दूर भी कर दिए जाएं, तब भी इंटरनेट पर मौजूद हानिकारक सामग्री, साइबर बुलिंग और डिजिटल शोषण जैसी समस्याएं बनी रह सकती हैं। इसलिए कुछ विशेषज्ञ “पूर्ण प्रतिबंध” के बजाय “सुरक्षित डिजिटल शिक्षा” और “जिम्मेदार तकनीकी डिजाइन” को अधिक प्रभावी उपाय मानते हैं।

जहां तक भारत की बात है तो यह देश दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट और सोशल मीडिया बाजारों में शामिल है। करोड़ों किशोर और बच्चे स्मार्टफोन के जरिए प्रतिदिन घंटों सोशल मीडिया पर बिताते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति से लेकर विभिन्न सरकारी रिपोर्टों तक, स्क्रीन-टाइम और डिजिटल लत को लेकर चिंता बार-बार व्यक्त की जा चुकी है।

हालांकि भारत में अभी तक अंडर-16 सोशल मीडिया बैन जैसा कोई प्रस्ताव नहीं है, लेकिन डेटा संरक्षण कानून, ऑनलाइन गेमिंग नियम और बाल सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों के माध्यम से सरकार डिजिटल क्षेत्र को अधिक नियंत्रित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के फैसले भारत के नीति निर्माताओं के सामने भी एक बड़ा प्रश्न खड़ा करते हैं कि क्या बच्चों की सुरक्षा के लिए कड़े प्रतिबंध जरूरी हैं, या फिर डिजिटल साक्षरता, अभिभावकीय निगरानी और तकनीकी कंपनियों की जवाबदेही अधिक प्रभावी रास्ता है?

बहरहाल, ब्रिटेन का प्रस्तावित सोशल मीडिया प्रतिबंध केवल तकनीकी नीति नहीं, बल्कि आधुनिक समाज में बचपन के स्वरूप को लेकर चल रही वैश्विक बहस का हिस्सा है। एक तरफ सरकारें बच्चों को डिजिटल खतरों से बचाने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, तकनीकी नवाचार और व्यावहारिक क्रियान्वयन से जुड़े सवाल भी मौजूद हैं।

भारत जैसे देश के लिए यह बहस और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी डिजिटल दुनिया में तेजी से प्रवेश कर रही है। आने वाले वर्षों में यह तय करना आसान नहीं होगा कि बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखा जाए या उन्हें डिजिटल दुनिया में सुरक्षित तरीके से जीना सिखाया जाए।

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प्रवीण कुमार
पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव रखता हूं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के साथ काम करते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर निरंतर लेखन करता आ रहा हूं। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं और डिजिटल मीडिया कंसल्टेंसी से भी जुड़ा हूं। बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और भगवत गीता के विचार मेरे लेखन और जीवन-दृष्टि को दिशा देते हैं।

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