गुवाहाटी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! कहा- वोटर आईडी, आधार या बिजली बिल से जमीन आपकी नहीं हो जाती

हाईकोर्ट ने कहा- आधार, वोटर आईडी, राशन कार्ड, बिजली कनेक्शन या पंचायत प्रमाण पत्र केवल पहचान और निवास के दस्तावेज हैं, ये किसी भी हालत में जमीन के स्वामित्व का प्रमाण नहीं बन सकते।

गुवाहाटी। असम में आरक्षित वन भूमि पर वर्षों से रह रहे लोगों को बड़ा झटका देते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि वोटर आईडी, आधार कार्ड, राशन कार्ड, बिजली बिल या अन्य सरकारी दस्तावेज किसी व्यक्ति को वन भूमि पर कानूनी स्वामित्व का अधिकार नहीं देते। अदालत ने आरक्षित वन क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को वैध ठहराया है। हालांकि, पात्र लोगों को राज्य सरकार की पुनर्वास नीति के तहत राहत मांगने की छूट भी दी है।

मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और न्यायमूर्ति अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने यह फैसला उन कई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद दिया, जिनमें नागांव जिले के विभिन्न आरक्षित वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने बेदखली की कार्रवाई को चुनौती दी थी। वन विभाग ने इन्हें आरक्षित वन भूमि का अनधिकृत कब्जाधारी माना था।

25 जून को दिए गए अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि आधार कार्ड, वोटर आईडी, मतदाता सूची में नाम, राशन कार्ड, बिजली कनेक्शन, पंचायत प्रमाणपत्र या ऐसे अन्य दस्तावेज किसी व्यक्ति की पहचान, निवास, मतदान या सरकारी सुविधाओं तक पहुंच का प्रमाण हो सकते हैं, लेकिन इन्हें कभी भी अचल संपत्ति के स्वामित्व या मालिकाना हक का कानूनी दस्तावेज नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि यदि किसी भूमि को कानून के तहत आरक्षित वन घोषित कर दिया गया है, तो उस भूमि पर वही कानूनी स्थिति लागू होगी। केवल लंबे समय तक वहां रहने या प्रशासन की निष्क्रियता के आधार पर कोई व्यक्ति उस जमीन पर अधिकार का दावा नहीं कर सकता। यदि कोई व्यक्ति अपना अधिकार बताता है तो उसे किसी विधिक रूप से मान्य दस्तावेज या कानून के आधार पर उसे साबित करना होगा।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरक्षित वन की सीमा तय करने वाले पिलरों और कथित अतिक्रमण की भौतिक जांच कर उन्हें अंतिम जियोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम (GIS) मानचित्र में शामिल किया गया है।अदालत ने स्पष्ट किया कि आधुनिक तकनीक का उपयोग केवल पहले से अधिसूचित वन सीमाओं की पहचान और सत्यापन के लिए किया गया है। इसलिए यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि पुराने वन अधिसूचना आदेश GIS तकनीक से पहले के हैं, इसलिए उसका उपयोग गलत है।

याचिकाकर्ता नागांव जिले के बरापानी, लुटुमाई, काकी और अन्य आरक्षित वन क्षेत्रों के भीतर या आसपास बसे गांवों के निवासी हैं। उनका दावा है कि वे और उनके पूर्वज कई दशकों से इन क्षेत्रों में रह रहे हैं। उन्होंने यहां स्थायी मकान बनाए, खेती की और अपनी आजीविका विकसित की।

उनका कहना था कि वर्ष 1970 में हुई बेदखली के बाद वन विभाग ने कुछ विस्थापित परिवारों को ‘टौंग्या प्रणाली’ (Taungya System) के तहत खेती और अस्थायी निवास की अनुमति दी थी। वर्तमान में रहने वाले कई लोग उन्हीं परिवारों के वंशज हैं या उन्हें उत्तराधिकार अथवा हस्तांतरण के माध्यम से यह अधिकार मिला है।

अपने दावे के समर्थन में याचिकाकर्ताओं ने टौंग्या प्रमाणपत्र, सरकारी पत्राचार, विभागीय दस्तावेज, टेलीग्राम, मतदाता सूची, पंचायत प्रमाणपत्र, वार्षिक पट्टा और भूमि राजस्व रसीदें अदालत के सामने पेश कीं।

उनका कहना था कि इन दस्तावेजों से साबित होता है कि सरकार ने वर्षों तक उनके कब्जे को मान्यता दी। साथ ही इन इलाकों में स्कूल, सड़क जैसी सार्वजनिक सुविधाएं भी विकसित की गईं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन ने इन बस्तियों को स्वीकार किया था। इसलिए अब बेदखली की कार्रवाई मनमानी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

मामला पहले भी विभिन्न अदालतों में लंबे समय तक चलता रहा। वर्ष 2025 में बेदखली नोटिस जारी होने के बाद प्रभावित लोगों ने हाईकोर्ट का रुख किया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘अब्दुल खालेक बनाम असम राज्य’ मामले में राज्य सरकार को वैज्ञानिक तरीके से भूमि का सत्यापन कराने, प्रभावित लोगों को अपने दस्तावेज पेश करने का अवसर देने और उनके कानूनी अधिकारों की जांच कर कारणयुक्त आदेश पारित करने का निर्देश दिया था।

इन्हीं निर्देशों के तहत दोबारा जांच की गई, जिसके बाद वन विभाग ने संबंधित लोगों को आरक्षित वन भूमि का अनधिकृत कब्जाधारी माना। अब गुवाहाटी हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को कानूनसम्मत ठहराते हुए याचिकाओं को खारिज कर दिया है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि जो लोग सरकार की पुनर्वास नीति के पात्र हैं, वे उसके तहत राहत के लिए आवेदन कर सकते हैं।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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