राहुल गांधी के तीन सवालों से घिरी सरकार, मोदी-शाह से मांगा छात्रों पर कार्रवाई का हिसाब

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बड़े ही तल्ख अंदाज में कहा- देश को सामान्य भाषण नहीं, छात्रों पर हुई कार्रवाई का जवाब चाहिए। राहुल ने गृह मंत्री अमित शाह से पूछा, पैलेट गन चलाने की अनुमति किसने दी?

नई दिल्ली। संसद का मॉनसून सत्र भले ही समापन की तरफ बढ़ रहा हो, लेकिन सरकार और विपक्ष के बीच टकराव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि देश को संसद में गृह मंत्री का सामान्य भाषण सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है। सवाल सीधा है- दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पैलेट गन चलाने की अनुमति किसने दी? इसका सीधा जवाब गृह मंत्री दें।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ पार्टी मुख्यालय इंदिरा भवन में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा, ”प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पिछले 15 दिनों से सदन में आने का साहस नहीं जुटा पाए हैं। उनका आरोप था कि सरकार उस कार्रवाई की जिम्मेदारी लेने से बच रही है, जिसको लेकर छात्र और विपक्ष लगातार सवाल उठा रहे हैं। राहुल गांधी ने कहा कि छात्रों के लिए यह समझना जरूरी है कि उनके साथ दिल्ली में जो कुछ हुआ वह प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को संसद में चर्चा के लायक नहीं लगता।” उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर सरकार इस पूरे मामले पर जवाब देने से क्यों बच रही है और उस कार्रवाई की जिम्मेदारी कौन लेगा?

राहुल ने कहा, ”होम मिनिस्ट्री से पैलेट गन चलाने का, कील वाली लाठी चलाने का आर्डर आया था। और पूरे देश ने देखा कि हमारे स्टूडेंट्स को मारा गया। पैलेट गन से अंधा किया गया। हमारी पहली डिमांड थी कि होम मिनिस्टर संसद में आएं और देश को पूरी स्पष्टता से बताएं कि उन्होंने आर्डर दिया और वो इसके लिए दोषी हैं। या फिर उनको मालूम ही नहीं था कि छात्रों पर गोली चलाने का आर्डर किसी और ने दे दिया तो फिर वो इनकंपिटेंट है। हमारा कहना था कि इस पर उनको स्टेटमेंट देनी चाहिए और हम उनका इस्तीफा मांग रहे हैं। हमारी दूसरी मांग ये है कि हमारे छात्रों पर दिल्ली में पैलेट गन चलाई गई, उन्हें मारा गया उसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को माफी मांगनी होगी और तीसरी डिमांड जो प्रधानमंत्री ने राम मंदिर ट्रस्ट में अपने लोग बैठाए थे जिन्होंने करोड़ों रुपए चोरी किए हैं सबके सामने उस पर चर्चा हो।”

राहुल ने कहा, ”हमारा ये कहना बिलकुल नहीं था कि अमित शाह जी आकर किसी भी विषय पर भाषण दे दें। जनरल चीजें आकर के बोल दें। न तो हमारी उसमें कोई दिलचस्पी है और न ही देश को। उनकी क्या ओपिनियन है? इसमें किसी को कोई दिलचस्पी नहीं है। हम यह जानना चाहते हैं कि गोली किसने चलवाई? और अगर इन्होंने नहीं चलवाई तो फिर किसने चलवाई। कल्पेबिलिटी है या इनकंपिटेंस है, यह हम समझना चाहते हैं।”

राहुल गांधी ने कहा, ”दरअसल, ये जो पूरा ड्रामा चल रहा है, अमित शाह का जो गुब्बारा फटा है, उसको रिपेयर करने का, उसमें फिर से गैस भरने की कोशिश हो रही है। लेकिन गुब्बारा तो फट चुका है। उसमें कोई मतलब नहीं गैस भरने का। उसमें गैस अब नहीं भरी जा सकती। अमित शाह डज नॉट हैव द करेज। गट्स नहीं है उनमें कि वो पार्लियामेंट में आकर हमारे सामने खड़े हों जाएं। 15 दिनों मे यही दिखाया है, न ही नरेंद्र मोदी जी में गट्स हैं न अमित शाह जी में गट्स हैं।”

राहुल गांधी का यह हमला महज एक राजनीतिक बयान नहीं है। इसके पीछे वह सवाल है जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है- जब राज्य की ताकत का इस्तेमाल नागरिकों के खिलाफ होता है तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी? प्रदर्शनकारी छात्र हों या कोई दूसरा नागरिक समूह, पुलिस कार्रवाई का आदेश किस स्तर से आया, किस अधिकारी ने उसे मंजूरी दी और किन परिस्थितियों में बल प्रयोग का फैसला लिया गया इन सारे सवालों का जवाब सरकार को देना चाहिए। राहुल गांधी ने विशेष तौर पर गृह मंत्री अमित शाह से यह स्पष्ट करने की मांग की कि छात्रों पर पैलेट गन चलाने की अनुमति किसने दी। उनका कहना था कि संसद में सामान्य राजनीतिक मुद्दों पर लंबा भाषण देने से ज्यादा जरूरी उस घटना पर जवाब देना है, जिसने छात्रों के बीच आक्रोश पैदा किया है।

दरअसल, छात्रों के आंदोलन को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक संघर्ष अब एक बड़े सवाल में बदलता दिखाई दे रहा है। क्या लोकतंत्र में विरोध की आवाज को सुनने के बजाय उसे दबाने के लिए पुलिस और प्रशासनिक ताकत का इस्तेमाल किया जा सकता है? और अगर ऐसा होता है तो उस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान और जवाबदेही तय होगी या नहीं? यही वह बिंदु है जहां राहुल गांधी सरकार को घेर रहे हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नीतियों का बचाव करना नहीं है, बल्कि उन घटनाओं पर भी संसद में जवाब देना है जिनमें सरकारी मशीनरी की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।

‘किसने आदेश दिया’ राहुल गांधी के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है। सरकार की ओर से यदि यह कहा जाता है कि पुलिस ने परिस्थितियों के अनुसार कार्रवाई की, तो अगला सवाल स्वाभाविक रूप से उठेगा कि कार्रवाई की अनुमति किस स्तर पर दी गई थी। यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी ने निर्णय लिया तो उसकी जवाबदेही तय होगी या नहीं? और यदि सरकार इस कार्रवाई को उचित मानती है तो वह खुलकर उसके पक्ष में क्यों नहीं खड़ी होती?

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की गैरमौजूदगी को भी इसी संदर्भ से जोड़ते हुए कहा कि दोनों ने पिछले 15 दिनों से सदन में आने का साहस नहीं दिखाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार उन घटनाओं की जिम्मेदारी लेने से बच रही है जिन पर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। हालांकि सरकार की ओर से इन आरोपों पर उसका पक्ष भी सामने आना जरूरी है। लोकतांत्रिक बहस तभी पूरी होगी जब सरकार यह बताए कि छात्रों के प्रदर्शन के दौरान वास्तव में क्या हुआ, पुलिस ने किन परिस्थितियों में बल प्रयोग किया और पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर क्या आधिकारिक प्रक्रिया अपनाई गई।

इस पूरे विवाद की राजनीतिक अहमियत इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि मामला सीधे युवाओं और छात्रों से जुड़ा है। छात्र आंदोलन किसी भी लोकतंत्र में केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं होता। वह सरकार की नीतियों, रोजगार, शिक्षा और भविष्य को लेकर नई पीढ़ी की बेचैनी का संकेत भी हो सकता है। ऐसे में छात्रों के प्रदर्शन को सिर्फ भीड़ नियंत्रण के नजरिये से देखना राजनीतिक रूप से सरकार के लिए आसान रास्ता हो सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक रूप से पर्याप्त जवाब नहीं। युवा जब सड़क पर उतरता है तो सरकार के सामने दो रास्ते होते हैं- पहला, उसे केवल प्रशासनिक समस्या मानकर नियंत्रित करना और दूसरा, उसके पीछे मौजूद असंतोष को समझना। राहुल गांधी का आरोप है कि सरकार ने पहला रास्ता चुना और अब उस कार्रवाई पर जवाब देने से बच रही है।

सरकार के सामने चुनौती सिर्फ विपक्ष के राजनीतिक हमले का जवाब देने की नहीं है। उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि छात्रों के प्रदर्शन से निपटने में पुलिस और प्रशासन ने किस प्रक्रिया का पालन किया। यदि सरकार के पास यह साबित करने के लिए तथ्य हैं कि कार्रवाई नियमों के अनुरूप हुई, तो उन्हें सार्वजनिक करने में उसे हिचक क्यों होनी चाहिए?
दूसरी तरफ, अगर कार्रवाई में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारी तय करना सरकार की ही जिम्मेदारी बनती है।
यही वजह है कि राहुल गांधी का सवाल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है- “गोली चलाने का आदेश किसने दिया?”

राहुल गांधी के बयान को कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन उनके सवाल की प्रकृति ऐसी है कि इसका जवाब केवल राजनीतिक आरोप लगाकर खारिज भी नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में सरकार के पास ताकत होती है और विपक्ष के पास सवाल। जब ताकत का इस्तेमाल नागरिकों के खिलाफ होता है तो सवाल और भी जरूरी हो जाते हैं। राहुल गांधी ने फिलहाल यही सवाल संसद और देश के सामने रख दिया है। अब गेंद सरकार के पाले में है। अमित शाह संसद में क्या कहते हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि वे छात्रों पर हुई कार्रवाई की जिम्मेदारी और उसके आदेश की कड़ी को लेकर क्या जवाब देते हैं।

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प्रवीण कुमार
पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव रखता हूं। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के साथ काम करते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर निरंतर लेखन करता आ रहा हूं। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं और डिजिटल मीडिया कंसल्टेंसी से भी जुड़ा हूं। बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और भगवत गीता के विचार मेरे लेखन और जीवन-दृष्टि को दिशा देते हैं।

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