गुजरात को लंबे कालखंड से देश के उन राज्यों में शुमार किया जाता है जहां शराबबंदी लागू है। महात्मा गांधी की जन्मभूमि होने के कारण यहां शराबबंदी को केवल एक प्रशासनिक नीति नहीं, बल्कि राजनीतिक और नैतिक प्रतिबद्धता के रूप में भी पेश किया जाता रहा है। लेकिन भावनगर की ताजा घटना ने इस पूरे दावे के सामने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है- अगर शराब की बिक्री और सेवन पर कानूनी रोक है तो फिर जहरीली शराब लोगों तक पहुंच कैसे रही है और इतनी बड़ी संख्या में लोग उसका शिकार कैसे हो रहे हैं?
बीते दिनों भावनगर में जहरीली शराब पीने के बाद अब तक 9 लोगों की मौत हो चुकी है। सूरत के रहने वाले संजय सिंह डोडिया को भी शुक्रवार को ब्रेन डेड घोषित किया गया। संजय ने 16 अगस्त की रात भावनगर में हुई शराब पार्टी में शराब पी थी। इसके बाद वह सूरत लौट आया, लेकिन सुबह तक उसकी हालत गंभीर हो गई। उसे सूरत के आईएनएस अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पिछले तीन दिनों से वेंटिलेटर पर जिंदगी के लिए जूझ रहे संजय को गुरुवार रात हार्ट अटैक आया और शुक्रवार सुबह डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया।
यह आंकड़ा इस त्रासदी की गंभीरता को समझने के लिए पर्याप्त है। भावनगर में अभी भी 25 लोग अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं और इनमें पांच की हालत गंभीर बताई जा रही है। यानी प्रशासन के सामने चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। आने वाले दिनों में मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। पूरी घटना की शुरुआत 16 अगस्त की रात घोघा इलाके के खरकड़ी गांव से हुई। बताया गया कि एक युवक ने पुलिस में भर्ती होने की खुशी में पार्टी आयोजित की थी। पार्टी में जिस शराब का इस्तेमाल हुआ, वह घनश्याम नाम के एक कथित तस्कर से खरीदी गई थी। आरोप है कि नकली शराब को विदेशी शराब की बोतलों में भरकर सप्लाई किया गया था।
पार्टी खत्म होने के बाद लोगों की तबीयत बिगड़नी शुरू हुई। कुछ लोगों की हालत इतनी तेजी से खराब हुई कि उन्हें अस्पताल ले जाने तक का मौका नहीं मिला। भावनगर के तीन युवकों की घरों में ही मौत हो गई। स्थानीय स्तर पर यह भी दावा किया जा रहा है कि यही शराब आसपास के कई गांवों तक पहुंची थी और इसके बाद दूसरे इलाकों से भी बीमार लोगों के अस्पताल पहुंचने का सिलसिला शुरू हुआ। यहीं से यह मामला एक सामान्य आपराधिक घटना से आगे बढ़कर गुजरात की शराबबंदी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
अगर शराब की बिक्री कानूनी रूप से प्रतिबंधित है तो अवैध शराब का पूरा नेटवर्क किस तरह काम कर रहा था? शराब कहां बन रही थी? कच्चा माल कहां से आ रहा था? इसे तैयार करने वाले लोग कितने समय से सक्रिय थे? इसकी सप्लाई किन इलाकों में हो रही थी? और सबसे अहम स्थानीय पुलिस तथा प्रशासन को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? पुलिस की जांच में अब तक 15 आरोपियों की गिरफ्तारी की बात सामने आई है। इनमें 13 आरोपी भावनगर के बताए जा रहे हैं। वहीं मुख्य आरोपियों में रईस और जुबैर के नाम सामने आए हैं, जिन्हें मध्य प्रदेश के उज्जैन का रहने वाला बताया गया है।
जांच में मुरैना निवासी नरेंद्र यादव उर्फ ‘डॉक्टर’ की भूमिका भी सामने आई है। पुलिस के मुताबिक रईस ने नरेंद्र यादव को कथित तौर पर अवैध शराब तैयार करने के लिए गुजरात बुलाया था। आरोप है कि नरेंद्र और उसके साथियों ने भावनगर के स्थानीय शराब तस्कर गौतम सोलंकी के साथ मिलकर शराब तैयार की। पुलिस के अनुसार, घटना से करीब तीन दिन पहले ही नरेंद्र और उसके साथियों ने जहरीली शराब की 25 पेटियां तैयार की थीं। यही शराब बाद में अलग-अलग लोगों तक पहुंची और कई परिवारों के लिए मातम का कारण बन गई। यहां सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 25 पेटियां किसने बनाईं। बड़ा सवाल यह है कि इन पेटियों को बनाने, रखने और अलग-अलग इलाकों तक पहुंचाने के दौरान प्रशासनिक तंत्र कहां खड़ा था?
गुजरात में जहरीली शराब का इतिहास पुराना है
भावनगर की ताजा घटना को अगर गुजरात में जहरीली शराब के पिछले मामलों की पृष्ठभूमि में देखा जाए तो तस्वीर और गंभीर हो जाती है। यह पहली बार नहीं है जब शराबबंदी वाले गुजरात में अवैध और जहरीली शराब ने लोगों की जान ली हो। पिछले डेढ़ दशक से ज्यादा समय में राज्य कई बड़े जहरीली शराब कांड देख चुका है। हर बड़ी घटना के बाद कार्रवाई, जांच और सख्ती के दावे हुए, लेकिन कुछ वर्षों बाद इसी तरह की त्रासदी फिर सामने आ गई।
2009 : अहमदाबाद का सबसे बड़ा शराब कांड- जुलाई 2009 में अहमदाबाद में जहरीली शराब ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। अलग-अलग रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 136 से लेकर 156 तक बताई गई। सैकड़ों लोग अस्पताल पहुंचे थे। घटना के बाद गुजरात में शराबबंदी को लागू करने के तरीके और पुलिस की भूमिका पर तीखे सवाल उठे। उस घटना ने यह सवाल पहली बार इतनी ताकत से सामने रखा था कि जब शराब की बिक्री और सेवन पर कानूनी रोक है, तब अवैध शराब का कारोबार इतना बड़ा कैसे हो सकता है। यानी 2009 में जो सवाल उठा था, वह आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
2016 : सूरत के वरेली में फिर मौत का तांडव- साल 2016 में सूरत जिले के पलसाना तालुका के वरेली गांव में जहरीली शराब की घटना में 21 लोगों की मौत हुई थी। इस घटना में बड़ी संख्या में प्रवासी टेक्सटाइल कर्मी भी प्रभावित हुए थे। इसके बाद जांच गुजरात एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड को सौंपी गई थी। यानी 2009 के बड़े हादसे के सात साल बाद भी अवैध शराब का नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था।
2022 : बोटाद में 42 मौतें और फिर वही सवाल- जुलाई 2022 में बोटाद और आसपास के इलाकों में जहरीली शराब ने एक बार फिर गुजरात को झकझोर दिया। इस घटना में 42 लोगों की मौत हुई और करीब 97 लोग उपचार के लिए अस्पतालों में पहुंचे। जांच में Methanol Poisoning की बात सामने आई। पुलिस जांच के अनुसार रासायनिक पदार्थ को अवैध तरीके से हासिल कर उसे शराब के रूप में बेचा गया था। इस घटना के बाद सरकार ने प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई की। बोटाद और अहमदाबाद के पुलिस अधीक्षकों का तबादला किया गया और छह पुलिसकर्मियों को ड्यूटी में लापरवाही के आरोप में निलंबित किया गया। यानी 2022 में सिर्फ तस्करों पर कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही का सवाल भी आधिकारिक कार्रवाई के स्तर तक पहुंचा।
2026 : भावनगर में फिर वही कहानी?- अब भावनगर की घटना सामने है। इस बार भी शुरुआती जानकारी के मुताबिक अवैध शराब का नेटवर्क सामने आया है, कई आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं और बड़ी मात्रा में कथित जहरीली शराब तैयार किए जाने की बात जांच में सामने आई है।
यहीं इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल खड़ा होता है। 2009 के बाद कार्रवाई हुई। 2016 में फिर मौतें हुईं। 2022 में 42 लोगों की जान गई और पुलिस अधिकारियों पर भी कार्रवाई हुई। फिर 2026 में भावनगर में वही संकट लौट आया। तो क्या हर बार घटना के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त है? या फिर उस व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है जिसके भीतर अवैध शराब का नेटवर्क बार-बार अपनी जगह बना लेता है?
गुजरात में शराबबंदी की जमीनी हकीकत
गुजरात में शराबबंदी दशकों से लागू है। इसके पीछे सामाजिक और नैतिक तर्क दिए जाते हैं। लेकिन शराबबंदी का वास्तविक मूल्यांकन सिर्फ कानून की किताब से नहीं किया जा सकता। उसका मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि जमीन पर अवैध शराब की उपलब्धता कितनी कम हुई और लोगों की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित हुई। भावनगर की घटना इसी कसौटी पर व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करती है। शराबबंदी का मतलब यह होना चाहिए कि शराब की अवैध आपूर्ति रोकने के लिए राज्य का तंत्र बेहद मजबूत हो। लेकिन अगर अवैध शराब बनाने वाले गिरोह सक्रिय हैं, तस्कर अलग-अलग राज्यों से आकर नेटवर्क खड़ा कर रहे हैं और नकली शराब गांवों तक पहुंच रही है, तो सवाल केवल अपराधियों पर कार्रवाई का नहीं रह जाता।
सवाल व्यवस्था की प्रभावशीलता का भी है। कार्रवाई के आंकड़े से आगे जाना होगा पुलिस ने 15 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। निश्चित रूप से यह जांच की दिशा में एक जरूरी कदम है। लेकिन ऐसे मामलों में गिरफ्तारी अपने आप में समाधान नहीं है। जरूरी यह है कि जांच उस पूरे नेटवर्क तक पहुंचे जिसने इस शराब को तैयार किया, वित्तपोषित किया, परिवहन कराया और ग्राहकों तक पहुंचाया। यदि केवल कुछ स्थानीय तस्करों को गिरफ्तार कर मामला बंद कर दिया गया तो कुछ समय बाद यही नेटवर्क किसी दूसरे रूप में सामने आ सकता है। इसलिए जांच में यह भी सामने आना चाहिए कि कथित जहरीली शराब के निर्माण के लिए जरूरी सामग्री कहां से आई, इसे तैयार करने की जगह कहां थी, इसके वितरण का नेटवर्क कितना बड़ा था और क्या इससे पहले भी इसी नेटवर्क ने शराब की सप्लाई की थी।
गुजरात के लिए यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं
जहरीली शराब की घटनाएं केवल पुलिस और अपराध की खबर नहीं होतीं। इनके पीछे सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक सवाल भी छिपे होते हैं। खासकर उस राज्य में जहां शराबबंदी लंबे समय से राजनीतिक पहचान का हिस्सा रही है, वहां ऐसी घटना का महत्व और बढ़ जाता है। गुजरात मॉडल की चर्चा विकास, निवेश और प्रशासनिक दक्षता के संदर्भ में होती रही है। ऐसे में यह भी पूछा जाना स्वाभाविक है कि प्रशासनिक दक्षता का परीक्षण उन इलाकों में कैसे किया जा रहा है जहां अवैध कारोबार लोगों की जान के लिए खतरा बन रहा है। शराबबंदी की सफलता का पैमाना यह नहीं हो सकता कि शराब की दुकानें दिखाई नहीं देतीं। असली सवाल यह है कि क्या अवैध शराब का नेटवर्क कमजोर हुआ है या उसने भूमिगत रास्ते तलाश लिए हैं? भावनगर की घटना इस बहस को फिर सामने ले आई है।
घटना की जिम्मेदारी सिर्फ तस्करों की नहीं
इस घटना में अपराधियों की जिम्मेदारी सबसे पहले तय होनी चाहिए। जहरीली शराब बनाना और उसे लोगों तक पहुंचाना गंभीर अपराध है। लेकिन प्रशासनिक जिम्मेदारी का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि कोई नेटवर्क कई दिनों तक शराब तैयार कर रहा था, उसकी कई पेटियां तैयार हुईं और फिर वह अलग-अलग गांवों में पहुंची, तो निगरानी तंत्र की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। क्या स्थानीय स्तर पर अवैध शराब के बारे में पहले से शिकायतें थीं? क्या पुलिस को इस नेटवर्क की जानकारी थी? क्या पहले भी इसी इलाके में अवैध शराब पकड़ी गई थी? क्या दूसरे राज्यों से आने वाले तस्करों पर निगरानी थी? इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।
जहरीली शराब की हर बोतल एक चेतावनी है
भावनगर की त्रासदी का सबसे दुखद पहलू यह है कि जिन लोगों ने शराब पी, उनमें से कई शायद यह जानते भी नहीं थे कि उनके सामने रखी बोतल में आखिर क्या है। नकली शराब को विदेशी शराब की बोतलों में भरकर बेचने का आरोप बताता है कि अवैध कारोबारियों ने लोगों के भरोसे को भी अपने कारोबार का हिस्सा बना लिया था। यहां सरकार के सामने दोहरी चुनौती है- एक तरफ अपराधियों के नेटवर्क को तोड़ना और दूसरी तरफ लोगों को ऐसी जहरीली शराब के खतरे से बचाना। सिर्फ गिरफ्तारी और मुकदमे से यह समस्या खत्म नहीं होगी। अवैध शराब के स्रोत, वितरण और आर्थिक नेटवर्क पर लगातार निगरानी करनी होगी।
गुजरात में शराबबंदी की बहस जितनी पुरानी है, उतना ही पुराना अवैध शराब का सवाल भी है। भावनगर की ताजा घटना इस बहस को फिर उसी जगह ले आई है जहां सबसे कठिन सवाल खड़ा होता है- जब शराबबंदी लागू है, तो जहरीली शराब लोगों तक पहुंच कैसे रही है? इस सवाल का जवाब सिर्फ उन 15 गिरफ्तारियों में नहीं मिलेगा। जवाब उस पूरे सिस्टम की जांच से मिलेगा, जिसने 25 पेटियों को तैयार होने, निकलने और लोगों तक पहुंचने दिया। क्योंकि जहरीली शराब से हुई हर मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है। वह उस व्यवस्था के लिए भी चेतावनी है, जो शराबबंदी के कानून को लागू करने का दावा करती है। और अब गुजरात में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितने तस्कर पकड़े गए। सवाल यह होना चाहिए कि इतनी बड़ी मात्रा में जहरीली शराब तैयार और सप्लाई होने तक प्रशासन सोता क्यों रहा?
शराबबंदी की सफलता का पैमाना क्या है?
गुजरात में शराबबंदी 1960 से लागू है। लेकिन जहरीली शराब की घटनाओं का यह इतिहास बताता है कि कानून होना और कानून का प्रभावी क्रियान्वयन- दो अलग बातें हैं। शराबबंदी के समर्थकों के लिए भावनगर की घटना एक कठिन सवाल लेकर आई है। यदि प्रतिबंध के बावजूद अवैध शराब उपलब्ध है, तो क्या समस्या सिर्फ अपराधियों की है? या फिर अवैध सप्लाई चेन, स्थानीय स्तर की मिलीभगत, निगरानी की कमजोरी और मांग—इन सभी पहलुओं को एक साथ देखना होगा?
दूसरी ओर, शराबबंदी की आलोचना करने वालों के पास भी इस घटना के बाद अपनी दलील मजबूत करने का आधार है। उनका तर्क है कि प्रतिबंध से मांग खत्म नहीं होती, बल्कि बाजार भूमिगत हो जाता है और उपभोक्ता ऐसी चीजों के संपर्क में आ सकते हैं जिनकी गुणवत्ता और सुरक्षा पर कोई नियंत्रण नहीं होता। लेकिन इस बहस के बीच एक बात निर्विवाद है- जहरीली शराब से होने वाली मौतों को केवल ‘लठ्ठाकांड’ कहकर और कुछ गिरफ्तारियां करके मामला खत्म नहीं किया जा सकता। हर बड़ी घटना के बाद यह पता लगाना जरूरी है कि नेटवर्क कहां से शुरू हुआ, कितने स्तरों तक फैला था और स्थानीय प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली।
भावनगर की घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह 2009, 2016 और 2022 की घटनाओं के बाद फिर वही सवाल पूछ रही है- क्या गुजरात में शराबबंदी का कानून मजबूत है, लेकिन उसे लागू करने वाला तंत्र कमजोर पड़ रहा है? अगर सरकार इस सवाल का जवाब सिर्फ गिरफ्तारियों के आंकड़े से देती है, तो वह आधा जवाब होगा। असली जवाब तब मिलेगा जब यह बताया जाएगा कि पिछली त्रासदियों से क्या सीखा गया, कौन-से संस्थागत सुधार किए गए और फिर भी अवैध शराब का नेटवर्क इतनी आसानी से सक्रिय कैसे हो गया।




