HPV VACCINE : कैंसर से बचाव और भरोसे की परीक्षा

दिल्ली हाईकोर्ट ने एचपीवी टीकाकरण अभियान पर रोक नहीं लगाई, लेकिन वैक्सीन के चयन, सुरक्षा निगरानी और सरकारी फैसलों की पारदर्शिता पर जवाब मांगा है। सवाल वैक्सीन की उपयोगिता से ज्यादा उस व्यवस्था का है, जिस पर करोड़ों परिवारों का भरोसा टिका है।

एचपीवी यानी ह्यूमन पैपिलोमा वायरस के खिलाफ भारत का अभियान अब अदालत की चौखट तक पहुंच चुका है। जुलाई 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट ने देशव्यापी टीकाकरण अभियान पर तत्काल रोक लगाने से इनकार जरूर किया, लेकिन केंद्र सरकार, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन से राष्ट्रीय कार्यक्रम में एचपीवी वैक्सीन को शामिल करने के औचित्य तथा इससे जुड़े सवालों पर जवाब भी मांगा।

हालांकि अदालत की यह कार्रवाई वैक्सीन को असुरक्षित घोषित करने के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए। लेकिन इसने एक असहज सवाल जरूर सामने रखा है- इतने बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य फैसले के पीछे वैज्ञानिक, नियामकीय और आर्थिक निर्णय कितने पारदर्शी हैं? यह जनहित याचिका स्त्री-रोग विशेषज्ञ डॉ. सुजाता मित्तल और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े उद्यमी जितेंद्र चौकसी ने दाखिल की थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ज्ञानेंद्र कुमार और अधिवक्ता रोहित कुमार पेश हुए। याचिका में प्रतिकूल घटनाओं से संबंधित आंकड़ों, सुरक्षा निगरानी और वैक्सीन चयन के आधार पर सवाल उठाए गए। याचिकाकर्ता पक्ष ने भारत में विकसित सर्वावैक के बजाय गार्डसिल के चयन के वैज्ञानिक और आर्थिक आधार पर भी स्पष्टीकरण मांगा।

वायरस आम, खतरा असाधारण

एचपीवी कोई दुर्लभ संक्रमण नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यौन रूप से सक्रिय अधिकांश लोग जीवन में कभी न कभी एचपीवी से संक्रमित होते हैं और अधिकांश संक्रमण शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली खुद नियंत्रित कर लेती है। खतरा उन हाई-रिस्क प्रकारों से है जो लंबे समय तक शरीर में बने रहें और कोशिकाओं में ऐसे बदलाव पैदा करें जो आगे चलकर कैंसर का कारण बन सकते हैं।

सर्वाइकल कैंसर के लगभग सभी मामले एचपीवी के संक्रमण से जुड़े हैं। यही वैज्ञानिक संबंध एचपीवी को कैंसर की रोकथाम की वैश्विक रणनीति के केंद्र में लाता है। इस कहानी में जर्मन वैज्ञानिक हेराल्ड जुर हाउज़ेन की खोज निर्णायक रही। उन्होंने एचपीवी के कुछ प्रकारों और सर्वाइकल कैंसर के बीच संबंध स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसी शोध के लिए उन्हें 2008 में नोबेल पुरस्कार मिला। इसके बाद विकसित वैक्सीन ने कैंसर के इलाज के बजाय उसके एक प्रमुख कारण को संक्रमण से पहले रोकने की संभावना पैदा की।

टीका कैंसर का इलाज नहीं, रोकथाम की पहली दीवार है

एचपीवी वैक्सीन में जीवित वायरस नहीं होता। इसमें वायरस-लाइक पार्टिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है, जो प्रतिरक्षा प्रणाली को वायरस पहचानने और उसके खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ संक्रमण से पहले मिलता है। इसलिए किशोरावस्था को टीकाकरण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है और विश्व स्वास्थ्य संगठन 9 से 14 वर्ष की लड़कियों को प्राथमिक लक्ष्य समूह मानता है। भारत ने 28 फरवरी 2026 को 14 वर्ष की लड़कियों के लिए देशव्यापी मुफ्त एचपीवी टीकाकरण अभियान शुरू किया।

सरकार के अनुसार, हर वर्ष लगभग 1.15 करोड़ लड़कियां इस कार्यक्रम के दायरे में आएंगी। पहले 90 दिनों के विशेष अभियान में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर टीका उपलब्ध कराया गया और इसके बाद नियमित टीकाकरण व्यवस्था के माध्यम से इसे जारी रखने की योजना है। दुनिया के कई देशों के वास्तविक आंकड़े एचपीवी टीकाकरण के पक्ष में मजबूत संकेत देते हैं। व्यापक टीकाकरण वाले देशों में वैक्सीन से लक्षित एचपीवी संक्रमण और प्री-कैंसर अवस्थाओं में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। लेकिन विज्ञान की सीमा भी उतनी ही स्पष्ट है- वैक्सीन हर एचपीवी प्रकार से सुरक्षा नहीं देती और सर्वाइकल कैंसर के हर मामले को नहीं रोकती। इसलिए टीकाकरण के बाद भी स्क्रीनिंग जरूरी रहती है।

असली लड़ाई : पहुंच, निगरानी और भरोसा

भारत में अभियान की सबसे कठिन परीक्षा वैक्सीन उपलब्ध कराना नहीं, उसे सही लड़की तक पहुंचाना है। स्कूल में पढ़ने वाली किशोरियों तक पहुंच अपेक्षाकृत आसान हो सकती है, लेकिन स्कूल से बाहर रहने वाली लड़कियां, दूरदराज और आदिवासी क्षेत्रों के परिवार तथा स्वास्थ्य सेवाओं से कटे समुदाय सबसे बड़ी चुनौती हैं। इसके साथ अभिभावकों की झिझक और एचपीवी को लेकर सामाजिक असहजता भी कवरेज को प्रभावित कर सकती है। एचपीवी यौन संपर्क से फैलने वाला संक्रमण है। इसलिए स्वास्थ्यकर्मियों को परिवारों के साथ स्पष्ट और संवेदनशील संवाद करना होगा कि किशोरावस्था में टीकाकरण का उद्देश्य किसी व्यवहार को प्रोत्साहित करना नहीं, बल्कि संक्रमण से पहले सुरक्षा देना है। गलत सूचनाओं का मुकाबला भी केवल सोशल मीडिया संदेशों से नहीं, बल्कि स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों, शिक्षकों और समुदाय के भरोसेमंद लोगों के जरिए करना होगा।

भारत का 2009 का अनुभव इस मामले में महत्वपूर्ण है। आंध्र प्रदेश और गुजरात में हुए प्रदर्शन कार्यक्रमों के दौरान कुछ मौतों के बाद सुरक्षा और निगरानी पर गंभीर सवाल उठे थे। बाद की जांच में इन मौतों को एचपीवी वैक्सीन से जोड़ने वाला प्रमाण नहीं मिला, लेकिन उस विवाद ने यह जरूर दिखाया कि वैज्ञानिक कार्यक्रम के साथ पारदर्शी निगरानी, सार्वजनिक संवाद और मजबूत कार्यक्रम प्रबंधन भी जरूरी हैं। पुराने अनुभव का सबक साफ है—किसी प्रतिकूल घटना का दर्ज होना और उसका वैक्सीन से कारणात्मक रूप से जुड़ना एक ही बात नहीं है; लेकिन हर प्रतिकूल घटना की विश्वसनीय जांच और सार्वजनिक रिपोर्टिंग जरूरी है।

बाजार नहीं, पारदर्शिता हो असली कसौटी

एचपीवी टीकाकरण करोड़ों किशोरियों तक पहुंचने वाला कार्यक्रम है। इसलिए दवा उद्योग की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। भारत में स्वदेशी सर्वावैक का विकास यह संभावना दिखाता है कि देश केवल वैक्सीन का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता भी हो सकता है। लेकिन बहस को किसी एक कंपनी के पक्ष या विरोध तक सीमित करना मूल सवाल से भटका देगा।

सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वैक्सीन के चयन में कौन-से वैज्ञानिक, महामारी-विज्ञान संबंधी और आर्थिक मानदंड अपनाए गए; खरीद किस कीमत पर हुई; किन विशेषज्ञों ने निर्णय प्रक्रिया में भाग लिया; संभावित हितों के टकराव का खुलासा कैसे हुआ; और प्रतिकूल घटनाओं की स्वतंत्र निगरानी किस व्यवस्था के तहत होगी। याचिकाकर्ताओं ने इन्हीं व्यापक सवालों को अदालत के सामने रखा है। सार्वजनिक स्वास्थ्य में वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी हैं, लेकिन केवल प्रमाण पर्याप्त नहीं होते। विश्वसनीय विज्ञान को विश्वसनीय शासन भी चाहिए।

टीका अकेला कैंसर नहीं हराएगा

एचपीवी वैक्सीन को सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन का पर्याय बना देना रणनीतिक भूल होगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 90-70-90 रणनीति स्पष्ट करती है कि कैंसर से लड़ाई तीन मोर्चों पर एक साथ चलनी होगी- 15 वर्ष की उम्र तक 90 प्रतिशत लड़कियों का पूर्ण टीकाकरण, 70 प्रतिशत महिलाओं की प्रभावी स्क्रीनिंग और जरूरतमंद महिलाओं में 90 प्रतिशत उपचार। भारत में यही सबसे बड़ी चुनौती है। यदि किशोरियों को टीका मिल गया लेकिन वयस्क महिलाओं के लिए नियमित स्क्रीनिंग उपलब्ध नहीं हुई, ग्रामीण क्षेत्रों में जांच की सुविधा नहीं पहुंची और प्री-कैंसर या कैंसर मिलने के बाद इलाज समय पर नहीं मिला, तो टीकाकरण की उपलब्धि अधूरी रहेगी। एचपीवी वैक्सीन पहला दरवाजा है; उसके बाद स्क्रीनिंग, निदान और उपचार की पूरी व्यवस्था खड़ी करनी होगी।

विज्ञान के पक्ष में प्रमाण, सरकार के सामने जवाबदेही

उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण एचपीवी वैक्सीन की प्रभावशीलता और सुरक्षा के पक्ष में मजबूत हैं। दुनिया में बड़े पैमाने पर इसके इस्तेमाल और दीर्घकालिक निगरानी से इसके लाभों का पर्याप्त प्रमाण मिला है। इसलिए अदालत में उठे सवालों को वैक्सीन-विरोधी मुहिम के रूप में देखना गलत होगा। लेकिन दूसरी ओर हर सवाल को ‘साजिश’ कहकर खारिज करना भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह है। दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यवाही का महत्व इसी संतुलन में है।

अदालत ने तत्काल अभियान रोकने का आदेश नहीं दिया, लेकिन सरकार से जवाब मांगे। यानी वैक्सीन का वैज्ञानिक मूल्य और सरकार की नीति संबंधी जवाबदेही- दोनों को अलग-अलग कसौटियों पर परखा जा सकता है। सरकार के सामने अब केवल टीकाकरण का लक्ष्य पूरा करने की चुनौती नहीं है। उसे यह भी बताना होगा कि कार्यक्रम की निगरानी कैसे होगी, प्रतिकूल घटनाओं पर क्या कार्रवाई होगी और जनता को उसके आंकड़े किस तरह उपलब्ध कराए जाएंगे। वैज्ञानिक सहमति का अर्थ यह नहीं कि नीति सवालों से ऊपर हो जाती है।

अंतिम कसौटी : कितने टीके नहीं, कितने कैंसर रुके

एचपीवी वैक्सीन पर भारत की बहस का निष्कर्ष न तो यह है कि यह दवा उद्योग की चाल है और न यह कि यह हर सवाल से परे कोई चमत्कारी समाधान है। यह कैंसर की रोकथाम के लिए विज्ञान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन इसकी सफलता स्वास्थ्य व्यवस्था की गुणवत्ता पर निर्भर करेगी। टीका गरीब और अमीर, शहर और गांव, स्कूल जाने वाली और स्कूल से बाहर रहने वाली किशोरी तक समान रूप से पहुंचे; परिवारों को सही जानकारी मिले; प्रतिकूल घटनाओं की स्वतंत्र निगरानी हो; खरीद प्रक्रिया पारदर्शी हो; और महिलाओं के लिए स्क्रीनिंग तथा उपचार की व्यवस्था मजबूत हो- तभी इसका वास्तविक प्रभाव सामने आएगा।

सामाजिक कार्यकर्ता रीना शक्या के अभियान में भी सर्वाइकल कैंसर को लेकर जागरूकता, नियमित स्क्रीनिंग और एचपीवी टीकाकरण की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दिया गया है। उनके अभियान का मूल संदेश यही है कि महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक संवाद और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच दोनों जरूरी हैं। अंततः भारत को यह नहीं गिनना चाहिए कि कितनी करोड़ खुराक दी गईं। असली सवाल होगा- कितने प्री-कैंसर मामले रोके गए, कितने सर्वाइकल कैंसर के मामले टले और कितनी जिंदगियां बचीं?

यही वह बिंदु है जहां एक टीकाकरण अभियान महज सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़कर सार्वजनिक स्वास्थ्य की ऐतिहासिक उपलब्धि बन सकता है। रीना शक्या का कहना है कि सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ लड़ाई में सबसे बड़ी बाधाओं में जानकारी की कमी, स्क्रीनिंग तक सीमित पहुंच और महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े सामाजिक मौन शामिल हैं। किशोरियों और महिलाओं के बीच एचपीवी वैक्सीन तथा नियमित जांच को लेकर जागरूकता बढ़ाने के साथ इन्हें सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए सुलभ बनाया जाए। (लेखक डेवलपमेंट जर्नलिस्ट हैं।)

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अमरेंद्र किशोर
स्वतंत्र पत्रकार और लेखक के तौर पर मशहूर अमरेंद्र किशोर दिल्ली में रहते हैं। विकास और सामाजिक सरोकारों से गहरा नाता रखने वाले अमरेंद्र का दक्षिण-पूर्व एशिया के दुर्गम इलाकों में रहने वाले मूल बाशिंदों गहरी रूचि है। यही वजह है कि उनके लेखन में जन-सरोकार के मुद्दों की गहराई में जाने की झलक मिलती है। अपनी पत्रकारिता के ज़रिये ज़मीनी स्तर पर सामाजिक और लैंगिक मुद्दों, ग्रामीण जीवन की जटिलताओं, गरीबी की मार्मिक वास्तविकताओं तथा आदिवासियों की ज़िन्दगी में बढ़ती चुनौतियों के गहन अन्वेषण का काम अमरेंद्र ने बख़ूबी किया है। अमरेंद्र किशोर भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय में पुनर्वास और पुनर्स्थापन मामलों के सलाहकार, राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रोजेक्ट रिव्यू कमेटी और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी सामाजिक विकास पुरस्कार समिति के सदस्य रह चुके हैं। ज़मीनी स्तर पर सामाजिक सहभागिता और जागरूकता के अलावा समाज के सतत विकास कार्यों के सिलसिले में फोर्ड फॉउंडेशन, जापान फॉउंडेशन, वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम की परियोजनाओं के साथ भी बतौर परियोजना निदेशक काम किया है। अंग्रेजी मासिक ''डेवलपमेंट फाइल्स'' के कार्यकारी सम्पादक (2014-2020) भी रह चुके हैं। इन्होंने ओडिशा की अनब्याही माताओं के मुद्दे पर मुल्क की मीडिया को नई दिशा दी है। फिलहाल, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन की हजारों बाघ विधवाओं पर केंद्रित अनुसंधान में सक्रिय हैं। आदिवासी, पर्यावरण और लोकज्ञान पर आधारित अभी तक इनकी सात क़िताबें प्रकाशित हुई हैं। इनके निबंध संग्रह 'जंगल-जंगल लूट मची है' कृति को दिल्ली सरकार के हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कृत (2007) किया जा चुका है। लोकज्ञान पर आधारित इनकी बहुचर्चित कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' के लिए इन्हें लोकायत देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय सम्मान (2011) से नवाज़ा गया है। अमरेंद्र सासाराम के शांति प्रसाद जैन कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक (1991) हैं और भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से जनसंचार में पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा (1994-95) की डिग्री ली है। इनकी पत्रकारिता भारतीय उप-महाद्वीप के आदिवासी समुदायों द्वारा झेली जा रही कठिनाइयों पर रोशनी डालती है और प्राकृतिक संसाधनों को स्थानीय जीवन से जोड़ने की तत्काल जरूरतों की वकालत भी करती है।

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