नई दिल्ली। लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार भी अपना भाषण सिर्फ उपलब्धियों के ब्योरे तक सीमित नहीं रखा। 80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर करीब 76 मिनट के संबोधन में प्रधानमंत्री ने एक तरफ देश को विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प, युवाओं की भूमिका और तकनीक के बढ़ते महत्व पर जोर दिया, तो दूसरी तरफ देश के भीतर मौजूद उन ताकतों को लेकर आगाह किया जिन्हें उन्होंने ‘दिमागी नक्सल’ कहा। प्रधानमंत्री का यह शब्द चयन उनके भाषण का सबसे राजनीतिक और बहस पैदा करने वाला हिस्सा रहा।
पीएम मोदी ने कहा कि हथियारी नक्सलवाद की चुनौती काफी हद तक खत्म हो चुकी है, लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ अभी भी मौजूद हैं और वे मौके की तलाश में हैं। उनके मुताबिक ऐसे लोग समाज को भटकाने, हिंसा और अराजकता का रास्ता तलाशने तथा देश की युवा पीढ़ी को गलत दिशा में ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि ऐसे लोगों को पहचानना और उन्हें समाज से अलग-थलग करना होगा। प्रधानमंत्री ने आने वाले दिनों में एक आधुनिक और व्यापक सिविल डिफेंस नेटवर्क तैयार करने की भी घोषणा की।
यही वह बिंदु है जहां इस बार का प्रधानमंत्री का स्वतंत्रता दिवस संबोधन महज सरकारी योजनाओं और विकास के आंकड़ों का भाषण नहीं रह जाता। लाल किले की प्राचीर से ‘दिमागी नक्सल’ का जिक्र एक राजनीतिक संदेश भी बन जाता है। सवाल यह है कि प्रधानमंत्री जिन लोगों को इस श्रेणी में रख रहे हैं, उनकी पहचान कैसे होगी और असहमति, आलोचना और हिंसक विचारधारा के बीच सरकार की सीमा कहां तय होगी? लोकतंत्र में यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी विचार या व्यक्ति को देश-विरोधी अथवा समाज के लिए खतरनाक बताने से पहले उसके लिए स्पष्ट कसौटियां भी जरूरी होती हैं।
प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में यह भी कहा कि हथियार उठाने वाले नक्सलियों के खिलाफ देश ने निर्णायक लड़ाई लड़ी है। अब चुनौती उस मानसिकता से है जो समाज में हिंसा और अराजकता के बीज बोती है। उनका जोर इस बात पर रहा कि देश के युवाओं को ऐसी ताकतों से दूर रखते हुए उन्हें विकसित भारत के निर्माण से जोड़ा जाए। पीएम मोदी जिस वैचारिक ताकत को ‘दिमागी नक्सल’ कहकर संबोधित किया, इससे पहले उसे ‘अर्बन नक्सल’ कहा करते थे।
दरअसल, इस पूरे भाषण में प्रधानमंत्री मोदी के केंद्र में युवा (Gen-Z) रहे। साल 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की बात के साथ उन्होंने युवाओं की ऊर्जा, कौशल और तकनीकी क्षमता को देश की सबसे बड़ी ताकत के रूप में पेश किया। इसी क्रम में प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि अगले एक साल में एक करोड़ युवाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की ट्रेनिंग देने का लक्ष्य रखा गया है।
यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब रोजगार का सवाल भारतीय युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में बना हुआ है। डिग्री, कौशल और रोजगार के बीच का अंतर लगातार बहस का विषय है। ऐसे में AI आधारित नए रोजगार और बदलती अर्थव्यवस्था के लिए युवाओं को तैयार करने की सरकार की योजना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके साथ असली सवाल यह रहेगा कि प्रशिक्षण के बाद रोजगार के अवसर कितने पैदा होते हैं और कितने युवा वास्तव में इस तकनीकी बदलाव का लाभ उठा पाते हैं।
प्रधानमंत्री ने गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं के लिए विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग उपलब्ध कराने की बात भी कही। यह घोषणा उस बड़े वर्ग को ध्यान में रखती है जो महंगी कोचिंग व्यवस्था के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं में बराबरी की स्थिति में नहीं पहुंच पाता। देश के छोटे शहरों और कस्बों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए डिजिटल शिक्षा का विस्तार एक बड़ा बदलाव ला सकता है।
लेकिन यहां भी सवाल सिर्फ घोषणा का नहीं, उसके क्रियान्वयन का है। मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग तभी प्रभावी होगी जब इंटरनेट, डिजिटल डिवाइस, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण सामग्री और प्रशिक्षित शिक्षकों तक गरीब और ग्रामीण युवाओं की वास्तविक पहुंच सुनिश्चित हो। डिजिटल इंडिया की सफलता का पैमाना सिर्फ ऐप और पोर्टल की संख्या नहीं, बल्कि उन युवाओं की संख्या भी होनी चाहिए जिन्हें इन सुविधाओं से वास्तविक अवसर मिला।
प्रधानमंत्री के भाषण में सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुख रहा। ‘दिमागी नक्सल’ के अलावा उन्होंने देश की रक्षा क्षमता और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। सरकार के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा अब सिर्फ सीमा पर सैनिकों की मौजूदगी का विषय नहीं, बल्कि तकनीक, रक्षा उत्पादन और स्वदेशी क्षमता का भी सवाल है। इसीलिए विकसित भारत की तस्वीर में रक्षा आत्मनिर्भरता को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।
इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह की शुरुआत भी कुछ मायनों में अलग रही। लाल किले पर पहली बार ‘वंदे मातरम्’ का गान कार्यक्रम का हिस्सा बना। समारोह की शुरुआत राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के स्मरण के साथ हुई। इसके बाद प्रधानमंत्री ने तिरंगा फहराया और राष्ट्रगान के साथ समारोह आगे बढ़ा। 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह को ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्षों की विरासत और 2047 तक विकसित भारत के लिए युवा शक्ति के योगदान से भी जोड़ा गया था।
लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण की राजनीतिक दिशा को सिर्फ राष्ट्रवाद और विकास की दो धाराओं में बांटना पर्याप्त नहीं होगा। उनके संबोधन में एक तीसरी धारा भी स्पष्ट दिखाई दी- वह थी देश के भीतर मौजूद वैचारिक संघर्ष की। ‘दिमागी नक्सल’ का जिक्र इसी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा है। पीएम मोदी ने जिस तरह समाज को ऐसे लोगों को पहचानकर उनसे अलग रहने का संदेश दिया, वह आने वाले दिनों में निश्चित तौर पर राजनीतिक बहस का विषय बनेगा।
लोकतंत्र में विचारों की लड़ाई और हिंसा के समर्थन के बीच एक स्पष्ट अंतर होना जरूरी होता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत इस बात में होती है कि सरकार की नीतियों पर सवाल पूछने, असहमति व्यक्त करने और विरोध दर्ज कराने की जगह बनी रहे। वहीं हिंसा, आतंक या सशस्त्र विद्रोह का समर्थन अलग श्रेणी का विषय है। प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान के बाद अब राजनीतिक बहस इसी बात पर केंद्रित हो सकती है कि इस शब्द की परिभाषा क्या है और इसकी सीमा कहां तक जाती है।
लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने देश के सामने 2047 का लक्ष्य फिर दोहराया। विकसित भारत का सपना, युवा शक्ति, AI, रक्षा आत्मनिर्भरता और सामाजिक एकता—इन सभी को उन्होंने एक ही राष्ट्रीय परियोजना का हिस्सा बताया। उनका संदेश साफ था कि आने वाले भारत की बुनियाद युवा पीढ़ी, नई तकनीक और आत्मनिर्भर क्षमता पर रखनी होगी।
लेकिन विकसित भारत का रास्ता सिर्फ तकनीक और आर्थिक विकास से नहीं बनेगा। उसे सामाजिक विश्वास, संस्थाओं की मजबूती, रोजगार, शिक्षा और लोकतांत्रिक संवाद की भी जरूरत होगी। अगर देश की युवा पीढ़ी को भविष्य का निर्माता बनाना है तो उसे केवल कौशल नहीं, सवाल पूछने की आजादी और अपनी बात रखने का लोकतांत्रिक भरोसा भी देना होगा।
इस लिहाज से 80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी का भाषण दो अलग-अलग संदेशों को एक साथ सामने रखता है। पहला संदेश भविष्य की ओर देखने वाला है—AI, कौशल, युवा शक्ति और विकसित भारत का। दूसरा संदेश सुरक्षा और वैचारिक चुनौती से जुड़ा है- ‘दिमागी नक्सल’ की पहचान और उसे अलग-थलग करने का।
अब देखना यह होगा कि आने वाले वर्षों में सरकार इन दोनों संदेशों को किस तरह जमीन पर उतारती है। एक करोड़ युवाओं को AI का प्रशिक्षण मिलता है या नहीं, गरीब और मध्यमवर्गीय युवाओं के लिए मुफ्त कोचिंग वास्तव में कितनी पहुंच बनाती है, रोजगार के कितने अवसर पैदा होते हैं और ‘दिमागी नक्सल’ जैसी अवधारणा का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है। इन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि लाल किले से दिया गया यह संदेश केवल स्वतंत्रता दिवस का भाषण था या आने वाले राजनीतिक दौर की दिशा का संकेत भी।
80 साल की आजादी के बाद लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को विकसित भारत का सपना दिखाया है। लेकिन उस सपने की सबसे बड़ी परीक्षा भाषण में नहीं, उसके बाद की जमीन पर होगी जहां युवा नौकरी मांगेंगे, छात्र अवसर मांगेंगे, नागरिक जवाबदेही मांगेंगे और लोकतंत्र सरकार से सवाल पूछेगा। यही वह कसौटी होगी जिस पर 2047 के विकसित भारत का दावा भी परखा जाएगा।
सिविल डिफेंस नेटवर्क बनाने की घोषणा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय सुरक्षा की बदलती तस्वीर की ओर भी देश का ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में खतरे सिर्फ सीमा पर दिखाई देने वाले पारंपरिक युद्ध तक सीमित नहीं रहेंगे। ऐसे में देश को ऐसी सिविल डिफेंस व्यवस्था की जरूरत है जो आधुनिक दौर की चुनौतियों का सामना कर सके। प्रधानमंत्री ने आने वाले दिनों में एक आधुनिक और व्यापक सिविल डिफेंस नेटवर्क तैयार करने की घोषणा की। प्रधानमंत्री के इस ऐलान का महत्व इसलिए भी है क्योंकि उन्होंने सिविल डिफेंस को महज युद्धकालीन व्यवस्था के बजाय बदलते सुरक्षा परिदृश्य से जोड़कर देखा।
मौजूदा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा उस दौर की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित हुआ था, जब खतरे मुख्य रूप से पारंपरिक युद्ध और सीमा पर होने वाले हमलों से जुड़े माने जाते थे। अब चुनौती का दायरा कहीं बड़ा है। महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, औद्योगिक प्रतिष्ठान, ऊर्जा व्यवस्था, बैंकिंग और डेटा से जुड़े केंद्र जैसे क्षेत्र भी किसी संकट की स्थिति में प्रभावित हो सकते हैं। यानी प्रधानमंत्री का संदेश साफ है- राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ सेना और सुरक्षा बलों तक सीमित नहीं रह सकती। नागरिकों की सुरक्षा और संकट के समय उनकी तैयारी भी राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा होगी।
इसी सोच के तहत सरकार एक ऐसे स्वयंसेवी नेटवर्क को आधुनिक रूप देने की दिशा में बढ़ना चाहती है, जो नए दौर की आपात स्थितियों और संकटों में नागरिक सुरक्षा को मजबूत कर सके। यह घोषणा प्रधानमंत्री के भाषण में सुरक्षा के बदलते चरित्र को समझने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। एक तरफ मोदी ‘हथियारी नक्सल’ और ‘दिमागी नक्सल’ की बात करते हैं, दूसरी तरफ सिविल डिफेंस को आधुनिक बनाने की घोषणा करते हैं। यानी उनके भाषण में राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ सिर्फ सीमा की रक्षा नहीं, बल्कि देश के भीतर सामाजिक स्थिरता, महत्वपूर्ण ढांचे की सुरक्षा और किसी भी आकस्मिक संकट से निपटने की क्षमता बढ़ाना भी है।
आधुनिक सिविल डिफेंस नेटवर्क कितना व्यापक होगा, उसमें आम नागरिकों और स्वयंसेवकों की भूमिका क्या होगी, प्रशिक्षण और संसाधनों की व्यवस्था कैसे होगी और केंद्र तथा राज्यों के बीच इसका समन्वय किस तरह किया जाएगा- इन सभी सवालों के जवाब इस योजना की वास्तविक प्रभावशीलता तय करेंगे। इस घोषणा को प्रधानमंत्री के उस व्यापक संदेश से भी जोड़कर देखा जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा कि भारत को भविष्य के खतरों के लिए आज से तैयार होना होगा। विकसित भारत का मतलब उनके भाषण में सिर्फ आर्थिक ताकत और तकनीकी क्षमता नहीं है, बल्कि ऐसा देश भी है जो संकट के समय अपने नागरिकों और महत्वपूर्ण संस्थानों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। यही वजह है कि सिविल डिफेंस का मुद्दा इस बार लाल किले के भाषण में एक अलग और महत्वपूर्ण स्थान लेकर सामने आया है।




