पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि सत्ता हाथ से निकल जाने के बावजूद उनकी राजनीतिक लड़ाई खत्म नहीं हुई है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने सोमवार को फेसबुक लाइव के जरिए कहा कि वह राजनीति से संन्यास नहीं लेने वाली और भाजपा को हाशिए पर धकेलने तक उनकी लड़ाई जारी रहेगी। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब बंगाल में भाजपा सरकार के गठन को करीब चार महीने हो चुके हैं और ममता बनर्जी विपक्ष की भूमिका में हैं।
ममता का यह ताजा बयान महज राजनीतिक संकल्प नहीं है। इसके पीछे बंगाल की बदली हुई सत्ता-व्यवस्था और तृणमूल कांग्रेस के सामने खड़ी नई चुनौती को समझना जरूरी है। 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 207 सीटों के साथ सत्ता हासिल की, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई। करीब डेढ़ दशक तक बंगाल की सत्ता पर काबिज रही ममता बनर्जी के लिए यह सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों के बड़े बदलाव का संकेत था। अब ममता जिस भाषा का इस्तेमाल कर रही हैं, उसमें एक तरफ संघर्ष की घोषणा है तो दूसरी तरफ अपने पुराने राजनीतिक हथियारों को नए संदर्भ में इस्तेमाल करने की कोशिश भी दिखाई देती है।
‘संन्यास नहीं’- ममता का संदेश किसके लिए?
ममता बनर्जी का राजनीति से संन्यास नहीं लेने का ऐलान सबसे पहले उनके अपने संगठन के लिए संदेश है। लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद विपक्ष में पहुंच चुकी तृणमूल कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को सक्रिय और एकजुट बनाए रखने की है। सत्ता से बाहर होने के बाद किसी भी क्षेत्रीय दल के सामने यह खतरा रहता है कि उसके नेता और कार्यकर्ता सत्ता के साथ खिसकने लगें। ऐसे में ममता का यह कहना कि वह लड़ाई जारी रखेंगी, तृणमूल के लिए राजनीतिक मनोबल बनाए रखने की कोशिश भी है।
लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण उनका यह दावा है कि भाजपा को बंगाल में सत्ता मिलने के सिर्फ चार महीने बाद ही जनता उसके ‘असली चेहरे’ को समझ चुकी है। यह दरअसल आने वाले वर्षों की राजनीति के लिए नैरेटिव तैयार करने की कोशिश है। ममता यह संदेश देना चाहती हैं कि 2026 का चुनाव भले ही भाजपा ने जीत लिया हो, लेकिन भाजपा सरकार के प्रति जनता का मोहभंग शुरू हो चुका है। इस दावे की वास्तविक परीक्षा आने वाले चुनावों और जनमत में होगी, लेकिन राजनीतिक रूप से ममता ने अपनी लड़ाई का अगला मुद्दा तय करने की कोशिश जरूर शुरू कर दी है।
‘अन्नपूर्णा योजना’ बनाम ‘लक्ष्मी भंडार’
ममता के हमले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा महिला कल्याण योजनाओं को लेकर है। तृणमूल सरकार की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना लंबे समय तक ममता बनर्जी की राजनीति की प्रमुख पहचान रही। भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले इसी सामाजिक-कल्याण मॉडल को चुनौती देते हुए ‘अन्नपूर्णा योजना’ के तहत महिलाओं को हर महीने 3,000 रुपये देने का वादा किया था। सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने ‘अन्नपूर्णा योजना’ शुरू की और पुराने लाभार्थियों को इसमें स्थानांतरित करने का प्रावधान किया। यहीं से बंगाल की राजनीति में एक दिलचस्प स्थिति पैदा हुई है। जिस कल्याणकारी राजनीति को ममता बनर्जी ने अपने शासन की ताकत बनाया था, भाजपा अब उसी मैदान में उनसे मुकाबला कर रही है। इसलिए ममता का अन्नपूर्णा योजना को लेकर हमला केवल सरकारी भुगतान में देरी का सवाल नहीं है। इसके जरिए वह भाजपा के सबसे महत्वपूर्ण चुनावी सामाजिक आधार- महिला मतदाताओं को फिर से अपने पक्ष में लामबंद करना चाहती हैं।
ममता का आरोप है कि अयोग्यता के नाम पर लाभार्थियों की संख्या कम की जा रही है और धर्म तथा नस्ल के आधार पर लाभ दिया जा रहा है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है, लेकिन राजनीतिक संदेश स्पष्ट है—तृणमूल भाजपा सरकार को यह बताने की कोशिश कर रही है कि महिलाओं के लिए शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं का लाभ चुनावी वादे के मुताबिक नहीं मिल रहा। जुलाई में तृणमूल ने भी दावा किया था कि अन्नपूर्णा योजना के लाभार्थियों की संख्या में बड़ी कमी आई है। दूसरी ओर सरकारी दस्तावेजों में योजना के लिए पात्रता और लाभार्थियों के सत्यापन की प्रक्रिया का उल्लेख है। इसलिए इस मुद्दे का अगला राजनीतिक चरण आरोपों से ज्यादा आंकड़ों और वास्तविक लाभार्थियों के अनुभव पर निर्भर करेगा।
ममता ने क्यों उठाया NRC का मुद्दा?
ममता बनर्जी ने जनगणना प्रक्रिया को भी NRC से जोड़ते हुए सवाल उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक दलों से सलाह लिए बिना ऐसी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है, जो आगे चलकर NRC लागू करने का रास्ता खोल सकती है। बंगाल की राजनीति में यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है। सीमा से सटे राज्य में नागरिकता, घुसपैठ, मतदाता सूची और पहचान की राजनीति लंबे समय से चुनावी विमर्श का हिस्सा रही है।
भाजपा जहां अवैध घुसपैठ और नागरिकता के सवाल को राजनीतिक मुद्दा बनाती रही है, वहीं ममता बनर्जी इस पूरी प्रक्रिया को नागरिक अधिकारों और मतदाता अधिकारों के संदर्भ में देखती हैं। अब जब भाजपा सत्ता में है, वही मुद्दे ममता के लिए विपक्षी राजनीति के महत्वपूर्ण हथियार बन सकते हैं। विशेष रूप से मतदाता सूची के पुनरीक्षण और नागरिकता से जुड़े सवालों को लेकर ममता पहले भी आक्रामक रही हैं। सोमवार के बयान में भी उन्होंने मतदाता सूची से कथित तौर पर नाम हटाए जाने का मुद्दा उठाने और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही।
ममता के सामने असली चुनौती क्या है?
हालांकि ममता का तेवर पुराना और संघर्षशील है, लेकिन राजनीतिक परिस्थिति अब पहले जैसी नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भाजपा अब बंगाल में विपक्ष नहीं, सत्ता में है। यानी जिस सरकार के खिलाफ ममता आंदोलन और राजनीतिक संघर्ष करती थीं, अब उसकी नीतियों और कामकाज पर उन्हें विपक्ष के नेता के रूप में लगातार नजर रखनी होगी।
दूसरी चुनौती महिला मतदाताओं की है। ‘लक्ष्मी भंडार’ के जरिए तृणमूल ने जिस बड़े महिला वोट बैंक को मजबूत किया था, भाजपा ने ‘अन्नपूर्णा’ के जरिए उसी वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की है। भाजपा सरकार के बजट में भी महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर खर्च का प्रावधान किया गया है।
तीसरी चुनौती संगठन की है। 15 साल सत्ता में रहने के बाद विपक्ष में आने पर तृणमूल को अपनी राजनीति का चरित्र बदलना होगा। अब सिर्फ सरकार की योजनाओं का प्रचार पर्याप्त नहीं होगा। उसे सरकार की कमियों को जमीन पर मुद्दा बनाना होगा और जनता के बीच लगातार मौजूद रहना होगा।
कहीं वापसी की पटकथा तो नहीं लिख रहीं ममता?
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ममता बनर्जी ने भाजपा सरकार के खिलाफ जनता का मूड बदल दिया है। लेकिन इतना जरूर है कि उन्होंने अपनी राजनीतिक दिशा स्पष्ट कर दी है। उनकी रणनीति तीन स्तरों पर दिखाई देती है- सरकार की कल्याणकारी योजनाओं पर सवाल, नागरिकता और मतदाता सूची के मुद्दे पर संघर्ष और भाजपा के खिलाफ राजनीतिक ध्रुवीकरण। यानी ममता अब सत्ता की राजनीति से ज्यादा ‘विरोध की राजनीति’ को अपनी ताकत बनाना चाहती हैं।
बंगाल की राजनीति में ममता की सबसे बड़ी ताकत उनका सड़क से जुड़ा राजनीतिक चरित्र रहा है। सत्ता में रहते हुए भी उन्होंने खुद को संघर्षशील नेता की छवि से अलग नहीं होने दिया। अब विपक्ष में आने के बाद वही छवि उनके लिए फिर से राजनीतिक पूंजी बन सकती है। लेकिन इस बार चुनौती पहले से कठिन है। भाजपा ने बंगाल में सिर्फ सरकार नहीं बनाई है, बल्कि उस राजनीतिक दुर्ग को तोड़ा है जिसे ममता बनर्जी ने 2011 से अपने कब्जे में रखा था। इसलिए ममता की लड़ाई सिर्फ भाजपा सरकार से नहीं है; यह अपनी पार्टी, अपने पुराने सामाजिक गठजोड़ और अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता को फिर से मजबूत करने की लड़ाई भी है।
देखा जाए तो ममता का ‘संन्यास नहीं’ वाला बयान इसी बड़े राजनीतिक संघर्ष की घोषणा है। सवाल यह नहीं है कि ममता बनर्जी राजनीति में रहेंगी या नहीं। असल सवाल यह है कि क्या वह विपक्ष में रहते हुए उस ममता को फिर से खड़ा कर पाएंगी, जिसने कभी बंगाल की राजनीति में वाम मोर्चे की तीन दशक पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंका था? बंगाल की अगली राजनीति का असली मुकाबला शायद इसी सवाल का जवाब तय करेगी।




