H-1B वीजा पर ट्रंप का नया वार : अब अमेरिका जाने के लिए चुकाने पड़ेंगे 98 लाख!

ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा की नई अर्जी पर $1,03,265 यानी करीब 98 लाख रुपये का शुल्क प्रस्तावित किया है। भारतीय IT पेशेवरों और अमेरिकी कंपनियों दोनों पर पड़ेगा असर, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह प्रतिभा को रोक पाएगा या अमेरिकी उद्योग को ही महंगा पड़ेगा?

नई दिल्ली/वॉशिंगटन। अमेरिका में नौकरी का सपना देखने वाले दुनिया भर के कुशल पेशेवरों के लिए H-1B वीजा पहले ही आसान रास्ता नहीं था। अब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन इसे आर्थिक रूप से भी बेहद कठिन बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने सोमवार को एक नया प्रस्ताव जारी किया है, जिसके तहत नई H-1B वीजा याचिकाओं पर $1,03,265 यानी करीब 98 लाख रुपये का शुल्क लगाया जा सकता है। यह रकम मौजूदा सामान्य शुल्कों की तुलना में असाधारण रूप से बड़ी छलांग है।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। यह अभी प्रस्ताव है, अंतिम नियम नहीं। प्रस्ताव के प्रकाशित होने के बाद 30 दिनों तक सार्वजनिक टिप्पणियां ली जाएंगी और उसके बाद प्रशासन अंतिम नियम जारी कर सकता है। यानी फिलहाल इसे हर नए H-1B आवेदक से निश्चित रूप से वसूली जाने वाली रकम कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन अगर यह प्रस्ताव अंतिम रूप लेता है तो इसका असर केवल अमेरिका जाने वाले विदेशी कर्मचारियों पर नहीं पड़ेगा। इसका सीधा असर उन अमेरिकी कंपनियों पर भी होगा जो भारत समेत दुनिया के दूसरे देशों से इंजीनियर, IT विशेषज्ञ, शोधकर्ता और अन्य उच्च-कुशल पेशेवरों को नियुक्त करती हैं।

$5 हजार से सीधे $1 लाख डॉलर से ज्यादा!

H-1B वीजा अमेरिका में विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को रोजगार देने के लिए इस्तेमाल होता है। तकनीकी कंपनियों से लेकर स्वास्थ्य, वित्त, शिक्षा और शोध क्षेत्र तक इसकी जरूरत पड़ती है। मौजूदा व्यवस्था में सामान्य तौर पर इससे जुड़े शुल्क कुछ हजार डॉलर के स्तर पर रहे हैं, हालांकि अलग-अलग परिस्थितियों में कुल लागत बदल सकती है। अब प्रस्तावित $1,03,265 शुल्क इस पूरी व्यवस्था की अर्थव्यवस्था को ही बदल सकता है। रॉयटर्स के अनुसार पहले H-1B से जुड़े शुल्क आम तौर पर लगभग $2,000 से $5,000 के दायरे में रहे हैं। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अमेरिका ने शुल्क बढ़ाया है। सवाल यह है कि क्या H-1B को इतना महंगा बनाया जा रहा है कि कंपनियां विदेशी प्रतिभा को नियुक्त करने से पहले कई बार सोचें? यही ट्रंप प्रशासन की नीति का मूल उद्देश्य भी दिखाई देता है।

ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का अगला अध्याय

ट्रंप और उनके समर्थकों का तर्क रहा है कि H-1B कार्यक्रम का इस्तेमाल कुछ कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की जगह अपेक्षाकृत सस्ते विदेशी श्रम को रखने के लिए करती हैं। प्रशासन का कहना है कि अमेरिकी कंपनियों को पहले अमेरिकी प्रतिभाओं को अवसर देना चाहिए और विदेशी कर्मचारियों को तभी लाया जाना चाहिए जब उनकी वास्तविक जरूरत हो। यही सोच ट्रंप की व्यापक ‘America First’ नीति से जुड़ती है। इस नीति में व्यापार से लेकर आव्रजन और रोजगार तक एक ही मूल संदेश दिखाई देता है- अमेरिकी बाजार और अमेरिकी नौकरियों में अमेरिकी नागरिकों को प्राथमिकता।

लेकिन समस्या यह है कि आधुनिक अमेरिकी अर्थव्यवस्था केवल अमेरिकी प्रतिभा के भरोसे नहीं चलती। सिलिकॉन वैली से लेकर विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों तक अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से वैश्विक प्रतिभा पर निर्भर रही हैं। इसलिए H-1B पर कठोरता का असर दो तरफा हो सकता है। एक तरफ विदेशी कर्मचारियों की संख्या कम हो सकती है, दूसरी तरफ अमेरिकी कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।

भारत के लिए क्यों है यह बड़ी खबर?

H-1B कार्यक्रम भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अमेरिकी तकनीकी और अन्य उच्च-कौशल क्षेत्रों में काम करते हैं।अमेरिकी प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार H-1B के लिए पिछले वर्ष लगभग 3.44 लाख पंजीकरण हुए, जो 2024 की तुलना में 25 प्रतिशत से अधिक कम थे और 2023 में दर्ज लगभग 7.94 लाख पंजीकरणों के आधे से भी कम थे। यह गिरावट बताती है कि अमेरिकी आव्रजन नीति में बदलाव का असर पहले से दिखाई देने लगा है। अब यदि $1 लाख से अधिक का नया शुल्क स्थायी रूप से लागू होता है तो भारतीय IT कंपनियों, अमेरिकी नियोक्ताओं और विदेश में अवसर तलाशने वाले भारतीय पेशेवरों के लिए स्थिति और कठिन हो सकती है। खासकर छोटे और मध्यम आकार के अमेरिकी नियोक्ताओं के लिए यह सवाल गंभीर होगा कि क्या वे एक कर्मचारी के H-1B आवेदन पर ही इतनी बड़ी अतिरिक्त रकम खर्च करने को तैयार होंगे।

क्या यह शुल्क कर्मचारी देगा?

यहां भी भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। H-1B प्रक्रिया में आवेदन सामान्यतः अमेरिकी नियोक्ता की ओर से होता है। इसलिए प्रस्तावित $1,03,265 शुल्क को सीधे किसी भारतीय कर्मचारी द्वारा अपनी जेब से भुगतान की जाने वाली ‘वीजा फीस’ समझना सही नहीं होगा। असल आर्थिक बोझ नियोक्ता पर पड़ेगा। लेकिन उसका अप्रत्यक्ष असर कर्मचारी पर पड़ सकता है- कंपनी विदेशी कर्मचारी को नियुक्त करने से पीछे हट सकती है, वेतन और नियुक्ति की शर्तें प्रभावित हो सकती हैं या कंपनियां अमेरिका के बजाय दूसरे देशों में प्रतिभा तलाश सकती हैं। यानी फीस कंपनी दे, लेकिन असर कर्मचारी और पूरी वैश्विक रोजगार व्यवस्था पर पड़ सकता है।

पहले भी लगाया गया था $100,000 शुल्क

ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में नए H-1B आवेदनों पर $100,000 का शुल्क लागू करने की घोषणा की थी। अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा (USCIS) ने स्पष्ट किया था कि यह व्यवस्था 21 सितंबर 2025 के बाद दाखिल कुछ नई H-1B याचिकाओं पर लागू होगी। मौजूदा वैध H-1B वीजाधारकों पर यह उसी तरह लागू नहीं थी।
अब DHS ने उस असाधारण शुल्क को एक औपचारिक नियामकीय व्यवस्था के जरिए स्थायी रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाया है। रॉयटर्स के मुताबिक 2025 की राष्ट्रपति उद्घोषणा सितंबर 2026 में समाप्त होने वाली थी और उसमें प्रशासन को शुल्क को नियम के रूप में लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने का निर्देश दिया गया था। इसलिए सोमवार का प्रस्ताव अचानक आया फैसला नहीं, बल्कि ट्रंप प्रशासन की पिछले साल शुरू हुई H-1B नीति का अगला चरण है।

अदालत में फिर पहुंच सकता है मामला

इस प्रस्ताव के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ उद्योग जगत का विरोध नहीं, बल्कि कानूनी लड़ाई भी हो सकती है। पिछले $100,000 शुल्क को लेकर अदालतों में चुनौती दी गई थी। एक संघीय न्यायाधीश ने जून में प्रशासन के शुल्क को अवैध मानते हुए उसे रोक दिया था। मामला अपील की अदालतों में भी पहुंचा है। विरोध करने वाले संगठनों का तर्क है कि राष्ट्रपति के पास आव्रजन को नियंत्रित करने की शक्तियां जरूर हैं, लेकिन कांग्रेस की अनुमति के बिना इतनी बड़ी रकम को अनिवार्य शुल्क के रूप में लागू करने का अधिकार सवालों के घेरे में है।

दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह पारंपरिक अर्थों में टैक्स नहीं है और राष्ट्रपति को देश में प्रवेश की शर्तें निर्धारित करने की व्यापक शक्ति प्राप्त है। यानी आने वाले महीनों में यह मामला सिर्फ आव्रजन नीति का नहीं, बल्कि राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियों की सीमा का संवैधानिक सवाल भी बन सकता है।

अमेरिका खुद के लिए पैदा कर रहा मुश्किल

यही इस पूरी नीति का सबसे दिलचस्प पहलू है। ट्रंप प्रशासन का लक्ष्य अमेरिकी नौकरियों की रक्षा करना है। लेकिन अमेरिकी कंपनियां कहती रही हैं कि कुछ क्षेत्रों में उन्हें ऐसे कुशल कर्मचारियों की जरूरत होती है जिन्हें घरेलू स्तर पर पर्याप्त संख्या में उपलब्ध कराना आसान नहीं है। H-1B कार्यक्रम का इस्तेमाल केवल IT नौकरियों के लिए नहीं होता। तकनीक, शोध, स्वास्थ्य, वित्त और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी विदेशी विशेषज्ञों की भूमिका है।

अगर शुल्क इतना अधिक हो जाता है कि कंपनियां विदेशी प्रतिभा को नियुक्त करना बंद कर दें तो इससे अमेरिकी श्रमिकों को फायदा मिल सकता है लेकिन दूसरी स्थिति भी पैदा हो सकती है। कंपनियां अपना शोध और विकास केंद्र दूसरे देशों में बढ़ा सकती हैं। अमेरिका के बाहर से प्रतिभा को नियुक्त कर सकती हैं। या फिर वैश्विक स्तर पर ऐसी जगहों का रुख कर सकती हैं जहां उच्च-कुशल कर्मचारियों को नियुक्त करना कम महंगा हो। इसलिए H-1B पर कठोरता का अंतिम परिणाम उतना सीधा नहीं है जितना पहली नजर में दिखाई देता है।

भारतीय IT सेक्टर के लिए संकेत

भारत की IT कंपनियों के लिए अमेरिका लंबे समय से सबसे बड़ा बाजार रहा है। ऐसे में अमेरिकी वीजा नीति में कोई भी बड़ा बदलाव भारतीय कंपनियों के बिजनेस मॉडल को प्रभावित कर सकता है। हालांकि कंपनियां पिछले कुछ वर्षों में स्थानीय अमेरिकी नियुक्तियां बढ़ाने, डिजिटल डिलीवरी और दूसरे देशों से काम कराने की दिशा में आगे बढ़ी हैं। इसलिए H-1B शुल्क में वृद्धि का मतलब यह नहीं कि भारतीय IT उद्योग अचानक संकट में आ जाएगा। लेकिन लागत का दबाव बढ़ना तय है।

कंपनियों को यह तय करना होगा कि किस कर्मचारी को अमेरिका भेजना आर्थिक रूप से उचित है और किस काम को भारत या किसी दूसरे देश से किया जा सकता है। इस तरह ट्रंप की H-1B नीति अमेरिकी सीमा से बहुत आगे जाकर भारत के IT रोजगार मॉडल और वैश्विक तकनीकी श्रम बाजार को भी प्रभावित कर सकती है।

ट्रंप का संदेश साफ है, लेकिन परिणाम अनिश्चित

H-1B पर प्रस्तावित $1,03,265 शुल्क ट्रंप प्रशासन के लिए सिर्फ राजस्व जुटाने का उपाय नहीं दिखाई देता। इसका राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट है कि अमेरिका में विदेशी श्रमिकों की नियुक्ति को महंगा और अधिक चयनात्मक बनाया जाए तथा अमेरिकी श्रमिकों को प्राथमिकता दी जाए। लेकिन अर्थव्यवस्था राजनीति से ज्यादा जटिल होती है। अमेरिका यदि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा को आकर्षित करने वाली अर्थव्यवस्था बना रहना चाहता है तो उसे यह भी देखना होगा कि आव्रजन नीति इतनी कठोर न हो जाए कि प्रतिभाशाली पेशेवर दूसरे देशों का रुख करने लगें।

दूसरी ओर, भारत जैसे देशों के लिए यह संकेत है कि केवल अमेरिका पर निर्भर वैश्विक रोजगार मॉडल को बदलते समय के साथ नए विकल्पों की जरूरत होगी। H-1B पर 98 लाख रुपये का प्रस्ताव सिर्फ एक वीजा शुल्क नहीं है। यह ट्रंप की उस आर्थिक और आव्रजन सोच का प्रतीक है जिसमें ‘अमेरिका पहले’ का अर्थ अब विदेशी प्रतिभा की कीमत तय करना भी बन गया है।

अब देखना यह है कि सार्वजनिक टिप्पणियों, अदालतों और अमेरिकी उद्योग के दबाव के बाद यह प्रस्ताव इसी रूप में कानून बनता है या इसमें बदलाव होता है। फिलहाल इतना तय है कि अमेरिका का H-1B दरवाजा बंद नहीं हुआ है, लेकिन उसके दरवाजे की कीमत असाधारण रूप से बढ़ाने की कोशिश जरूर शुरू हो गई है।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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