नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इस्तीफे की मांग और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहा विरोध आंदोलन सोमवार, 12 अक्टूबर को एक नए मोड़ पर पहुंच गया। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों के नेताओं तथा समर्थकों ने दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया। SIR में गड़बड़ी के खिलाफ विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दाखिल की है, उसमें राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव समेत 11 विपक्षी नेता याचिकाकर्ता हैं। याचिका में मांग की गई है कि चुनाव आयोग के कामकाज, मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़े सवालों की जांच हो।
हालांकि दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेडिंग कर दी थी और मध्य दिल्ली के कई मेट्रो स्टेशन भी बंद कर दिए गए थे, बावजूद इसके विपक्षी नेताओं ने अपना विरोध जारी रखा और उनके वकीलों ने अदालत में याचिका दाखिल की। यह मार्च उस विरोध प्रदर्शन के बाद हुआ, जिसमें सप्ताहांत के दौरान दिल्ली में हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया था। प्रदर्शन का नेतृत्व युवा आंदोलन कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और छात्र संगठनों से जुड़े लोग कर रहे थे। उनकी प्रमुख मांग मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा थी।
तमाम विपक्षी दलों ने भी इस आंदोलन को समर्थन दिया और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर सरकार तथा चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। सोमवार को दिल्ली की सड़कों पर विपक्षी नेताओं की मौजूदगी ने इस विवाद को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया। विवाद की जड़ एसआईआर के तहत मतदाता सूचियों में किया जा रहा बदलाव है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस प्रक्रिया के दौरान विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए हैं। हालांकि, इन नामों में मृत मतदाता, दूसरे स्थानों पर जा चुके लोग और सत्यापन के दौरान नहीं मिल पाए मतदाता भी शामिल बताए गए हैं। इसलिए सभी हटाए गए नामों को पात्र मतदाताओं के नाम मान लेना सही नहीं होगा।
विपक्ष और नागरिक संगठनों का मुख्य सवाल यह है कि क्या इस व्यापक प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम भी अनुचित ढंग से हटाए गए हैं और क्या प्रत्येक मामले में पर्याप्त पारदर्शिता तथा शिकायत निवारण की व्यवस्था रही है। विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों का आरोप है कि एसआईआर की प्रक्रिया ने मतदाताओं के अधिकारों को प्रभावित किया है और इसका राजनीतिक लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि मुस्लिम मतदाताओं तथा अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर इसका असमान प्रभाव पड़ा है।
चुनाव आयोग ने किसी राजनीतिक दल के पक्ष में काम करने के आरोपों को खारिज किया है। उसका कहना है कि पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूचियों को दुरुस्त करना और गलत प्रविष्टियों को हटाना है। भाजपा ने भी विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाकर विपक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा रहा है।
मार्च से पहले राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी सरकार चुनाव आयोग का इस्तेमाल चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए कर रही है। उन्होंने इसे ‘वोट चोरी’ करार दिया और मुख्य चुनाव आयुक्त पर तीखे आरोप लगाए। राहुल गांधी ने युवा प्रदर्शनकारियों के आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि जब तक संविधान की रक्षा, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने, चुनावी व्यवस्था में बदलाव और न्याय की मांग पूरी नहीं होती, तब तक युवा पीछे नहीं हटेंगे। ये राहुल गांधी और विपक्ष के आरोप हैं; इनके संबंध में अंतिम निष्कर्ष संबंधित तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
सोमवार के मार्च में पुलिस की बैरिकेडिंग ने भी विवाद को बढ़ाया। मध्य दिल्ली में कई मेट्रो स्टेशन बंद किए गए और सुप्रीम कोर्ट की ओर जाने वाले रास्तों पर भारी सुरक्षा व्यवस्था की गई। प्रदर्शनकारियों को अदालत से लगभग 600 मीटर पहले रोक दिया गया, जिसके बाद कई लोग लौटने को मजबूर हुए। हालांकि, विपक्ष की ओर से दाखिल याचिका अदालत तक पहुंच गई। इस घटनाक्रम ने एक अहम सवाल खड़ा किया है: जब नागरिकों और राजनीतिक दलों को किसी संवैधानिक संस्था के कामकाज पर गंभीर आपत्ति हो, तो उनकी शिकायतों को उचित मंच तक पहुंचाने की प्रक्रिया कितनी सहज होनी चाहिए? सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध और शिकायत दर्ज कराने के अधिकार का सम्मान भी उतना ही जरूरी है।
इस आंदोलन में तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने भी हिस्सा लिया। उन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में उनके निर्वाचन क्षेत्र से 10,000 से अधिक मतदाताओं के नाम अनुचित ढंग से हटाए गए हैं। यह उनका आरोप है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित मतदाता सूची और आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच जरूरी होगी। मोइत्रा ने विरोध जारी रखने की बात कही और पुलिस कार्रवाई की आलोचना की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उनके बयान से स्पष्ट है कि विपक्ष का एक हिस्सा इस विवाद को केवल चुनाव आयोग के प्रशासनिक फैसलों तक सीमित नहीं मान रहा, बल्कि इसे मताधिकार और संस्थागत जवाबदेही के व्यापक सवाल के रूप में पेश कर रहा है।
एसआईआर को लेकर विपक्ष की नाराजगी हाल के दिनों में तेज हुई है। चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं पर पहले भी सवाल उठाए जा रहे थे, लेकिन मीडिया रिपोर्टों में सामने आए विवरणों ने विवाद को और व्यापक बनाया। विपक्षी गठबंधन की याचिका में मतदाता सूचियों से नाम हटाने की प्रक्रिया, चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने के तरीके और चुनावी आंकड़ों की विश्वसनीयता जैसे मुद्दे उठाए गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, याचिका में हटाए गए नामों का स्वतंत्र ऑडिट कराने और यह जांचने की मांग भी शामिल है कि महत्वपूर्ण फैसले निर्धारित प्रक्रियाओं के मुताबिक लिए गए या नहीं।
इस पूरे घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है कि विपक्षी दल लंबे समय से चुनावी निष्पक्षता को लेकर सरकार और चुनाव आयोग पर सवाल उठाते रहे हैं। एसआईआर विवाद ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को साझा मुद्दे पर एक मंच पर आने का अवसर दिया है। वहीं, सरकार और भाजपा का पक्ष है कि मतदाता सूचियों को साफ-सुथरा बनाना जरूरी है और राजनीतिक दलों को वैध चुनावी प्रक्रियाओं पर संदेह पैदा नहीं करना चाहिए। इस तरह बहस दो अलग-अलग दावों के बीच खड़ी है- एक ओर मतदाता सूची की शुद्धता और दूसरी ओर यह सुनिश्चित करने की जरूरत कि शुद्धिकरण के नाम पर किसी पात्र नागरिक का मताधिकार प्रभावित न हो।
सीजेपी और छात्र संगठनों ने भी विरोध जारी रखने के संकेत दिए हैं। आंदोलन के नेताओं ने सोमवार को दिल्ली पुलिस से संपर्क कर बिना बाधा प्रदर्शन करने के लिए तारीख और अनुमति मांगी। उनका कहना है कि यदि उन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलती, तो समर्थक फिर सड़कों पर उतरेंगे। सप्ताहांत में हुई हिरासतों और पुलिस कार्रवाई के बाद यह सवाल और अहम हो गया है कि राजधानी में विरोध दर्ज कराने के लिए उपलब्ध सार्वजनिक स्थानों और प्रशासनिक अनुमति की व्यवस्था किस तरह काम कर रही है।
अब इस विवाद का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव न्यायिक प्रक्रिया है। विपक्ष की मांग है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं की जांच हो, हटाए गए नामों के रिकॉर्ड की समीक्षा की जाए और चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। दूसरी ओर, चुनाव आयोग और भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया का बचाव कर रहे हैं। इस स्थिति में जरूरी है कि विवाद का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर सत्यापित आंकड़ों, पारदर्शी प्रक्रिया और निष्पक्ष जांच के जरिए हो।
मतदाता सूची केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है। वह नागरिक के उस अधिकार का आधार है जिसके जरिए वह लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी भागीदारी दर्ज कराता है। इसलिए किसी नाम को हटाने का फैसला जितना नियमसम्मत होना चाहिए, उतना ही जरूरी है कि गलती की स्थिति में उसे ठीक करने का रास्ता भी स्पष्ट और सुलभ हो। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का भरोसा इसी पर निर्भर करेगा कि उठाए गए सवालों के जवाब कितनी पारदर्शिता से दिए जाते हैं और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।




