विरोध की आवाज को रोकना मुश्किल हो तो क्या उस जगह को ही बदल दिया जाए, जहां से यह आवाज सत्ता के दरवाजे तक पहुंचती है? दिल्ली में जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने के फैसले ने जनता के समाने कुछ ऐसा ही सवाल खड़ा कर दिया है। जिस जंतर-मंतर पर दशकों से किसान, छात्र, कर्मचारी, सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक संगठन अपनी मांगों के साथ जुटते रहे हैं, अब वहां प्रदर्शन आयोजित करने की पहले जैसी आधिकारिक व्यवस्था नहीं रहेगी।
दिल्ली पुलिस ने इसकी जगह रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को प्रदर्शन के लिए निर्धारित किया है। पुलिस का कहना है कि यह फैसला केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है। लेकिन फैसले का समय और उसके पीछे की परिस्थितियां इसे महज जगह बदलने का प्रशासनिक मामला मानकर छोड़ देने की इजाजत नहीं देतीं।
यह फैसला ऐसे समय आया है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर दिल्ली में विरोध तेज है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), छात्र संगठनों और विपक्षी दलों के प्रदर्शनकारी चुनाव आयोग की निष्पक्षता तथा मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के मुद्दे पर सवाल उठा रहे हैं। पिछले दिनों प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोकने के लिए बैरिकेडिंग की गई, बड़े पैमाने पर हिरासतें हुईं और राजधानी के कई इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई। इसी घटनाक्रम के बीच जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की आधिकारिक सूची से हटाने का फैसला सामने आया। इससे यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि विरोध के अधिकार को सुरक्षित रखने और उसे नियंत्रित करने के बीच प्रशासन किस तरह संतुलन बना रहा है।
दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार के आदेश में कहा गया है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नागरिकों के विरोध और प्रदर्शन के अधिकार के लिए मौजूदा निर्धारित स्थल के विकल्प तलाशने के उद्देश्य से एक समिति गठित की थी। समिति की सिफारिशों के आधार पर जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित व्यवस्था से हटा दिया गया है और तीन नए स्थान निर्धारित किए गए हैं। प्रशासन की ओर से इसे वैकल्पिक स्थलों की व्यवस्था के रूप में पेश किया गया है। लेकिन विरोध प्रदर्शन के मामले में सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कोई जगह उपलब्ध करा दी गई है। यह भी देखना होगा कि वह जगह कहां है, वहां तक पहुंचना कितना आसान है, वहां प्रदर्शन आयोजित करने की शर्तें क्या हैं और क्या वहां से उठने वाली आवाज उतनी ही प्रभावी ढंग से सरकार तथा राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श तक पहुंच सकती है।
जंतर-मंतर का महत्व उसकी भौगोलिक स्थिति से भी जुड़ा है। संसद और केंद्र सरकार के प्रमुख कार्यालयों के निकट होने के कारण यह जगह विरोध और सत्ता के बीच एक प्रत्यक्ष सार्वजनिक संपर्क का माध्यम रही है। यहां प्रदर्शन करने वाले लोग केवल अपनी मांग दर्ज नहीं कराते थे; वे देश की राजनीति और मीडिया का ध्यान भी आकर्षित करते थे। किसानों से लेकर छात्रों, श्रमिक संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों तक, अनेक आंदोलनों ने इस स्थान का इस्तेमाल अपनी बात सामने रखने के लिए किया है। जंतर-मंतर की पहचान समय के साथ एक ऐसे सार्वजनिक मंच के रूप में बनी, जहां किसी मुद्दे को लेकर असंतोष रखने वाले नागरिक अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते थे। इसीलिए इसका महत्व केवल एक सड़क या निर्धारित प्रदर्शन स्थल तक सीमित नहीं है।

अब रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड को विकल्प बनाया गया है। इन स्थानों की क्षमता, सुविधाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। रामलीला मैदान भी दिल्ली में बड़े जनसमूहों और राजनीतिक रैलियों का जाना-पहचाना स्थल है। लेकिन बुराड़ी और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड की स्थिति, वहां पहुंचने की सुविधा और सत्ता के केंद्रीय संस्थानों से उनकी दूरी अलग है। किसी भी स्थल को केवल उसके आकार के आधार पर जंतर-मंतर के बराबर का विकल्प नहीं माना जा सकता। प्रदर्शन का उद्देश्य सिर्फ लोगों को एक मैदान में इकट्ठा करना नहीं होता। उसका एक उद्देश्य अपनी मांगों को सार्वजनिक करना, जिम्मेदार संस्थाओं का ध्यान आकर्षित करना और व्यापक नागरिक बहस पैदा करना भी होता है। यदि स्थान बदलने से इन उद्देश्यों को पूरा करना कठिन होता है, तो वैकल्पिक स्थल उपलब्ध होने के बावजूद विरोध की व्यावहारिक गुंजाइश प्रभावित हो सकती है।
सीजेपी के सह-संयोजक सौरव दास ने फैसले को मनमाना बताते हुए कहा कि वे इसे स्वीकार नहीं करते। उन्होंने कहा, “अब पूरा देश जंतर-मंतर बन रहा है।” यह बयान आंदोलन के उस संदेश को सामने रखता है कि किसी एक स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति समाप्त होने से असहमति खत्म नहीं हो जाएगी। सीजेपी नेता अशुतोष रांका ने भी सोशल मीडिया पर दावा किया कि वे जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की तारीख मांगने दिल्ली पुलिस के पास गए थे और लगभग आधे घंटे बाद ही स्थल को प्रदर्शन की आधिकारिक सूची से हटाने की घोषणा हो गई। कांग्रेस ने भी इस फैसले को सरकार की घबराहट का संकेत बताया। ये संबंधित नेताओं और दलों की राजनीतिक प्रतिक्रियाएं हैं; प्रशासन ने अपने आदेश में फैसला समिति की सिफारिशों पर आधारित बताया है।
इस विवाद की पृष्ठभूमि को समझने के लिए जंतर-मंतर के हालिया आंदोलनों को भी देखना जरूरी है। इस साल परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ सीजेपी के नेतृत्व में युवाओं ने लंबा आंदोलन किया था। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, 36 दिनों तक चले इस आंदोलन के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। इस घटनाक्रम ने जंतर-मंतर को युवा विरोध और सरकार पर सार्वजनिक दबाव बनाने की क्षमता के प्रतीक के रूप में स्थापित किया। अब जब इसी वर्ष चुनाव आयोग और एसआईआर को लेकर नया आंदोलन चल रहा है, तब इस स्थल की आधिकारिक स्थिति बदलने से उसके राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व पर बहस तेज होना स्वाभाविक है। हालांकि, किसी फैसले के पीछे राजनीतिक मंशा का निष्कर्ष निकालने के लिए केवल घटनाओं का समय पर्याप्त प्रमाण नहीं है। इसके लिए प्रशासन के तर्क, आदेश की शर्तों और उनके वास्तविक प्रभाव का परीक्षण जरूरी है।
जंतर-मंतर का सवाल आखिरकार इस बात से जुड़ता है कि लोकतंत्र में विरोध को कितनी जगह मिलती है। संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है। यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है; सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य संवैधानिक आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। लेकिन प्रतिबंधों का औचित्य, उनका दायरा और उनका अनुपात भी महत्वपूर्ण है। प्रशासन को यातायात, सुरक्षा और सार्वजनिक सुविधाओं की रक्षा करनी होती है, पर इन उद्देश्यों के नाम पर शांतिपूर्ण विरोध के अवसर को इस हद तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए कि अधिकार केवल कागज पर रह जाए। सुप्रीम कोर्ट भी सार्वजनिक प्रदर्शनों के नियमन और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के बीच संतुलन के सवाल पर पहले विचार कर चुका है।
यहां सबसे अहम अंतर विरोध को नियंत्रित करने और विरोध के अधिकार को प्रभावी बनाए रखने के बीच है। प्रशासन को किसी भीड़ के आकार, यातायात, सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए नियम बनाने पड़ सकते हैं। लेकिन नियमों की कसौटी यह भी होनी चाहिए कि क्या वे नागरिकों को अपनी बात रखने का वास्तविक अवसर देते हैं। यदि प्रदर्शन की अनुमति लेने की प्रक्रिया जटिल हो, निर्धारित स्थलों तक पहुंचना कठिन हो या अलग-अलग संगठनों की जरूरतों के अनुरूप जगह उपलब्ध न हो, तो नए स्थलों की घोषणा अपने आप में समस्या का समाधान नहीं होगी। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि इन तीनों स्थानों पर प्रदर्शन की अनुमति कैसे मिलेगी, कितने लोगों को जुटने की इजाजत होगी, आवेदन पर कितने समय में निर्णय होगा और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को किन शर्तों का पालन करना होगा।
एसआईआर के खिलाफ आंदोलन इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाता है। मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन उसकी निष्पक्षता, पारदर्शिता और पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार की रक्षा पर सवाल उठें तो उनका जवाब दिया जाना चाहिए। विपक्ष और नागरिक संगठनों ने मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने तथा प्रक्रिया के कथित राजनीतिक प्रभाव को लेकर आरोप लगाए हैं। चुनाव आयोग और भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हैं। इन दावों का अंतिम मूल्यांकन आंकड़ों, आधिकारिक रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच के आधार पर होना चाहिए। लेकिन इन सवालों को उठाने के लिए नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अवसर मिलना भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। किसी आरोप का सही या गलत होना एक प्रश्न है; उस पर सवाल पूछने और जवाब मांगने का अधिकार दूसरा।
सरकार और प्रशासन के लिए चुनौती यही है कि वे विरोध को केवल कानून-व्यवस्था के चश्मे से न देखें। किसी प्रदर्शन से असुविधा हो सकती है, यातायात प्रभावित हो सकता है और सुरक्षा की अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ सकती है। इन वास्तविकताओं से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन लोकतंत्र में असहमति की मौजूदगी भी एक वास्तविकता है। सरकार के लिए हर विरोध को सुविधाजनक बनाना संभव नहीं, पर उसे इस बात का भरोसा जरूर देना चाहिए कि शांतिपूर्ण विरोध को अनावश्यक रूप से हतोत्साहित नहीं किया जा रहा। पारदर्शी अनुमति प्रक्रिया, स्पष्ट नियम और सभी संगठनों के लिए समान मानदंड इस भरोसे को मजबूत कर सकते हैं।
जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का फैसला इसीलिए एक बड़े सवाल का हिस्सा है- क्या राजधानी में जनता की आवाज को सुनने के लिए ऐसे सार्वजनिक स्थान बने रहेंगे, जहां नागरिक अपनी मांगों को सत्ता और देश के सामने रख सकें? क्या नए स्थल पुराने स्थल की तरह पहुंच, दृश्यता और सार्वजनिक संवाद की सुविधा देंगे? और क्या विरोध के अधिकार की रक्षा के लिए बनाई गई नई व्यवस्था वास्तव में नागरिकों की भागीदारी आसान करेगी? इन सवालों के जवाब केवल आदेश जारी कर देने से नहीं मिलेंगे। उनका जवाब इस बात से मिलेगा कि आने वाले दिनों में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले नागरिकों के साथ व्यवहार कैसा रहता है और नई व्यवस्था कितनी पारदर्शी तथा व्यावहारिक साबित होती है।
जंतर-मंतर की पहचान किसी एक सरकार, संगठन या आंदोलन से नहीं बनी। यह उन तमाम आवाजों से बनी है जो अलग-अलग समय पर यहां पहुंचीं और अपनी मांगों को सार्वजनिक किया। उसकी जगह बदल देने से विरोध की जरूरत समाप्त नहीं हो जाती। यदि नए स्थल नागरिकों को अधिक सुविधाजनक और प्रभावी अवसर देते हैं, तो प्रशासन को यह साबित करने का अवसर मिलेगा कि उसका फैसला विरोध को सीमित करने के बजाय व्यवस्थित करने के लिए था। लेकिन यदि स्थानांतरण से प्रदर्शन करना कठिन होता है, तो इस फैसले की आलोचना और गहरी होगी।
बहरहाल, लोकतंत्र की विश्वसनीयता सिर्फ इस बात से नहीं तय होती कि सरकार कितनी कुशलता से व्यवस्था बनाए रखती है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह असहमति के लिए कितनी जगह छोड़ती है। सत्ता के करीब होने के कारण जंतर-मंतर का प्रतीकात्मक महत्व रहा है; वहां उठने वाली आवाज सीधे राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक पहुंचती थी। अब चुनौती यह है कि नई व्यवस्था में नागरिकों का विरोध केवल किसी दूरस्थ मैदान तक सीमित औपचारिक गतिविधि बनकर न रह जाए।





बहुत बढिया लिखा है .बधाई एवं आशीष