भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक, न्याय का मंदिर और सरकार की शक्तियों पर संवैधानिक नियंत्रण रखने वाली संस्था माना जाता है। लेकिन जब न्यायपालिका के भीतर से ही सरकार के साथ उसके रिश्तों, जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया और संवेदनशील मुकदमों के आवंटन को लेकर सवाल उठने लग जाए तो बहस किसी एक न्यायाधीश की कार्यशैली तक सीमित नहीं रहती। यह सवाल संस्थागत स्वतंत्रता और सत्ता के साथ न्यायपालिका के संबंधों तक पहुंच जाता है।
याद कीजिए, 12 जनवरी 2018 का वो दिन जब देश की सर्वोच्च अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों ने देश के इतिहास में पहली बार एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उस प्रेस कांफ्रेंस में कहा गया था कि हमें काम नहीं करने दिया जा रहा, हम पर गलत फैसलों के लिए दबाव बनाया जा रहा है। अब आठ साल बाद एक बार फिर इसी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल इस बात का दावा करते हैं कि किस तरह से देश का ज्यूडिशियल सिस्टम बीजेपी और आरएसएस नीत सरकार के दबाव में काम कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल ने अपनी आगामी पुस्तक Without Fear or Favour में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कौल का आरोप है कि न्यायिक नियुक्तियों के मामले में चंद्रचूड़ मोदी सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम रुख अपनाते थे। उनके मुताबिक, कॉलेजियम की औपचारिक बैठक में नामों पर विचार होने से पहले ही सरकार की राय जानने की कोशिश करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए गलत संकेत दे सकता है। कौल के ये दावे ऐसे समय में सामने आए हैं, जब न्यायपालिका की स्वायत्तता, कॉलेजियम व्यवस्था और केंद्र सरकार के साथ उसके संबंधों को लेकर लंबे समय से बहस जारी है। पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि उन्होंने अभी किताब पढ़ी नहीं है और उसके संदर्भ को समझने के बाद ही विस्तृत प्रतिक्रिया दे सकेंगे।
नियुक्तियों से पहले सरकार की सहमति का सवाल
संजय किशन कौल ने पत्रकार करण थापर के साथ द वायर को दिए साक्षात्कार में सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की एक बैठक का जिक्र किया। उनके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में छह रिक्त पदों को भरने के लिए पांच नामों पर पहले ही सहमति बन चुकी थी। लेकिन बैठक से ठीक पहले चंद्रचूड़ ने छठे उम्मीदवार का नाम सामने रखा। कौल कहते हैं कि उस नाम पर उनकी सहमति नहीं थी और उन्हें विश्वास था कि कॉलेजियम के अन्य सदस्य भी उसे स्वीकार नहीं करेंगे।
कौल के अनुसार, बैठक से पहले चंद्रचूड़ उन्हें अलग कमरे में ले गए और विचार किया कि क्या सरकार की राय जानने के लिए फोन किया जाना चाहिए। कौल ने इसे सामान्य परामर्श से अलग स्थिति बताते हुए कहा कि सरकार से सलाह लेने और कॉलेजियम की औपचारिक चर्चा से पहले उसकी मंजूरी तलाशने में बुनियादी अंतर है। उनके शब्दों में, सरकार से पहले ही सहमति लेने की यह प्रवृत्ति आगे चलकर एक ऐसी परंपरा बन सकती है, जिसमें न्यायिक नियुक्तियों के मामले में कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ता जाए। कौल का कहना है कि उन्होंने चंद्रचूड़ को इस तरीके से बचने की सलाह दी थी, क्योंकि भविष्य में आने वाले मुख्य न्यायाधीशों के लिए इस तरह की स्थापित प्रक्रिया का विरोध करना और कठिन हो सकता है।
यहां मूल सवाल किसी एक उम्मीदवार के नाम पर सहमति या असहमति का नहीं, बल्कि नियुक्तियों की प्रक्रिया का है। कॉलेजियम व्यवस्था में न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदोन्नति के संबंध में वरिष्ठ न्यायाधीशों की सामूहिक भूमिका केंद्रीय होती है। यदि सरकार के साथ बातचीत कॉलेजियम के औपचारिक विचार-विमर्श से पहले होने लगे, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि उस बातचीत की सीमा क्या है और अंतिम निर्णय लेने का अधिकार किसके पास है।
सरकार के साथ संवाद अपने आप में न्यायपालिका की स्वतंत्रता के विरुद्ध नहीं है। नियुक्तियों पर आपत्तियों, प्रशासनिक जरूरतों और संवैधानिक प्रक्रियाओं को लेकर बातचीत हो सकती है। लेकिन संवाद और पूर्वानुमति के बीच की सीमा धुंधली होने पर पारदर्शिता और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही वह अंतर है जिसे कौल ने अपने संस्मरण में रेखांकित किया है।
कॉलेजियम बनाम सरकार : पुरानी बहस फिर चर्चा में
भारत में न्यायिक नियुक्तियों की मौजूदा कॉलेजियम व्यवस्था को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द कर दिया था। इस आयोग के जरिए न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सरकार की भूमिका बढ़ाने का प्रावधान था। कौल का कहना है कि एनजेएसी व्यवस्था को लेकर मतभेदों पर अधिक संवाद हो सकता था और उसमें आवश्यक सुधार किए जा सकते थे। उनके विचार में, नियुक्तियों को लेकर सरकार से बातचीत की एक सीमा होनी चाहिए और न्यायपालिका को अपनी संस्थागत स्वतंत्रता के मामले में दृढ़ रहना चाहिए।
इस बहस का एक पहलू यह भी है कि कॉलेजियम व्यवस्था को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग खुद लंबे समय से उठती रही है। नियुक्तियों में सरकार की भूमिका बढ़ाने का सवाल और कॉलेजियम की निर्णय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की मांग दो अलग-अलग मुद्दे हैं। एक का समाधान दूसरे की स्वतंत्रता समाप्त करके नहीं किया जा सकता। न्यायपालिका को सरकार के अनुचित दबाव से मुक्त रहना चाहिए, लेकिन नियुक्तियों की प्रक्रिया भी स्पष्ट मानदंडों और संस्थागत जवाबदेही के दायरे में होनी चाहिए।
पीएमएलए मामले में ‘मध्य मार्ग’ अपनाने की सलाह
कौल के संस्मरण में एक अन्य महत्वपूर्ण प्रसंग धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) से संबंधित मामले का है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2022 के उस फैसले के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार से जुड़ा था, जिसमें कानून के प्रमुख प्रावधानों को बरकरार रखा गया था। कौल के मुताबिक, उनके नेतृत्व वाली पीठ के सामने इस मामले को उठाया गया था। सुनवाई के दौरान उन्हें यह संकेत दिया गया कि मामले में सावधानी बरतना और बीच का रास्ता अपनाना बेहतर हो सकता है। कौल ने साक्षात्कार में बताया कि उन्होंने इस सुझाव से सहमति नहीं जताई।
उन्होंने यह भी कहा कि मामला पहले उनके सामने आया था और सरकार की ओर से अतिरिक्त समय मांगे जाने के कारण सुनवाई आगे बढ़ी। इस तरह सुनवाई उनके सेवानिवृत्त होने के करीब आ गई। कौल ने स्पष्ट किया कि किसी महत्वपूर्ण मामले को इसलिए टालना उचित नहीं होगा कि न्यायाधीश का कार्यकाल समाप्त होने वाला है। उनके मुताबिक, इस चर्चा में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ और उस समय के न्यायाधीश संजीव खन्ना भी मौजूद थे।
मुख्य न्यायाधीश की प्रशासनिक शक्ति पर सवाल
कौल ने सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक कामकाज और मुख्य न्यायाधीश की पीठ आवंटित करने की शक्ति पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कई उच्च न्यायालयों में प्रशासनिक विषयों पर चर्चा के लिए बेहतर व्यवस्था दिखाई देती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में निर्णय प्रक्रिया काफी हद तक रजिस्ट्री और मुख्य न्यायाधीश के बीच केंद्रित रहती है। उनके मुताबिक, किसी मामले को एक पीठ से दूसरी पीठ में स्थानांतरित करने का आधार केवल यह आशंका नहीं होनी चाहिए कि संबंधित पीठ किस तरह का फैसला दे सकती है।
कौल ने पीएमएलए मामले के अलावा न्यायिक नियुक्तियों में देरी से संबंधित मामले का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, जब उनकी पीठ सरकार को लंबित नियुक्तियों पर कार्रवाई के लिए प्रेरित करने की कोशिश कर रही थी, तब मामला दूसरी पीठ के पास चला गया। उन्होंने इस बदलाव को लेकर चिंता जताई, हालांकि यह भी स्पष्ट नहीं किया कि इसके पीछे सरकार का प्रत्यक्ष दबाव था या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश को रोस्टर मास्टर कहा जाता है। यानी मामलों को अलग-अलग पीठों को सौंपने और अदालत के कामकाज की सूची तय करने की महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी उन्हीं के पास होती है। यह व्यवस्था अदालत के सुचारु संचालन के लिए जरूरी है। लेकिन इतनी महत्वपूर्ण शक्ति के साथ पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रिया और उचित आंतरिक परामर्श की जरूरत भी जुड़ी है।
यदि पीठों के गठन या मामलों के स्थानांतरण को लेकर सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब स्पष्ट प्रक्रिया और संस्थागत नियमों के जरिए दिया जाना चाहिए। सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि यह मुख्य न्यायाधीश का प्रशासनिक अधिकार है। साथ ही, किसी मामले का स्थानांतरण अपने आप में अनुचित हस्तक्षेप का प्रमाण भी नहीं है। उसके कारणों, प्रक्रिया और संबंधित परिस्थितियों को देखना आवश्यक है।
कांग्रेस ने उठाए न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल
कौल के संस्मरण से सामने आए विवरणों के बाद कांग्रेस ने केंद्र की मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए हैं। पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्तियों से पहले सरकार की मंजूरी लेने की कथित कोशिशें और संवेदनशील मामलों की पीठ में बदलाव गंभीर चिंता के विषय हैं।
जयराम ने न्यायपालिका को संविधान की रक्षा करने वाली संस्था बताते हुए कहा कि उसे सत्ता में बैठे लोगों के दबाव से मुक्त रहना चाहिए। कांग्रेस की प्रतिक्रिया राजनीतिक है और उसके आरोपों को स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्यों के बराबर नहीं माना जा सकता। फिर भी, जब किसी पूर्व न्यायाधीश के संस्मरण में नियुक्तियों, पीठों के आवंटन और सरकार के साथ संवाद को लेकर सवाल दर्ज हों, तो उन पर सार्वजनिक चर्चा होना स्वाभाविक है। ऐसी चर्चा का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल के आरोपों को अंतिम सत्य मानना नहीं, बल्कि संस्थागत प्रक्रियाओं की मजबूती और पारदर्शिता सुनिश्चित करना होना चाहिए।
पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की प्रतिक्रिया
इस पूरे विवाद में पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ का पक्ष भी अहम है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा है कि जब तक वे कौल के संस्मरण को पढ़कर उसके संदर्भ को नहीं समझ लेते, तब तक विस्तृत प्रतिक्रिया देना उचित नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि कॉलेजियम के फैसले सर्वसम्मति से हुए थे और कौल ने सभी सिफारिशों का समर्थन किया था। यह प्रतिक्रिया नियुक्तियों को लेकर दोनों पूर्व न्यायाधीशों के विवरणों के बीच अंतर को सामने लाती है। कौल ने अपनी असहमति और सरकार के साथ बातचीत के तरीके पर सवाल उठाए हैं, जबकि चंद्रचूड़ ने कॉलेजियम के अंतिम निर्णयों में सर्वसम्मति का उल्लेख किया है। अंतिम फैसलों पर सहमति और उन फैसलों तक पहुंचने की प्रक्रिया पर असहमति दो अलग बातें हैं। इसलिए पूरे विवाद का मूल्यांकन करते समय दोनों पहलुओं को समझना जरूरी है।
असली कसौटी संस्थागत स्वतंत्रता
कौल के संस्मरण से उठी बहस का महत्व इस बात में है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल अंतिम फैसलों से नहीं, बल्कि उन प्रक्रियाओं से भी जुड़ी होती है जिनके माध्यम से न्यायाधीश नियुक्त किए जाते हैं, मुकदमों का आवंटन होता है और प्रशासनिक निर्णय लिए जाते हैं। सरकार और न्यायपालिका के बीच संवाद संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन यह संवाद किस चरण पर होता है, उसकी सीमाएं क्या हैं और अंतिम निर्णय लेने वाली संस्था कितनी स्वतंत्र है- इन सवालों के जवाब स्पष्ट होने चाहिए। इसी तरह, न्यायपालिका की आंतरिक प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल भी ऐसी प्रक्रियाओं के तहत होना चाहिए जिन पर भरोसा कायम रहे।
पूर्व न्यायाधीश कौल के आरोपों से यह बहस एक बार फिर से सामने आई है कि क्या कॉलेजियम की प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक कामकाज को अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत है। इसका जवाब सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप से नहीं मिलेगा। इसके लिए तथ्यों, संबंधित पक्षों के स्पष्टीकरण और संस्थागत प्रक्रियाओं की निष्पक्ष समीक्षा जरूरी होगी। लोकतंत्र में न्यायपालिका की विश्वसनीयता इस भरोसे पर टिकी होती है कि संविधान और कानून के सवालों पर निर्णय किसी राजनीतिक सुविधा के बजाय न्यायिक विवेक के आधार पर लिए जाएंगे। यही वजह है कि न्यायिक नियुक्तियों में सरकार की भूमिका और संवेदनशील मामलों की सुनवाई से जुड़े सवालों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।




