मानहानि केस में राहुल गांधी बरी, अमित शाह पर टिप्पणी को कोर्ट ने नहीं माना मानहानि

साल 2018 के कर्नाटक चुनाव के दौरान दिए गए बयान से जुड़ा था मुकदमा; अदालत ने शिकायतकर्ता को भी नहीं माना पीड़ित पक्ष। फैसले को चुनौती देने की तैयारी में शिकायतकर्ता।

सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) : कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर की विशेष एमपी-एमएलए अदालत से बड़ी कानूनी राहत मिली है। अदालत ने 2018 में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ कथित टिप्पणी से जुड़े मानहानि के मुकदमे में राहुल गांधी को बरी कर दिया है। अदालत के फैसले के मुताबिक, राहुल गांधी की टिप्पणी मानहानिकारक नहीं थी और शिकायतकर्ता विजय मिश्रा इस मामले में पीड़ित पक्ष के रूप में योग्य नहीं थे। हालांकि, शिकायतकर्ता की ओर से फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देने की बात कही गई है।

कोर्ट यह फैसला सिर्फ एक मानहानि मुकदमे का अंत नहीं, बल्कि राजनीतिक बयानबाजी और आपराधिक मुकदमों के बीच की उस बहस को भी सामने लाता है, जिसमें यह तय करना जरूरी होता है कि किसी नेता की टिप्पणी कानूनन मानहानि के दायरे में आती है या राजनीतिक आलोचना के दायरे में। लोकतंत्र में नेताओं के बयान सवालों और आलोचना के दायरे में आते हैं। लेकिन किसी टिप्पणी को अपराध मानने के लिए कानूनी कसौटियों पर खरा उतरना भी जरूरी होता है। इस मामले में अदालत ने शिकायतकर्ता की दलीलों को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं माना।

दरअसल, यह मामला 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान बेंगलुरु में राहुल गांधी की टिप्पणी से जुड़ा था। उस समय अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। राहुल गांधी ने अपने बयान में शाह का संदर्भ एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिया था, जिस पर हत्या के मामले में आरोप लगे थे। यह टिप्पणी सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले से जुड़ी थी, जिसमें विशेष सीबीआई अदालत ने 2014 में अमित शाह को आरोपमुक्त कर दिया था।

राहुल गांधी की टिप्पणी को मानहानिकारक बताते हुए स्थानीय भाजपा नेता विजय मिश्रा ने 4 अगस्त 2018 को शिकायत दर्ज कराई थी। मिश्रा सुल्तानपुर जिला सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं। मामले में भारतीय दंड संहिता की मानहानि से संबंधित धाराओं के तहत कार्यवाही चली। राहुल गांधी 2023 में अदालत में पेश हुए और उन्हें जमानत मिली। इसके बाद कई वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया चलती रही और आखिरकार 26 अक्टूबर 2026 को अदालत ने अपना फैसला सुना दिया।

अदालत ने किन आधारों पर दी राहत?

शिकायतकर्ता के वकील संतोष पांडेय के मुताबिक, अदालत ने राहुल गांधी के बयान को मानहानिकारक नहीं माना और यह भी कहा कि विजय मिश्रा इस मामले में पीड़ित पक्ष नहीं हैं। शिकायतकर्ता की ओर से पेश की गई सीडी को लेकर भी सुनवाई हुई थी। लेकिन किसी रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जाने भर से यह साबित नहीं हो जाता कि उसमें दर्ज बयान कानूनी रूप से मानहानि है या शिकायतकर्ता को उसके आधार पर मुकदमा चलाने का अधिकार है। यही इस फैसले का अहम पहलू है। अदालत के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं था कि राहुल गांधी ने क्या कहा, बल्कि यह भी था कि क्या उस बयान के आधार पर शिकायतकर्ता का मानहानि का दावा कानून की कसौटी पर टिकता है। अदालत ने मामले में राहुल गांधी को दोषी नहीं ठहराया।

शिकायतकर्ता की अपील की तैयारी

फैसले के बाद विजय मिश्रा के वकील ने कहा है कि वे आदेश की प्रमाणित प्रति हासिल करेंगे, उसका अध्ययन करेंगे और अपने मुवक्किल से सलाह लेकर अपीलीय अदालत का रुख करेंगे। मिश्रा ने भी कहा कि वे आदेश देखने और कानूनी सलाह लेने के बाद आगे की कार्रवाई करेंगे। इस तरह, राहुल गांधी को मिली राहत के बावजूद यह मामला ऊपरी अदालत में पहुंच सकता है। कांग्रेस की कानूनी टीम ने फैसले का स्वागत किया है। पार्टी के एक वकील ने कहा कि उन्हें भरोसा था कि मामला राहुल गांधी के पक्ष में तय होगा, क्योंकि उनके मुताबिक शिकायत योग्यता से ज्यादा अन्य कारणों से प्रेरित था।

राजनीतिक लड़ाई से आगे कानून का सवाल

राहुल गांधी और भाजपा नेतृत्व के बीच राजनीतिक टकराव लंबे समय से सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहा है। ऐसे माहौल में नेताओं के बयान अक्सर राजनीतिक विवाद और कानूनी कार्रवाई का कारण बनते हैं। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक विरोध और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की रक्षा दोनों के बीच संतुलन जरूरी है। मानहानि कानून का उद्देश्य प्रतिष्ठा की रक्षा करना है, न कि राजनीतिक असहमति को अपने आप आपराधिक मामला बना देना।

इस मामले में अदालत का फैसला राहुल गांधी के लिए राहत जरूर है, लेकिन इसे हर राजनीतिक बयान के लिए खुली छूट के रूप में भी नहीं पढ़ा जाना चाहिए। हर मामले में बयान का संदर्भ, उसके तथ्यात्मक आधार, शिकायतकर्ता की कानूनी स्थिति और लागू कानून को अलग-अलग परखना पड़ता है। इसी तरह, सिर्फ मुकदमा दर्ज हो जाने से किसी व्यक्ति का दोषी होना साबित नहीं होता।

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सत्ता विमर्श डेस्क
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