खजूर के बाग से निकला आइडिया ऑफ वक्फ बोर्ड

मान्यता है कि पैगंबर मोहम्मद साहब के समय में 600 खजूर के पेड़ों का एक बाग था जिससे होने वाली आमदनी से मदीना के गरीब लोगों की मदद की जाती थी। अपनी किताब भारत में वक्फ कानून और प्रशासन 1968 में एस. अतहर हुसैन और एस. खालिद रशीद लिखते हैं कि 1206 से 1526 ईस्वी के बीच दिल्ली सल्तनत के वक्त भारत में वक्फ बोर्ड की शुरुआत हुई थी। तब सुल्तान मुइजुद्दीन सैम गौर ने मुल्तान की जामा मस्जिद को वक्फ में दो गांव दान किए थे। हालांकि ब्रिटिश राज में लंदन की प्रिवी काउंसिल के चार जजों ने वक्फ कानून को अमान्य घोषित कर दिया था लेकिन भारत के मुसलमानों ने वक्फ वैधीकरण अधिनियम-1913 कानून बनाकर चार अंग्रेज जजों के सुनाए फैसले को पलट दिया था। 1954 में आजादी के बाद भारत में वक्फ अधिनियम के नाम से अलग कानून बना जिसके बाद वक्फ बोर्ड एक सरकारी संस्था की तरह काम करने लगी। 1964 में देश में पहली बार सेंट्रल वक्फ काउंसिल बनाई गई।

वक्फ कानून (संशोधन) विधेयक-2024 जेपीसी के हवाले

देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस समेत कुल नौ राजनीतिक दलों के विरोध के बाद केंद्र की मोदी सरकार ने वक्फ कानून (संशोधन) विधेयक 2024 को संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया है। संसद के बजट सत्र में 8 अगस्त 2024 को केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने जब इस विधेयक को लोकसभा में पेश किया तो चर्चा के दौरान कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, एनसीपी शरद पवार, एआईएमआईएम, टीएमसी, सीपीआईएम, डीएमके समेत नौ राजनीतिक दलों ने विरोध जताया। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने कहा कि सरकार समुदायों के बीच विवाद पैदा करना चाहती है, वहीं एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि इस विधेयक को लेकर केंद्र सरकार देश को जोड़ने का नहीं, बल्कि बांटने का काम कर रही है। यह संशोधन विधेयक इस बात का सुबूत है कि मोदी सरकार मुसलमानों की दुश्मन है।

हालांकि वक्फ बोर्ड के कानून में कोई पहली बार संशोधन नहीं किया जा रहा है। इससे पहले 1995 में बाबरी मस्जिद कांड के बाद पीवी नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार ने 1955 के बाद दूसरी बार वक्फ एक्ट में बदलाव किया था। तब इस कानून के तहत वक्फ बोर्ड को काफी ज्यादा शक्तियां मिल गईं। इसके तहत वक्फ एक्ट 1995 के सेक्शन 3(R) के मुताबिक, अगर बोर्ड किसी संपत्ति को मुस्लिम कानून के मुताबिक पाक (पवित्र), मजहबी (धार्मिक) या (चैरिटेबल) परोपरकारी मान ले तो वह संपत्ति वक्फ बोर्ड की हो जाएगी। अगर किसी को इस फैसले से ऐतराज है तो वह वक्फ से गुहार लगा सकता है।

वक्फ एक्ट 1995 के आर्टिकल 40 के अनुसार यह जमीन किसकी है, यह वक्फ का सर्वेयर और वक्फ बोर्ड ही तय करेगा। अगर किसी को वक्फ बोर्ड के फैसले से ऐतराज है तो वह अपनी संपत्ति से जुड़े विवाद को निपटाने के लिए वक्फ ट्रिब्यूनल में जा सकता है। इस कानून की एक खास बात यह भी है कि जमीन या संपत्ति पर आखिरी फैसला वक्फ ट्रिब्यूनल में ही होता है। इस कानून के सेक्शन 85 के मुताबिक वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले को सिविल, राजस्व या अन्य अदालतों में चुनौती नहीं दी जा सकती है। इस बार संशोधित विधेयक में देशभर में वक्फ संपत्तियों की निगरानी करने के लिए जियोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम मैपिंग की व्यवस्था की गई। ताकि संपत्तियों का सही और सटीक रिकॉर्ड रखा जा सके। साथ ही यह ध्यान भी रखा गया कि बोर्ड पर किसी तरह का बाहरी दबाव या हस्तक्षेप नहीं हो।

हालांकि वक्फ कानून में संशोधन के पीछे केंद्र की मोदी सरकार का मकसद वक्फ बोर्ड के कामकाज में पारदर्शिता लाना और महिलाओं को इन बोर्ड में शामिल करना भर है जिसकी मांग मुस्लिम समुदाय के भीतर से लंबे वक्त से उठ रही थी। लेकिन मोदी सत्ता को लेकर मुस्लिम समाज के भीतर जिस तरह का डर बैठा हुआ है तो सवाल उठने लाजिमी हैं कि आखिर मोदी सरकार वक्फ बोर्ड के कानून में बदलाव क्यों करना चाह रही है? वो भी एक-दो नहीं, पूरे 40 बदलाव।

दरअसल, मोदी सरकार वक्फ बोर्ड को भी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बनाना चाहती है। मौजूदा कानून में वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों की एंट्री नहीं है, लेकिन संशोधन कहता है कि वक्फ बोर्ड में अब दो सदस्य गैर-मुस्लिम होंगे। इतना ही नहीं बोर्ड के सीईओ भी गैर मुस्लिम हो सकते हैं। कानून में बदलाव के तहत वक्फ में महिलाओं की सहभागिता भी होगी। सेक्शन-9 और 14 में बदलाव करके केन्द्रीय वक्फ परिषद में दो महिलाओं को शामिल करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा नए बिल में बोहरा और आगाखानी मुस्लिमों के लिए अलग से वक्फ बोर्ड बनाए जाने की बात भी कही गई है।

बोहरा समुदाय के मुस्लिम आमतौर पर व्यवसाय से जुड़े होते हैं जबकि आगाखानी इस्माइली मुसलमान होते हैं, जो न तो रोजा रखते हैं और न ही हज जाते हैं। इसके अलावा भारत सरकार कानून में संशोधन के जरिये वक्फ बोर्ड की संपत्ति पर अपना नियंत्रण बढ़ाना चाहती है। वक्फ बोर्ड के प्रबंधन में गैर-मुस्लिम विशेषज्ञों को शामिल करने और सरकारी अधिकारियों से वक्फ का ऑडिट कराने से पैसे और संपत्ति का हिसाब-किताब में पारदर्शिता आएगी। केंद्र सरकार सीएजी के जरिए वक्फ की संपत्ति का भी ऑडिट करा सकेगी।

कानूनी बदलाव के लिए मोदी सरकार ने जस्टिस सच्चर आयोग और के. रहमान खान की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय कमेटी की सिफारिशों का हवाला भी दिया है। इसके मुताबिक राज्य और केंद्र सरकार वक्फ संपत्तियों में दखल नहीं दे सकती हैं, लेकिन कानून में बदलाव के बाद वक्फ बोर्ड को अपनी संपत्ति जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तर में रजिस्टर्ड करानी होगी ताकि संपत्ति के मालिकाना हक की जांच हो सके। नए बिल के पास होने पर इन संपत्तियों और उसके राजस्व की जांच जिला मजिस्ट्रेट कर सकेंगे।

सरकार का मानना है कि वक्फ की जमीनों को जिला मुख्यालयों के राजस्व विभाग में रजिस्टर्ड कराने और कम्प्यूटर में रिकॉर्ड दर्ज कराने से पारदर्शिता आएगी। मोदी सरकार के नए संशोधन विधेयक के मुताबिक, वक्फ ट्रिब्यूनल में अब 2 सदस्य होंगे। ट्रिब्यूनल के फैसले को 90 दिनों के अंदर हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। अभी सबसे बड़ी चुनौती ये है कि अगर किसी जमीन को वक्फ ने अपना बता दिया तो उस जमीन पर दावा करने वाले दूसरे पक्ष की ये जिम्मेदारी है कि वह ये साबित करे कि ये जमीन उसकी है। मतलब बर्डेन ऑफ प्रूफ, दावा करने वाले व्यक्ति पर होती है। सरकार नए बिल में इस समस्या का भी समाधान भी लेकर आई है।

क्या होता है ‘वक्फ’ : ‘वक्फ’ अरबी भाषा के वकुफा शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है ठहरना। लेकिन इस्लाम में वक्फ को दान के एक तरीके के तौर पर पेश किया गया है, ऐसी संपत्ति जो समाज के लिए समर्पित की गई हो। अपनी संपत्ति वक्फ को देने वाला इंसान वकिफा कहलाता है। दान देते वक्त वकिफा की ये शर्त होती है कि उसकी संपत्ति से होने वाली आमदनी सिर्फ तालीम पर या अस्पतालों पर ही खर्च होगी।

27 देशों में वक्फ की संपत्तियों पर काम करने वाली संस्था ‘औकाफ प्रॉपर्टीज इन्वेस्टमेंट फंड’ यानी एआईपीएफ की मानें तो इस्लाम में कोई व्यक्ति जब धार्मिक वजहों से या अल्लाह के नाम पर अपनी संपत्ति दान करता है तो वह वक्फ कहलाता है। इसमें चल और अचल संपत्ति दोनों हो सकती है। आमतौर पर वक्फ की संपत्ति या इससे होने वाली आमदनी को शैक्षणिक संस्थाओं, कब्रिस्तानों, मस्जिदों में धर्मार्थ और अनाथालयों में खर्च किया जाता है।

भारत में इस वक्त 30 वक्फ बोर्ड हैं और सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करें तो भारतीय रेलवे तथा भारतीय सेना के बाद सबसे ज्यादा जमीन वक्फ बोर्ड के पास ही है। वक्फ की कुल 8.70 लाख संपत्तियां देश की 9.40 लाख एकड़ जमीन में फैली हुई हैं। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय ने दिसम्बर 2022 में लोकसभा में जानकारी दी थी जिसके अनुसार वक्फ बोर्ड के पास 8,65,644 अचल संपत्तियां हैं। इनमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश वक्फ के पास करीब दो लाख से ज्यादा अचल संपत्तियां हैं। 2009 के बाद वक्फ की संपत्तियों में दोगुना वृद्धि हुई है।

वक्फ बोर्ड क्या है : भारत में वक्फ में मिलने वाली जमीन या संपत्ति की देखरेख के लिए कानूनी तौर पर एक संस्था बनी जिसे वक्फ बोर्ड कहते हैं। दरअसल, 1947 में जब देश का विभाजन हुआ तो एक तरफ जहां काफी संख्या में भारत के मुसलमान देश छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे वहीं, दूसरी तरफ पाकिस्तान से काफी सारे हिन्दू भारत आए थे। 1954 में संसद ने वक्फ एक्ट-1954 के नाम से कानून बनाया जिसके तहत पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों की संपत्तियों का मालिकाना हक वक्फ बोर्ड को दे दिया गया।

1955 में यानी कानून लागू होने के एक साल बाद इस कानून में संशोधन कर हर राज्यों में वक्फ बोर्ड बनाए जाने की बात कही गई। वक्फ बोर्ड का काम वक्फ की कुल आमदनी कितनी है और इसके पैसे से किसका भला किया गया, उसका पूरा लेखा-जोखा रखना होता है। इनके पास किसी जमीन या संपत्ति को लेने और दूसरों के नाम पर ट्रांसफर करने का कानूनी अधिकार है। बोर्ड किसी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी नोटिस भी जारी कर सकता है। किसी ट्रस्ट से ज्यादा अधिकर वक्फ बोर्ड के पास होती है।

कहने का मतलब यह कि भारत में वक्फ बोर्डों को जो असीमित अधिकार हासिल हैं, वैसे अधिकार सउदी अरब या अन्य दूसरे इस्लामिक देशों में भी हासिल नहीं हैं। मसलन भारत में कोई संपत्ति अगर एक बार वक्फ की घोषित हो गई तो वह सदा के लिए वक्फ के अधिकार में आ जाती है। दूसरे देशों में इसकी न्यायिक समीक्षा का विकल्प है, लेकिन भारत में ये बेहद पेचीदगी भरा मसला है। भारत में हिन्दुओं के ट्रस्ट, मठ, अखाड़े और सोसाइटी पर अनेक कानूनों के साथ जिला प्रशासन का प्रशासनिक नियंत्रण रहता है, लेकिन वक्फ बोर्ड के मामले में ऐसा नहीं है।

एक सवाल आम है कि वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है तो इसका जवाब है नहीं। साल 2013 में वक्फ एक्ट में बदलाव के बाद वक्फ के फैसले से असहमत व्यक्ति को वक्फ बोर्ड या ट्रिब्यूनल के पास ही जाना पड़ता है। किसी हिन्दू या गैर-मुस्लिम की संपत्ति को वक्फ की घोषित कर दी जाए तो भी वक्फ कानून के तहत ट्रिब्यूनल के पास अपनी बात रखनी पड़ती है। इसकी वजह से अदालतों का क्षेत्राधिकार कम होता है जो संविधान सम्मत नहीं है। लेकिन नए कानूनी संशोधनों को अगर संसद से मंजूरी मिल जाती है तो संपत्ति विवाद से जुड़े 40 हजार से ज्यादा वर्तमान मामलों का सिविल कोर्ट में निपटारा हो सकता है। नई कानूनी व्यवस्था में वक्फ विवाद से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के साथ रिट याचिका भी दायर हो सकेगी।

अंत में बात उनकी भी जो इस कानून में संशोधन के खिलाफ हैं और उनके अपने तर्क हैं। बिहार शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन सैयद अफजल अब्बास कहते हैं कि जिस तरह से मोदी सरकार किसानों से मशविरा किए बिना तीन कृषि कानून लेकर आई थी, उसी तरह से केंद्र सरकार वक्फ बोर्ड के नेताओं से बात किए बिना वक्फ बोर्ड से जुड़े कानून में बदलाव करने जा रही है। मतलब यह कि सरकार को वक्फ से जुड़े लोगों से कानूनी बदलावों को लेकर बातचीत और रायशुमारी करनी चाहिए थी।

अनुच्छेद 26(बी) धार्मिक संप्रदायों को धर्म के मामलों में खुद प्रबंधन करने के अधिकार की गारंटी देता है। वक्फ की संपत्ति अल्लाह के नाम की संपत्ति है। ऐसे में अगर मोदी सरकार वक्फ के कानून में बदलाव करके वक्फ बोर्ड की स्वतंत्रता और स्वायत्ता छीनना चाहती है तो यह सही नहीं है। तीसरी अहम बात यह कि सरकार कानून में बदलाव कर वक्फ बोर्ड को पूरी तरह से अपने नियंत्रण में करना चाहती है। यह मुस्लिम समाज की धार्मिक आजादी को खत्म करने जैसा है।

बहरहाल, सरकार ने वक्फ बोर्ड कानून (संशोधन) विधेयक के सभी पहलुओं पर विचार करने के लिए 31 सदस्यों वाली संसद की भारी भरकम संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी का गठन कर दिया है। देखना रोचक होगा कि जेपीसी इसपर अपनी क्या सिफारिशें देती है और आने वाले वक्त में इस संशोधन विधेयक का हश्र क्या होता है।

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प्रवीण कुमार
मैं कौन हूं, क्या हूं, क्यों हूं, यह सब खुद मुझे भी नहीं पता क्यों कि खुद के बारे में बताना, जताना या उकेरना सबसे मुश्किल काम होता है। हां! बुद्ध, गांधी, विवेकानंद और गीता के दर्शन से मैंने अपने जीवन को संवारने की कोशिश जरूर की है। बिहार के बेगूसराय जिले का रहने वाला हूं। जाने-अनजाने में पत्रकारिता के आंगन में ढाई दशक से अधिक वक्त से कूद-फांद कर रहा हूं। शुरूआती दौर में जी भरकर देश के तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में वैचारिक लेखन किया। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषयों पर लिखने में अपनी रूचि रहती है। फिलहाल भारत सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर लेखन कर रहा हूं। डिजिटल और सोशल मीडिया कंसल्टेंट के तौर भी हाथ साफ करता रहता हूं। 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान फेक न्यूज़ की बयार को गहराई से जांचा परखा था। उससे पहले नोएडा स्थित ज़ी न्यूज़ में हिन्दी वेबसाइट की शुरूआत कर काफी लंबा वक्त गुजारा। इससे भी पीछे का पूछेंगे तो करीब डेढ़ दशक तक दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अखबारों के संपादकीय विभाग में अलग-अलग भूमिकाओं को निभाते हुए एक पत्रकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, एक बेहतर इंसान भी बनने की कोशिश की, पर कितना बन पाया ये सब ''ऊपर वाले पर'' छोड़ता हूं...

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