25 जुलाई 2024 की तारीख को भी इतिहास में दर्ज होना था सो हो गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने आज यानी गुरुवार को राष्ट्रपति भवन के दो हॉल का नाम बदलने का ऐलान जो कर दिया। अब से दरबार हॉल को गणतंत्र मंडप और अशोक हॉल को अशोक मंडप के नाम से जाना जाएगा।
इसको लेकर राष्ट्रपति सचिवालय की तरफ से एक प्रेस रिलीज जारी की गई है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने इस मामले में सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा कि इस देश में दरबार का कॉन्सेप्ट नहीं है, लेकिन शहंशाह का कॉन्सेप्ट है।
राष्ट्रपति भवन की प्रेस रिलीज के मुताबिक, राष्ट्रपति भवन के परिवेश में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और प्रकृति की झलक दिखाई दे, इसलिए दोनों हॉल के नाम बदले गए हैं। राष्ट्रपति भवन, जो कि भारतीय राष्ट्रपति का कार्यालय और आवास है, वह देश का प्रतीक है और लोगों की अमूल्य धरोहर है। ऐसे में लगातार कोशिशें की जा रही हैं कि राष्ट्रपति भवन में भारतीय संस्कृति की झलक दिखे।
रिलीज के मुताबिक, दरबार हॉल में नेशनल अवॉर्ड दिए जाने जैसे अहम समारोह और उत्सव आयोजित किए जाते हैं। भारतीय शासकों और ब्रिटिशर्स की तरफ से लगाए जाने वाले दरबार और सभाओं के नाम पर इस हॉल को ‘दरबार’ नाम दिया गया था, लेकिन 1950 में देश के गणतंत्र बनने के बाद इस नाम का कोई औचित्य नहीं रह गया था। इसीलिए इस हॉल के लिए ‘गणतंत्र भवन’ सटीक नाम है।
प्रेस रिलीज में कहा गया, ‘अशोक’ शब्द का अर्थ है कोई ऐसा व्यक्ति जो ‘सभी दुखों से मुक्त’ हो या ‘किसी भी दुख से रहित’ हो. साथ ही, ‘अशोक’ का तात्पर्य सम्राट अशोक से है, जो एकता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का प्रतीक हैं।
भारत गणराज्य का राष्ट्रीय प्रतीक सारनाथ से अशोक का सिंह स्तंभ है। यह शब्द अशोक वृक्ष को भी संदर्भित करता है, जिसका भारतीय धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ कला और संस्कृति में भी गहरा महत्व है।
‘अशोक हॉल’ का नाम बदलकर ‘अशोक मंडप’ करने से भाषा में एकरूपता आएगी और अंग्रेजीकरण के निशान मिटेंगे। साथ ही ‘अशोक’ शब्द से जुड़े प्रमुख मूल्यों को भी कायम रखा जाएगा।”
इससे पहले राष्ट्रपति भवन के विश्व प्रसिद्ध ‘मुगल गार्डन’ का नाम भी बदला जा चुका है। पिछले साल 28 जनवरी को ‘मुगल गार्डन’ का नाम बदलकर ‘अमृत उद्यान’ कर दिया गया था।
हालांकि इन दोनों हॉलों की अपनी-अपनी कहानी रही है। 92 साल पुरानी बात है जब सर एडविन लुटियंस ने इस भव्य राष्ट्रपति भवन को 1911 में बनाना शुरू किया था और 1932 में पूरा किया।
दरबार हॉल पहले था थॉर्न हॉल
जब 1932 में ये भवन बनकर तैयार हुआ तो इसे वायसराय हाउस कहा जाता था। बाद में इस हॉल को थोर्न हॉल का नाम दिया गया। लेकिन जब भारत आजाद हुआ तो इस कक्ष को दरबार हॉल नाम दिया गया। हालांकि इसका एक और नाम भी रहा है – सिंहासन कक्ष, जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं।
आम तौर पर दरबार हॉल में जगहें काफी बड़ी होती हैं लेकिन ये हॉल काफी छोटा है। इतना छोटा कि पदभार ग्रहण करने और शपथ ग्रहण समारोह तक के लिए जगह कम पड़ जाती है।
दरबार हॉल राष्ट्रपति भवन के सबसे भव्य कमरों में एक है जो विशाल केंद्रीय गुंबद के ठीक नीचे बना मुख्य हॉल है। ऐतिहासिक तथ्य है कि सन् 1947 में देश की आजादी की रात जवाहरलाल नेहरू ने यहीं देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। फिर 1950 में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने भी यहीं राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी।
यही वो स्थान भी है, जहां फरवरी 1977 में राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद का पार्थिव शरीर रखा गया था। यहीं पर सरकार दुनियाभर के राष्ट्राध्यक्षों की मेजबानी करती है। यहीं पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 107 वर्षीय सालूमरदा थिमक्का से आशीर्वाद प्राप्त किया था, जिन्हें ‘वृक्ष माथे’ के नाम से जाना जाता है।
इस कक्ष का प्रभाव बड़ा ही सम्मोहित करने वाला है। ये 42 फीट ऊंची संगमरमर की दीवारों से घिरा गोलाकार कक्ष है। ब्रिटिश वास्तुकला के विशेषज्ञ क्रिस्टोफर हसी ने 1953 में अपनी किताब द लाइफ ऑफ सर एडविन लुटियंस में लिखा, “इस हॉल का प्रभाव जबरदस्त व पूरी तरह से खामोश करने वाला और तुरंत सम्मोहित करने वाला होता है।
ये हॉल पीले जैसलमेर संगमरमर के स्तंभों से घिरा हुआ है, जिसके शीर्ष और आधार सफ़ेद हैं। अटारी में 12 संगमरमर की जालियों से हॉल में सूरज का प्रकाश आता है। फर्श मकराना और अलवर के सफ़ेद संगमरमर और इटली से आयातित गहरे चॉकलेटी रंग के संगमरमर का मिश्रण है। इन सबके बीच दो टन का बेल्जियम ग्लास का झूमर इतना चमकता है कि हॉल की फिजां ही बदल देता है।
1970 के दशक में शपथ ग्रहण समारोहों के लिए दरबार हॉल का उपयोग कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया था। तब कहीं इससे बड़े अशोक हॉल का इस्तेमाल किया जाने लगा था। हालांकि अंग्रेज वाइसरायों को भी लगता था कि ये हॉल कुछ छोटा है।
कहते हैं जब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने दरबार हॉल में देश के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी, तो राष्ट्रपति भवन के विशाल प्रांगण के बाहर भीड़ उमड़ पड़ी थी, जो परिसर के अंदर जाने की कोशिश कर रही थी। हाल ही में, 2014 और 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिपरिषद ने शपथ ग्रहण समारोह दरबार हॉल के बजाय राष्ट्रपति भवन के बड़े से प्रांगण में आयोजित किए गए थे।
अब इस हॉल को गणतंत्र मंडप के नाम से जाना जाएगा। हालांकि पहले इसे सिंहासन कक्ष के नाम से ही जाना जाता था, जब सी. राजगोपालाचारी ने 1948 में इसमें भारत के गर्वनर जनरल की शपथ ली थी और शायद तभी उन्होंने ही इसका नाम दरबार हॉल रख दिया था।
इस कक्ष में दीवार के सामने लाल मखमली पृष्ठभूमि पर भगवान बुद्ध की 5वीं शताब्दी की मूर्ति रखी गई है। इस मूर्ति के सामने राष्ट्रपति की कुर्सी लगी है। पहले इस स्थान पर दो सिंहासन रखे जाते थे, एक वायसराय और दूसरा वायसरीन के लिए। इस हॉल के गलियारे में देशभर के प्रसिद्ध मूर्तिकारों द्वारा गढ़ी गई पूर्व भारतीय राष्ट्रपतियों की प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। इसमें कई शानदार पेंटिंग्स भी लगी हैं।
अशोक हॉल कभी था बॉलरूम
अब आइए अशोक हॉल के बारे में भी जान लेते हैं। राष्ट्रपति भवन के सबसे आकर्षक और अलंकृत कमरों में से एक है अशोक हॉल। इसका नाम अब अशोक मंडप हो गया है। वैसे तो भारतीय स्थापत्यकला के संदर्भ में स्तंभों पर खड़े बाहरी हॉल को मंडप कहते हैं, जिसमें कई तरह के कार्यकलाप होते हैं।
अशोक हॉल का इस्तेमाल वायसराय के दौर में स्टेट बॉलरूम के रूप में होता था। दरबार हॉल के मुकाबले ये थोड़ा बड़ा हॉल है। अशोक हॉल का उपयोग विदेशी मेहमानों द्वारा परिचय पत्र प्रस्तुत करने और राष्ट्रपति द्वारा आयोजित राजकीय भोज के लिए होता रहा है।
इस हॉल की छत और फर्श दोनों का अपना अलग ही आकर्षण है। फर्श पूरी तरह से लकड़ी का बना है। इसकी सतह के नीचे स्प्रिंग लगे हैं। जबकि इसकी छतें तैल चित्रों से सजी हैं। छत के बीच में चमड़े की एक पेंटिंग है, जिसमें फतह अली शाह का घुड़सवार चित्र है, जो फारस के सात कजर शासकों में दूसरे थे, अपने बाइस बेटों के साथ एक बाघ का शिकार कर रहे हैं। इस पेंटिंग की लंबाई 5.20 मीटर और चौड़ाई 3.56 मीटर है। हालांकि लेडी विलिंगटन को ये पेंटिंग पसंद नहीं थी। ये भी सम्मोहित कर देने वाला हॉल है।
अशोक हॉल में कई उल्लेखनीय कलाकृतियां हैं जो बहुमूल्य हैं। कहा जाता है कि अशोक हाल में जो कालीन बिछा है, उसको बनाने में दो साल तक 500 बुनकर लगे थे। ये कालीन गहरे लाल रंग का है जिसमें फूलों और पेड़ों की आकृतियां हैं।




