बिरसा की बेटियां कहां लगाए गुहार?

साल 2022 के मार्च महीने में महाराष्ट्र के पालघर स्थित किसी फॉर्म हाउस में एक युवती की हत्या हुई थी। उसी साल जुलाई के महीने में झारखण्ड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में एक औरत को डायन बताकर उसे मार डाला गया। उसी महीने संपत्ति विवाद में मध्यप्रदेश के गुना जिले में एक स्त्री को ज़िंदा जलाया गया। ऐसी तमाम खबरें क्षणिक चर्चाओं में आकर देश की विस्मृतियों में चली जाती हैं। इन घटनाओं की प्रतिक्रिया नहीं होती। कैंडल मार्च नहीं निकाले जाते। मीडिया ट्रायल भी नहीं होता। क्यों ये तीनों महिलाएं आदिवासी थीं।

मतलब, आदिवासियों का दमन और उन पर ढाया जाने वाला अत्याचार देश के लोकमानस के लिए महत्वपूर्ण क्यों नहीं होता। दुःख की बात है कि तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद देश के जनजातीय आबादी के खिलाफ अपराध का ग्राफ ऊपर की तरफ ही बढ़ता दिख रहा है।

चिंता की बात है कि स्थानीय हालात और गैर-जनजातीय आबादी का मन-मानस इन आदिवासियों के खिलाफ संगठित होता जा रहा है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट में यह तथ्य खुलकर सामने आया है कि अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासियों के बीच महिलाओं पर हुए जुल्म की घटनाओं में साल 2020 के (8272 घटनाएं) मुकाबले 2021 में (8802 घटनाएं) 6.4 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी है। ध्यान रहे, हर मामले थानों में दर्ज नहीं होते। लिहाजा, अपंजीकृत मामले ज्यादा होते हैं जो प्रस्तुत आंकड़ों को कमतर दिखाते हैं।

केरल के तिरुअनंतपुरम के घटित हादसे इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। वहाँ पलोडे और विथुरा आदिवासी समुदायों के बीच पांच महिलाओं की सामूहिक आत्महत्या की घटना की सुधि लेने वाला आज कोई नहीं है। ऐसे में इन औरतों के खिलाफ उभरते वास्तविकता का चेहरा ज्यादा खौफनाक दिखता है।

सवाल है कि किसी ने जानने की कोशिश की है कि भद्राद्री-कोठागुडेम जिले की घटना से जुड़ी कानूनी-प्रक्रिया किस स्थिति में है? चूँकि क़ानून की मौजूदगी उन आदिवासी इलाकों में ठीक नहीं है तो अपराध करने का उत्साह समाज में देखने को खूब मिलता है। जैसे तेलंगाना के वन विभाग के एक अधिकारी ने मलकापल्ली मंडल के साकिवलसा गांव की चार आदिवासी महिलाओं की सिर्फ पिटाई नहीं की, बल्कि उन चारों को पास के घने जंगलों में ले जाकर उनमें से दो की साड़ियां भी उतार दी।

घंटों चले इस कुकृत्य को रोकने वाला कोई नहीं था क्योंकि भारत का सबसे बड़ा जमींदार जंगलात विभाग है। विभाग के वनपाल बहुत ज्यादा हैसियत रखते हैं। वे जो चाहे, जैसा चाहें उन आदिवासियों के साथ बदसलूकी करते हैं। नतीजतन, सदियों से चले आ रहे उनके भयकारी वजूद की वजह से स्थानीय लोगों की रोज की जीवन-शैली बद से बदतर होती है। यहाँ तक कि जंगलात विभाग उनकी संस्कृति, सामाजिक सरोकार और आस्थाओं में अपना हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटती।

इसलिए, आदिवासी स्त्रियों के खिलाफ हिंसा की ऐसी घटनाओं के सर्वकालिक कारणों को समझना इतना आसान कतई नहीं है जब तक वहां के नस्लीय हालात, सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति और राजनीतिक माहौल को नहीं समझा जाए। क्योंकि हर राज्य में आदिवासियों पर अलग-अलग किस्म से अत्याचार हो रहे हैं। जैसे मध्य प्रदेश में मूल वाशिंदों की बस्तियों में देह दलालों का दबदबा है।

वेश्यावृत्ति के नेटवर्क में आदिवासी युवतियों को खींच लाने की कोशिशों में इस धंधे के बिचौलिए आपराधिक घटनाओं को खुलकर अंजाम देते रहे हैं। जब कि छत्तीसगढ़ में, माओवादियों के खिलाफ आतंकवाद विरोधी अभियान में पुलिस के लोग आदिवासियों की ज़िन्दगी में अपराध का जहर घोलते हैं। कभी झारखंड में भी छत्तीसगढ़ जैसे हालात थे। लेकिन वहां नक्सलवाद की कमर टूट चुकी है। फिर भी वहां की कन्याएं बड़े पैमाने पर शोषित हैं। क्यों कि काम की तलाश में सैकड़ों गाँवों की हजारों लड़कियाँ महानगरों की ओर पलायन करतीं हैं। महानगरों तक पहुँचने के पहले ज्यादातर कन्याएं यौन हिंसा की शिकार होतीं हैं। महानगरों की कोठियों में भी उन्हें तमाम किस्म के समझौते करने पड़ते हैं।

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आदिवासी महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा से संबंधित खराब रिकॉर्ड हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के हालिया आंकड़े आदिवासियों के खिलाफ हुई हिंसा की घटनाओं को उजागर करते हैं। उसके तथ्यों में उन ‘विमुक्त जनजातियाँ’ की असंख्य पीड़ा छलकती है जो ज़माने से खानाबदोश हैं। ‘विमुक्त जनजातियाँ’ वर्ष 1871 में पारित एक ख़ास कानून के चलते संस्थागत दमन की शिकार रहीं हैं।

मई 2019 में द फ्री प्रेस जर्नल में के मुताबिक़ गैर-अधिसूचित जनजातीय महिलाओं ने गवाही दी है कि उनके साथ रोज जुल्म किया जाता है और बलात्कार किया है।’ उल्लेखनीय है कि गैर-अधिसूचित जनजातियां अनुसूचित नहीं हैं, इसलिए उनके पास विधायी सुरक्षा की कमी है, जिससे वे और भी कमजोर हो जाते हैं। खेदजनक तो यह है कि तथाकथित सभ्य समाज इन समुदायों को आज भी जन्मजात अपराधी ही मानता है। इस पूर्वाग्रह के चलते सुदूरवर्ती इलाकों में विमुक्त और घुमंतू जनजातियों की हजारों औरतें यौन हिंसा की भेंट चढ़तीं हैं।

बेशक, वन्य समाज में बढ़ते बलात्कार के मामले पितृसत्तात्मक हिंसा का एक और महत्वपूर्ण संकेत हैं। वैसे तो महिलाओं को समाज में उनकी जगह दिखाने के लिए बलात्कार या यौन हिंसा के कई अन्य रूपों का उपयोग एक उपकरण के रूप में किया जाता है। लेकिन आदिवासी अंचलों में क़ानून व्यवस्था का लचर होना, जातीय दबाव समूहों के साथ पुलिस की मिली-भगत और अदम्य गरीबी में समझौतावादी माहौल के होने के अलावा सेक्स का टैबू नहीं होना उस माहौल का निर्माण करता है जहाँ यौन सम्बन्ध बना लेना एक सहज व्यवहार माना जाता है।

लेकिन इन तमाम धारणाओं के बीच स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा का खतरा बहुत अधिक होता है। क्योंकि वे कामकाजी होती हैं, उनमें सहजता होती है और वे उन्मुक्त भी होतीं हैं। उनका माहौल और उनकी परवरिश नर और नारी के भेद से मुक्त होती है। साथ में गैर-आदिवासी समाज आदिवासी स्त्री को यौनाचार का सस्ता और सहज उपलब्ध साधन मानता है। कौन याद करता है पश्चिम बंगाल के नादिया जिले के हंसखाली के उस हादसे को? अपनी माँ के साथ मेला देखने गयी एक लड़की को अकेला पाकर उसके साथ पांच युवकों ने सामूहिक बलात्कार किया। बाद में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गयी। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि जंगलों-पहाड़ों में कुछ ही घटनाएं प्रकाश में आतीं हैं। कुछेक की जानकारी होती है तो उसका विरोध मुखर नहीं होता। जैसे वर्ष 2020 के जून के महीने में छत्तीसगढ़ में एक लड़की के साथ कथित तौर पर सुरक्षा बलों द्वारा बलात्कार किया गया था और बाद में उसे एक मुठभेड़ में मार डाला गया। देश को इस बलात्कार का कोई संज्ञान नहीं है।

प्रतिरोध मूलक समझे जाने वाले आदिवासी अपनी अस्मिता की हिफाजत के लिए जाने जाते हैं। इसके बावजूद उनके बीच की आधी आबादी भला कैसे दमित और शोषित हैं। यह विरोधाभास है। जंगलों-पहाड़ों का प्रकृतिजीवी समाज आत्माभिमान से लबालब समाज है। उसके आर्थिक तंत्र की धुरी स्त्री होती है। वह मेहनती तो होती है लेकिन सहनशील भी होती है। कर्मठता उसके संस्कार में रहता है और वह समूह में प्रतिरोध जताती है। उसकी मासूमियत सहजता ओढ़े रहकर प्रलोभन को पुरस्कार मान लेती है। चूँकि आदिवासियों में सेक्स कभी टैबू (वर्जना) नहीं माना गया किन्तु इस ढिलाई के कोई अन्यथा भरे मायने नहीं होते।

बेशक, सेक्स-सौंदर्य और सामाजिक सरोकारों में अपराध की कोई जगह आदिवासी समाज में नहीं रही है। लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि आदिवासी स्त्री हर किस्म के अपराध सहने को मजबूर है। क्योंकि पूंजीवादी समाज यह मानता है कि किसी आत्मनिर्भर समाज की धुरी को तोड़कर उस व्यस्था की चूलें हिलाई जा सकतीं हैं। जब तक चूलें नहीं हिलेंगीं तब तक सस्ता मजदूर और कौड़ियों के मोल उनकी रत्नगर्भा ज़मीन नहीं मिलेगी। तभी तो आदिवासी समाज की धुरी आज पूंजीवाद के निशाने पर है।

उल्लेखनीय है कि दुनिया की तमाम सभ्यताओं में ज़मीन-अस्मिता और वजूद की लड़ाईयों का सबसे बड़ा खामियाजा औरतों को भुगतना पड़ा है। औरतों के खिलाफ हिंसा के विरुद्ध उग्रता अमूमन दमित हो जातीं हैं। महान दार्शनिक ज्यां-पॉल सार्त्र लिखते हैं कि ‘दमित उग्रता को अभिव्यक्ति नहीं मिलती है तो यह महज शून्य में बदल जाती है।’ मध्यप्रदेश के भील और बरेला आदिवासी समुदायों के साथ ऐसा ही हो रहा है। सरकार के एक प्रोजेक्ट के लिए अपने मूल से उजड़े आदिवासियों के लिए उनकी ज़मीनी लड़ाई बेहद महंगी साबित हुई है। इस तरह की लड़ाईयों में पुलिसिया दमन में सबसे सहज निशाना औरतें बनतीं हैं। इनके अलावा, ईंट भट्ठों-खेती वाले इलाकों से लेकर छोटे-छोटे उद्योगों में काम करनेवाली आदिवासी स्त्रियां जमकर शोषित होती हैं ।

लोकतान्त्रिक समाज में एकता, समरूपता और समरसता की दुहायियों के बीच लिंग आधारित हिंसा महज संयोग नहीं है। बल्कि जल-जंगल-ज़मीन के लिए लड़ी जा रही लड़ाईयों के दमन के उपनिवेशवादी उपायों का सबसे बड़ा हथियार यौन उत्पीड़न होता है। इस हथियार के इस्तेमाल का मूल दर्शन यही है कि किसी समाज को मानसिक तौर से तोड़ने के लिए औरतों के खिलाफ जमकर हिंसा मचाई जाए। आज सरकार और पारम्परिक व्यवस्था के खिलाफ गोलबंद हुए गिरोहों के बीच की लड़ाईयों की आधी सदी बीत चुकी है। साथ में समाज के प्रभावशाली वर्ग के खिलाफ दलितों की लड़ाईयां सम्पत्ति के समान वितरण, मेहनत की हक़दारी और परम्परागत शोषण की व्यवस्था को ध्वस्त करने को लेकर है। जबकि आदिवासी साधन सम्पन्न हैं। भले ही उनके पास पूंजी का अभाव है। लेकिन देश के सम्पूर्ण आर्थिक ढांचे के बीच आदिवासी न सिर्फ कमजोर है बल्कि लाचार भी है। आजादी के 75 साल के जलसे वाले माहौल में वह भूख की लड़ाईयां लड़ रहा है। जबकि; वर्चस्व की लड़ाई’ तो चंद आदिवासी लड़ रहे हैं जिन्हें खुद को आदिवासी नेतृत्व, प्रतिनिधित्व और अवाम की आवाज घोषत कर अपने समाज की अभिजात्यता पर कब्जा करना है।

ये चंद आदिवासी ‘अति कुलीन’ होते हैं। वे अपने समाज की स्त्रियों के वजूद की लड़ाईयों का बिम्ब गढ़ते हैं लेकिन वे व्यक्तिगत लैंगिक हिंसा का लंबा प्रतिरोधात्मक आंदोलन नहीं रच पाते। इतना ही नहीं, नागर समाज के हाथों से बने कानून और उन्हें निभाने के संकल्पों की आत्मा आदिवासी महिलाओं के हकों के सवाल को दरकिनार कर देती है। अफ़्रीकी गुलामों के वंशज के रूप में प्रख्यात रहे लेखक फ्रेंज़ फेनॉन लिखते हैं कि ‘कुछ राजनीतिक व्यवस्थाओं की ख़ास विशेषता यह होती है कि वे अमूर्त सिद्धांतों की घोषणा करतीं हैं किन्तु निश्चित कमान जारी करने से परहेज करतीं हैं’– यह एक सभ्य जनित साजिश है जो औरत को सामूहिक अधिकारों से वंचित रखने के एक अदृश्य मॉडल को मजबूत बनाये रखती है। यही मजबूती औरतों को व्यवस्था के विरुद्ध लामबंद भी नहीं होने देती। क्योंकि ‘अति कुलीन’ को भी औपनिवेशिक राज्य तंत्र के धोवन बने आज की व्यवस्था का अंग बन जाना है। उन्हें भी उसी कल्चर को अपनाना है जो कल्चर समूची व्यवस्था को मंत्रालयों में स्थापित करता है। इस स्थापना की मूल भावना जल-जंगल-ज़मीन-जन और जानवर की तारतम्यता को तोड़ना है। लेकिन ‘अति कुलीन’ यह भूल जाता है कि जब भी यह युगीन तारतम्य टूटता है तो असंगठित उद्यमों के लिए आदिवासी समाज से हजारों मजदूरिनें पैदा होतीं हैं जो महज श्रमिक ही नहीं होतीं बल्कि सस्ते की सेक्स-ऑब्जेक्ट भी मान ली जाती हैं।

देश भर में आदिवासी औरतों के खिलाफ बढ़ती आपराधिक घटनाओं के गुनाहगार वे तमाम संस्थाएं हैं जो क़ानून-कल्याण और सुरक्षा के वादे और दावेदारियां परोसतीं हैं। कमाई के लिए उन औरतों का अपने मूल निवास से कहीं जाना, अपने समाज में अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ना और पूंजीगत संगठनों में श्रमिक बने रहकर उत्पादक होने के सपने देखते हुए ज़िन्दगी काट लेना उन्हें उस मुक़ाम पर ला छोड़ता है जहाँ शोषणवादी संस्कृति उन्हें अपने अंदर समेट लेती है।

ध्यान देने की बात है कि ओडिशा-झारखंड-मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तक़रीबन एक लाख अनब्याही माताएं सांसें ले रहीं हैं। उनमें से कितनों की बेटियों के साथ भी यौन शोषण के हादसे इस कारण हुए क्योंकि कानून का आबाल वृद्ध ढांचा वही है। लोगों का लिजलिजा नजरिया भी नहीं बदला। इस तस्वीर को बदलने के लिए गांवों को आत्मनिर्भर बनाना होगा और उसके केंद्र में स्त्रियों को रखकर क़ानून के परकोटों से सीधा सम्बन्ध स्थापित करना होगा। जब तक ग्रामीण स्तर के पूँजीवाद और औपनिवेशिक काल के थके-बुझे प्रशासन के बीच के रासायनिक बांड का वजूद बना रहेगा तब तक व्यवस्था और अपराधी की मजबूत साठगांठ का खामियाजा बिरसा की बेटियों को भुगतना पड़ेगा।

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अमरेंद्र किशोर
स्वतंत्र पत्रकार और लेखक के तौर पर मशहूर अमरेंद्र किशोर दिल्ली में रहते हैं। विकास और सामाजिक सरोकारों से गहरा नाता रखने वाले अमरेंद्र का दक्षिण-पूर्व एशिया के दुर्गम इलाकों में रहने वाले मूल बाशिंदों गहरी रूचि है। यही वजह है कि उनके लेखन में जन-सरोकार के मुद्दों की गहराई में जाने की झलक मिलती है। अपनी पत्रकारिता के ज़रिये ज़मीनी स्तर पर सामाजिक और लैंगिक मुद्दों, ग्रामीण जीवन की जटिलताओं, गरीबी की मार्मिक वास्तविकताओं तथा आदिवासियों की ज़िन्दगी में बढ़ती चुनौतियों के गहन अन्वेषण का काम अमरेंद्र ने बख़ूबी किया है। अमरेंद्र किशोर भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय में पुनर्वास और पुनर्स्थापन मामलों के सलाहकार, राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रोजेक्ट रिव्यू कमेटी और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी सामाजिक विकास पुरस्कार समिति के सदस्य रह चुके हैं। ज़मीनी स्तर पर सामाजिक सहभागिता और जागरूकता के अलावा समाज के सतत विकास कार्यों के सिलसिले में फोर्ड फॉउंडेशन, जापान फॉउंडेशन, वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम की परियोजनाओं के साथ भी बतौर परियोजना निदेशक काम किया है। अंग्रेजी मासिक ''डेवलपमेंट फाइल्स'' के कार्यकारी सम्पादक (2014-2020) भी रह चुके हैं। इन्होंने ओडिशा की अनब्याही माताओं के मुद्दे पर मुल्क की मीडिया को नई दिशा दी है। फिलहाल, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन की हजारों बाघ विधवाओं पर केंद्रित अनुसंधान में सक्रिय हैं। आदिवासी, पर्यावरण और लोकज्ञान पर आधारित अभी तक इनकी सात क़िताबें प्रकाशित हुई हैं। इनके निबंध संग्रह 'जंगल-जंगल लूट मची है' कृति को दिल्ली सरकार के हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कृत (2007) किया जा चुका है। लोकज्ञान पर आधारित इनकी बहुचर्चित कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' के लिए इन्हें लोकायत देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय सम्मान (2011) से नवाज़ा गया है। अमरेंद्र सासाराम के शांति प्रसाद जैन कॉलेज से अंग्रेजी में स्नातक (1991) हैं और भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से जनसंचार में पोस्ट-ग्रेजुएट डिप्लोमा (1994-95) की डिग्री ली है। इनकी पत्रकारिता भारतीय उप-महाद्वीप के आदिवासी समुदायों द्वारा झेली जा रही कठिनाइयों पर रोशनी डालती है और प्राकृतिक संसाधनों को स्थानीय जीवन से जोड़ने की तत्काल जरूरतों की वकालत भी करती है।

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