नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण पिछले एक हफ्ते से बेहद खतरनाक स्तर पर बना हुआ है। दिल्ली के अशोक विहार और बवाना में जहां AQI 495 दर्ज किया गया है वहीं हरियाण के गुरुग्राम में AQI लेवल 576 तक पहुंच गया है। दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी ने बढ़ते प्रदूषण को मेडिकल इमरजेंसी बताते हुए कहा है कि भाजपा शासित राज्यों में पराली जलाने से दिल्ली की हवा प्रदूषित हो रही है।
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में सरकारों को निर्देश दिया है कि प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए 12वीं तक के स्कूल तुरंत बंद किये जाएं। साथ ही एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) का स्तर नीचे लाने के लिए ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) स्टेज 3 और स्टेज 4 के सभी जरूरी प्रतिबंधों को लागू किया जाए।
जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा कि स्टेज 3 की पाबंदियां लागू करने में आपने देरी क्यों की। आप हमारी इजाजत के बगैर ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) स्टेज 4 से नीचे नहीं आएंगे। भले ही AQI 300 से नीचे ही क्यों ना आ जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित राज्य सरकारों को 5 निर्देश जारी किए हैं-
1. दिल्ली, हरियाणा और यूपी की सरकारें स्टेज 4 के प्रतिबंध तुरंत लगाएं और इनका सख्ती से पालन किया जाए।
2. इन राज्यों की एक टीम बनाई जाए जो स्टेज 4 के लागू होने पर नजर रखे।
3. अगर किसी तरह से प्रतिबंध का उल्लंघन किया जाता है, तो ऐसे केस सुलझाने के लिए मैकेनिज्म बनाया जाए।
4. जब तक हम अगला आदेश नहीं देते, तब तक स्टेज 4 GRAP लागू रहना चाहिए, भले ही AQI 300 से नीचे क्यों ना आ जाए।
5. 10वीं और 12वीं की क्लास अभी भी लग रही है, NCR में शामिल राज्य सरकारें तुरंत स्कूल बंद करने पर फैसला लें।
अब सवाल यह उठता है कि ये सब काम सुप्रीम कोर्ट का है या सरकारों का? क्योंकि इस तरह की प्रतिकूल परिस्थिति कोई पहली बार तो आई नहीं है। कई वर्षों से यह सब चल रहा है और दो-तीन हफ्ते के हल्ला-गुल्ला के बाद फिर ऐसा लगता है कि कुछ हुआ ही नहीं।
दरअसल, ये मसला पूरी तरह से पॉलिटिकल पॉल्यूशन का है। ये मुद्दा जनता का होना चाहिए। ये मुद्दा चुनाव का होना चाहिए। ये मुद्दा सिविल सोसाइटी का होना चाहिए। जब तक राजनीतिक दलों और सत्ताधारी दलों के अंदर प्रदूषण का एक्यूआई लेवल ठीक नहीं होगा तब तक आप दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हवा की शुद्धता और शुचिता की कल्पना नहीं कर सकते हैं।
मसला सिर्फ पराली का नहीं है। जब तक पराली पॉलिटिक्स की आड़ में वाहनों की हर साल बढ़ती संख्या से ध्यान भटकाने का अपराध करने वालों को सजा नहीं मिलेगी, समस्या जस की तस बनी रहेगी। सरकार और ऑटो सेक्टर के बीच का गठजोड़ जब तक बना रहेगा और सरकारी नीतियां ऑटो इंडस्ट्री के मनमाफिक बनती रहेंगी, समस्या जस की तस बनी रहेगी।




