अक्सर यह बात बहस-मुबाहिसों में शुमार होती है कि देश के समृद्ध इलाकों के लोग निर्धन हैं। यानी जिन इलाकों में कुदरत के कुबेर की युगीन मेहरबानी है वहां के लोग इतने बदहाल होते हैं कि आजादी हासिल किये जाने का मतलब समझ में ही नहीं आता। जैसे सात दशकों के बाद भी किसी तरह के बदलाव या सुधार का रास्ता इस देश में तय नहीं किया जा सका है। यह सच भी है कि यदि सब कुछ ठीक रहता तो फिर देश में निर्धनतम जनपदों की सूची सिस्टम और सरकार को चुनौती देती क्यों दिखती। इलाकों की समृद्धि से अलग हटकर संसाधनों की उपयोगिता और समाज की आजीविका के काम आने वाले संसाधनों की उपलब्धता और वितरण को लेकर देश के कोने-कोने से कई तरह के सवाल उभर रहे हैं। सवाल अनाज और पानी तक ही सीमित नहीं है बल्कि जीवन की हक़दारी और उससे आगे जीवन जीने के सवालों को लेकर भी है। तभी तो झारखण्ड के पाकुड़ जिले के एक पहाड़िया बहुल गाँव की सोमारी ने पूछा था कि उसकी गलती कहाँ है? उल्लेखनीय है कि साल 2019 में प्राथमिक इलाज के बगैर 20 दिन की उसकी नवजात बिटिया को बचाया नहीं जा सका।
उधर, व्यवस्था से सीधा सवाल नहीं पूछ सकने की विवशता लेकर जीने वाले ओडिशा के जाजपुर जिले के नागदा गांव के जुआंग आदिवासियों ने भी सत्ता पक्ष से जानना चाहा था कि उनका कसूर क्या है? क्योंकि साल 2016 में भूख-कुपोषण के कारण इन आदिवासियों के 20 बच्चों की मौत ने उन्हें सदमे में डाल दिया था। उसी राज्य के सुंदरगढ़ जिले के बोनाई अनुमंडल के किरी, केटा, कुण्डला और कुनु जैसे दर्जन भर गाँव के आदिवासियों ने भी अपना गुनाह इस मुल्क की व्यवस्था से पूछा था, जहाँ भात के बिना उपजे भुखमरी के हालात में दरवाजे-दरवाजे मौत के हरकारे दस्तक देने लगे थे। वैसे तो विकास से मुक्त बदहाल समाज को लेकर कही गयी ये बातें साधारण नहीं हैं। बल्कि यह एक बड़ा सच है। पिछले 40 सालों का भारत का राजनीतिक इतिहास खंगालिए तो बदहाल राज्यों में राजनीतिक नेतृत्व के तमाम प्रयोग और प्रयास पूरे किये जा चुके हैं। लगभग सारे राजनीतिक दलों को सूबों से लेकर केंद्र तक आजमाया जा चुका है। बल्कि जहाँ सत्ता में बदलाव का जोखिम उठाया गया, जहाँ राजनीति के तमाम प्रयोग किये गए, जहाँ लोकतंत्र के अनेकानेक अनुष्ठानों और कर्मकांडों का यज्ञ भी किया गया वहां ख़ास तौर से गरीबी-निर्धनता और वंचना के आंतरिक यथार्थ का सुरमयी रंग ज्यादा गहराया है।
इस प्रकार, गाँवों को लेकर कागजी आंकड़े कितने भी दुरुस्त क्यों न किये गए हों लेकिन विकास के तमाम नुस्खे असाध्य गरीबी के सामने निष्फल साबित हुए हैं। आरोपों की राजनीति या महिमामंडन की राजनीति के दो पाटों के बीच बहती सामाजिक न्याय और समरसता की धार में कल्याण, विकास, आत्मनिर्भरता जैसे शब्दों को निखारे जाने का जमकर प्रचार जरूर किया गया है। मगर पुरजोर लामबंदी के बाद भी गरीबी का दायरा सिमटने का नाम नहीं ले रहा है। समानता के नाम पर बिहार में मठों की ज़मीन अवाम में बांटने से लेकर जरूरी कानूनी प्रावधानों और समूचे देश में रोज़गारपरक कार्यक्रमों को कानून का जामा पहनाये जाने के बाद भी नतीजा संतोषजनक नहीं है। अन्यथा झारखंड में संतोषी को समय पर भात नहीं देने की विवशता क्या थी। ट्राइबल को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (ट्राईफेड) द्वारा वनोपजों के बिकने के सुचारु और मुकम्मल इंतजार की दावेदारियों के बरक्स आदिवासियों के अंतर्मन में भूखमरी का भय व्याप्त है। कार्यक्रमों और योजनाओं की भारी विफलता और देश की आबादी के एक बड़े हिस्से की बेचारगी के बीच अब आजादी के हीरक जयंती मनाये जाने का रंग जोर पकड़ता जा रहा है। जैसे उत्सव की आजादी हो या आजादी का उत्सव हो।फिर सवाल है कि आजादी का असली मकसद और मतलब क्या है? दूसरा प्रश्न है कि किसी भी जयंती का मनाया जाना क्या सोमारी को सुख दे सकेगा या संतोषी की आत्मा को शांति मिल सकेगी?
यह काल खंड जयंती के जश्न का काल है। आजादी के महानायकों और शिल्पकारों की जन्मशताब्दियाँ लगातार आ रहीं हैं। तो जश्न और जलसे का जोर लाजिमी है। यह सच है कि उन महानायकों ने जाति-जमात-धर्म और वर्जनाओं के खिलाफ एक से एक आंदोलन गढ़े हैं। दिवंगत पूर्वजों के योगदान से आजादी मिली है और उनके पद चिह्नों पर चलते हुए किसी ने बचपन बचाने की तसल्ली दी तो किसी ने जैव-संसाधनों के उपयोग से ग्रामीण विकास की रागिनी गाने का रूपक दिखाया। उन तमाम नायकों के नेतृत्व में विकास के देशज प्रारूपों की झड़ी लग गयी। जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से उपजे ज़मीनी और मुल्की मिजाज के लोगों ने देश के सुदूरवर्ती इलाकों में ठक्कर बापा के तर्ज पर उद्धार-कल्याण और सेवा के नाम पर समाज के समुन्नत विकास का संकल्प दोहराया। रेगिस्तानी-कच्छ और पहाड़ी इलाकों से लेकर डेल्टाई इलाकों में मानवता बचाने का महा उच्चार सुनने को मिला।
इंसान क्या जल-जंगल-ज़मीन और जानवर की चिंता में और उनके बीच के अन्योन्य रिश्तों की हिफाजत में हजारों क्या लाखों की संख्या में लोगों ने काम करना शुरू किया। इसके बाद विदेशी अनुदान की प्रकृति और रुझान को देखकर देश भर में एक से एक आंदोलन चलाये गए। बात वर्जनाओं-जुल्मों और वर्चस्व से मुक्ति से लेकर व्यक्तिक आजादी- हर तरह की स्वतंत्र और सामाजिक समरसता से लेकर गाँव की ओर चलने जैसे विचारोत्तेजक सामाजिक मुलम्मों की हुई- सदियों की बेड़ियों से मुक्ति की छटपटाहट में लोगों को ऐसे नारे-वादे बेहद लुभावने लगे। और इसी प्रक्रिया में इन प्रारूपों को सजा-संवारकर डेमोक्रेटिक दायरे में सरकार के फण्ड से ही सरकार की लानत-मलानत करते धुरंधर नायकों को देश-विदेश में महिमामंडित किये जाने का दौर चला। उन्हें एक से एक पुरस्कारों और सम्मान से नवाजा गया। लेकिन किसी ने यह सवाल नहीं पूछा कि समाज सेवा के इन इष्टजनों, आदर्शों और आईकॉन के अपने इलाके कैसे हैं? तभी तो उनके पुरस्कारों की महत्ता और सम्मान की प्रासंगिकता समझी जा सकती है।
इस देश ने समाज सेवा के क्षेत्र में सामाजिक लामबंदी के मामले में दुनिया भर में नाम कमाया है। स्थानीय संसाधनों की महत्तम उपयोगिता से मजबूत आत्मनिर्भरता और टिकाऊ विकास के एक से एक नजीर पेश कर विकसित देशों द्वारा स्थापित एक से एक पुरस्कारों को बटोरने का दमखम भी दिखाया है। लेकिन विडंबनाओं की फ़ेहरिस्त भी छोटी नहीं है। लगभग 74 साल पुरानी लोकताँत्रिक व्यवस्था में महिलाओं के बीच जीर्ण-शीर्ण साक्षरता दर को लेकर उदासी छा जाती है जब मध्यप्रदेश के अलीराजपुर (30.29%) और बीजापुर (50.46%) का सच खुलकर सामने आता है। इन दो जिलों के अलावा, महिलाओं की शिक्षा से जुड़ी बदहालियों को टटोलिये तो शुरू के दस जिलों में दांतेवाड़ा (32.54%), झाबुआ (33.77%), नबरंगपुर (35.80%), मलकानगिरी (38.28), नारायणपुर (39.88%), कुरुंगपुर कुमे (42.64%) और पाकुड़ (39.88%) जिले आदिवासी बहुल हैं। जबकि उत्तर प्रदेश का श्रावस्ती (34.78%) की स्थिति तो मलकानगिरी से भी बदतर है। दक्षिण ओडिशा के मलकानगिरी में दिमागी मलेरिया से देश में सबसे ज्यादा मौतें होतीं हैं। आंकड़ों के इस समीकरण में ये तमाम जिले उन्हीं वजहों से बेहद पिछड़े हैं जिन वजहों से देश के आदिवासी मुख्यधारा से बहुत दूर दीखते हैं। अन्यथा, 2011 की जनगणना में वैसे 93 जिले (पाकुड़ को छोड़कर) जहाँ आदिवासियों की आबादी 50 फ़ीसदी से ज्यादा हैं, बीजापुर (80%), अलीराजपुर (89%), दांतेवाड़ा (76.9%), झाबुआ (87%), नबरंगपुर (55.8%), मलकानगिरी (57.8%), नारायणपुर (77.4%) और कुरूंग कुमे (98.6%), जहाँ विकास के नाम पर दस दर्जन से ज्यादा केंद्रीय कार्यक्रम और परियोजना की जितनी राशि उलीचकर गैर-बराबरी के उन्मूलन की कोशिश की गयी। नतीजा सामने है कि निर्धनतम जिलों की सूची लंबी है।
पानी की तरह पैसा बहाये जाने के बाद भी कितना विकास हुआ। अब ओडिशा की राजधानी भुबनेश्वर में यूनाइटेड नेशन की चार विकास एजेंसी यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम, यूनाइटेड नेशन वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम, यूनाइटेड नेशन चिल्ड्रन फण्ड (यूनिसेफ) और यूनाइटेड नेशन पापुलेशन फण्ड के अलावा वर्ल्ड बैंक के ओरिसा फण्ड फॉर डेवलपमेंट इनिशिएटिव और यूनाइटेड नेशंस जॉइंट प्रोग्राम ऑन कन्वर्जन्स की मौजूदगी है। लेकिन वहां की जिंदगी में विडंबनाओं के अंबार हैं और साथ में विरोधाभास हैं। ओडिशा में सुखद नैसर्गिक सुंदरता है किन्तु वहाँ की जिंदगी सुखद नहीं है। लोगों के पक्के मकान हैं, घर में अनाज है, बैंक में खाते हैं, खाते में पैसे हैं–और कमाल यह है कि इसके बावजूद उनके पास चावलवाला खैराती कार्ड भी है। भयानक बर्बादी के बाद भी वहाँ कुदरती संसाधन हैं–जल-जंगल और जमीन हैं लेकिन वहाँ वंचना है, शोषण है और पलायन है। गाँवों में पंचायत है, वहाँ विभिन्न राजनीतिक दलों के एजेंट हैं, जनवादी विकास के पोस्टर हैं, पर उन्हीं गाँवों में राशनकार्ड गिरवी रखकर कर्ज जुटाते किसान हैं। बाहर जाकर अपना श्रम बेचनेवाले मजदूर हैं। नवजात शिशु बेचती माएँ हैं और बिन शादी किए माँ बनतीं बालाएँ हैं। फिर गलती कहाँ हो रही है?
अकेला ओडिशा ही क्यों, यवतमाल-मुर्शिदाबाद और बेलगाम को कोई भला कैसे भूल सकता है? देश भर में सबसे ज्यादा अनब्याही माताएं यवतमाल जिले में हैं। मुर्शिदाबाद मादा देह तस्करी में बहुत आगे है और बेलगाम में आज भी देवदासी प्रथा मौजूद है। इस तरह के कुत्सित व्यापार-कलंक प्रथाएं और नारी शोषण की बेलौस उपस्थिति के कारणों को ढूंढिए तो प्रश्न उठता है कि क्या देश में गरीबी और गुलामी पर विजय हासिल करने की कोई मुहिम पूरी हुई है? बाल दासता, बंधुआ मुक्ति, पतिता उद्धार से लेकर पहाड़ों और कुदरती संसाधनों को बचाने की कोई ज़िद्द सार्थक हुई है? तो फिर किस बात पर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की झड़ियाँ लगती चली आ रही है? क्या यह पूछना गलत होगा कि धरातल पर देशी-विदेशी अनुदान से किये गए कार्यों के किस अनुपात में वैश्विक और एशियाई स्तर के पुरस्कारों की आमद होती है।
इस बात के लिए कौन उत्तरदायी है कि उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के राजपुरा तहसील में मात्र 11.10 फीसदी महिलाएं साक्षर हैं तो राजस्थान के उदयपुर जिले के कोटरा तहसील में यह आंकड़ा 11.11% का है। एक बड़ा सच यह भी है कि उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा बाल मजदूर राजस्थान में हैं। जयपुर में देश के कुल बाल मज़दूरों का दसवाँ हिस्सा नरक के गिरफ़्त में है। विकास के विरोधाभास के ढांचे में बलिया जिला की तस्वीर कितनी डरावनी है जहाँ सालाना शिशु मृत्यु दर 52 है अर्थात देश के सर्वोच्च वैसे 100 जिलों में ओडिशा का बोलांगीर 71वें स्थान पर है जबकि बलिया 36वें पायदान पर है जहाँ शिशु मृत्यु दर औसत से कहीं ज्यादा है। अब शिक्षा का अलावा यदि सिंचाई की बात करें तो देश भर में सबसे ज्यादा संख्या में बड़े-मंझोले बाँध महाराष्ट्र में हैं जिनकी संख्या 1845 है। मगर इस राज्य की कृषि वाली भूमि का मात्र 16.78 फीसदी हिस्सा नहरों से सिंचित है। जबकि मरुस्थली राजस्थान (31%) और सूखे और अकाल के लिए बदनाम ओडिशा (33.16%) महाराष्ट्र से कहीं बेहतर हाल में है। क्या यह महज इत्तेफ़ाक है या इसके पीछे का सच कुछ और है। ध्यान रहे मध्य प्रदेश में बांधों की संख्या 905 है जो संख्या के लिहाज से देश में दूसरे स्थान पर है लेकिन यहाँ मात्र 28.20 प्रतिशत सिंचित कृषि भूमि नहरों से पानीदार है। इन बांधों से राज्य की धरती कितनी पानीदार होती है, यह देखना होगा? या नकदी फसलों के लिए इतने सारे बाँध बनाकर ख़ास इलाके को सिंचित किये जाने के मंसूबों को पूरा किया गया है?
विकास की सारी दावेदारियों और किसी हद तक कई मामलों में संतोषजनक उपलब्धियों के बावजूद आज भी देश के ग्रामीण इलाकों के 12.4 फ़ीसदी घरों में पीने के पानी का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हो सका है, ऐसा सरकार बताती है। ध्यान रहे कि कुंओं और हैंडपंप की मौजूदगी का मतलब पानी उपलब्ध होना नहीं है। सच्चाई यह भी है कि ग्रामीण इलाकों के 42 प्रतिशत घरों को डेढ़ से दो किलोमीटर पैदल चलकर पीने का पानी जुटाकर लौटना पड़ता है। इस दूरी को सरकार पाट नहीं सकी है तभी तो देश के नक़्शे पर डेगनमई जैसे गाँव (महाराष्ट्र) भी अस्तित्व में हैं जहाँ पानी के लिए कई पत्नियां रखे जाने की परम्परा आज भी मौजूद है। अधिकतम बांधों वाले राज्य महाराष्ट्र से जुड़ी ऐसी प्रथाएं विकास के वैसे विरोधाभास की बानगी हैं इसे समझने के लिए गाँवों की वास्तविक समस्या को क्षेत्रवार समझना होगा। क्योंकि बिहार के गाँव और कर्नाटक के गाँव की समझ, उनकी जरूरत और मनोभावनाएं अलग-अलग किस्म की हैं। बिहार में गाँव डूबते हैं तो साथ में कागजों पर पहले तालाब खोदकर बाद में उसे भरने का टेंडर भी निकाले जाने का इतिहास है। झारखंड के पलामू में कागज पर इतने कुएं खोदे गए हैं कि यदि उन्हें वास्तविक धरातल पर लाया जाए तो हर कदम पर कुआं दिखेगा। तभी तो प्यासों की सूची में पलामू काफी आगे दिखता है।
बहरहाल, सवाल सिर्फ सत्ता से नहीं समाज के उन महानायकों से भी पूछा जाना चाहिए। उन सारे नायकों से सवाल पूछा जाना चाहिए जिन्होंने अवाम के विकास, गरीबों के आत्मसम्मान और महिलाओं की आत्मनिर्भरता के सुहाने और सम्पन्न द्वीप बनाये हैं और उनके एवज में भारत सरकार से तरह-तरह के नागरिक सम्मान हासिल किये है। विदेशों से लाखों रूपये वाले पुरस्कार भी बटोरे हैं। यह सवाल महत्वपूर्ण है कि सरकारी खजाने से विकास के नाम का निकला पैसा और विदेशी अनुदान की सुनामी में बहकर आया डॉलर समाज के आखिरी छोर पर नहीं पहुँचने के पीछे की वजहें क्या हैं? क्या कुल 10 सालों में झारखण्ड में विकास-शिक्षा और सेहत के नाम पर लगभग 18 हजार करोड़ का विदेशी अनुदान समाज तक पहुँचने के बजाये सेवा के नाम पर सौदा पर खर्च किया गया या कोई और तरह के आंदोलनों में खपाया गया, इस बात का जवाब कौन देगा? इन अनुदानों के अनुपात में परिणाम क्या रहे, विकास की उपलब्धियों से जुड़े आंकड़े निकालिये। सारा खेल-तमाशा समझ में आ जाएगा। क्या बाल मजदूरी के नाम पर आया विदेशी अनुदान नक्सलियों के भयादोहन की भेंट नहीं चढ़ा या राज्य में शहरों के बीच उभरते शहरों को सम्पन्न बनाने और संपन्न कहलाने की होड़ में खर्च किया गया? यह सवाल भी है और जिज्ञासा भी।
यदि अनुदान के अनुपात में विकास का प्रयोग सफल नहीं दिखता या देश के नक़्शे पर बलिया, कोटरा और नारायणपुर दिखता है तो यह सवाल लाजिमी है कि लोकतंत्र के महल-मकान और मचान पर गरीबी की तमाम प्रजातियों को दूध-लावा-बतासा का भोग लगाने का खेल कब ख़त्म होगा? सच में, विकास के इन अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के रहते तमाम तरह की गरीबी की मौजूदगी भी अपने आप में एक सवाल है। यह सवाल लोकतंत्र को लांछित करती है। हाल के 20-25 सालों में, ख़ास तौर से भूमंडलीकरण और खुली बाजार व्यवस्था के बीच अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से लेकर ब्यूटी कांटेस्ट में भारत के बढ़ते दबदबे और साथ में गरीबी का ज़िद्दी प्रारूप यानी ‘दो बीघा ज़मीन’, ‘हज़ार चौरासी की माँ’ से लेकर ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ की जीवंतता कहीं कोई प्रायोजित खेल तो नहीं है? अन्यथा, जंगलों में रहनेवाले अल्प-शिक्षित या 11 फीसदी से भी कहीं कम साक्षरता की उपलब्धियाँ सजाये आदिवासी जब अंग्रेजी में लिखे ‘विकास विरोधी’ और ‘सरकार विरोधी’ पोस्टर लेकर जंगलों से और अपनी बस्तियों से निकलते हैं तो यह सवाल जरूर पूछना होगा कि विकास के नाम पर कार्यरत संस्थाएं और उनके संचालक बरगद महानायकों की जड़ें और शाखाएं कहाँ तक फ़ैली और पसरी हुई है। सरकार को यह जानने का हक़ है और ऐसा सवाल पूछने का अधिकार भी है।




