देश के करोड़ों आदिवासी अब अपनी परम्पराओं और टोला टप्परों के खूबसूरत प्रतिरूपों को देश के कई संग्रहालयों में सजा-संवरा देखेगें। फिलहाल ऐसे रंगारंग कौतुकालय गिनती के हैं। अभी हाल ही में एक खुशखबरी सुनने को मिली है कि देश की नई पीढ़ी को आदिवासी इतिहास के गौरव से अवगत करवाने और विभिन्न आदिवासी बहुल इलाकों में पर्यटन को नई गति देने के मकसद से देश भर में कई संग्रहालय बनाये जा रहे हैं। ये संग्रहालय संजातीय पहचान वाले लोगों के गीत, उनके संगीत, हस्तशिल्प और उनकी कला-कौशल को संरक्षित करेंगे और बढ़ावा देंगे।
देश के ये चुनिंदा इलाके हैं, गुजरात में राजपीपला, आंध्र प्रदेश में लांबासिंगी, छत्तीसगढ़ में रायपुर, केरल में कोझिकोड, मध्य प्रदेश में छिंदवाड़ा, तेलंगाना में हैदराबाद, मणिपुर में तमेंगलोंग, मिजोरम में केलसिह और गोवा में पोंडा, जहां ऐसे संग्रहालय निर्माणाधीन हैं जो मूलतः स्वदेशी मानव अवशेष और सांस्कृतिक विरासत के शो-केस बनेंगे। सरकार चाहती है कि इतिहास के जिन आदिवासी योद्धाओं ने ‘अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष’ किया और ‘झुकने से इनकार कर दिया’ इन संग्रहालयों के जरिये उनकी वीरता और देशभक्ति के कार्यों को राष्ट्रीय स्वीकृति दिलाने का यही सही समय और बेजोड़ माध्यम है।
सवाल है कि देश भर में आदिवासी किस हाल में हैं। उनके वीर योद्धाओं की कर्मभूमि में लोकतंत्र कितना खुशहाल है? उनके वंशज आज किन परिस्थितियों में जी-खा रहे हैं। इनके अलावा, एक बेहद महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि आदिवासियों के वीर-युयुत्सु पूर्वजों को लेकर सरकार की संवेदना कितनी अभूतपूर्व है। साथ में उन आदिवासियों के वीर पूर्वजों की जन्मस्थली, उनके वंशज और उनके लोग आज जीवन की वास्तविक जरूरतों से कितने संपन्न हैं, यह देखना होगा। आदिवासियों को लेकर सरकार का जागा अचानक प्रेम सराहनीय है किन्तु सवाल है कि क्या सरकार के सैकड़ों विकास कार्यक्रमों, औद्योगिक विकास के एक से एक हजारों अनुप्रयोगों और उनका निष्पादन जनजातीय भावनाओं-संवेदनाओं और परिकल्पनाओं को लेकर ज्यादा से ज्यादा सुग्राही है? क्या प्रकृति का सम्मान सरकार की प्राथमिकता में है? जिन भावनाओं, आस्थाओं और धारणाओं के साथ आदिवासी जल-ज़मीन-जंगल की हिफाजत के हिमायती हैं, क्या उसी गहनता-प्रबलता और उत्कटता के साथ विकास से जुडी परियोजनाएं गढ़ी जातीं हैं?
कहते हैं हाथ कंगन को आरसी क्या। इसके लिए देश में अभी तक बने 5334 बांधों, कोयले-गैस-परमाणु शक्ति से संचालित 399 विद्युत-गृहों के अलावा 6000 से कहीं ज़्यादा फैक्ट्रीज, 1375 खदानों से प्रभावित इलाकों और वहां के रहवासियों के उजड़े जाने की ज़िंदा कहानियां जानिए। इन कहानियों से यह जानने में मदद मिलेगी कि इन 75 सालों में कैसे देश के विकास, उसकी समपन्नता और समृद्धि के नाम पर समूचे भारत में लगभग ढाई करोड़ मूल वाशिंदे विस्थापित हो गए। कैसे उनकी संस्कृति और जीवन के सरोकार सिमट गए, धुल गए या उनका समूल नाश हो गया। तभी तो उनकी रंगारंग संस्कृति, रुचिकर जीवन शैली और उनके जीवंत मिजाज को संग्रहालयों में सजाने की नौबत आ गई।
आदिवासियों को देशभक्ति-राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता से जोड़ने के पहले सरकार को यह समझना होगा कि आदिवासियों ने भौगोलिक सीमाओं की हिफाजत या विदेशी सत्ता को भगाने के मकसद से अंग्रेजों से लड़ाईयां नहीं लड़ी थीं। किसी धरोहर, किसी सम्पदा या रियासत की सम्प्रभुता के मोह से भरी उनकी कोई बगावत नहीं थी। बल्कि काकोरी-मेरठ-चौरा चौरी जैसे तीर्थों से असम्बद्ध दूरस्थ के इन रहवासियों की लड़ाई मुल्की लड़ाई की उन भावनाओं से ओत-प्रोत थी जिसका मूल मकसद था अक्षत ज़मीन की शुद्धता बरकरार रहे। क्योंकि अंग्रेजों ने जंगलों में जंगलों में हस्तक्षेप शुरू किया था। लिहाजा जंगलों की शुचिता बनी रहे और तमाम जल संकायों का वैभव कायम रहे, आदिवासी यही चाहते थे। क्योंकि वन्य समाज का अस्तित्व इन्हीं तीन प्राकृतिक अवयवों पर आधारित है।
आजादी के बाद आदिवासी यह मुल्की लड़ाई अपने ही मुल्क के लोगों से हार गए। फिर यह आत्मचिंतन का मसला है कि देश की सरकारों ने कुदरत के इन तीनों अवयवों का सम्मान किया? क्या शासन की पद्धति, कानून का आग्रह, व्यवस्था का नजरिया मुल्की लड़ाईयों के तात्पर्य और उसके भावार्थ को लेकर आभारी दिखा? फिर संग्रहालयों में आदिवासी संस्कृति, जनजातीय जीवन और उनकी कला दिखाने का मूल मकसद क्या है? आदिवासी रहवास को विशिष्ट रंगों सी भरी रोशनी से नहला कर जो बिम्ब सिरजा जाता है, क्या कभी उतना ही खूबसूरत दिखता है जनजातीय भारत का कोई समाज, कोई घर या कोई इलाका?
एक ओर निष्ठुर नीतियों और दूसरी ओर ज़ालिम नियमों से आदिवासियों को उनके टोला-टप्परों से उजाड़ा जा रहा है लेकिन दूसरी तरफ उसी संस्कृति को लेकर संग्रहालय की विविध कला दीर्घाओं में जनजातीय जीवन शैली की सम्मोहक सजावट की जाती है। संग्रहालय के पक्ष में यह बात मायनेखेज है कि आदिवासी प्रथाएं पौराणिक विचारों पर आधारित होतीं हैं, इसलिए उनकी हिफाजत और प्रदर्शन जरूरी है। यह पूजा और बलिदान की कहानियों, संकेतों और प्रतीकों के महत्व, आध्यात्मिक ऊर्जा, अदृश्य शक्ति, अलौकिक लेकिन व्यावहारिक दर्शन से लबालब होतीं हैं। चूँकि जनजातीय संग्रहालय वन-संस्कृति के सौंदर्यशास्त्र का रंगा-रंग महिमामंडन करते हैं इस वजह से साधारण सा दिखने वाले आदिवासी जीवन को कला रूपों में समाहित कर उसे अलौकिक होने का प्रयास करता है। मुल्क को बताया जाता है कि इन संग्रहालयों के बूते वन्य समाज के एक से एक आवासों, उनके अनुष्ठानों, गहनों, उनकी कलाकृतियों की रंगीन स्थापना के जरिये आदिवासी विरासत की दंतकथाओं से लेकर कहावतों और लोकगीतों को सुनने का मौक़ा मिलता है, जिसके जरिये एक अबूझ संसार को समझने का अवसर मिलता है।
यह सच है कि ऐसा कहा जाता है कि संग्रहालय की सारी कलाकृतियां आदिवासियों द्वारा ही बनाई गई हैं, लेकिन क्या कोई यह जानने की कोशिश करता है इन दस्तकारों और कारीगरों को मौजूदा दौर में किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ रहा है? दलील है कि संग्रहालय का मूल उद्देश्य है जनजातीय जीवन शैली को समझना और उसे आम जनता तक पहुँचाना। लेकिन जरूरी क्या है- आदिवासियों की देहरी पर दम तोड़ती कला और संस्कृति को बचाना या उनकी परम्परा की ममी (पुराना परिरक्षित शव) संग्रहालयों में सजाकर टिकटों से पैसे बटोरना? या फिर संग्रहालयों को ज्यादा खूबसूरत बनाने के नाम पर संस्कृति के नाम का करोड़ों का फंड उलीचना।
इसमें कोई दो राय नहीं कि आदिवासियों के जीने की हक़दारी के नाम पर रोजगारपरक कार्यक्रम हैं, सुरक्षा और आत्मसम्मान के लिए सख्त क़ानून हैं और साथ ही जीवन में तरक्की के रास्ते प्रशस्त करने के लिए आज मंत्रालय-आयोग और बेशुमार प्राधिकरण हैं। किन्तु सच यह भी है कि जनजातीय ज़िन्दगी की बदरंग सचाईयाँ तमाम विरूपताओं के साथ उमड़ने लगतीं हैं। लोकतंत्र के धरोहर बनी एक से एक स्वतंत्र संस्थाएं न बाना गोंड जनजाति के ख़ास वाद्य यंत्र और न ही छत्तीसगढ़ के भरेवा, घड़वा की हिफाजत में समर्थ दीखते हैं। उन आदिवासियों के यानी बस्तर-उदयपुर-पलामू-गुमला की ज़िन्दगी में एक से एक परम्पराएं हैं, प्रथाएं हैं और विश्वास हैं लेकिन वहां संविधान और क़ानून कारगर नहीं रहते- यकीन नहीं हो तो इंटरनेट के सर्च इंजिन पर आदिवासी समाज के हादसों, उनके हतभाग और दृष्टांतों से जुड़े शब्द इन जगहों के साथ जोड़कर लिखिए। माजरा समझ में आ जाएगा। कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। अब जनजातीय कला और उत्पाद के बिचौलियों का कारोबार भी दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक्की करता दिख रहा है। इस बारे में सरकार की निष्क्रियता पर सवाल उठाया जाना जरूरी है।
यह खुशी की बात है कि देश का गैर-आदिवासी लोकमानस इस बात को समझता है कि इस मुल्क में आदिवासी कहा जाने वाला एक समाज आज भी ज़िंदा है जो देशज मूल्यों की हिफाजत का हिमायती है। उस समाज में भावनाओं की उर्वर खेती का दौर अभी ख़त्म नहीं हो पाया है। यह दिखाने की बात नहीं है बल्कि उन गाँवों में जाकर घर की नई बहू के पीतल के कंगन देखना आत्माभिमान होगा जिस कंगन पर उर्वरा शक्ति के प्रतीक स्वरूप खेत में खड़ी फसल, वृक्ष, कुआँ, बावड़ी और जीवन चक्र से जुड़े अन्य प्रसंगों का जिक्र रहता है। यही कंगन-कड़ा हाथ में लेकर बहू बुआई के लिए बीज तैयार करती है। बेहतर यही होता कि आदिवासियों को प्रदर्शनी-संग्रहालय और नुमाईश-तमाशों से दूर रखे जाने की पहल हो। जिन गाँवों में रेसकुल पेड़ के नीचे टटल देवी का स्थान है उस स्थान की नक़ल भोपाल, रायपुर या अन्य जगहों पर दिखाने की जरूरत नहीं है। जिस गाँव में किसी व्यक्ति अथवा जानवर के हाथ-पैर टूटने पर टटल देवी की कैसे मन्नत की जाती है, कैसे ठीक होने के बाद, उस मन्नत वाली पर लकड़ी से बना हाथ या पाँव, काली चूड़ियां, मुर्गा आदि चढ़ाकर पूजा की जाती है, उस जगह का मान बढ़ाने की बात हो, न कि उनकी नक़ल के प्रतिरूप भोपाल-रायपुर में सजाकर कर्तव्यों से इतिश्री की जाए।
संग्रहालय बनाना बड़ी बात है लेकिन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है उन गाँवों को बचाना जिनकी पहचान वे जनजातीय मूल्य हैं, सोच और शैली है जिसे लेकर दुनिया भर की जिज्ञासाएं हैं। इस देश के आदिवासियों की सैकड़ों जातियां हैं, जिनके अपने सरोकार हैं, अपने तरीके से जीने-रहने की परम्परा है। उनके धर्म हैं, विश्वास है, आस्थाएं और धारणाएं हैं। टोटेम हैं, अनुष्ठान के रिवाज हैं। कहीं वंश परम्परा पर जोर है, कहीं वन देवी हैं तो कहीं कुल देवता हैं। विचारों पर छाया मिथकों का संजाल है, रोजमर्रे की ज़िन्दगी में यदि पूर्वजों से प्रभावित ग्रहणबोध हैं तो आत्माओं की अनुभूतियाँ भी हैं। लेकिन बेहद बेदर्दी से इनकी बेपरवाही हुई है। उनकी बोलियों की गहराइयां हैं। नृत्य के अभिप्राय हैं। किसानी के लोकाचार हैं और अनाज-वनोपज से लेकर शिकार से जुड़ी एक से एक बोध कथाएं, लोकोक्तियाँ और पहेलियां हैं।
जीवन की रोचक आख्यिकाएं, जीवंत संकेतिका और दिलचस्प अनुश्रुतियाँ हैं। इनमें से ज़्यादातर अब बिला गयीं हैं। सरकार का फ़र्ज़ था इन सबको उसी ज़मीन और माहौल में बचाना, सहेजना जहाँ सैकड़ों क्या हजारों साल से आदिम सभ्यता खिलकर अपने परवान चढ़ी है। इन तमाम खूबियों के संवर्द्धन की विभिन्न नीतियां बनाकर हर आदिवासी बहुल गाँव में संग्रहालय बनाकर जनजातीय परम्परा का भरपूर सम्मान और पहचान देना जरूरी था। एक जलविद्युत परियोजना के निर्माण के कुल खर्च में देश की तमाम बोलियों के शब्दकोश बनाये जा सकते थे। देश भर में गाँव के स्तर पर पांच हजार जनजातीय गाँव ज़िंदा संग्रहालयों में तब्दील किये जा सकते थे।
लेकिन यह तमाशों का दौर है। दिखावे और दावेदारों का कालखंड है। ज़्यादा से ज़्यादा दिखाकर तमाशा की तालियां लूट लेना है। किन्तु समझना होगा- किसी जाति या जनजाति को तमाशा बना देना उसकी मौलिकता पर ऐसा कुठाराघात है जिससे वे अपनी मौलिक पहचान से बेहद दूर धकेले जा सकते हैं। क्योंकि जिस बेदर्दी से विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी ज़मीन से हटाकर कहीं और बसाया जाता है तो उनकी वास्तविक पहचान, उनकी संजातीय चेतना और स्थानीय प्रकृति से अपने वंशानुगत तारतम्य से उनका नाता टूट जाता है। जब तक इस टूटते तारतम्य पर विराम नहीं लगता जनजातीय संग्रहालयों का सोप ओपेरा चलता रहेगा।




