हर्षवर्धन त्रिपाठी
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी पर हमेशा कांग्रेस यह कहते हमलावर रहती है कि नेहरू जी की कोई बराबरी नहीं कर सकता और लगे हाथ यह भी कहती है कि हर बात में नेहरू को बीच में क्यों लाते हो। अब एक बार फिर से जवाहर लाल नेहरू और नरेंद्र मोदी की तुलना हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के दो वर्ष पूरे हो गए हैं। इसके साथ ही प्रधानमंत्री पद पर रहते लगातार 12 वर्ष हो गए। लगातार जनता के मतों से जीतकर सर्वाधिक समय तक प्रधानमंत्री रहने के जवाहर लाल नेहरू के रिकॉर्ड को अब दूसरे स्थान पर याद किया जाएगा। पहले स्थान पर अब नरेंद्र मोदी हैं। हालांकि जवाहर लाल नेहरू 1952 का पहला चुनाव जीतने से पहले भी प्रधानमंत्री थे, लेकिन तब वह जनता के सीधे मतों से नहीं चुने गए थे। गांधी जी तय करते तो शायद सरदार वल्लभभाई पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते।
खैर, जो नहीं हो सका उसकी क्या ही बात करना, लेकिन सर्वाधिक समय तक चुने हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है? लगातार जनता के मतों से चुनकर 4399 दिनों से प्रधानमंत्री पद पर आसीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए आसान नहीं रहा। भारत की उस समय की स्थितियां आजादी के समय से अधिक आपदा जैसी थी। आजादी के पश्चात् देश जवाहर लाल नेहरू से कोई बड़ी उम्मीद नहीं पाल रहा था। देश के लोगों के लिए स्वतंत्र भारत में सांस लेना ही सबसे बड़ी राहत की बात थी। जवाहर लाल नेहरू हमारे मतों से चुनकर प्रधानमंत्री बने हैं, इतना ही पर्याप्त था। जवाहर लाल नेहरू के किसी भी निर्णय की आलोचना क्या सामान्य सुधार की दृष्टि से भी नहीं देखा जाता था। जवाहर लाल नेहरू की सरकार का हर निर्णय भारत की बेहतरी के लिए ही हो रहा है, ऐसी सामान्य अवधारणा जनमानस में स्थापित थी। विपक्ष सशक्त नहीं था और विपक्ष के नेता भी ‘पंडितजी’ के आभामंडल से इतने प्रभावित रहते थे कि नेहरू जी को हटाकर प्रधानमंत्री बनना है, इसके बजाय नेहरू जी के प्रधानमंत्री रहते अपना अस्तित्व, प्रासंगिकता बनी रहे, इसकी भर लड़ाई लड़ रहे थे।
इसके ठीक उलट लगभग डेढ़ दशक से एक राज्य के सर्वाधिक सफल मुख्यमंत्री होने के बावजूद प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी का हर निर्णय जबरदस्त आलोचना और कुतर्क से भरे हमलों के केंद्र में रहा और अभी भी वही है। मई 2014 में प्रधानमंत्री बनने के पहले दिन से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पंडित नेहरू के बनाए ‘तंत्र’ से लड़ते हुए भारत के विकास की गाथा लिखना था। उस ‘तंत्र’ को प्रतीक के तौर पर समझना हो तो मणिशंकर अय्यर से समझ सकते हैं। मणिशंकर अय्यर के चेहरे पर लिखा था कि उन्होंने नरेंद्र मोदी को ‘नीच’ कहा भर नहीं था, उसी भाव से देखते ही थे। यही भाव था जो जनता के लगातार दिए जा रहे मतों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री स्वीकार करने को तैयार नहीं था। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भारत की विकास गाथा भले न लिखी हो, भले ही भारत का स्व पूरी तरह से अंग्रेजों की भाषा-भूषा, शिक्षा पद्धति में विलीन कर दिया, लेकिन एक काम जवाहर लाल नेहरू ने मौलिक कर दिया। जवाहर लाल नेहरू ने अपना ‘कल्ट’ जरूर तैयार कर दिया। एक ऐसा ‘कल्ट’ जो भले ही कहे कि मैं राहुलियन नहीं हूं, लेकिन नेहरूवियन हूं। वही ‘कल्ट’ अपने प्रोफाइल में आज भी नेहरू का चित्र लगाए रखता है। इसका अर्थ सामान्य नहीं है।
दरअसल, यह ‘कल्ट’ ब्रिटिश सरकार से आसानी से नेहरू सरकार पर स्थानांतरित भर हो गया है। इस ‘कल्ट’ के लिए भारत का स्व, भारत का नवाचार, भारत का विचार, भारत की संस्कृति, भारत का धर्म, भारत की भावना यह सब हास्य का विषय थी क्योंकि, इस ‘कल्ट’ को आज भी लगता है कि भारत आयातित विचार, आयातित भाषा और आयातित संस्कृति से नेहरू जी की तरह ‘भारत एक खोज’ कर सकता है। यही वजह रही कि लंबे समय तक आयातित विचार, आयातित भाषा और आयातित संस्कृति से आह्लादित वर्ग यही मानने को तैयार नहीं हुआ कि भारत के स्व की बात करके भारत में पूर्ण बहुमत की राजनीति सफलतापूर्वक की जा सकती है। आयातित अंग्रेजी और कम्युनिस्ट विचार ने भारत को हीन करने की हर साजिश सफलतापूर्वक नेहरू के शासनकाल से लेकर राजीव गांधी के शासनकाल में की और डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में साजिशकर्ता प्रमुख भूमिका में रहे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे बड़ी चुनौती के तौर पर लिया और ‘गुजरात मॉडल’ जैसी आसानी से समझ आने वाली शब्दावली में भारत के स्व को जगाने वाला बड़ा मॉडल प्रस्तुत किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दुत्व के साथ विकास की अवधारणा को ही सरल शब्दों में हिन्दू एकता कहता है। नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के तौर पर यह सब सहजता से आत्मसात कर चुके थे। गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर जब संघ का प्रचारक बैठा तो भारत के स्व को जगाने का पायलट प्रोजेक्ट गुजरात से शुरू कर दिया। संघ और भाजपा से चिढ़ने वाली जमात मोदी से भयानक नफरत करती है क्योंकि, मोदी ने वह सब करके दिखा दिया, जिसकी कल्पना किसी को नहीं थी। वह था, भारत के लोगों को यह अहसास करा देना कि हम सब कुछ अपना करके ही अपना बेहतर कर सकते हैं। हिन्दुत्व और विकास का यह मॉडल नई पीढ़ी को, नौजवानों को गणित के सबसे आसान सूत्र की तरह रटा गया। हिन्दुत्व और विकास का यह सूत्र भारत के किशोरों, नौजवानों को ऐसे रटा गया है कि हर समस्या के समाधान के लिए उसी सूत्र को आजमाने लगे। उत्तर प्रदेश से शुरू होकर हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार और अभी पश्चिम बंगाल उसी सूत्र की सफलता के साक्षात उदाहरण बन गए हैं।
हिन्दुत्व और विकास के सूत्र को ही नरेंद्र मोदी ने और सरल करके आत्मनिर्भर भारत का नाम दे दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्वदेशी अवधारणा भी तो यही है। गांधी जी भी इसी स्वदेशी की बात करते थे। स्वतंत्रता आंदोलन में विदेशी वस्त्रों की होली जलाना भी तो यही था, लेकिन देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार गांधी जी के विचारों के ठीक उलट चल पड़ी। देश का गर्व धूल-धूसरित करते अंग्रेजीदां नेहरू ने देश का भाव हीन कर दिया। उसी का एक प्रमाण था तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर के पुनरूद्धार में जाने से रोकना। अब श्रीराम मंदिर पर धर्म ध्वजा फहरा रही है। काशी विश्वनाथ धाम से लेकर प्रयागराज संगम तीरे तक सम्पूर्ण विश्व भारत के वैभव का दर्शन कर रहा है। हिन्दू ग्रोथ रेट का अर्थ विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, यह स्थापित हो चला है। आत्मनिर्भर भारत ने कोविड काल से लेकर हर आर्थिक संकट के वक्त भारत को अच्छे संभाल लिया है। भारतीय वैक्सीन से लेकर सेमीकंडक्टर तक, भारत का स्व विश्व पर प्रभावी दिखने लगा है। ऑपरेशन सिन्दूर रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत का एक सशक्त प्रमाण है।
मोदी सरकार ने सिर्फ मंदिर बनाए, ऐसा नहीं है, लेकिन मंदिर बनने के साथ और क्या किया, उसे जानने से समझ आएगा कि मंदिर वाला भारत ही स्वर्णिम भारत क्यों रहा होगा। मोदी सरकार के 12 वर्षों में रक्षा निर्यात 33 गुना, सेमीकंडक्टर शून्य से विश्व के अग्रणी देशों के मुकाबले में, भारत में मोबाइल निर्माण 6 करोड़ से लगभग साढ़े पांच गुना बढ़कर 33 करोड़ प्रति वर्ष से अधिक, डिजिटल भुगतान न्यूनतम से 18 बिलियन प्रति माह, 11 करोड़ नए शौचालय, ईवी चार्जिंग स्टेशन नगण्य से 25 हजार से अधिक, हर घर बिजली पहुंच गई, 4 करोड़ पक्के घर गरीबों के लिए बन गए, कोयला उत्पादन 565 मिलियन टन से एक बिलियन टन, सौर ऊर्जा 42 गुना बढ़कर 110 गीगावॉट से अधिक, गैस पाइपलाइन 15 हज़ार किलोमीटर से बढ़कर 25 हजार किलोमीटर से अधिक, LPG हर घर में पहुंच गई, पीएनजी कनेक्शन 25 लाख से बढ़कर पौने दो करोड़ घरों तक पहुंच गया, मेट्रो रेल चार गुना बढ़ गई, रेलवे इलेक्ट्रीफिकेशन तीन गुना, एक्सप्रेसवे लगभग सात गुना, हवाई अड्डे ढाई गुना और बंदरगाह साढ़े तीन गुना बढ़ गए। अपनी पहचान बनाने में सफल भारत की यह विकास यात्रा है।
जवाहर लाल नेहरू ने अगर स्व की पहचान करने का अवसर नहीं गंवाया होता तो भारत भी चीन की ही तरह 80 के दशक तक विश्व की महाशक्ति होने के रास्ते पर बढ़ चला होता, लेकिन नेहरू के गंवाए अवसर की वजह से देश पिछड़ गया। अब देश को अपनी शक्ति का अहसास है। मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में स्व का भाव जगाया है। भारत की सही मायने में पहचान कराई है। जवाहर लाल नेहरू के पास यह आसान अवसर था, जिसे उन्होंने खो दिया और देश को अंग्रेजी शासन पद्धति का ही विस्तार दिया। अभी भी उसे पूरी तरह से हटाया नहीं जा सका है, लेकिन नरेंद्र मोदी ने उस दिशा में बहुत तेजी से काम किया है। इसी रफ्तार से इस सही दिशा में चलते रहे तो भारत का विश्व गुरु होना इतिहास का नहीं, वर्तमान का प्रतीक हो जाएगा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)





दोनों प्रधानमंत्री के बारे में बेहतरीन आकलन। ऐसी समग्र जानकारी देने के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई। प्रधानमंत्री नेहरू ने आज जहां मजबूत भारत की न्यू रखी थी, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने विषम परिस्थितियों में देश को एकजुट और स्थिर रखा। दोनों ने अलग-अलग विचारधारा के होने का बावजूद देश के लोकतंत्र के लिए एक मजबूत स्तंभ के रूप में काम किया।