प्रवीण कुमार
दृढ़ निश्चयी और किसी भी परिस्थिति से जूझने व जीतने की क्षमता रखने वाली देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने न केवल इतिहास बल्कि पाकिस्तान को विभाजित कर दक्षिण एशिया के भूगोल को ही बदल डाला और 1962 के भारत-चीन युद्ध की अपमानजनक पराजय की कड़वाहट धूमिल कर भारतीयों में जोश का संचार किया।
रूसी क्रांति के साल 1917 में 19 नवंबर को पैदा हुईं इंदिरा गांधी ने 1971 के युद्ध में विश्व शक्तियों के सामने न झुकने के नीतिगत और समयानुकूल निर्णय क्षमता से पाकिस्तान को परास्त किया और बांग्लादेश को मुक्ति दिलाकर स्वतंत्र भारत को एक नया गौरवपूर्ण क्षण दिलवाया।
स्वप्नदर्शी राजनेता जवाहर लाल नेहरू ने भारत में कई महत्वपूर्ण पहल कीं, लेकिन उन्हें अमली जामा इंदिरा गांधी ने पहनाया। चाहे रजवाड़ों के प्रिवी पर्स समाप्त करना, बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो अथवा कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण। इनके जरिये उन्होंने अपने आप को गरीबों और आम आदमी का समर्थक साबित करने की कोशिश की।
राजनीति में कदम रखने पर कुछ लोगों ने इंदिरा को ‘गूंगी गुड़िया’ कहा था। लेकिन वह सदैव अपने विरोधियों पर बीस साबित होती थीं। नटवर सिंह कहते हैं, ‘इंदिरा गांधी हमेशा अपने विरोधियों पर भारी पड़ती थीं। चौथे राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी की जगह वीवी गिरी को जिताकर उन्होंने इसे और पुख्ता किया था।’
बीबीसी के पूर्व संवाददाता मार्क टुली ने लिखा है, ‘इंदिरा गांधी को ‘दुर्गा’, ‘लौह महिला’, ‘भारत की साम्राज्ञी’ और भी न जाने कितने विशेषण दिए गए थे जो एक ऐसी नेता की ओर इशारा करते थे जो आज्ञा का पालन करवाने और डंडे के जोर पर शासन करने की क्षमता रखती थीं।’
वरिष्ठ समाजशास्त्री आशीष नंदी लिखते हैं, ‘नेतृत्व की पहचान गुडी गुडी छवि के लिए नहीं, उसके मजबूत समर्थन और विरोध से बनती है। ऐसा न उसके चाहने से होता है, न उनके विरोधियों के चाहने से।
कठिन चुनौतियों का सामना करते हुए उन्हें मजबूती से कुछ चीजों के, कुछ मूल्यों के पक्ष में खड़ा होना होता है और कुछ की उतनी ही तीव्रता से मुखालफत करनी होती है। आज भारत के इतिहास में इंदिरा गांधी की छवि कुछ ऐसे ही संकल्पशील नेता की है।’
इंदिरा प्रियदर्शनी गांधी का जन्म 19 नवम्बर 1917 को इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश के आनंद भवन में नेहरु खानदान में हुआ था। वह भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु की इकलौती बेटी थीं।
इंदिरा का नाम इनके दादा पंडित मोतीलाल नेहरु ने रखा था। यह संस्कृतनिष्ठ शब्द है जिसका आशय है कांति, लक्ष्मी एवं शोभा। इनके दादा को लगता था कि पौत्री के रूप में उन्हें मां लक्ष्मी और दुर्गा की प्राप्ति हुई है।
पंडित नेहरु ने अत्यंत प्रिय देखने के कारण अपनी पुत्री को प्रियदर्शिनी के नाम से संबोधित किया था। इंदिरा को एक घरेलू नाम भी मिला जो इंदिरा का संक्षिप्त रूप ‘इंदु’ था।
कहते हैं कि जब इंदिरा 14 साल की हो गई तब उन्हें पहली बार पूना के पीपुल्स ऑन स्कूल में सीधे सातवीं कक्षा में दाखिला कराय गया था। इतने दिनों तक इंदिरा ने स्कूल का मुंह नहीं देखा था। पिता आजादी के आंदोलन में व्यस्त थे और मां कमला नेहरु अक्सर बीमार रहती थीं। घर का वातावरण भी पढ़ाई के अनुकूल नहीं था। कांग्रेस कार्यकर्ताओं का रात-दिन आनंद भवन में आना जाना लगा रहता था। इसलिए पंडित नेहरु ने बेटी की शिक्षा के लिए घर पर ही शिक्षकों का इंतजाम कर दिया था।
इंदु को आनंद भवन में ही शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जाता था। 1934 में इंदिरा ने 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। काफी सोच-विचार के बाद पंडित नेहरु ने निश्चय किया कि वह अपनी बेटी इंदिरा को शांति निकेतन में पढ़ने के लिए भेजेंगे।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर उन दिनों कोलकाता से कुछ दूरी पर प्राकृतिक वातावरण में ‘शांति निकेतन’ नामक एक शिक्षण संस्थान चला रहे थे। वहां का रहन-सहन एवं सामान्य जीवन सादगी से परिपूर्ण था। इंदिरा का स्वास्थ्य भी इन दिनों बहुत अच्छा नहीं था। इसलिए पंडित जवाहरलाल नेहरु ने अपनी बेटी का दाखिला शांति निकेतन में करवा दिया।
सामान्यत: अमीरी में पले बच्चों के लिए वहां टिक पाना कठिन था। लेकिन इंदिरा ने सख्त अनुशासन तथा अन्य नियमों का पूर्णतया पालन किया। इंदिरा में अध्ययन से इतर लोक कला और भारतीय संस्कृति में भी रुचि जाग्रत की गई। इंदु ने शीघ्र ही मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य में दक्षता हासिल कर ली।
शांति निकेतन की एक अतिरिक्त विशेषता यह थी कि वहां के सभी अध्यापक अपने विषयों के धुरंधर ज्ञाता थे। यह उनकी विद्वत्ता का ही परिणाम था कि इंदिरा ने ज्ञानार्जन करने में अच्छी गति दिखाई। लेकिन शांति निकेतन में रहते हुए इंदिरा अपनी पढ़ाई पूरी न कर सकीं।
पंडित नेहरू इंदिरा की शिक्षा को लेकर बेहद चिंतित थे। काफी सोचने के बाद उन्होंने इंदिरा का दाखिला ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी (इंग्लैंड) में करवा दिया। इंदिरा ने अपना ध्यान पढ़ाई में लगाया। उन दिनों इंग्लैंड में ‘इंडिया लीग’ नामक एक संस्था थी जो भारत की आजादी के लिए निरंतर प्रयासरत थी।
इंदिरा में देशसेवा का प्रस्फुटन सालों पूर्व ही हो चुका था इस कारण वह भी इंडिया लीग की सदस्य बन गईं और उनके कार्यकलापों में अपना योगदान देने लगीं। वहां इंदिरा का परिचय पंडित नेहरू के मित्र कृष्ण मेनन (जो बाद में भारत के रक्षा मंत्री भी बने) से हुआ।
कृष्ण मेनन एक विद्वान व्यक्ति थे। उनका संबंध विश्व के अनेक ख्यातिनाम व्यक्तियों से था। मेनन के सान्निध्य से इंदिरा को यह लाभ हुआ कि वह विश्व के महान राजनीतिज्ञों और उनकी विचारधाराओं को समझने में सक्षम हो गईं लेकिन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से इंदिरा को कोई भी उपाधि नहीं प्राप्त हो सकी।
प्रथम विश्व युद्ध छिड़ चुका था। जर्मनी ने इंग्लैंड के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया था। मित्र देशों की सेनाएँ इंग्लैंड के साथ थीं लेकिन हिटलर का पलड़ा भारी था। ऐसे में इंदिरा का इंग्लैंड में रहना उचित नहीं था। समुद्री मार्ग पर भी खतरा था मगर समय पर भारत लौटना जरूरी था। और 1941 में इंदिरा भारत लौट आईं जबकि समुद्री मार्ग पर काफी खतरा बना हुआ था।
इंदिरा के बारे में कहा जाता है कि वह औसत दर्जे की स्टूडेंट थी। लेकिन अंग्रेजी भाषा पर इंदिरा की जबरदस्त पकड़ थी। दरअसल स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण पंडित नेहरु को अक्सर अंग्रेजों द्वारा जेल की सजाएं प्रदान की जाती थीं। तब वह अपनी बेटी इंदिरा को अंग्रेजी में लंबे-लंबे पत्र लिखते थे। इस पत्र का पढ़- पढ़कर इंदिरा ने अंग्रेजी भाषा में महारत हासिल कर ली थी।
जब देश में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन चल रहा था और विदेशी वस्तुओं की होलियाँ जलाई जा रहीं थीं तब बालिका इंदिरा भी किसी से पीछे नहीं रही। इंदिरा ने भी अपने तमाम विदेशी कपड़ों को आग लगा दी और खादी के वस्त्र धारण करने लगी।
जब इंदु को टोका गया कि तुम्हारी गुड़िया भी तो विदेशी हैं, तुम उनका क्या करोगी। तब इंदु ने बड़े प्यार से सहेजे गए उन खिलौनों को भी आग लगा दी। बेशक ऐसा करना कठिन था क्योंकि प्रत्येक खिलौने और गुड्डे गुड़िया से इंदिरा का एक भावनात्मक रिश्ता बन गया था जो एकाकी जीवन में उनका एकमात्र सहारा था।
1931 में जब मां कमला नेहरु को गिरफ्तार कर लिया गया था तब इंदिरा मात्र 14 वर्ष की बालिका थीं। पिता पहले से ही जेल में थे। इस दौरान दादा पंडित मोतीलाल नेहरु और पोती इंदिरा का काफी वक्त एक साथ गुजरता था। लेकिन दादा भी अपनी पोती को पर्याप्त समय नहीं दे पाते थे।
एक समय ऐसा भी आया जब अंग्रेजों ने पंडित मोतीलाल नेहरु को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया ऐसे में एकदम अकेली इंदिरा की मनोदशा की कल्पना सहज ही की जा सकती है।
जब शांतिनिकेतन में इंदिरा पढ़ाई कर रही थी तो इसी दौरान मां कमला नेहरू की तबियत ज्यादा खराब हो गई। इलाहाबाद पहुंचने पर इंदिरा ने अपनी मां की रुग्ण स्थिति देखी जो काफी चिंतनीय थी। भारत में उस समय टीबी का इलाज नहीं था। यह 1935 का वक्त था।
तब डॉ. मदन अटल के साथ इंदिरा अपनी मां को लेकर इलाज के लिए जर्मनी प्रस्थान कर गईं। पंडित नेहरू उस समय जेल में थे। चार माह बाद जब पंडित नेहरू जेल से रिहा हुए तो वह भी जर्मनी पहुंचे। कुछ दिनों के बाद पंडित नेहरू और इंदिरा कमला को स्विट्जरलैंड ले गए। वहां उन्हें लगा कि कमला के स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है। लेकिन यह तो दीपक के बुझने से पहले की लौ थी।
राजरोग को अपनी बलि लेनी थी और फरवरी 1936 में कमला नेहरू का निधन हो गया। 19 वर्षीया बेटी इंदिरा के लिए यह भारी शोक का वक्त था। इंदिरा में अवसाद के आरंभिक लक्षण नजर आने लगे थे।
तब पंडित नेहरू ने यूरोप के कुछ दर्शनीय स्थलों पर अपनी बेटी इंदिरा के साथ कुछ समय गुजारा ताकि बदले हुए परिवेश में वह अतीत की यादों से मुक्त रह सके। इसका असर भी हुआ। इंदिरा ने विधि के कर विधान को समझते हुए हालात से समझौता कर लिया।
1942 में उनका विवाह फिरोज गांधी से हुआ। उनके दो पुत्र हुए राजीव और संजय। बाद में राजीव गांधी भी भारत के प्रधानमंत्री बने। प्रेम की भावना का उदय इंदिरा के हृदय में भी हुआ था। पारसी युवक फिरोज गांधी से इंदिरा का परिचय उस समय से था जब वह आनंद भवन में एक स्वतंत्रता सेनानी की तरह आते थे।
फिरोज गांधी ने कमला नेहरू को माता का मान दिया था। जर्मनी में जब कमला नेहरू को इलाज के लिए ले जाया गया तब फिरोज मित्रता का फर्ज पूरा करने के लिए जर्मनी पहुंच गए थे। इंदिरा की लंदन से भारत वापसी का प्रबंध भी फिरोज ने ही एक सैनिक जहाज के माध्यम से किया था। दोनों की मित्रता इस हद तक परवान चढ़ी कि विवाह करने का निश्चय कर लिया।
ऐसा माना जाता है कि कमला नेहरू जीवित होतीं तो इस शादी को आसानी से स्वीकृति मिल जाती। लेकिन कमला नेहरू उनकी मदद करने के लिए दुनिया में नहीं थीं। इंदिरा चाहती थी कि उस शादी को पिता का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त हो लेकिन पंडित नेहरू ने बेटी से साफ कह दिया कि शादी को मंजूरी नहीं दी जा सकती। लेकिन इंदिरा की जिद कायम रही। अंत में नेहरू ने कहा कि यदि महात्मा गांधी अगर इस शादी के लिए सहमत होते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।
इंदिरा को लगा कि महात्मा गांधी को मनाना उनके लिए कठिन नहीं होगा। लेकिन इंदिरा की सोच के विपरीत महात्मा गांधी ने इस शादी के लिए इंकार कर दिया। गांधी का मानना था कि यह विवाह आगे चलकर सफल नहीं होगा क्योंकि वह कई मायनों में असमानता रखता था।
उन्होंने इंदिरा को समझाया कि जो विवाह संबंध धर्म, जाति, आयु और पारिवारिक स्तर में असमान हों वे सफल नहीं होते। यदि एक-दो अंतर हों तो भी बात मानी जा सकती थी। गांधी की अंतर्दृष्टि कह रही थी कि इंदिरा और फिरोज का विवाह असफल साबित होगा लेकिन इंदिरा कुछ भी समझने को तैयार नहीं थीं। तब गांधी ने नेहरू को विवाह के लिए स्वीकृति प्रदान कर दी। वह हर प्रकार से इंदिरा को समझाकर अपना दायित्व पूर्ण कर चुके थे।
महात्मा गांधी की ही सलाह पर इंदिरा का विवाह बिना किसी आडंबर के इलाहाबाद के शुभचिंतक और करीबी व्यक्ति के बीच संपन्न हुआ। यह विवाह 26 मार्च, 1942 को हुआ। उस समय इंदिरा की उम्र 24 वर्ष, 4 माह और 7 दिन थी।
वक्त गुजरा। इस बीच फिरोज गांधी लखनऊ और पंडित नेहरू दिल्ली शिफ्ट हो गए। इंदिरा की मुसीबत यह हो गई कि एक तरफ पति तो दूसरी तरफ पिता दोनों का ख्याल रखना उसके लिए मुश्किल हो रही थी। खैर, वह दिल्ली से लखनऊ के फेरे लगाती रहीं।
इस बीच राजीव और संजय के रूप में दो पुत्र को इंदिरा ने जन्म दिया। दोनों पुत्र राजीव और संजय भी त्रिमूर्ति भवन में अपने नाना के पास ही आ गए थे। फिरोज कुछ अंतराल पर बच्चों से भेंट करने के लिए आते रहे। लेकिन फिरोज के दिल में इस बात की चुभन जरूर थी कि इंदिरा को पत्नी के रूप में जिन कर्तव्यों की पूर्ति करनी चाहिए थी, वे बेटी के कर्तव्यों के सम्मुख दब गई हैं।
1952 के आम चुनाव में फिरोज को कांग्रेस का टिकट दिया गया और वह लोकसभा के लिए निर्वाचित भी हो गए। सांसद बनने के बाद कुछ समय तक वह त्रिमूर्ति भवन में ही रहे। लेकिन सांसद आवास मिलने के बाद फिरोज ने त्रिमूर्ति भवन छोड़ दिया। लेकिन इंदिरा चाहती थी, फिरोज त्रिमूर्ति भवन में ही रहें। यहीं से दोनों के दाम्पत्य जीवन में अलगाव शुरू हो गया। इंदिरा काफी महत्त्वाकांक्षी थीं। उनके भी भविष्य के कुछ सपने थे।
इस तरह से फिरोज पत्नी और बच्चों से दूर होते चले गए। फिरोज के दिल में पत्नी इंदिरा से ज़्यादा नाराजगी और कड़वाहट अपने ससुर पंडित नेहरू के प्रति थी। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण उस समय देखने को मिला जब फिरोज ने संसद में ही पंडित नेहरू की आलोचना शुरू कर दी।
फिरोज गांधी का यह गैरज़िम्मेदाराना व्यवहार रिश्तों की डोर को कमजोर करने वाला साबित हो रहा था। किसी तरह से वक्त गुजरता गया। दोनों बच्चे बड़े हो गए। राजीव और संजय देहरादून के प्रसिद्ध स्कूल ‘दून’ में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। फिरोज अधिक मदिरा सेवन के कारण अस्वस्थ रहने लगे। उन्हें हृदय रोग ने जकड़ लिया था।
1960 में तीसरी दफा दिल का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई। उस समय इंदिरा की उम्र 43 वर्ष थी। हालांकि अंतिम समय में वह अपने पति के पास मौजूद थीं। इंदिरा के लिए यह कठिन समय था। पंडित नेहरू ने इस कठिन वक्त में धैर्य बंधाया और पूरा ख्याल रखा।
हालांकि फिरोज की मौत से पहले ही इंदिरा सक्रिय राजनीति में कदम रख चुकीं थीं। कांग्रेस पार्टी की कार्यकारिणी में इनका चयन 1955 में ही हो गया था। वह कांग्रेस संसदीय मंडल की भी सदस्य रहीं।
पंडित नेहरू इनके साथ राजनीतिक परामर्श करते और उन परामर्शों पर अमल भी करते थे। 1957 के आम चुनाव के समय पंडित नेहरू ने जहां लालबहादुर शास्त्री को कांग्रेसी उम्मीदवारों के चयन की ज़िम्मेदारी दी थी, वहीं इंदिरा गांधी का साथ शास्त्री जी को प्राप्त हुआ था।
शास्त्री जी ने इंदिरा गांधी के परामर्श का ध्यान रखते हुए प्रत्याशी तय किए थे। लोकसभा और विधानसभा के लिए जो उम्मीदवार इंदिरा ने चुने थे, उनमें से लगभग सभी विजयी हुए और अच्छे राजनीतिज्ञ भी साबित हुए।
इंदिरा गांधी को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने के आरोप उस समय पंडित नेहरू पर भी लगे थे। 1959 में जब इंदिरा को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तो कई आलोचकों ने दबी जुबान से पंडित नेहरू को पार्टी में परिवारवाद फैलाने का दोषी ठहराया था।
इंदिरा गांधी 16 वर्ष देश की प्रधानमंत्री रहीं और उनके शासनकाल में कई उतार-चढ़ाव आये। लेकिन 1975 में आपातकाल लागू करने के फैसले को लेकर इंदिरा गांधी को भारी विरोध-प्रदर्शन और तीखी आलोचनाएं झेलनी पड़ी थीं।
आलोचकों ने इसे लोकतंत्र और मीडिया पर हमला बताया और कहीं न कहीं भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि भी प्रभावित हुई। जाने माने इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा अपने एक लेख में इंदिरा गांधी के दर्शन को बड़े ही सहज अंदाज में समझाने की कोशिश की है।
गुहा लिखते हैं, साल 1965 की गर्मियों में इंदिरा गांधी दिल्ली से लंदन शिफ्ट होने की सोच रही थीं। उस समय वह प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में कनिष्ठ मंत्री थीं। शास्त्री उनके पिता जवाहरलाल नेहरू के बाद प्रधानमंत्री बने थे।
राजनीति में उनकी तरक्की की गुंजाइश क्षीण थी और वह निजी कारणों से भी इंग्लैंड को पसंद करती थीं। उनके बेटे राजीव और संजय ब्रिटेन में ही पढ़ाई कर रहे थे और इसके अलावा वह लंदन में कला और संस्कृति में अपनी रुचि को भी बढ़ा सकती थीं। लेकिन अंततः उन्होंने अपने देश में ही ठहरने का फैसला किया और इसका उन्हें बेहद अप्रत्याशित फल भी मिला।
जब जनवरी 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की हृदयाघात से ताशकंद में मौत हुई तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने को कहा गया। कहते हैं कि यह फैसला कांग्रेस पार्टी का संचालन करने वाले कुटिल बुजुर्गों के समूह ‘सिंडिकेट’ ने किया था।
उनका अनुमान था कि नेहरू की बेटी को आगे करने से अल्पकाल में दो प्रधानमंत्रियों की मौत के बाद देशवासियों को अपने साथ करना आसान रहेगा। इसके अलावा, उनके अनुसार वह इतनी नौसिखिया थीं कि उन्हें अपने हिसाब से चलाना आसान रहेगा।
लेकिन पद संभालने और शुरुआती झिझक के बाद इंदिरा गांधी में गजब का आत्मविश्वास आ गया। 1967 के चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी में अंतर्कलह मची हुई थी। इस बीच चुनाव संपन्न हुए और केंद्र में कांग्रेस बेशक सत्ता में आ गई लेकिन कई राज्यों में उसकी स्थिति काफी खराब हो गई थी।
राज्यों की यह हालत केंद्र में कांग्रेस पार्टी की अंतरकलह की वजह से हुई। इंदिरा गांधी पुन: प्रधानमंत्री बन गई लेकिन सिंडीकेट का पराभव लंबे समय तक नहीं चला। के. कामराज और एस.के. पाटिल उप चुनावों के माध्यम से विजयी होकर सांसद बन गए।
उन्होंने मोरारजी देसाई को अपने साथ मिलाकर सिंडीकेट को पुन: मजबूत बना लिया। सिंडीकेट ने दावा किया कि कांग्रेस का प्रधानमंत्री पार्टी से ऊपर नहीं है और पार्टी की नीतियों के अनुसार ही प्रधानमंत्री को शासन करने का अधिकार होता है।
1967 के अंत में के. कामराज का अध्यक्षीय कार्यकाल समाप्त होना था। इंदिरा गांधी को यह उम्मीद बंधी कि पार्टी का नया अध्यक्ष पद निजलिंगप्पा के सुपुर्द हो गया। सिंडीकेट ने तय कर लिया कि इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटाकर सिंडीकेट के किसी वफादार व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त किया जाए।
मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री बनने के लिए अपनी रजामंदी भी दे दी। इंदिरा गांधी भी खतरे को भांप चुकी थी। मई 1967 में जब डॉ. जाकिर हुसैन की राष्ट्रपति पद पर कार्यकाल के दौरान मृत्यु हो गई तो नए राष्ट्रपति के चुनाव ने यह भूमिका बनाई कि इंदिरा गांधी आर-पार की लड़ाई लड़ सकें। तब सिंडीकेट ने नए राष्ट्रपति के रूप में नीलम संजीव रेड्डी का नाम प्रस्तावित किया। फिर कांग्रेस की ओर से उनका नामांकन भी कर दिया गया।
सिंडीकेट चाहती थी कि रेड्डी के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद इंदिरा को प्रधानमंत्री पद छोड़ने के लिए विवश कर दिया जाए। इंदिरा को सिंडीकेट की इस चाल का पूर्वानुमान था। उन्होंने तत्कालीन उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि को राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में खड़ा कर दिया।
इससे जनता के मध्य उनकी छवि खंडित हुई कि वह पार्टी के विरुद्ध जा रही हैं। लेकिन इंदिरा गांधी को यह पता था कि उन्हें आगे क्या करना है। लिहाजा उन्होंने मोरारजी देसाई से वित्त मंत्रालय वापस ले लिया।
अब इंदिरा गांधी ने वित्त मंत्रालय अपने पास रखते हुए कई आर्थिक कार्यक्रम चलाए। उन्होंने देश के महत्त्वपूर्ण 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया ताकि वे सरकार की आर्थिक नीति के अनुसार आचरण कर सकें।
12 नवंबर, 1967 को इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए पार्टी से निष्कासित कर दिया। इस प्रकार वे उन्हें प्रधानमंत्री पद से अपदस्थ करना चाहते थे। जो व्यक्ति पार्टी की सदस्यता से निष्कासित हो चुका हो, वह उस पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री कैसे रह सकता था?
इसके जवाब में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी को विभाजित कर दिया। उन्होंने अपनी कांग्रेस को कांग्रेस-आर (रिक्विसिशनिस्ट) करार दिया जबकि सिंडीकेट की कांग्रेस को कांग्रेस-ओ (आर्गेनाइजेशन) नाम प्राप्त हो गया।
इंदिरा की पार्टी में सिंडीकेट की पार्टी से ज़्यादा सदस्य संख्या थी। इस कारण वह प्रधानमंत्री, साथ ही अपनी पार्टी की अध्यक्ष भी बनी रहीं। इंदिरा अब सिंडीकेट से पूरी तरह मुक्त हो जाना चाहती थीं। इसके लिए यह जरूरी था कि वह पुन: जनादेश लें और नई पार्टी अध्यक्ष के रूप में चुनाव सभा में जाएं।
मध्यावधि चुनाव की घोषणा करने से पूर्व इंदिरा ने कुछ ऐसे कार्यों को संपादित किया जिससे चुनावों के दौरान उन्हें लाभ मिल सके। चुनाव से पूर्व इंदिरा ने अपना आभामंडल तैयार किया और 27 दिसंबर, 1970 को लोकसभा भंग करके मध्यावधि चुनाव का मार्ग प्रशस्त कर दिया। एक वर्ष पूर्व लोकसभा भंग करने का उनका निर्णय साहसिक था।
इंदिरा मध्यावधि चुनाव भी करवा सकती हैं, विपक्ष को इसका अंदाजा नहीं था। लोकसभा भंग होने की घोषणा ने उन्हें भौचक्का कर दिया। उन्होंने न तो कोई तैयारी की थी और न ही कोई व्यूह रचना बनाई थी।
ऐसी स्थिति में विपक्ष इस कसौटी पर खरा नहीं उतर सका और संगठनवादी कांग्रेस के पास भी कोई मुद्दा नहीं था। इस कारण विपक्ष ने जहां ‘कांग्रेस हटाओ’ का नारा दिया, वहीं संगठन कांग्रेस ने इंदिरा हटाओ को ही अपनी चुनावी मुहिम का मुख्य मुद्दा बना लिया लेकिन जनता ठोस कार्यों की कार्ययोजना चाहती थी।
तब इंदिरा ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे के साथ समाजवादी सिद्धांतों के अनुरुप चुनावी घोषणा पत्र तैयार कराया। ‘गरीबी हटाओ’ का नारा हिट हो गया इंदिरा की पार्टी को 518 में से 352 सीटें हासिल हुईं।
इस प्रकार से इंदिरा ने खुद को ‘सिंडिकेट’ से आजाद कर लिया और उन्हें प्रतिक्रियावादियों के धड़े के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि वह खुद उस वक्त की प्रगतिशील ताकतों की प्रतिनिधि थीं।
1974 में जाने-माने गांधीवादी जयप्रकाश नारायण ने सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चलाया। जून 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी गड़बड़ी का दोषी पाया।
इंदिरा गांधी ने राजनीतिक और न्यायिक स्तर पर उठी इन चुनौतियों का जवाब आपातकाल लगाकर दिया। प्रेस को सेंसर कर दिया गया और विपक्ष के सैकड़ों नेताओं को जेल में डाल दिया गया।
आपातकाल जनवरी 1977 तक जारी रहा। मार्च में हुए चुनाव में चार अलग-अलग दलों से बने गठबंधन जनता पार्टी ने कांग्रेस को उखाड़ फेंका। जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को 542 में से 330 सीटें प्राप्त हुईं। इंदिरा गाँधी की पार्टी मात्र 154 स्थानों पर ही विजय प्राप्त कर सकी। इंदिरा ऐसी प्रधानमंत्री रहीं जो अपनी सीट तक नहीं बचा पाईं। इनके पुत्र संजय गांधी को भी हार का सामना करना पड़ा।
हालांकि, नई सरकार तीन साल से भी कम वक़्त तक चली और अपने ही अंतर्विरोधों के चलते गिर गई। 1980 में इंदिरा गांधी और कांग्रेस की ‘स्थायित्व’ के नाम पर फिर सत्ता में वापसी हो गई। इंदिरा कांग्रेस को 592 में से 353 सीटें प्राप्त हुईं और स्पष्ट बहुमत के कारण केंद्र में इनकी सरकार बनी। इंदिरा पुनः प्रधानमंत्री बन गईं।
23 जून, 1980 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी की प्लेन क्रैश में मौत हो गई। इस हादसे ने इंदिरा को तोड़कर रख दिया। तब राजीव गांधी ने पायलट की नौकरी छोड़कर संजय की कमी पूरी करने का प्रयास किया। हालांकि राजीव ने यह फैसला दिल से नहीं किया था।
इसका कारण यह था कि उन्हें राजनीति के दांवपेच नहीं आते थे। इंदिरा के चौथे कार्यकाल के पहले दो साल तो शांत रहे, लेकिन अचानक उनके सामने कश्मीर, असम और पंजाब आतंकवाद की आग में झुलसने लगा। दक्षिण भारत में भी सांप्रदायिक दंगों का माहौल पैदा होने लगा।
पंजाब में भिंडरावाले के नेतृत्व में अलगाववादी ताकतें सिर उठाने लगीं और उन ताकतों को पाकिस्तान से हवा मिल रही थी। पंजाब में भिंडरावाले का उदय इंदिरा गांधी की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के कारण हुआ था।
अकालियों के विरुद्ध भिंडरावाले को स्वयं इंदिरा गांधी ने ही खड़ा किया था। लेकिन भिंडरावाले की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं देश को तोड़ने की हद तक बढ़ गई थीं। जो भी लोग पंजाब में अलगाववादियों का विरोध करते थे, उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता था।
भिंडरावाले को ऐसा लग रहा था कि अपने नेतृत्व में पंजाब का अलग अस्तित्व बना लेगा। यह काम वह हथियारों के बल पर कर सकता है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इंदिरा गांधी शक्ति के बल पर समस्या का समाधान नहीं करना चाहती थीं। वह पंजाब के अलगाववादियों को वार्ता के माध्यम से समझाना चाहती थीं। लेकिन भिंडरावाले ने इंदिरा की एक न सुनी।
3 जून, 1984 को भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर पर घेरा डालकर भिंडरावाले और उसके समर्थकों के विरुद्ध निर्णायक जंग लड़ने का निश्चय किया। सरेंडर न किए जाने पर 5 जून, 1984 को भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर में प्रवेश किया।
ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार नाम से यह ऑपरेशन कामयाब रहा। भिंडरावाले और उसके कट्टर समर्थकों की मौत के घाट उतार दिया गया। और स्वर्ण मंदिर को आतंकवादियों से मुक्त करा लिया गया। तब इंदिरा गांधी को गुप्तचर संस्था ‘रॉ’ ने आगाह किया था कि सिखों में ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार अभियान से भारी रोष है और उन्हें अपनी सुरक्षा में सिखों को स्थान नहीं देना चाहिए।
लेकिन इंदिरा ने रॉ की सलाह पर ध्यान नहीं दिया। इसकी परिणति यह हुई कि 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की उनके ही सिख सुरक्षा गार्डों ने गोलियों से छलनी कर दिया। इंदिरा की मौके पर ही मौत हो गई।
प्रधानमंत्री रहते इंदिरा पर जो सबसे गंभीर आरोप लगते रहे उनमें सबसे बड़ी है सार्वजनिक संस्थाओं को विकृत करना। नेहरू के समय में अफसरशाही और न्यायपालिका को राजनीतिक दखलंदाजी से अलग रखा गया था।
नियुक्ति, तैनाती और तरक्की मेहनत और क्षमता के आधार पर तय होती थी। इंदिरा गांधी ने एकदम जुदा और बेहद नुकसानदेह) चलन शुरू किया। मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री अधिकारियों की तैनाती रिश्तेदारी या वफादारी के आधार पर करते थे।
इस तर्ज पर जिन संस्थाओं को बर्बाद किया गया उनमें से एक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी थी। पंडित नेहरू के समय में कांग्रेस सचमुच एक विकेंद्रीकृत और लोकतांत्रिक पार्टी थी, जिसमें जिला और राज्य समितियों का चयन पार्टी के आंतरिक चुनाव के आधार पर होता था।
मुख्यमंत्री का चयन राज्य के चुने हुए विधायक करते थे। लेकिन इंदिरा गांधी ने इसके विपरीत कांग्रेस को अपना ही एक रूप बनाने के लिए लगातार काम किया। पार्टी के आंतरिक चुनाव बंद कर दिए गए। मुख्यमंत्री का चयन सिर्फ वही करती थीं. लेकिन यह सब यहीं तक सीमित नहीं था।
चूंकि इंदिरा गांधी जानती थीं कि वह अमर नहीं हैं और क्योंकि वह अपने अलावा किसी और पर पूरी तरह से भरोसा भी नहीं कर सकती थीं, इसलिए वह अपने बेटों को भी राजनीति में ले आईं।
1976 से संजय गांधी उनके नजदीक रहकर काम करते रहे। यह माना जाने लगा था कि जब वह रिटायर होंगी या उनकी मौत होगी तो संजय उनकी जगह लेंगे। जब जून 1980 में संजय की असमय मृत्यु हो गई तो इसी विचार के साथ उनके बड़े भाई राजीव को राजनीति में लाया गया। और इस तरह से कांग्रेस के एक पारिवारिक व्यवसाय के रूप में बदलाव का अन्य पार्टियों ने भी अनुसरण किया।
यह मानना संभव नहीं कि इंदिरा गांधी ने अकाली दल या द्रमुक को यह राह नहीं दिखाई थी। उसके बाद लालू, मुलायम समेत कई नेताओं ने राजनीति में परिवारवाद की परंपरा को आगे बढ़ाया।
इंदिरा की विदेश नीति : अप्रैल 1966 में इंदिरा गांधी ने अमेरिका की सरकारी यात्रा की। इसका उद्देश्य यह था कि अमेरिका पी.एल. 480 के अंतर्गत भारत को गेहूं एवं मौद्रिक सहायता प्रदान करे।
अमेरिका ने 35 लाख टन गेहूं और लगभग एक हजार मिलियन डॉलर की आर्थिक सहायता करने की पेशकश रखी। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉनसन चाहते थे कि इसके बदले में भारत अमेरिका के पक्ष में बयान जारी करके उत्तरी वियतनाम युद्ध को उचित ठहराए।
अमेरिकी राष्ट्रपति को पूरी उम्मीद थी कि कठिन समय से जूझते भारत द्वारा उसकी युद्ध नीति की वकालत जरूर की जाएगी। लेकिन जब अमेरिका की यह उम्मीद पूरी नहीं हुई तो अमेरिका ने भी भारत की सहायता के लिए दिए गए अपने पूर्व वचन को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
जब इंदिरा को यह विश्वास हो गया कि अमेरिका सशर्त सहायता करना चाहता है तो उन्होंने अमेरिकी युद्ध नीति की तीव्र भर्त्सना की और उत्तरी वियतनाम पर अमेरिकी हमले को संयुक्त राष्ट्र संघ की नीतियों के विरुद्ध बताया। अमेरिका को भारत से ऐसी तीखी आलोचना की उम्मीद नहीं थी।
लिहाजा अमेरिका से मदद का रास्ता बंद हो गया। इंदिरा ने भी समझदारी दिखाते हुए सोवियत संघ की ओर मैत्री का हाथ बढ़ा दिया। यही उस समय की विदेशी नीति और कूटनीति की मांग थी।
समस्त विश्व दो महाशक्तियों के समर्थन में बंटा हुआ था। एक खेमा अमेरिका का था और दूसरा सोवियत संघ का। इस प्रकार पूरी दुनिया दो गुटों में बंट गई थी लेकिन भारत की विदेशी नीति का आधार गुटनिरपेक्षता था। इसलिए इंदिरा गांधी ने इस नीति पर कायम रहते हुए सोवियत संघ से मित्रता की उम्मीद रखी।
1966 के जुलाई में इंदिरा गांधी ने सोवियत संघ की यात्रा की। तब उन्होंने सोवियत संघ के साथ एक संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर किया जिसमें अमेरिका की निंदा करते हुए उत्तरी वियतनाम पर किए गए हमले को साम्राज्यवादी नीति का हिस्सा बताया गया था।
इस वक्तव्य में यह भी मांग की गई थी कि अमेरिका अविलंब तथा बिना किसी शर्त के उत्तरी वियतनाम में युद्ध बंद करे। युद्ध विराम की वकालत करते हुए भारत ने स्पष्ट कर दिया कि वह अमेरिका के खेमे में रहने को इच्छुक नहीं है। इस वक्तव्य के बाद भारत और सोवियत संघ की मैत्री को नया आयाम मिला।
इसके अतिरिक्त इंदिरा गांधी ने वक्त की जरूरत को देखते हुए यह भी समझ लिया कि गुटनिरपेक्ष देशों के संगठन को अधिक मजबूत बनाने की जरूरत है ताकि किसी भी संकट को आपसी सहयोग और राजनीतिक इच्छा शक्ति से दूर किया जा सके।
इस दौरान मिस्र और यूगोस्लाविया के साथ भी भारत के मैत्री संबंध विकसित हुए। दोनों देशों के राष्ट्रध्यक्ष क्रमश: अब्दुल नासिर और जोसेफ टीटो ने भी दिल्ली में आयोजित गुटनिरपेक्ष देशों के सम्मेलन में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। इस प्रकार से एक स्वतंत्र विदेश नीति द्वारा भारत ने अपनी विशिष्ट छवि बनाई।




